कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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अब उपभूषण बताये जाते हैं । प्रावार, दान पात्र, गण्डक और गृह
हैं । पर्य्यंक आदि जो और दूसरे हैं। वे सब आभूषण हैं । जो सौम्य
परिपूर्ण के बिना और काँसे के बिना भूषण होता है वह सुवर्ण और
रौप्य के अभाव में शरीर में नीचे नियोजित करना चाहिए । इन भूषण
आदि में जो भी नरों के द्वारा दिया जा सकता है, वही सम्भव होने पर
सब ही देना चाहिए । इस प्रकार से भूषण चतुर्वर्ग का दाता और सब
सौख्य का प्रदान करने वाला हुआ करता है । अपनी शक्ति के ही
अनुसार तुष्टि और पुष्टि के करने वाला भूषण कहा गया है ।
हे पुत्रों! हे वेताल और भैरव! अब भली भाँति गन्ध का श्रवण
कीजिए । यह गन्ध पाँच प्रकार का होता है, जो देवों की प्राप्ति को
प्रदान करने वाला है । चूर्णीकृत, घृष्ट अर्थात् घिसा हुआ, दाह को
आकर्षित करने वाला, सम्मर्दन से समुत्पन्न रस अथवा प्राणी के अंग
से उद्मन ये ही पाँच भेद हैं । गन्ध का चूर्ण, गन्ध पत्र, पुष्यों का चूर्ण
प्रशस्त गन्ध से युक्तों के पत्रों का चूर्ण जो है वे सब गन्ध वह होते हैं ।
घृष्ट मलय से समुत्पन्न गन्ध है जो मेरु के द्वारा चूर्णीकृत हैं ।
अगुरु प्रभृति भी गन्ध है जिसका पंक प्रदान किया जाया करता
है । घिस कर भी अघृष्ट गन्ध प्रियादि का जो दग्ध करके ग्रहण किया
जाता है वह दाह से समुत्पन्न रस हैं । दाह के साथ आकर्षित गन्ध
तीसरा कहा जाता है वह निपीडन करके ही परिग्रहीत किया जाया
करता है । वही सम्मर्द से उत्पन्न गन्ध सम्मर्द से, इस नाम से अभीष्ट
हुआ करता है । मृग की नाभि से समुत्पन्न, उसके कोप उद्भूत गन्ध
प्राणी के अंग से जायमान कहा गया है जो स्वर्ग के निवासियों का भी
मोह देनेवाला है । कर्पूर गन्ध, साराद्यक्षोद के धृष्टि होने पर संस्थित
होते हैं । चन्द्र भाग आदि भी रस में और पंक में संगत हैं । गन्धसार,
सर्वरस और गन्धादि में प्रयुक्त किया जाता है । मृग नाभि और घृष्ट,
चूर्ण भी अन्य के योग से होता है । रीति से सभी जगह पर गन्ध पाँच
प्रकार का होता है । जो मलराज गन्ध है वह दैव कार्य और पितृगण
के कार्य में सम्मत होता है । उसका पंकरस अथवा चूर्ण भी भगवान्