कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 411, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंᏊ श्रीकालिका पुराण Ꮚ ४१५
सुन्दर शिखा से युक्त, शब्द से रहित, बिना धुआँ वाला, अत्यधिक
छोटा भी न हो और जिसमें बत्ती दक्षिणावर्त्त वाली हो ऐसा प्रदीप हो
वह श्री की वृद्धि के लिए हुआ करता है । दीपक का पात्र दीवट पर
स्थित हो और शुद्ध घृतादि से भरा हुआ हो तथा जिनकी वर्त्तिका को
दक्षिण की ओर होनी चाहिए । हे पुत्र! ऐसा ही दीपक उत्तम कहा
जाया करता है जो सबकी तुष्टि के देनेवाला हो । जो दीपक दीवट से
रहित होता है वह मध्यम कहा जाता है । दीपक के लिए निरन्तर नूतन
की बत्ती ही ग्रहण करे । इसी से श्री की वृद्धि होती है । कोष से उत्पन्न
रोम से उद्भूत वस्त्र को बत्ती के लिए कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए
और दीपक में स्नेह घृतादि का मिश्रण करके कभी भी न दे । जो
घृतादिक का दीपक में मिश्रण करके रखता है वह तामिस्र नरक में
जाता है । वसा, मज्जा, अस्थियों का निर्यास के स्नेहों (चिकनाई) से
तथा किसी भी प्राणी के अंग से समुत्पन्न स्नेह से दीपक की रचना
कभी भी नहीं करनी चाहिए । यदि ऐसा कोई भी मनुष्य करता है तो
वह पंक में अवसाद प्राप्त किया करता है । ऐसा दीपक विवृद्ध पुरुषों
के द्वारा श्री की विशेष वृद्धि के लिए कभी भी नहीं देना चाहिए ।
दीपक को यत्नपूर्वक कदाचित भी निर्वापति नहीं करे । निरन्तर ही देवों
के लिए सुन्दर लक्षणों से युक्त ही दीपक कल्पित करना चाहिए ।
ज्ञानपूर्वक तथा लोभ आदि से मनुष्य को दीपक का हरण नहीं करना
चाहिए । जो दीपक का हरण किया करता है वह अन्धा और जो
दीपक को बुझा दिया करता है वह काना हुआ करता है । उदीप्त दीप्त
की प्रतिमा के युक्त काष्ठ के काण्ड से समुद्भव विल्व के मध्य से
उत्पन्न का ही दीपक के अभाव में निवेदन करना चाहिए । दीपक के
लिए उल्मुक का कभी भी उत्सृजन न करे । इस प्रकार से दीपक के
विषय में सब कुछ कह दिया गया है ।
अब आप लोग धूप के विषय में श्रवण करिए । धूप भी ऐसी ही
होनी चाहिए । जो नासिका के रन्ध्रों (छिद्रों) के लिए सुख प्रदान करने
वाली हो और मन का हरण करने वाला सुन्दर गन्ध से युक्त हो, दाह