सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 401, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 401

५ ६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३ ४०५
आचमनीय कहा जाया करता है अथवा केवल जल ही दे और मिश्रित
नहीं दे । सुगन्धित पदार्थों से उस जल को वासित करे । आचमनीय का
समर्पण करके साधक आयु, बल और यश एवं बुद्धि प्राप्त किया
करता है ।
साधक अपने हृदय में उठे हुए मनोरथों की भी प्राप्ति किया करता
है । सभी देवों की तुष्टि के लिए मधुपर्क दिया करता है । दधि, घृत,
जल, मधु, मिश्री, इन्हीं पाँचों में मिश्रित करके मधुपर्क बनाया जाता
है । इसमें जल तो बहुत ही थोड़ा होना चाहिए और मिश्री, घृत और
दधि समान परिमाण में होने चाहिए । इन सबसे अधिक मधु मधुपर्क
में प्रयुक्त करे । यह मधुपर्क काँसे के पात्र के द्वारा, सुवर्ण, अथवा
चाँदी के पात्र से ही समर्पित करे । ज्योतिष्टोम और अश्वमेध आदि में,
पूर्व में और इष्ट में पूजन में यह मधुपर्क प्रविष्ट होता है । जो सभी
देवों के समुदाय की तुष्टि के लिए हुआ करता है । यह मधुपर्क धर्म,
अर्थ, काम और मोक्ष का साधन कीर्तित किया गया है । मधुपर्क
सांख्य, भोग्य, तुष्टि, पुष्टि का प्रदान करने वाला हुआ करता है ।
पिष्टातक, कस्तूरी, रोचन, कुंकुम, गुड़, मधु, पंचगव्य, सर्वोषधियों
का समुदाय, सित्ता, (मिश्री), निर्णेजन, तैर, स्निग्ध स्नेह से तिल,
प्रान्त में जल, ये सभी पदार्थों को काव्य कोविदी के द्वारा स्नानीय
अर्थात् स्नान का जल कहा गया है । इस स्नानीय जल को स्वर्ण और
रत्नी का जल जो कपूर आदि सुगन्धित पदार्थों से अधिवासित करे और
उसको तैजस अर्थात् उत्तम धातु पात्रों के द्वारा, काँसे के पात्रों से अथवा
शंखों के द्वारा निवेदित करना चाहिए ।
आदित्य की प्रतिमाओं में मण्डल और केशर से देना चाहिए ।
शिवजी के लिंग में तथा भोग में, पीठ में तथा देवता के तनु में देना
चाहिए । सद्य स्निग्ध में, मुक्तिका से निर्मित में, घृत और सिन्दूर से
निर्मित में अथवा श्री चन्दन प्रतिष्ठ में प्रतिमा के तुने में लेपन करना
चाहिए । स्वास्तिक में स्थापित में, खंड अथवा दर्पण में स्नपन कराना
चाहिए । इसी प्रकार से और विशेष रूप से महादेवी के लिए स्नानीय