कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१४ श्रीकालिका पुराण
घृत का दीप, जो सर्वप्रथम होता है, तिलों के तैल से बनाया हुआ दीप,
रानिक अर्थात् राई के तेल से तैयार किया हुआ दीपक, दधि से बनाया
हुआ और अन्न से किया दीपक, ये सात प्रकार के दीप कहे गए हैं ।
दीप में वर्तिकारी पाँच प्रकार की होती है, पद्म के सूत्र से बनी हुई,
दर्भ के मध्यस्थ सूत्र से निर्माण की गयी, शण से निर्मित बदरी,
फलकोष से उद्भूत हुई वर्तिका ।
दीपक के कृत्यों में वर्तिका सदा ही पाँच तरह की बतायी गयी है ।
किसी धातु से निर्मित जो भी उत्तम धातु हो । काष्ठ से बना हुआ, लोहे
का, मृत्तिका से निर्मित, नारियल से बनाया हुआ अथवा तृण ध्वज से
उद्भूत दीपक का पात्र प्रशस्त होता है । हे भैरव! दीप वृक्ष अर्थात्
दीवट तैजस अर्थात् उत्तम धातुओं की ही बनानी चाहिए । दीवट पर
ही दीप रखना चाहिए । भूमि पर दीपक कभी भी नहीं रखना चाहिए ।
यह भूमि सभी को सहन करने वाली होती है किन्तु दो कामों को यह
सहन नहीं किया करती है, एक तो बिना ही किसी कार्य के पादों का
घात करना और दूसरा दीपक का ताप, यह नहीं सहा करती है । इस
कारण जिस तरह से भी यह पृथ्वी ताप प्राप्त न करे वैसे ही करना
चाहिए अर्थात् दीपक को भूमि पर कभी नहीं रखना चाहिए । हे भैरव!
महादेव के लिए तथा अन्य देवों के लिए भी दीप समर्पितं करे । जो
मानव पृथ्वी को ताप देता हुआ दीपक का उत्सृजन किया करता है वह
मनुष्य ताम्रताप नामक नरक को सौ वर्ष तक निश्चित रूप से प्राप्त
किया करता ही है, इसमें कुछ संशय नहीं है । सुवृत्त बत्ती वाला, सुन्दर
स्नेह से युक्त, अर्थात् घृतादि से संयुत, देखने में भी अच्छा दीपक होना
चाहिए । सुन्दर ऊँचाई से युक्त वृक्ष की कोटि पर ही प्रयत्न पूर्वक
दीपक रखना उचित है और उसका ही देवता के लिए उत्सृजन करे ।
चार अंगुल से जिस दीप का ताप प्राप्त किया जाया करता है वह
दीपक, इस नाम से ख्यात नहीं होता है । वह तो वह्नि का एक समूह
ही है, ऐसा सुना गया है । दीपक नेत्रों को आह्लाद करने वाला, सुन्दर
लौ वाला और दूरी से नाम से रहित ही होना चाहिए ।