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सर्वकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 442 में से

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पृष्ठ 398

४०२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
प्रतिमाओं में देने के लिए जो भी योग्य हो वह तनु में देना चाहिए ।
पौष्य जो होता है वह पुष्यों के समुदाय से रचित हुआ करता है और
कुश तथा सूत्र आदि से संयुक्त होता है । हे भैरव ? यह देवी का, मेरा
और समुद्भूत आसन मसृण और शुभ हुआ करता है ।
आसन के प्रकार और भेद
आसन ऐसा होना चाहिए जो बहुत ऊँचा न हो, न बहुत विस्तृत
होना चाहिए । ऐसे ही आसन को निवियोजित करे । अन्य लकड़ी से
बनाया हुआ भी उत्तम देवे । वह आसन दारु (काष्ठ) के सार रहित
तथा काँटों से युक्त एवं क्षीर से संयुक्त, चैत्य शमशान से समुत्पन्न और
विभीतक को छोड़कर ही काष्ठ का आसन बनाना चाहिए । वस्त्र के
आसन के लिए वल्कल (वृक्ष की छाल), कोषज और शाण अर्थात्,
ये ही तीन आसन माने गए हैं । रोमज अर्थात् रोमों से बनाया हुआ
कम्बल, ये चार होते हैं । अपने इष्टदेव की मूर्ति के लिए इसके द्वारा
विरचित आसन ही देना चाहिए । सिंह, व्याघ्र, तीक्षण, छाग, महिष,
गज, तुरंग, कृष्णास्मर, ये मृगों के नौ भेद हैं । इनके चर्मों के द्वारा
आसन बनाया जाया करता है जो सभी देवों के लिए हुआ करता है ।
चर्म के आसन में तुरंग के चर्म का आसन श्रेष्ठ होता है तथा काष्ठ के
आसनों में चन्दन का श्रेष्ठ माना गया है । सभी देवों का संयुत आत्म
वाले ऋषियों का योगपीठ के सदृश आसन तथा स्थान कहा जाता है ।
देवों के लिए आसन के समर्पण से परम सौभाग्य और मुक्ति की
प्राप्ति की जाया करती है । मृग नौ प्रकार के माने गए हैं । अर्थात्
निम्नांकित इनके नौ भेद होते हैं, शम्बर, रोहित, राम, न्यंक, अंकु,
शशा, रूरू, राण और हिरण, ये नौ भेद हैं । हे भैरव! हरिण भी यहाँ
पर पाँच भेदों वाला समझना चाहिए । ऋष्य, शृंग, रूरू, पृषत, तथा
मृग, ये बलि के प्रदान करने में तथा चर्म दान में कीर्त्तित किए गए हैं ।
धातु के आसनों में केवल लौह को छोड़कर काँसा, सीमा, शिलामय,
मणिमय, ये रत्नमय माने गये हैं । देवताओं के लिए आसन मुक्ति