कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०६ ॐ श्रीकालिका पुराणे ॐ
को समर्पित करना चाहिए । सूर्य, विष्णु, शिव के लिए जहाँ-तहाँ पर
पूजन में पूजक स्नानीय के समर्पण करने से पूजक कल्प के अन्त तक
स्वर्ग के निवास का अधिकारी हो जाया करता है । जिस समय में ही
पाद्य तथा गन्ध और पुष्प प्रभृति दिए जाया करते हैं तथा सभी उपचार
समर्पित किए जाते हैं । इन सबको अर्घ्य पात्र में अवदित जलों में
अमृतीकरण आदि करे तथा सुसंस्कृत करे और फिर उसके द्वारा
अभिसिञ्चन करना चाहिए । इसके उपरान्त ही इष्ट देवों की सेवा में
समर्पित करना चाहिए । उस समर्पित को वह स्वयं ही ग्रहण किया
करते हैं । अर्घ्य पात्रों को उस प्रकार के जलों के बिना जो निवेदन
किया जाता है । ऐसा जो समर्पण है जो अपने इष्ट देवों के लिए किया
जाता है । वह सभी समर्पण निष्फल ही हुआ करता है जो राग से,
प्रसाद अथवा लोभ से किया जाया करता है वह फल ही नहीं होता है ।
अर्घ्य पात्र में अमृतीकृत होना चाहिए ।
पात्र से जल स्रुत होता है फिर उसको अमृत करना चाहिए ।
अमृतीकृत जब पात्र में स्वल्प अवशेष रहे तो उस समय में उसमें अन्य
जल दे दें । वह उससे ही अमृत हो जाया करता है । यदि बहुत से पुष्प
हों और यदि प्रचुर मालायें हों तो अर्घ्य पात्र में स्थित जल से सिञ्चन
करके दी जाया करती हैं । दूसरे जलों से अर्घ्य पात्र में स्थित से भिन्न
हों जो उत्सृजन किया जाये तो सैंकड़ों विधियों से भी समर्पित किए गए
को इष्टदेव ग्रहण नहीं किया करते हैं । नवीन प्रतिपत्तियों के द्वारा
संस्कृत अर्थात् संस्कार किए हुए अर्घ्यपात्र में जो स्थित रहते हैं । वहाँ
पर तो सभी तीर्थ और सभी और से पीयूष स्वरूप स्थित रहा करते हैं ।
इस कारण से उसमें स्थित रहने वाले जल से ही अभ्युक्षण करके ही
उपचारों का उत्सृजन करना चाहिए । अर्घ्य पात्रों में योग्य को निधान
न करके जो निवेदन करे वह निवेदन करना उचित नहीं होता है । हे
भैरव! आपके सामने यह आसन आदि का वर्णन करके बता दिया गया
है । अब वस्त्रादि को बताऊँगा । उसका आप श्रवण विज्ञान की बुद्धि
के लिए करिए ।