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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

३९८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
को लेकर विजय ने शत्रु की ओर उसका प्रक्षेपण किया था और वह
शक्ति सुदर्शन के हृदय में प्रवेश कर गयी थी ।
वह विह्वल होकर नीचे की ओर मुख वाला रथ के ही समीप में
बैठ गया था । उस नृप सुदर्शन के मोह को प्राप्त हो जाने पर उसके
आगे की ओर तथा पार्श्व में ही वहाँ पर जो सैनिक स्थित थे, हे
द्विजोत्तमो ! राजा ने एक ही क्षण भर में उन सबको मार गिराया था ।
दश हजार रथों को, और उतने ही हाथियों को, बड़े वेग वाले अश्वों
की बीस हजार संख्या और दो लाख पदातियों को क्षण भर में मार
गिराया था । इसके उपरान्त होश में आकर तथा सुदृढ़ धनुष लेकर
सुदर्शन ने विजय के ऊपर शरों की वर्षा की थी । उसके सज्य कार्मुक
को भाले के द्वारा उसी क्षण में छिन्न कर दिया था और सारथी का शिर
काया से दूर कर दिया था और इसके चार अश्वों को मृत्यु के मुँह में
भेज दिया था । इसके अनन्तर बिना रथ वाले राजा को दश कंकपत्रों
के द्वारा विद्ध कर दिया था ।
सुदर्शन ने हृदय में वेधन कर फिर गर्जना की थी । वह कटे हुए
धनुष वाले और बिना रथ वाले होकर वेग से युक्त ने गदा का आदान
किया था । विजय की इच्छा वाले विजय ने सुदर्शन पर धावा किया
था । सुदर्शन ने ऊपर से पतन करने वाले महान् वीर पर बाणों की वर्षा
की थी जैसे वर्षा ऋतु में बादल पर्वत पर वर्षा किया करता है । विजय
ने उन बाणों को अपने शरों से प्रच्छादित करके गदा से उसी क्षण में
रथ पर समारूढ़ हुए उसके समीप में समाधान किया था । उस महान्
वीर्य वाले के पास पहुँचकर सुदर्शन के शिर में प्रहार करके उसको
भूमि पर गिरा दिया था । जिस प्रकार से वज्र के द्वारा विदीर्ण किया
गया पर्वत का ऊँचा शिखर गिरा करता है । उस वीर के गिर जाने पर
उसकी सेना के सैनिक उस युद्ध स्थल से डर से भयभीत होते हुए
दिशा-विदिशाओं में भाग गए थे । उसकी सेना के सैनिकों के नष्ट हो
जाने पर विजय ने खाण्डवी नाम वाली नगरी में प्रवेश किया था ।
उसने नगरी में प्रवेश करके वहाँ पर एकत्रित पर्वतों की ही

ൠൠ श्रीकालिका पुराण ൠൠ ३९९
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
राशिभूत सुवर्णों की तथा रत्नों के ढेरों को बहुत तादाद में देखा था ।
वहाँ पर खिले हुए कमलों वाले सरोवरों को देखा था । जो हंसों के
नाद से सभी ओर से युक्त थे । पर्वतों के ही समान सुवर्ण और रत्नों
के ढेरों को देखा था, घूमते हुए भौरों से विभूषित और पुष्पित देव वृक्षों
को देखा था जो प्रस्फुट और सुन्दर गन्ध से युक्त प्रत्येक घर में
व्यवस्थित थे । शत्रुओं का हनन करने वाली विजय से राजा के नेत्र
प्रफुल्लित हो गए थे । उसने उस नगरी को भूमि पर समागत अमरावती
ही माना था । उस परम सुन्दर नगरी को देखते हुए राजा के पास
सुरेश्वर ने आकर परम तीक्ष्ण वाणी से उसको सान्त्वना देते हुए विजय
से कहा था ।
इन्द्रदेव ने कहा- हे राजन्! यह महावन देवगणों से समावृत था ।
यह गन्धर्व, यक्ष और मुनियों से समावृत और परम मनोहर था । राजा
सुदर्शन ने देव आदि सबको यहाँ से उत्सारित करके मेरे अप्रिय कार्य
करने में रत होता हुआ उसने इन वन का भंग करके गुह्य तपोधन को
उत्साहित करके राजा ने हठ से खाण्डवी नगरी की रचना की थी । हे
नरोत्तम! आप पुनः इसको उत्तम वन बना दीजिए । वहाँ पर मैं तक्षक
के साथ एकान्त में विहार करूँगा । यह आपके प्रसाद से मुनिगणों के
तपश्चर्या करने का अनुपम स्थान होगा । हे पार्थिव! यह यक्षों का और
किन्नरों का भी उत्तम स्थान हो जायगा ।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-उस समय इन्द्रदेव के इस वचन को
विजय ने श्रवण करके इन्द्रदेव के गौरव से उस खाण्डवी नगरी को
विस्तृत वन ही बना दिया था । समस्त प्रजाजन अपनी इच्छा के अनुसार
यथास्थान गमन कर जायें । जिन लोगों की पुनः मेरे राज्य में गमन
करने की इच्छा होवे वे वाराणसी में गमन कर जावें जो कि मेरे द्वारा
ही प्रतिपादित पुरी है । इसके उपरान्त मनुष्यों ने उसके वचन का श्रवण
किया और कुछ लोग अपने ही स्थान को गमन कर गए । और कुछ
लोग विजय नृप के द्वारा अभिपालिता वाराणसी में चले गए । इसके
अनन्तर धनों की तथा रत्नों की तथा राशियों को अलग-अलग और

४०० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
मणियों, कनकों और पुरुषों की राशियों को विजन ने अंक साधनों के
द्वारा वाराणसी नगरी की ही ओर वारित करा दिया था ।
विजय ने तुरन्त ही तीस योजन विस्तीर्ण एवं सौ योजन आयत उस
पुरी को वन बना दिया था । उस वन में इन्द्रदेव की सम्मत्ति से अपने
गणों के साथ तक्षक ने निवास किया था । वहाँ पर तक्षक बहुत समय
तक रहा था और फिर वह निर्धन बन गया था । वहाँ पर गन्धर्वों के
साथ देवगण और अप्सराओं के समुदाय आनन्द की क्रीड़ा किया करते
हैं । वे सब युद्धों में विजय प्रदान करने वाले विजय की चर्चा किया
करते हैं । अट्ठाईसवाँ युग के प्राप्त होने पर द्वापर के शेष में वह्नि ने
विष्णु से ब्राह्मण के रूप से भिक्षा की याचना की थी । पाण्डु के सुत
द्वारा भिक्षा देने की स्वीकृति दे दी गई थी ।
वह्नि ने अपने स्वरूप में स्थित होकर विष्णु से यह वचन कहा था,
हे पाण्डु पुत्र! मैं अग्नि हूँ, यज्ञ भागों के अभिभाजन से मैं व्याधित हो
रहा हूँ । अब आप ही मेरी व्याधि का विनाश कीजिए । खाण्डव नाम
वाला विपिन है जो पक्षी-मृग और राक्षसों से समन्वित है । हे श्वेत
वाहन! यदि आप मुझको भोजन कराने में समर्थ है तभी मेरी यह व्याधि
शीघ्र ही नष्ट हो जायगी । पहले समय में विजय नाम वाले नृप ने
खाण्डवी नाम की उस पुरी को भंग करके इसको वन बना दिया था ।
इसी कारण से यह खाण्डव वन है । हे श्वेत वाहन! वह देवों के द्वारा
विहित वन मेरे ही लिए था । इन्द्रदेव के विरोध से मैं स्वयं इसका भोग
करने का उत्साह नहीं करता हूँ । हे महाभाग! इसी कारण से आप
परित्राण करिए और उस वन में नियोजन कीजिए । जिस रीति से मैं
सम्पूर्ण का भोग करने के लिए आपके प्रसाद से मैं समर्थ हो सकता
हूँ । महान् बलवान् सव्यसाची ने उसके इस वचन का श्रवण करके उस
सम्पूर्ण वन को जो कि प्राणियों से समन्वित था, दग्ध कर दिया था ।
यह देवकी के आत्मज भगवान् वासुदेव के द्वारा पालित है । अग्नि
के हित करने से रति रखने वाले ने उस खाण्डव वन को जला दिया
था । परम प्रसन्न होकर वह्नि ने इसी कारण से महात्मा अर्जुन को

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४०१
गाण्डीव धनुष जो देवों द्वारा निर्मित और वारुण था, प्रदान किया था
और अक्षय, दिव्य औषधियाँ दी थीं और सुरूप से संयुत चार अश्व,
हनुमानजी से अधिष्ठित वानर ध्वजा वाला महान् रथ, खंड, वीक्षण
त्रिशिख अग्नि से सव्यसाची (अर्जुन) को दिए थे । तथा विष्णु के
प्रसाद से वह्नि रोग से रहित हो गया था । फाल्गुन (अर्जुन) ने उन
बाणों से, उस धनुष से, खंड से, केतु से उन अश्वों वाले रथ से शत्रुओं
पर विजय प्राप्त की थी । इस प्रकार से भैरव के वंशों में विजय नृप
जो महाआकृति वाला था उसने खाण्डव को विपिन कर दिया था ।
विजय राजा के महान् बल वाले तेरह पुत्र हुए थे । उनके नाम
द्युतिमान, सौम्यदर्शी, भूरि, प्रद्युम्न, ऋतु-पुण्य, विरुपाक्ष, विक्रान्त,
धनञ्जय, प्रहर्ष, प्रबल, केतु और उपरिधर थे ।
इन सबका राजा वीर हुआ था जो शेषोपरिचर था जिसने
वाराणसी नगरी में पहले एक लाख यज्ञ किए थे । एक लाख यज्ञों के
करने वाला कोई भी नहीं हुआ था और न भविष्य में भी होगा । इसके
पुत्र, पौत्र, प्रपौत्रों से ही यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है । भूमण्डल में ऐसा
कौन-सा मनुष्य है जो बहुत लम्बे समय में भी उनकी गिनती कर सकता
हो । अर्थात् ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं है । क्रम से भैरव के वंश से यह
तीनों लोक व्याप्त हो रहे हैं । हे विप्रों! यह मैंने आपके समक्ष में भैरव
की सन्तति का वर्णन कर दिया है । जो एकाग्र मन से उत्तम चरित्र का
श्रवण करता है उसके वंश का विच्छेद कभी भी नहीं हुआ करता है
और न होगा ही ।
श्री भगवान ने कहा-हे भैरव मैं अब सोलह उपचारों का वर्णन
करता हूँ । उनका आप श्रवण कीजिए । जिनसे देवी भली भाँति से
सन्तुष्ट हुआ करती है और अन्यदेव भी परम प्रसन्न होते हैं । सबसे
प्रथम आसन देना चाहिए । यह आसन या कौश हो । उसे खण्डल के
उत्तर की ओर ही सृजन करना चाहिए । जिस समय में यह पद्य में दिया
जाता है उसे मण्डल के उत्तर में ही देवे । अर्घ्य, पाद्य, आचमन,
स्थानीय, नेत्ररञ्जन, मधुपर्क, गन्ध और पुष्प निवेदित करे । और

४०२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
प्रतिमाओं में देने के लिए जो भी योग्य हो वह तनु में देना चाहिए ।
पौष्य जो होता है वह पुष्यों के समुदाय से रचित हुआ करता है और
कुश तथा सूत्र आदि से संयुक्त होता है । हे भैरव ? यह देवी का, मेरा
और समुद्भूत आसन मसृण और शुभ हुआ करता है ।
आसन के प्रकार और भेद
आसन ऐसा होना चाहिए जो बहुत ऊँचा न हो, न बहुत विस्तृत
होना चाहिए । ऐसे ही आसन को निवियोजित करे । अन्य लकड़ी से
बनाया हुआ भी उत्तम देवे । वह आसन दारु (काष्ठ) के सार रहित
तथा काँटों से युक्त एवं क्षीर से संयुक्त, चैत्य शमशान से समुत्पन्न और
विभीतक को छोड़कर ही काष्ठ का आसन बनाना चाहिए । वस्त्र के
आसन के लिए वल्कल (वृक्ष की छाल), कोषज और शाण अर्थात्,
ये ही तीन आसन माने गए हैं । रोमज अर्थात् रोमों से बनाया हुआ
कम्बल, ये चार होते हैं । अपने इष्टदेव की मूर्ति के लिए इसके द्वारा
विरचित आसन ही देना चाहिए । सिंह, व्याघ्र, तीक्षण, छाग, महिष,
गज, तुरंग, कृष्णास्मर, ये मृगों के नौ भेद हैं । इनके चर्मों के द्वारा
आसन बनाया जाया करता है जो सभी देवों के लिए हुआ करता है ।
चर्म के आसन में तुरंग के चर्म का आसन श्रेष्ठ होता है तथा काष्ठ के
आसनों में चन्दन का श्रेष्ठ माना गया है । सभी देवों का संयुत आत्म
वाले ऋषियों का योगपीठ के सदृश आसन तथा स्थान कहा जाता है ।
देवों के लिए आसन के समर्पण से परम सौभाग्य और मुक्ति की
प्राप्ति की जाया करती है । मृग नौ प्रकार के माने गए हैं । अर्थात्
निम्नांकित इनके नौ भेद होते हैं, शम्बर, रोहित, राम, न्यंक, अंकु,
शशा, रूरू, राण और हिरण, ये नौ भेद हैं । हे भैरव! हरिण भी यहाँ
पर पाँच भेदों वाला समझना चाहिए । ऋष्य, शृंग, रूरू, पृषत, तथा
मृग, ये बलि के प्रदान करने में तथा चर्म दान में कीर्त्तित किए गए हैं ।
धातु के आसनों में केवल लौह को छोड़कर काँसा, सीमा, शिलामय,
मणिमय, ये रत्नमय माने गये हैं । देवताओं के लिए आसन मुक्ति

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४०३
अर्थात् साँसारिक सुखों के उपभोग और मुक्ति अर्थात् साँसारिक
बन्धनों से छुटकारा पाने के लिए उपभोग और समुत्सृजित करना
चाहिए । हे भैरव! और यहाँ पर ही साधना करने वालों के आसनों के
विषय में भी श्रवण कर लीजिए । जिन पर बैठकर अभ्यर्चन करता
हुआ सब प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर लिया करता है । साधकों
के लिए चार प्रकार के आसन निरन्तर बताये गए हैं, ऐन्धन ( काष्ठक ),
चार्मण, ( चमक ), वास्त्र ( वस्त्र का ), और तेजस अर्थात् धातु निर्मित ये
चार हैं । साधक को पूजा के कर्म में वे सभी आसन प्रशस्त होते हैं ।
बुध पुरुष को चाहिए कि सर्वदा काष्ठ आदि का आसन ही रखे ।
काष्ठ का आसन चौबीस अंगुल प्रमाण वाला दीर्घ होना चाहिए, यही
शास्त्र सम्मत होता है । सोलह अंगुल के विस्तार से युक्त और चार
अंगुल ऊँचाई वाला होना चाहिए, अथवा छः अंगुल ऊँचा करे । इससे
ऊँचा कभी न करे । आसन दो हाथ से बड़ा नहीं होना चाहिए और डेढ़
हाथ से अधिक विस्तृत नहीं हो । तीन. अंगुल से ऊँचा आसन कभी भी
पूजा के कर्म में संश्रित करना चाहिए । चर्म का आसन जितना भी
अभीष्ट हो करे । पूर्व में वर्णित आसन सिद्धि का प्रदान करने वाला
हुआ करता है । छः अंगुल से ऊँचा कभी भी नहीं करना चाहिए ।
कम्बल का आसन तथा चर्म का आसन और शैल अर्थात् शिला का
आसन महामाया के प्रकृष्ट पूजन में परम प्रशस्त आसन कहा गया है
तथा कामाख्या देवी के पूजन में इसी को श्रेष्ठ बताया गया है तथा देवी
के पूजन में और भगवान् विष्णु के अर्चन में भी कुशा, आसन प्रशस्त
माना गया है । बहुत दीर्घ, बहुत ऊँचा और बहुत विस्तार वाला काष्ठ
और भूमि के समान ही कहा गया है और पाषाण का भी आसन सभी
कर्मों में प्रशस्त होता है । द्वार में बाहर आसन पृथक्-पृथक् ही कल्पित
करे । पत्रों का आसन कभी पूजन में प्रयोग नहीं करना चाहिए ।
गज को छोड़कर किसी भी प्राणी के अंग से निर्मित आसन तथा
अस्थियों से रचित आसन ग्रहण नहीं करे । मातंग के दाँतों से निर्मित
आसन कामिक कर्मों में समाचरित करना चाहिए । गजचर्म का आसन

४०४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
नहीं ग्रहण करना चाहिए जो पूर्व में कहा गया है तथा गन्ध मृग के चर्म
का आसन ले । यदि जल में देवताओं का पूजन करे वहाँ पर भी
आसन पर बैठे हुए साधक को कभी उठना नहीं चाहिए । जल में
शिलामय अथवा कुशा का ही आसन करे । काष्ठ का अथवा तैजस
अर्थात् धातु निर्मित आसन को ग्रहण करे तथा अन्य आसन को
समाचरित नहीं करे । स्थान के अभाव में तो पूजन आसन के आरोप
में संस्थान को ही आसन कल्पित करके मन से जल में पूजन करें ॥ यदि
जल के मध्य में बैठने का संस्थान नहीं दे तो अन्य स्थान में बैठकर उस
समय में देव की पूजा का समाचरण करना चाहिए । हे पुत्र! यही
आपको मैंने पूज्य का जो संगत विषय है वह कहकर बता दिया है ।
हे बेताल भैरव! आसन और इससे पाद्य का श्रवण कीजिए । चरणों
के प्रक्षालन के लिए जो जल है वही पाद्य होता है अथवा केवल वह
जल ही होता है । वह पाद्य किसी उत्तम धातु से निर्मित पात्र के द्वारा
और शंख के द्वारा भी देना चाहिए । पाद्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष
का संस्थान होता है ।
उस समय में आसन के उत्तर में सभी ओर से मूल मन्त्र के द्वारा
कुश, पुष्प, अक्षत, सिद्धान्त, चन्दन तथा यथालभ्य अर्थात् जो भी
प्राप्त हो सकें जलों से सिद्धि के लिए अर्घ्य देना चाहिए । अर्घ्य से
कामनाओं का लाभ होता है और अर्घ्य देने से धन की प्राप्ति हुआ
करती है । अर्घ्य से पुत्र, आयु, सुख, मोक्ष की प्राप्ति हुआ करती ।
विचक्षण पुरुष को कभी शंख के द्वारा जल का अर्घ्य भास्कर के लिए
नहीं देना चाहिए । सीप के पात्र से भगवान् विष्णु के लिए अर्घ्य
निवेदित नहीं करे । सुगन्ध से युक्त जल से ही जो परम शुभ हो
आचमनीय समर्पित करे । कर्पूर के वासित और कृष्ण गुरु से धूपित
जिस प्रकार से सुगन्धित हों । वैसे ही प्रसंगों से और फेनों से रहित जल
से तैजस ( धातु निर्मित ) पात्र के द्वारा और शंख के द्वारा भी निवेदित
करे । जो भी जल दिया जाता है वह स्वच्छ और फेनों रहित ही होना
चाहिए । देवों के लिए जो आचमन करने को जल दिया जाता है वही

५ ६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३ ४०५
आचमनीय कहा जाया करता है अथवा केवल जल ही दे और मिश्रित
नहीं दे । सुगन्धित पदार्थों से उस जल को वासित करे । आचमनीय का
समर्पण करके साधक आयु, बल और यश एवं बुद्धि प्राप्त किया
करता है ।
साधक अपने हृदय में उठे हुए मनोरथों की भी प्राप्ति किया करता
है । सभी देवों की तुष्टि के लिए मधुपर्क दिया करता है । दधि, घृत,
जल, मधु, मिश्री, इन्हीं पाँचों में मिश्रित करके मधुपर्क बनाया जाता
है । इसमें जल तो बहुत ही थोड़ा होना चाहिए और मिश्री, घृत और
दधि समान परिमाण में होने चाहिए । इन सबसे अधिक मधु मधुपर्क
में प्रयुक्त करे । यह मधुपर्क काँसे के पात्र के द्वारा, सुवर्ण, अथवा
चाँदी के पात्र से ही समर्पित करे । ज्योतिष्टोम और अश्वमेध आदि में,
पूर्व में और इष्ट में पूजन में यह मधुपर्क प्रविष्ट होता है । जो सभी
देवों के समुदाय की तुष्टि के लिए हुआ करता है । यह मधुपर्क धर्म,
अर्थ, काम और मोक्ष का साधन कीर्तित किया गया है । मधुपर्क
सांख्य, भोग्य, तुष्टि, पुष्टि का प्रदान करने वाला हुआ करता है ।
पिष्टातक, कस्तूरी, रोचन, कुंकुम, गुड़, मधु, पंचगव्य, सर्वोषधियों
का समुदाय, सित्ता, (मिश्री), निर्णेजन, तैर, स्निग्ध स्नेह से तिल,
प्रान्त में जल, ये सभी पदार्थों को काव्य कोविदी के द्वारा स्नानीय
अर्थात् स्नान का जल कहा गया है । इस स्नानीय जल को स्वर्ण और
रत्नी का जल जो कपूर आदि सुगन्धित पदार्थों से अधिवासित करे और
उसको तैजस अर्थात् उत्तम धातु पात्रों के द्वारा, काँसे के पात्रों से अथवा
शंखों के द्वारा निवेदित करना चाहिए ।
आदित्य की प्रतिमाओं में मण्डल और केशर से देना चाहिए ।
शिवजी के लिंग में तथा भोग में, पीठ में तथा देवता के तनु में देना
चाहिए । सद्य स्निग्ध में, मुक्तिका से निर्मित में, घृत और सिन्दूर से
निर्मित में अथवा श्री चन्दन प्रतिष्ठ में प्रतिमा के तुने में लेपन करना
चाहिए । स्वास्तिक में स्थापित में, खंड अथवा दर्पण में स्नपन कराना
चाहिए । इसी प्रकार से और विशेष रूप से महादेवी के लिए स्नानीय

४०६ ॐ श्रीकालिका पुराणे ॐ

को समर्पित करना चाहिए । सूर्य, विष्णु, शिव के लिए जहाँ-तहाँ पर
पूजन में पूजक स्नानीय के समर्पण करने से पूजक कल्प के अन्त तक
स्वर्ग के निवास का अधिकारी हो जाया करता है । जिस समय में ही
पाद्य तथा गन्ध और पुष्प प्रभृति दिए जाया करते हैं तथा सभी उपचार
समर्पित किए जाते हैं । इन सबको अर्घ्य पात्र में अवदित जलों में
अमृतीकरण आदि करे तथा सुसंस्कृत करे और फिर उसके द्वारा
अभिसिञ्चन करना चाहिए । इसके उपरान्त ही इष्ट देवों की सेवा में
समर्पित करना चाहिए । उस समर्पित को वह स्वयं ही ग्रहण किया
करते हैं । अर्घ्य पात्रों को उस प्रकार के जलों के बिना जो निवेदन
किया जाता है । ऐसा जो समर्पण है जो अपने इष्ट देवों के लिए किया
जाता है । वह सभी समर्पण निष्फल ही हुआ करता है जो राग से,
प्रसाद अथवा लोभ से किया जाया करता है वह फल ही नहीं होता है ।
अर्घ्य पात्र में अमृतीकृत होना चाहिए ।
पात्र से जल स्रुत होता है फिर उसको अमृत करना चाहिए ।
अमृतीकृत जब पात्र में स्वल्प अवशेष रहे तो उस समय में उसमें अन्य
जल दे दें । वह उससे ही अमृत हो जाया करता है । यदि बहुत से पुष्प
हों और यदि प्रचुर मालायें हों तो अर्घ्य पात्र में स्थित जल से सिञ्चन
करके दी जाया करती हैं । दूसरे जलों से अर्घ्य पात्र में स्थित से भिन्न
हों जो उत्सृजन किया जाये तो सैंकड़ों विधियों से भी समर्पित किए गए
को इष्टदेव ग्रहण नहीं किया करते हैं । नवीन प्रतिपत्तियों के द्वारा
संस्कृत अर्थात् संस्कार किए हुए अर्घ्यपात्र में जो स्थित रहते हैं । वहाँ
पर तो सभी तीर्थ और सभी और से पीयूष स्वरूप स्थित रहा करते हैं ।
इस कारण से उसमें स्थित रहने वाले जल से ही अभ्युक्षण करके ही
उपचारों का उत्सृजन करना चाहिए । अर्घ्य पात्रों में योग्य को निधान
न करके जो निवेदन करे वह निवेदन करना उचित नहीं होता है । हे
भैरव! आपके सामने यह आसन आदि का वर्णन करके बता दिया गया
है । अब वस्त्रादि को बताऊँगा । उसका आप श्रवण विज्ञान की बुद्धि
के लिए करिए ।

६८९ श्रीकालिका पुराण ६८९ ४०७
देव पूजा के अन्य उपचार
श्री भगवान् ने कहा-कपास का अर्थात् सूत निर्मित, कम्बल,
वल्कल अर्थात् छाल से रचित और कोशज वस्त्र ही अभीष्ट हुआ
करता है । उसको ही पूर्व में मन्त्रों के द्वारा पूजन करके देवों के लिए
उत्सृजित करना चाहिए । कीड़ों के द्वारा कटा तथा कुतरा हुआ मैला,
जीर्ण, छिन्न और गाय से अर्वालंगित अर्थात् अंग पर धारण किया हुआ
और चूहों के द्वारा काटा हुआ, सुई से विद्ध तथा उषित, गुप्त केश
और विधोत एवं श्लेष्मा, मूत्र आदि से दूषित देवताओं के लिए प्रदान
में और दैव तथा पित्रकर्म में वर्जित कर देना चाहिए । पताका और
ध्वजा तथा कुण्डाडि में सिले हुए वस्त्र का प्रयोग करना चाहिए । और
अन्यत्र आवरणादि में उसके विनाश के होने से रक्त वस्त्र और कौशेय
वस्त्र महादेव के लिए उत्सृजन करना चाहिए । परमात्मा शिव के लिए
रक्तवर्ण का कम्बल समर्पित करे ।
समस्त देवों के लिए देवियों के लिए विचित्र वस्त्र का निवेदन
करना चाहिए । कपास का सर्वतोभद्र सभी के लिए निवेदित करे ।
बहुत ही लाल वस्त्र भगवान् वासुदेव के लिए नहीं निवेदन करना
चाहिए । नील और रक्त जो भी वस्त्र है वह सभी जगह पर विशेष
रूप से वर्जित कर देना चाहिए । जो बुध पुरुष प्रसाद से नील अथवा
रक्त वस्त्र को भगवान् विष्णु के लिए निवेदित करता है हे भैरव!
उसकी वह पूजा निष्फल ही हुआ करती है । विचित्र वस्त्र में जो कोई
नीले वर्ण की विरंज्जित हुई हो तो ऐसे वस्त्र को महादेव के लिए
निवेदित करना चाहिए । अन्य किसी देवता को कभी भी निवेदित न
करे । जिस रीति से दो पदों वालों में ब्राह्मण और देवों में इन्द्रदेव होते
हैं । उसी भाँति भूषण वर्गों में उत्तम कहा जाया करता है । वस्त्र से
लज्जा जीर्ण होती है और वस्त्र के द्वारा पाप हीन अर्थात् नष्ट हो जाता
है, वस्त्र से सभी प्रकार की सिद्धि होती हैं अतः वस्त्र चारों वर्गों के
फल का प्रदान करने वाला होता है । हे पुत्र! आपके सामने यह वस्त्र
सब प्रीति का देने वाला कह दिया गया है । अब भूषणों के विषय में
मुझ से श्रवण करो ।

४०८ श्रीकालिका पुराण
आभूषणों के नाम व प्रकार आदि
भूषण बताये जाते हैं, किरीट शिरोरत्न, कुण्डल, ललाटिक, ताल
पत्र, हार, ग्रैवैषक, उर्मिका, प्रालम्बिका, रत्न सूत्र, उत्तुंग, तक्ष मालिका,
पार्श्वद्योत, नखद्योत, अंगुलीच्छादक, अंगद, बाहुवलय, शिखाभूषण,
इंगिका, प्राग्दण्वन्ध, नीवी, मुष्टिबन्ध, प्रकीर्णक, पादांद, हंसक,
भूपुर, क्षुद्रघण्टीका, मुखपट्ट, ये परम सुशोभन अलंकार कहे गए हैं।
ये कुल चालीस होते हैं जो देवलोक में सौम्य के प्रदान करने वाले हैं।
अलंकारों के प्रदान करने से चारों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) वर्गों का
प्रसाधन होता है। इसका पूजन करके ही इष्ट की सिद्धि के लिए
समर्पण करना चाहिए। विचक्षण पुरुष को उनके दैवत का उच्चारण
करके ही पूजन करना चाहिए। अथवा शिरोगतं सौवर्णों को सर्वदा
समर्पित करना चाहिए।
हे भैरव! चूड़ारत्न आदि भूषण ग्रैवेयक से आदि लेकर हंस के
अन्त तक सब सुवर्ण से निर्मित हों अथवा रजत (चाँदी) से रचित होने
चाहिए। इन्हीं को देवताओं के लिए समर्पित करना चाहिए और अन्य
तेजस अर्थात् धातुओं से विरचितों को निवेदित नहीं करना चाहिए।
रीति रंग आदि से निर्मित पात्र और उपकरण आदि ही होने चाहिए।
इन भूषणों की बीच में इससे उपभूषण देवे। सब ताम्रमय जो कुछ भी
भूषण आदि हैं उन्हें निवेदित करे। सर्वत्र ताम्र आभूषण भी स्वर्ण की
ही तरह से दे और अर्घ्य पात्र में अधिक देना चाहिए। पूजा का अर्घ्य
पात्र, नैवेद्य का आधार पात्र, पालक है। भगवान् विष्णु के लिए सदा
उदुम्बर (गूलर वृक्ष) से निर्मित प्रीति तथा सन्तोष देने वाले होते हैं।
ताम्रपात्र में देवगण प्रसन्न हुआ करते हैं क्योंकि ताम्र में देव सदा स्थित
रहा करते हैं। ताम्र सबके लिए प्रीति का करने वाला हुआ करता है।
अतएव ताम्र का प्रयोग करना चाहिए। हे भैरव! अपने उपयोग में भी
ताम्र का ही प्रयोग करे और देवगणों के भी उपयोग में इसका प्रयोग
करना चाहिए। ग्रीवा के ऊपर के भाग में कभी भी रौप्य (चाँदी का
भूषण का प्रयोग न करे)।

8023 श्रीकालिका पुराण 8023 ४०९
अब उपभूषण बताये जाते हैं । प्रावार, दान पात्र, गण्डक और गृह
हैं । पर्य्यंक आदि जो और दूसरे हैं। वे सब आभूषण हैं । जो सौम्य
परिपूर्ण के बिना और काँसे के बिना भूषण होता है वह सुवर्ण और
रौप्य के अभाव में शरीर में नीचे नियोजित करना चाहिए । इन भूषण
आदि में जो भी नरों के द्वारा दिया जा सकता है, वही सम्भव होने पर
सब ही देना चाहिए । इस प्रकार से भूषण चतुर्वर्ग का दाता और सब
सौख्य का प्रदान करने वाला हुआ करता है । अपनी शक्ति के ही
अनुसार तुष्टि और पुष्टि के करने वाला भूषण कहा गया है ।
हे पुत्रों! हे वेताल और भैरव! अब भली भाँति गन्ध का श्रवण
कीजिए । यह गन्ध पाँच प्रकार का होता है, जो देवों की प्राप्ति को
प्रदान करने वाला है । चूर्णीकृत, घृष्ट अर्थात् घिसा हुआ, दाह को
आकर्षित करने वाला, सम्मर्दन से समुत्पन्न रस अथवा प्राणी के अंग
से उद्मन ये ही पाँच भेद हैं । गन्ध का चूर्ण, गन्ध पत्र, पुष्यों का चूर्ण
प्रशस्त गन्ध से युक्तों के पत्रों का चूर्ण जो है वे सब गन्ध वह होते हैं ।
घृष्ट मलय से समुत्पन्न गन्ध है जो मेरु के द्वारा चूर्णीकृत हैं ।
अगुरु प्रभृति भी गन्ध है जिसका पंक प्रदान किया जाया करता
है । घिस कर भी अघृष्ट गन्ध प्रियादि का जो दग्ध करके ग्रहण किया
जाता है वह दाह से समुत्पन्न रस हैं । दाह के साथ आकर्षित गन्ध
तीसरा कहा जाता है वह निपीडन करके ही परिग्रहीत किया जाया
करता है । वही सम्मर्द से उत्पन्न गन्ध सम्मर्द से, इस नाम से अभीष्ट
हुआ करता है । मृग की नाभि से समुत्पन्न, उसके कोप उद्भूत गन्ध
प्राणी के अंग से जायमान कहा गया है जो स्वर्ग के निवासियों का भी
मोह देनेवाला है । कर्पूर गन्ध, साराद्यक्षोद के धृष्टि होने पर संस्थित
होते हैं । चन्द्र भाग आदि भी रस में और पंक में संगत हैं । गन्धसार,
सर्वरस और गन्धादि में प्रयुक्त किया जाता है । मृग नाभि और घृष्ट,
चूर्ण भी अन्य के योग से होता है । रीति से सभी जगह पर गन्ध पाँच
प्रकार का होता है । जो मलराज गन्ध है वह दैव कार्य और पितृगण
के कार्य में सम्मत होता है । उसका पंकरस अथवा चूर्ण भी भगवान्

४१० श्रीकालिका पुराण
विष्णु की तुष्टि प्रदान करने वाला होता है । समस्त गन्धों में मलय से
समुत्पन्न गन्ध परम प्रशस्त होता है इस प्रकार होता है । इस कारण
सम्पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए । हे भैरव! कर्पूर के सहित कृष्ण अगुरु
मलयोद्भूत के साथ वैष्णवी प्रीति का देने वाला होता है तथा यह गन्ध
चण्डी देवी के लिए भी प्रशस्त माना जाता है । साधक को चाहिए कि
देवता के उद्देश्य के पूर्व में गन्ध का सम्पूजन करे फिर अपने इष्टदेव
के लिए उसका वितरण करे तो यह सदा समस्त सिद्धियों के प्रदान
करने वाला हुआ करता है । गन्ध के द्वारा मनुष्य अपनी कामनाओं का
भला किया करता है और गन्ध सदा ही धर्म देने वाला होता है । गन्ध
अर्थों का भी साधन हुआ करता है और गन्ध में मोक्ष भी प्रतिष्ठित है ।
हे वेताल और भैरव! यह गन्ध आप दोनों को बता दिया गया है । अब
वैष्णवी देवी के परम प्रिय जो पुष्प हैं उनके विषय में श्रवण कीजिए ।
वैष्णवी देवी, कामाख्यादेवी तथा त्रिपुरा देवी का अर्चन निम्नांकित
पुष्पों द्वारा करना चाहिए । वकुल, मन्दार, कुन्द, कुरुण्टक, करवीर,
अर्क, शाल्मल, अपराजित, दमन, सिन्धुवार, सुरभी, कुरुवक, ब्रह्मावृक्ष
की लता, कोमल दुर्वा के अंकुर, दशाओं की मञ्जरी, सुशोभव
विल्वपत्र, इनसे यजन करे और अन्य जो भगवान् शिव की प्रीति के
लिए पुष्पों की जातियाँ होती हैं । हे वैताल भैरव! उनका भी अब आप
श्रवण कीजिए जो मेरे द्वारा अभी कही जा रही है । मल्लिका, मालती,
जाती, यूथिका, माधवी, पाटला, करवीर, जवा, तार्परिका, कुब्जक,
नगर, कर्णिकार, रोचना, चम्पक, आम्रतक, वाण, वर्वरामल्लिका,
अशोक, लोध्र, तिलक, अष्टरूप, शिरीष, शमी, द्रोण, पद्म, उत्पल,
वकारुण, श्वेतारुण, विसन्ध्य, पलाश, खादिर, वनमाला सेवन्ती,
कुमुद, कदम्ब, चक्र कोकन्द, तण्डिल, गिरिकर्णिका, नागकेशर,
पुन्नाग, केतकी, अञ्जलिका, दोहदा, बीजापुर, नमेरु, शाल, त्रपुषी,
चण्डविल, झिंठरी पाँचों प्रकार की ऐवमादि कथित पुष्पों के द्वारा
वरदा शिवा का अर्चन करना चाहिए । अपामार्ग के पत्र, भृंगार के पत्र,
गन्धिनी के पत्र, वलाहक इससे भी पर हैं । खदिर का पत्र, वञ्जुलान्तवक,

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वृद्धि के लिए संस्कार की हुई अग्नि में हवन करना चाहिए । कामना
की वृद्धि के लिए संख्या से जो जप संकल्प किया गया है उसके अन्त
में पूजन किया है वह द्विजों के द्वारा करना चाहिए । श्रेष्ठ द्विजों ने
जिसको पुरश्चरण के नाम से कीर्तित किया हैं उसमें पूर्व में पुराण
पूर्वोक्त और विस्तार से वर्णित विधानों के द्वारा कामाख्या और वैष्णवी
देवी का पूजन करे । जहाँ तक भी सम्भव हो साधक को यहाँ पर
सोलह उपचार समर्पित करने ही चाहिए । उसी भाँति षोडश पूर्वोक्त
उपचारों का और विधान के कृत्यों का लंघन नहीं करना चाहिए ।
सम्पूर्ण पूजन करके कल्पोक्त का सौ बार जप करे । जाप के अन्त में
अग्नि में होम करे और होम के अन्त में तीन बलि दे । तीन जाति के
बलियों का वितरण करे तथा इसके उपरान्त नृत्य गीत करना चाहिए ।
पत्नी स्वयं अथवा भाई या गुरु, अपना पुत्र अथवा शिष्य नैवेद्य आदि
का विनियोजन करना चाहिए ।
यज्ञ की समाप्ति पर श्री गुरुदेव को शुभ दक्षिणा देनी चाहिए ।
सुवर्ण, तिल, गौएं दक्षिणा में देवे और इनके देने की शक्ति न हो तो
केवल चेटक ही निवेदित करे । मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि
में ब्रह्मचर्य रखने वाला तथा इन्द्रियों को जीत लेने वाला रहे और नवमी
में अथवा चतुर्दशी में महादेवी का पुरश्चरण करे । हे भैरव ! श्री
गुरुदेव के मुख से आदान करना करना चाहिए । जो भी विधि और
विस्तार कल्प में कहा गया हो उससे इन उक्त तिथियों में भली भाँति
पूजन करे । सम्पूर्ण पूजा को न करके ईप्सित मन्त्र को नहीं देना चाहिए
अथवा पुरश्चरण भी नहीं करे । यदि ऐसा करता है तो अवसाद प्राप्त
किया करता है । जो नित्य पूजा है, यदि की जा सकती है तो सम्पूर्ण
पूजा करे और उस समय में अतीन्द्रिय होकर की कल्प में वर्णित पूजन
करना चाहिए । हे भैरव! यदि विस्तार से देवी की पूजा करना न हो
तो कल्प में कथित अन्य देव की पूजा करे ।
अर्घ्य पात्र में आठ बार जप कर उपचारों का प्रसेचन करना
चाहिए । आधार शक्ति के प्रमुख मूल वर्गों का प्रयोग करे और हृदय

६०९ श्रीकालिका पुराण ६०९ ४१३
में संस्थित देवता का ध्यान करके और वायु के द्वारा बाहर करके
मण्डल में आरेहण करके विधि के अनुसार उपचारों को देना चाहिए ।
अंगों का पूजन करके उसी भाँति दल देवताओं का यजन करे । फिर
तीन पुष्पांजलियों को देकर, जप करके, स्तवन करके और प्रणाम
करे । देवता के सामने मुद्रा को प्रदर्शित करके पीछे विसर्जन करना
चाहिए । सभी देवताओं की यह ही विधि कही गई है । यदि कल्प में
कही हुई पूजा भली भाँति नहीं की जा सकती है तो उपचारों को उस
भाँति देने के लिए उस समय में इन पाँचों को सदा वितरित करे । गन्ध,
पुष्प, दीप और नैवेद्य, ये पाँच हैं । अभाव में पुष्प और दीप के द्वारा
करे, इनके भी अभाव में भक्ति की भावना से ही करना चाहिए । यह
संक्षेप पूजा कह दी गई है ।
दीप पूजा का विधान
हे भैरव! पुरश्चरण के कृत्य में प्रदीप के विषय में आप श्रवण
कीजिए । दीप को तेजोमय बताया गया है । यह दीप चारों वर्गों के
प्रदान करने वाला हुआ करता है इस कारण से दीपों के द्वारा श्री के
ऊपर जप प्राप्त करना चाहिए ।
जो पुरुष निरन्तर ही पुष्पों और दीपों के द्वारा देवता का अर्चन
किया करता है । इन दोनों ही से चारों वर्गों की प्राप्ति कही गयी है,
इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है । पुष्पों में रहने वाली परम ज्योति है
अतएव पुष्प से ही प्रसन्न होती है । तीन वर्गों का अर्थात् धर्म, अर्थ,
और काम का साधन हैं । यह पुष्प तुष्टि, पुष्टि और मोक्ष प्रदान करने
वाला है । पुष्प के मूल में ब्रह्माजी रहा करते हैं और पुष्प के मध्य में
केशव का निवास है । पुष्प के अग्रभाग में महादेवजी विराजमान रहा
करते हैं और सभी देवगण दल में संस्थित रहते हैं । इस कारण से पुष्पों
के द्वारा देवों का यजन करना चाहिए और भक्ति की भावना से संयुत
होकर नित्य ही अर्चन करे । नाममात्र का उच्चारण करना सब विभूति
के लिए होता है । अब दीपक के भेदों के विषय में बताया जाता है,

४१४ श्रीकालिका पुराण
घृत का दीप, जो सर्वप्रथम होता है, तिलों के तैल से बनाया हुआ दीप,
रानिक अर्थात् राई के तेल से तैयार किया हुआ दीपक, दधि से बनाया
हुआ और अन्न से किया दीपक, ये सात प्रकार के दीप कहे गए हैं ।
दीप में वर्तिकारी पाँच प्रकार की होती है, पद्म के सूत्र से बनी हुई,
दर्भ के मध्यस्थ सूत्र से निर्माण की गयी, शण से निर्मित बदरी,
फलकोष से उद्भूत हुई वर्तिका ।
दीपक के कृत्यों में वर्तिका सदा ही पाँच तरह की बतायी गयी है ।
किसी धातु से निर्मित जो भी उत्तम धातु हो । काष्ठ से बना हुआ, लोहे
का, मृत्तिका से निर्मित, नारियल से बनाया हुआ अथवा तृण ध्वज से
उद्भूत दीपक का पात्र प्रशस्त होता है । हे भैरव! दीप वृक्ष अर्थात्
दीवट तैजस अर्थात् उत्तम धातुओं की ही बनानी चाहिए । दीवट पर
ही दीप रखना चाहिए । भूमि पर दीपक कभी भी नहीं रखना चाहिए ।
यह भूमि सभी को सहन करने वाली होती है किन्तु दो कामों को यह
सहन नहीं किया करती है, एक तो बिना ही किसी कार्य के पादों का
घात करना और दूसरा दीपक का ताप, यह नहीं सहा करती है । इस
कारण जिस तरह से भी यह पृथ्वी ताप प्राप्त न करे वैसे ही करना
चाहिए अर्थात् दीपक को भूमि पर कभी नहीं रखना चाहिए । हे भैरव!
महादेव के लिए तथा अन्य देवों के लिए भी दीप समर्पितं करे । जो
मानव पृथ्वी को ताप देता हुआ दीपक का उत्सृजन किया करता है वह
मनुष्य ताम्रताप नामक नरक को सौ वर्ष तक निश्चित रूप से प्राप्त
किया करता ही है, इसमें कुछ संशय नहीं है । सुवृत्त बत्ती वाला, सुन्दर
स्नेह से युक्त, अर्थात् घृतादि से संयुत, देखने में भी अच्छा दीपक होना
चाहिए । सुन्दर ऊँचाई से युक्त वृक्ष की कोटि पर ही प्रयत्न पूर्वक
दीपक रखना उचित है और उसका ही देवता के लिए उत्सृजन करे ।
चार अंगुल से जिस दीप का ताप प्राप्त किया जाया करता है वह
दीपक, इस नाम से ख्यात नहीं होता है । वह तो वह्नि का एक समूह
ही है, ऐसा सुना गया है । दीपक नेत्रों को आह्लाद करने वाला, सुन्दर
लौ वाला और दूरी से नाम से रहित ही होना चाहिए ।

Ꮚ श्रीकालिका पुराण Ꮚ ४१५
सुन्दर शिखा से युक्त, शब्द से रहित, बिना धुआँ वाला, अत्यधिक
छोटा भी न हो और जिसमें बत्ती दक्षिणावर्त्त वाली हो ऐसा प्रदीप हो
वह श्री की वृद्धि के लिए हुआ करता है । दीपक का पात्र दीवट पर
स्थित हो और शुद्ध घृतादि से भरा हुआ हो तथा जिनकी वर्त्तिका को
दक्षिण की ओर होनी चाहिए । हे पुत्र! ऐसा ही दीपक उत्तम कहा
जाया करता है जो सबकी तुष्टि के देनेवाला हो । जो दीपक दीवट से
रहित होता है वह मध्यम कहा जाता है । दीपक के लिए निरन्तर नूतन
की बत्ती ही ग्रहण करे । इसी से श्री की वृद्धि होती है । कोष से उत्पन्न
रोम से उद्भूत वस्त्र को बत्ती के लिए कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए
और दीपक में स्नेह घृतादि का मिश्रण करके कभी भी न दे । जो
घृतादिक का दीपक में मिश्रण करके रखता है वह तामिस्र नरक में
जाता है । वसा, मज्जा, अस्थियों का निर्यास के स्नेहों (चिकनाई) से
तथा किसी भी प्राणी के अंग से समुत्पन्न स्नेह से दीपक की रचना
कभी भी नहीं करनी चाहिए । यदि ऐसा कोई भी मनुष्य करता है तो
वह पंक में अवसाद प्राप्त किया करता है । ऐसा दीपक विवृद्ध पुरुषों
के द्वारा श्री की विशेष वृद्धि के लिए कभी भी नहीं देना चाहिए ।
दीपक को यत्नपूर्वक कदाचित भी निर्वापति नहीं करे । निरन्तर ही देवों
के लिए सुन्दर लक्षणों से युक्त ही दीपक कल्पित करना चाहिए ।
ज्ञानपूर्वक तथा लोभ आदि से मनुष्य को दीपक का हरण नहीं करना
चाहिए । जो दीपक का हरण किया करता है वह अन्धा और जो
दीपक को बुझा दिया करता है वह काना हुआ करता है । उदीप्त दीप्त
की प्रतिमा के युक्त काष्ठ के काण्ड से समुद्भव विल्व के मध्य से
उत्पन्न का ही दीपक के अभाव में निवेदन करना चाहिए । दीपक के
लिए उल्मुक का कभी भी उत्सृजन न करे । इस प्रकार से दीपक के
विषय में सब कुछ कह दिया गया है ।
अब आप लोग धूप के विषय में श्रवण करिए । धूप भी ऐसी ही
होनी चाहिए । जो नासिका के रन्ध्रों (छिद्रों) के लिए सुख प्रदान करने
वाली हो और मन का हरण करने वाला सुन्दर गन्ध से युक्त हो, दाह

४१६ श्रीकालिका पुराण
दिए गए काष्ठ अथवा पराग का जिसका धूप ताप रहित हो वह धूप
देवगणों की तुष्टि के देने वाला होता हैं, ऐसा जान लेना चाहिए । उन
द्रव्यों को सबको एक समूह में एकत्रित करके परिधूपित नहीं करे ।
तुषाग्नि से वर्त्तुन करके धूप न दे । ऐसा करने से धूप देने का जो भी
कुछ फल हुआ करता है वह कभी भी प्राप्त नहीं होता है । जब उसका
कोई भी फल नहीं है तो वैसा न करें ।
अब यह बताया जाता है किन-किन वृक्षों को धूप के लिए ग्रहण
करना चाहिए । श्री चन्दन, सरल शाल तथा कृष्ण गुरु, उदय, सुरथ,
स्कन्द, काशल, नमेरु, नेदेव दारु, विम्बसार, खादिर, सन्तान, पारिजात,
हरिचन्दन, वल्लभ, इन वृक्षों की धूप सभी देवों के लिए प्रीति देने
वाली परिकीर्तित की गई है । सूत्र के साथ अराल, श्री बास, पट्ट
वासक, कर्पूर, श्रीकर, पराग, श्रीहर, आमल, सर्वोषधीय, जातीय
वराह, चूर्ण, उत्कल, जाती कोप का चूर्ण, गन्ध, कस्तूरिका, क्षोद वृत्त
में कही हुई ये उदाहृत हैं । यक्ष धूप, वृक्ष धूप, श्रीपिटट, अगुर, झर्झर,
हवि, वाहा, पिण्डधूप, रुगोल, दण्ठ, अन्योन्य योग, निर्यास, ये धूप
कीर्तित किए गए हैं । इन धूपों के द्वारा देवों को धूपित करना चाहिए ।
जिनकी धूपों से उद्भूत घ्राणों के द्वारा जन्तुगण तुष्टि को प्राप्त हुआ
करते हैं ।
निर्यास, परांग, काष्ठ, गन्ध और कृत्रिम, ये पाँच धूप परम प्रीति
के करने वाला हुआ करते हैं । भगवान् माधव प्रभु के लिए किसी भी
समय में यक्ष धूप का वितरण नहीं करना चाहिए । मेरे लिए रक्त
विद्रुम तथा सुरथ, कद्रिल का भी वितरण न करे । यक्ष धूप, पुत्र बाद,
पिण्ड धूप, सुगोलक, कृष्णा गुरु, कपूर से युक्त, यह महामाया का
प्रिय धूप कहा गया है । वृक धूप द्वारा महामाया देवी का प्रकृष्ट पूजन
करना चाहिए । जो धूप में मेद और मज्जा से समायुक्त हों उनका
विनियोग कभी भी नहीं करना चाहिए । परकीय अर्थात् दूसरों के
आघ्रात अर्थात् जिनका घ्राण कर लिया गया हो, कृत्या से अभिमर्दित
पुष्प, धूप और गन्ध को तथा दूसरे भी उपचारों को घ्राण करके जो

൰०४ श्रीकालिका पुराण ൰०४ ४१७
देवगणों के लिए समर्पित किया करता है वह मनुष्य घोर नरक में प्राप्त
हुआ करता है । धूप को कभी आसन पर तथा घट पर वितरण नहीं
करना चाहिए । जैसा-जैसा भी कोई आधार बनाकर ही उनको
विनवेदित करना चाहिए । रक्त विद्रुम, शाल, सुरथ, सुरल, सन्तानक,
नमेरु, काला गुरु से समन्वित, जाती से संयुक्त धूप कामेश्वरी को प्रिय
हुआ करता है ।
हे पुत्र! उसी भाँति यह त्रिपुण्या को तथा नित्य ही मातृकाओं को
और समस्त पीठदेवों को और रुद्र आदि को भी प्रिय हुआ करता है ।
धूप हमने आपको बता दिया है ।
अब नेत्रों के अञ्जन के विषय में आप श्रवण करिए जिसके द्वारा
कामाख्या देवी त्रिपुरा देवी वैष्णवी देवी परम प्रसन्न हुआ करती हैं ।
अञ्जन छः प्रकार के हुआ करते हैं उनके नाम ये हैं-सौवीर, यामुन,
तुत्य, मयूरयामुन, दूर्विका, मेघनील, ये छः होते हैं । ये घिसे हुए ग्रहण
करने के योग्य होते हैं । चाहे शिला पर घिसे हुए हों या किसी उत्तम
धातु पर घृष्ट किए गए हों । हे पुत्र! यह सभी देवों के लिए समर्पित
करे और सभी देवियों की सेवा में निवेदित करना चाहिए । धृत और
तैल आदि के योग्य से ताम्र आदि पर दीपक की अग्नि के द्वारा जो
अञ्जन बनाया जाता है वही दर्विका कहा गया है । यदि सबका अभाव
हो तो देवियों की सेवा में इस दाह से समुत्पन्न अञ्जन को ही समर्पित
करना चाहिए । महामाया देवी, जगत् की धात्री कामाख्या देवी तथा
त्रिपुरा देवी इन उपर्युक्त छः प्रकार के अञ्जनों से जब ये निवेदित किए
गए हों तो सदा ही महान तोष को प्राप्त हुआ करती है अर्थात् उनको
परमाधिक प्रसन्नता इनको हुआ करती है । महामाया के लिए प्रस्तुत इस
उत्तम अंजन को विधवा नारी को कभी अपने उपयोग में नहीं लेनी
चाहिए । इसका तात्पर्य यही है कि विधवा नारी के द्वारा यह अंजन
नहीं बनाया जाना चाहिए ।
वैष्णवी देवी कभी भी विधवा नारी के द्वारा तैयार किया अञ्जन
स्वीकार नहीं करती हैं । साधना करने वाले को चाहिए कि मिट्टी के