कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
उत्थानिका ]
(३३)
प्रतियां दी हैं, उन लोगोंने छपी हुई ? । २ प्रतिके साथ अपनी हस्त लिखित प्रतिभी वापस पाने के इरादेसेही दिये हैं ।
इसके अतिरिक्त धर्ममें व्यापारके प्रवेशके कारण एकही कवीरके नाम लेनेवालोंमें निजनिज शाखाओंकी श्रेष्ठता दिखानेके लिये लोभ और तृष्णा द्वारा इतनी स्वार्थ परता और विचारशून्यता आ गयी है कि, जिस प्रकार वंश-घरवालोंने प्रत्येक ग्रन्थोंमें मिलौनी कर, अपनी श्रेष्ठता मानता बढानेके लिये, सबको कालदूत कहना आरंभ कर दिया था, उसी प्रकार अपने को सर्व श्रेष्ठ बतलानेवाली एक शाखाके कुछ अदूरदर्शी व्यक्तियोंने प्रत्येक वाणी-जिनमें धर्मदास साहबका नाम आया है-उसमेंसे धर्मदास शब्दको निकालकर, उसके बदले कुछ और ही रखना आरंभकर दिया है । पुरानी वाणियोंमेंसे धर्मदास-जीका नाम उनने निकाला तो निकाला, किन्तु थोडे दिनोंकी बनी गुरुमहिमामेंसेभी अंतिम साखी जिसमें धर्मदासजीका नाम आता है, निकालकर छपवाया है । यह गुरु महिमा श्रीमहंत शंबुदासजी कृत है ।
इस प्रकार धर्मदासके नामको लुप्त करनेका प्रयत्न सूर्य्यपर धूल डालने के समान है, इससे उनकी शाखाका गौरव नहीं बढता है किन्तु उलटा उनकी निन्दा होती है। भला वह कहाँ तक धर्मदासका नाम मिटानेका प्रयत्न करेंगे। कवीरके साथही साथ धर्मदासका नाम तो इतना अटल अविनाशी हो गया है कि, इन थोडेसे धर्मदास द्वेषियोंके सिवाय सब पंथवाले धर्मदासकी श्रेष्ठताको स्वीकार करते हैं और कवीर धर्मदासके सम्वादवाले ग्रंथोंको पढकर अपना कल्याण चाहते हैं।
ऐसेही सब बातोंको विचारकर इस “कवीरपंथी शब्दावली” के सम्पादनमें मुझे प्रवृत्त होना पडा है।
इस संग्रहमें कई विभाग करके अलग अलग विषयोंको संक्षेपमें दर्शानेका प्रयत्न किया है । जो वाणी प्रत्यक्षमें दूसरोंकी है । उन्हें अगले विभागोंमें रखा है और जिन वाणियोंमें कवीरकेही नाम आते हैं वे सब इकट्ठा संग्रह किया है। इस वाणी जंगलमेंसे खास कवीरकी वाणीको परखनेकी कुंजीभी इसीमें छाप दी है। तथापि पाठकोंको अधिकार है अपने ज्ञान पहुँच और रुचिके अनुसार लाभ उठा सकते हैं ।
कवीरपंथी शब्दावली २
(३४)
[शब्दावली—
इस ग्रन्थमें कई चित्रभी दिये गये हैं। अपने स्वभाव और सदाके नियमके अनुसार जैसी वाणी मिली है वैसेही इस संग्रहमें रख दिया है जैसे पहले मैंने बहुतसे ग्रन्थ छपवाये हैं। वैसेहीशब्दावलीमें भी मैंने अपनी बुद्धी लगाकर विशेष सुधार नहीं किया है। मेरा कामतो जीर्णोद्धार करके डूबतेको बचाना है, अब आगे विद्वान् लोग उसे जैसा चाहें सुधार करें।
कई वर्षोंसे इस कामसे उदासीन रहने पर फिर मुझे इस काममें प्रवृत्त होनेकी आवश्यकता नहीं थी तथापि यह देखकर कि कवीर पंथियोंमें जो विद्वान् कहलाते हैं, उनकी दृष्टिमें तो ये ग्रन्थ और वाणी महान् तुच्छही हैं और साधारण पंथायी लोगोंको धर्म व्यापारके कारण परस्पर तू तू मैं मैं सेही फुरसत नहीं। धनी मानी महन्तोंको अपनी नामबरी और ऐशोआरामसे अवकाश नहीं। सभा सुसाइटी और कॉसिलोंको अपने निरर्थक ध्येयकी दौड धूपसेही फुरसत नहीं।
फिर इन नष्ट प्रायः होनेवाले ग्रन्थ और वाणियोंको जब कोई धनी धोरी नहीं तो मुझसे ही जहां तक बन सके इसमें कुछ कर डालूँ। इसी विचार को लेकर मैं इसमें फिर प्रवृत्त हुआ हूँ।
यद्यपि उपर्युक्त पंक्तियोंकी बातें कुछ लोगोंको कडवी लगेगी तथापि सत्यके अनुरोधसे कहना पडा है। आशा है इस उत्थानिकाके पाठकमुझे क्षमा करते हुए इसके यथार्थ आशयकी ओर ध्यान देंगे।
अन्तमें मुझे कवीरपन्थके माननेवाले और कवीर साहबके वचनपर श्रद्धा रखनेवाले—सबही लोगोंसे—वे चाहे पंथकी किसी शाखाके अनुयायी हों—कहना है कि, ये सीधी साधी भाषामें लिखे, हुए ग्रन्थ और वाणी उपेक्षाके योग्य नहीं हैं। कालके प्रभावसे इनमें धर्मव्यापारके कारण जो भिलौनी हुई है, श्रावणके अन्धोंके समान सदा चैन ही चैन देखनेवालोंकी, अदूरदर्शताके कारण ग्रन्थोंमें सांप्रदायिकता घुस गयी है, यदि उन पक्षपातमय वाणियोंको इन ग्रन्थोंमेंसे निकालकर बाहर कर दिया जाय, तो ये अमूल्य रत्नोंके भण्डार बहुत ही मूल्यवान प्रमाणित होंगे।
यद्यपि “बीजक” सब कवीरपंथियोंका सर्वस्व है तथापि उसमें भी भी सांप्रदायिकताने अपना अधिकार जमा लिया है। मूलकी ओर तो किसीका ध्यान ही नहीं है, टीकाका ही बीजकका सिद्धांत समझकर, साधारणमें पक्षपातका इतना बड़ा आडम्बर फैला हुआ है कि, जो पंथकी जिस शाखाका माननेवाला
उत्थानिका ।]
(३५)
है, उसी शाखाके किसी पुरुषकी की हुई टीकाको सर्व श्रेष्ठ कहकर, चाहे वह किसी दूसरी टीकाकी नकलही क्यों नहो, उसीको यह पढ़ेगा। और ठीक उसी प्रकारकी दूसरी टीकाको बुरा बतलायगा इस प्रकारकी बात, श्रद्धेय पूर्णसाहबकी टीका तथा मेहीदास और प्रागदासकी टीकावालोंसे मिलनेसे साफ २ प्रगट हो जाती है। यद्यपि मेहीदासजी और प्रागदासजीकी टीका पूर्ण साहबकी टीकासेही बनायीं गयीं हैं और रद्दीके भाव विककर पंसादीकी दूकान पर पुडिया बांधी गयी है तथापि जिनके पास वे टीकाएँ हैं वे पूर्ण साहबकी भी भूल निकाल कर अपनी मानी हुई टीकाको सर्व श्रेष्ठ बतलाते हैं।
इसके अतिरिक्त पाठके उलट फेरने भी खासा साम्प्रदायिकताका तांडव नाच नचवा दिया है। साम्प्रदायिक नशामें चूर सब अपनी अपनी शाखाकेही पाठ को सर्व श्रेष्ठ बतलाकर दूसरोंकी सत्यताकी भी उपेक्षा करते हैं इसका कारण मिथ्या पक्षपात ही है। आज कवीर साहबके उपदेशोंका-आश्रय लेकर दूसरे लोग संसारमें बहुत कुछ कर रहे हैं और उनके कामोंको देखकर कुछ समझ-बूझवाले कवीरपंथियोंके मुहमें पानी भर आता है किंतु ऐसा होनेपर भी उनको अपने घरकी पवित्र वस्तुका ध्यान नहीं है और दूसरोंके जूठनको देखकर ललचा ललचा मरते हैं।
प्यारे भाइयो ? सद्गुरुके इस वचन पर जरा गौर करो फिर आपको पता लग जायगा कि, आपके घरमें कैसे २ अमूल्य रत्न भरे पड़े हैं—
सद्गुरु कहते हैं—
“सब सँग रसिये सबसँग बसिये, सबका लीजे नाम ।
हांजी हांजी सबकी कीजे, रहिये अपने ठाम ॥”
अर्थात्—
“वेद आदि विद्या सबै, बोध हेत हिय धार ।”
अथवा—
“सब मत महरम करू, तब देखू निज सैन”
सब कुछ पढ़ो, सब कुछ देखो सब सुनो, सबके साथ प्रीतिके साथ बर-तावा करो, किसीके दिलको मत दुखाओ “आत्मवत्सर्वभूतेषु” के न्यायसे, सबकी सहायता करो किंतु “रहिये अपने ठौर” को मत भूलो; यही गुरुकी
( ३६ )
[शब्दावली-उत्थानिका]
आज्ञा है, यही अपने आत्माको प्रवंचानेसे बचानेका मार्ग है; इस आदर्शको ही सामने रख कर, अपने मानव जन्मको सफल कर सकते हो, यही आदर्श तुम्हें सब प्रकारकी गुलामीकी परतंत्रतासे छुड़ाकर मुक्ति और स्वतंत्रता अर्थात् जीवन मुक्तिका मार्ग दिखा सकता है । सद्गुरु कहते हैं—
अपने अपने धर्ममें, सब सुखलह सब काल ।
निज धर्म जिन अपने गह्यो, सहजे भये निहाल ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—
“स्वधर्मं निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः”
इस लिये प्यारो ! आपकी विद्या और सब दौड धूपकी सफलता इसीमें है कि, आप वर्तमान कालका ध्यान रखते हुए अपने धर्मके भोलेभाले सांप्रदायिक पक्षमें डूबे हुओंको-सत्य कवीरके सच्चे उपदेशके द्वारा बाहर निकालने का प्रयत्न कीजिये. क्योंकि, यह सांप्रदायिक पक्षपात ऐसा बुरा है कि, इसमें पड़े हुए बडी कठिनाईसे सीधे रस्ते पर लाये जा सकते हैं.
उत्थानिका का कलेवर बहुत बड़ाहो गया है. इसलिये विशेष न लिखकर मैं इसे यहाँही समाप्त करता हूँ और आशा करता हूँ कि, सत्य धर्मके अनुयायी महात्मागण इस शब्दावलीको अपनाकर और इसके गुण दोषका विवेचन कर अपना कर्तव्य निबाहेंगे और मुझपर अनुग्रह करेंगे ।
सर्वं सज्जनोंका परमार्थी-कृपाकांक्षी—
बम्बई.
मिति आषाढवदी
१४ सम्बत १९८६. वि
ता० ५।७।२९.
श्रीयुगलानन्दविहारी.
कबीराश्रमाचार्य—
कबीराश्रम (खरसिया.)
विलासपुर
सतसुकृत आदि अदली अजर अचित पुख्य सुनीन्द्र करणामय कबीर
सुरतियोगसंतायन धनी धर्मदासकी दया वंश एकोत्तर की दया ।
कबीर साहब के अधिकारी वर्तमान आचार्य शिरोमणि
श्री १०८ श्रीमहंत काशी दासजी साहब की दया सर्व महंत संतनकी दया ।
अथ कबीर पंथमें प्रचलित—
शब्दावली
मंगलाचरण
( संग्रह कर्ता का )
सतगुरु चरण सरोज रज; बार बार शिर नाय ।
शब्दावलि संग्रह करूं; सतगुरु होहिं सहाय ॥ १ ॥
इसते लाभ क्या—
धर्म, पंथ सब जगतके, ईश ब्रह्मलो जोय ।
शब्द प्रताप ते जानिये, सतगुरुके बल होय ॥ २ ॥
( सतगुरुका स्वरूप शब्दकी महिमा )
सत्यगुरु सत्य कबीर सो, शब्द रूप जगमान ।
धर्मदास सो शिष्य है, शब्द करे पहिचान ॥ ३ ॥
शब्द क्या बतलाता है ?
पापपुण्य अरु धर्म अधर्म, बन्ध मोक्ष लों जोय ।
शब्द प्रकाश ते जानिये, सूझ परत सब कोय ॥ ४ ॥
(३८)
कबीरपंथी-
चार वेद अरु किताब पुनि, शास्त्र हदीस पुरान ।
भुगोल खगोल विज्ञान सब, शब्द प्रमाण ते जान ॥ ५ ॥
विना शब्द जगमें कहूँ, अहै न होवन हार ।
सतगुरु वचन प्रमाण है, मनमें लेहु विचार ॥ ६ ॥
शब्दे मारा गिर पड़ा, शब्दे छोड़ा राज ।
जिन जिन शब्द विवेकिया, तिनका सँबरा काज ॥ ७ ॥
इसलिये-
काज संवारे आपनो, वचन गुरुको मान । ८ ॥
“माने वचन सो वंश है” सतगुरु शब्द प्रमान ॥
परन्तु-
शब्द हमारा आदि का, सुनि मत जाहु सरख ।
जो चाहो निज तत्व को, शब्दे लेहु परख ॥ ९ ॥
इयोंकि-
शब्द विना सुरति आँधरी, कहो कहाँको जाय ।
द्वार न पावे शब्द का, फिर फिर भटका खाय ॥ १० ॥
किन्तु-
शब्द शब्द बहुअन्तरा, सार शब्द मथि लीजे ।
कहैं कबीर जहैं सार शब्द नहीं, धिग जीवन सोजीजे ॥ ११ ॥
सार शब्द पाये बिना, जीवहिँ चैन न होय ।
फन्द काल जेहि लखि पड़े, सार शब्द कहि सोय ॥ १२ ॥
सतगुरु शब्द प्रमान है, कहो सो बारम्बार ।
धर्मनिते सतगुरु कहै, नहिं बिनु शब्द उबार ॥ १३ ॥
संगलाचरण
(३९)
सतगुण वचन
(आगम संदेश)
धर्मनि सार भेद अव खोलौं । शब्दस्वरूपी घटघट बोलौं ॥
शब्दहिं गहे सो पंथ चलावे । बिना शब्द नहिं मार्ग पावै ॥
प्रगटे वचन चूरामनि अंशु । शब्द रूप सब जगत प्रशंसु ॥
शब्दे पुरुष शब्द गुरुराई । बिना शब्द नहिं जिवसुकताई ॥
जेहिते मुक्त जीव हो भाई । सुकतामनि सो नाम कहाई ॥
इतलिये-
शब्द कहै सो कीजिये, गुरुवा बडे लबार ।
अपने अपने स्वार्थको, ठौर ठौर बटमार ॥
ताते धर्मनिकर परचारा । बिना शब्द नहिं जीव उबारा ॥
शब्द गहे सो पंथ चलावे । बिना शब्द नहिं सत्य लखावे ॥
शब्द गहेसो भौ जलपारा । बिना शब्द नहिं जीव उबारा ॥
याते शब्द सनेही कीजै । जीवन जन्म सुफल करिलीजै ॥
ताते संग्रह कीन्ह यह, शब्दावलि धरि नाम ।
गुरु संतनको वन्दगी, बारबार परनाम ॥
॥ इति भङ्गलाचरण ॥
आगम संदेश जिसको चाहिये. इस पतेसे संग्रह सकता है. इसमें पंथका मविष्य पुरापुरा वर्णन है. मिलनेका पता—स्वामी श्रीगुलानन्द विहारी, कबीराश्रम पो खरसिया स्टेशन जि० विलासपुर. सी. पी. ॥
सत्यमुकृत आदि अदली अजर अचिन्त पुण्य
मुनीन्द्र कल्याणमय कबीर सुरति योग
सन्तायन धनी धर्मदासकी दया
सर्व सन्त महन्तांकी दया ।
अथ कबीरपंथी-शब्दावली
प्रथम खण्ड-प्रथम विभाग :
संज्ञा सुभिरन-प्रारम्भः
साखी
गुरुको कीजे दण्डवत, कोटि कोटि परनाम ।
कीट न जाने भुंगको, वह करले आप समान॥
संज्ञा गौरी ( समय सुर्यास्त )
गुरुसों लगन कठिन है भाई ॥
लगत लगे बिनु काज न सरिहै, जिय परलेतर जाई ॥
मृगा नाद शब्दका भेदी, शब्द सुनन को जाई ॥
सो शब्द सुनि प्राण दान दे, नेक न तन को डराई ॥
तजि गृहबार सती एक निकसी, सत् करन को जाई ॥
पावक देख डरे नहिं मनमों, कूदपरे सर माई ॥
पपिहा स्वाति-बुन्द के कारण, पिया पिया रट लाई ॥
च्यासे प्राण जाय क्यों न अबहीं, और नीर नहिं भाई ॥
शब्दावली
(४१)
दोय दल आनि जुरे जब सनमुख, सूरा लेत लड़ाई ॥
टूक टूक है गिरे धरणि में, खेत छाड़ि नहीं जाई ॥
छाडे अपने तन की आशा, निरभय है गुण गाई ॥
कहें कबीर ऐसी लव लावे, सहज मिले गुरु आई ॥ १ ॥
साखी
काल खडा शिर ऊपरे, जागु विराने गीत ।
जाका घर है गैलमें, सोव कस सोव निचित ॥
॥ गौरी ॥ २ ॥
॥ सकल तजि नाम सुमिर रे भाई ॥
माटी के सँग माटी मिलिहै, पवन में पवन समाई ॥
जतन जतन कर सुत को पाले, काचा दूध पिलाई ॥
सो बेटा रे काल है बैठे, बाबा कहत लजाई ॥
जो तिरिया मुख बिरिया खवाती, सोवत अंग लगाई ॥
सो तिरिया मुख मोरके बैठी, टूटिगयी सगम सगाई ॥
जो देहिया पर नीर पखारे, चोवा चँदन लगाई ॥
सो देहिया पर काग उड़त हैं, देखत लोग घिनाई ॥
झूठी काया झूठी माया, झूठी लोग लुगाई ॥
कहें कबीर सुनो भाइ साधू, झूठ जगत पतियाई ॥ २ ॥
साखी
साधु हमारे आतमा, हम साधुनके जीव ।
साधुन मध्ये यों रमूँ, ज्यों पय मध्ये घीव ॥
गौरी ॥ ३ ॥
॥ दासपर नाम ध्वजा फहराई ॥
काल जंजाल निकट नहीं आवै, माया देखि डराई ॥
जो कोई दाससे द्रोह विचारे, प्रभु को नाहि सोहाई ॥
हिरण्यकुश की वा गति हो गई, रावण धूर उड़ाई ॥
(४२)
कबीरपंथी—
दुरयोधन परिच्छित राजा, फिर पाछे पछताई॥
सुर पण्डित औ नृपति बादशाह, ऊंची पदवी पाई ॥
भक्ति बिना सब तुच्छ बराबर, बांधे यमपुर जाई ॥
का भये वेद पुराण गुन गाये, सत्य दया नहिं आई ॥
अहंकारमें सबहिं भुलाने, अजगर जनम सो पाई ॥
हम तो कान राखी नहिं भाई, ज्यों का त्यों ठहराई ॥
भावे कोई दुख सुख करि माने, भक्ति के पंथ चलाई ॥
योग, यज्ञ, तीरथ, व्रत, संयम, करनी कोटि कराई ॥
नाम बिना सबही है खाली, कहैं कबीर समुझाई ॥ ३ ॥
संगीतरत्नमालामें यही पद इस प्रकार हैं—
ध्वनी गौरी वृन्दावनी (समय सूर्यास्त)
॥ दास पर नाम ध्वजा फहराई ॥ काल जाल निकट नहिं
आवे, माया देखि डराई ॥ जो कोई दाससो द्रोह विचारे,
प्रभुको नाहिं सुहाई ॥ हरनाकुशकी वह गति हो गई, रावण धूर
उड़ाई ॥ सुर ब्रह्मा नृप अरु इन्द्रकी, ऊंची पदवी पाई । भक्ति
बिना सब तुच्छ बराबर, बांधे यमपुर जाई ॥ कहैं भयो वेद
पुरान पढ़े से, घट महे दया न आई । अहंकारसे भवमें डूबे,
अजगर तन धरि भाई ॥ हमनहिं कान करी काहू की, ज्यों को
त्यों दर्शाई । चाहे कोई सुख कोई दुःख मानो, सत्य कहौं
गोहराई ॥ योग यज्ञ तीरथ व्रत संयम, साधन कोटि कराई ।
विनु गुरु सफल होत नहिं कबहुँ, कहे कबीर समुझाई ॥
साखी ।
नाम लिया तिन सब लिया, सकल वेदका भेद ।
बिना नाम नरके गये, पढ़ि पढ़ि चारों वेद ॥
गौरी ४ ।
॥ बंदे नाम साहेब का ले रे ॥ एक लख पूत सवा लख
नाती, संपति थिर ना रहे रे ॥ लंका ऐसे कोट विनशि गये, छिन
शब्दावली
(४३)
में ऐसो बाव बहे रे ॥ न कोई तेरा तू ना किसी का, पैडोई खलक बहे रे ॥ नदी नाव संयोग जुरो है, ऐसो मिलना हैरे ॥ मातु पिता सुत बंधू तिरिया, कोई न संग चले रे ॥ ये सब हैं स्वारथ के संगी, गुरु विन सुख न लहे रे ॥ छिनकमाहिं तन विनशि जायगा, फिर कछु करिना सके रे ॥ ताते वेग सम्हार अपनपौ, साहेब कबीर कहे रे ॥ ४ ॥
साखी ।
साहब से सब होता है, बन्दे से कछु नाहिं ॥
राई सो परवत करे, परवत राई माहिं ॥
- गौरी ५ ।
॥ अवधू कुदरत की गति न्यारी ॥ रंक निवाज करै वह राजा, भूपति करै भिखारी ॥ एते लौंग फल नहिं लागे, चंदन फूल न फूला ॥ मच्छ शिकारी रमे जँगल में, सिंह समुद्रहिं झूला ॥ रेंड-हख भयो मलयागिर, चहुँदिशि फूटी बासा ॥ तीन लोक ब्रह्मण्ड खण्डमें, अंधा देख तमासा ॥ पंगुल मेरु सुमेर उलंघे, त्रिभुवन मुक्ता डोले ॥ गुंगा ज्ञान विज्ञान प्रकासे, अन-हद बानी बोले ॥ अकाशहिं बांधि पताल पठावै, शेष र्वर्ग पर राजे ॥ कहैं कबीर राम हैं राजा, जो कछु करे सो छाजे ॥ ५ ॥
आरती प्रारम्भ ।
आरती ॥ १ ॥
जय जय सत्य कबीर । सत्यनाम सत मुक्त; सत रत सत कामी । विगत क्लेश सत धामी, त्रिभुवनपति स्वामी ॥ टेक ॥ जयति जय कबीरम्, नाशक भव भीरम् । धरचो मनुज शरीरम्, शिशु वर सरतीरम् ॥ जय २ ॥ कमल पत्र पर शोभित, शोभाजित कैसे । नीलाचल पर राजित, मुक्तामनि जैसे
- नोट -और बहुतसी गौरी आगे दिया है सो देखना चाहिये सूचीमें देखनेसे पता मिलेगा ।
(४४)
कबीरपंथी—
॥ जय २ ॥ परम मनोहर रूपम्, प्रमुदित सुखरासी । अति
अभिनव अविनाशी, काशी पुर वासी ॥ जय २ ॥ हंस उबारन
कारन, प्रगटे तन धारी । पारखरूपविहारी, अविचल अधिकारी
॥ जय २ ॥ साहब कबीर की आरति, अगनित अघहारी ।
धर्मदास बलिहारी, सुद मंगल कारी ॥ जय २ ॥
आरति ॥ २ ॥
जय जय श्रीगुरुदेव ।
पारख रूप कृपालम्, सुदमय त्रैकालम् । मानस साधु मरा-
लम्, नाशक भव जालम् ॥ जय २ ॥ कुन्द इन्दु वर सुन्दर,
सन्तन हितकारी । शान्ताकार शरीरम्, श्वेताम्बर धारी
॥ जय २ ॥ शुभ्र सुकुट चर्कांकित, मस्तक पर सोहै । विमल
तिलक युत भृकुटी, लखि सुनिमन मोहै ॥ जय २ ॥ हीरा
मणि सुक्तादिक, भूषित उर देशम् । पद्मासन सिंहासन, स्थित
मंगल वेषम् ॥ जय २ ॥ तरुण अरुण कञ्जांघ्रि, त्रिभुवन वश
कारी । तम अज्ञान प्रहारी, नख छुति अति भारी ॥ जय २ ॥
सत्य कबीर की आरति, जो कोइ गावै । सुक्ति पदारथ पावै,
भवमै नहिं आवै ॥ जय २ ॥
आरती ॥ ३ ॥
संज्ञा आरतीनाम तुम्हारे । अनहद ध्वनि गुरुज्ञान विचारे ॥
ततकर तेल दयाकर दीपा । ब्रह्मअग्नि मन पवन समीपा ॥
पांचो बाती निरमल बारो । सुरति चैँवर ले सनमुख ठारो ॥
प्रेमकर पुहुप धूप धर ध्याना । चित चंदन घसि आगे आना ॥
अविगतरूप अघर परकासा । आरति गावे कविर धर्मदासा ॥
आरती ॥ ४ ॥
संज्ञा आरति करे गुरुसेवा । संपुट खोल मिले गुरुदेवा ॥
तेजपुंजकी ज्योति उजियारा । घंटा झाँझ बजे अधिकारा ॥
शब्दावली
(४५)
अनहद शब्द अखंडित होई । अगवासमें रहे समोई ॥
सुकृत अंश पुरुष को ध्यावे । सतगुरुचीन्ह चरण चितलावे ॥
मनबच कर्म जो आरतिगावे । कहे कबीर सतलोक सिधावे ॥
आरती ॥ ५ ॥
संज्ञाआरति सुकृत कीन्हा । हंस उबरि अपन करलीन्हा ॥
गगनमंडलबिच फुल्य कफुला । तर भी डार उपर भी मूला ॥
गगनमंडलबिच आरति साजे । सोहैं हंसा आन विराजे ॥
तत निहतत मैं जाय समाना । देखहु दीप अघर अस्थाना ॥
कहैं कबीर सुनु साधो भाई । अजर अमर घर रहो समाई ॥
आरती ॥ ६ ॥
संज्ञा आरति करो विचारी । कालहृत जम रहे झखमारी ॥
खुलगइ सुषमन कूंचीतारा । अनहदशब्द उठे झनकारा ॥
सुरत निरत दोय उलटिसमावै । मकरतार जिहिं डोर लगावै ॥
उनसुन शब्द अगम घर होई । अचाह कँवलमें रहे समोई ॥
विगसित कमल होय परगासा । आरतिगावै कविर धर्मदासा ॥
आरती ॥ ७ ॥
संज्ञाआरति सुकृति सँजोई । चरणकमल चित राखु समोई ॥
तिरगुन तेल तत्वकी बाती । ज्योति प्रकाश भरे दिनराती ॥
शून्य शिखर पर झाझर बाजे । महापुरुष घर राज विराजे ॥
शब्दसरूपी आप विराजे । दर्शन होत सकल भ्रम भाजे ॥
प्रेमप्रीति कै सेवा लावै । गुरुगम हो परम पद पावै ॥
सुख अनंद है आरति गावै । कहैं कबीर सतलोक सिधावै ॥
संज्ञासाखी
‘कबीर’ संज्ञासुभिरन आरती, भजन भरोसे दास ।
मनसा बाचा कर्मना, जबलग घटमें श्वास ॥ १ ॥
श्वास श्वास में नाम ले, बूथा श्वास जनि खोय ।
ना जानो यहि श्वास को, आवन होय न होय ॥ २ ॥
(४६)
कबीरपंथी—
श्वासा की कर सुमिरनी, कर अजपा को जाप ।
परम तत्त्व को ध्यान धर, सोऽहं आपै आप ॥ ३ ॥
सोऽहं पोषा पवन में, बांधा मेरु सुमेर ।
ब्रह्मगांठ हिरदय धरो, यहि विधि माला फेर ॥ ४ ॥
माला है निज श्वास का, फेरेंगे कोइ दास ।
चौरासी भरमें नहीं, कटे करमकी फांस ॥ ५ ॥
सदगुरु मोहिं निवाजिये, दीजे अम्मर बोल ।
शीतल शब्द कबीर का, हंसा करें कलोल ॥ ६ ॥
'हंसा' मत डरपो काल से कर मेरी परतीत ।
अमरलोक पहुँचाइहौं, चलो सो भौजल जीत ॥ ७ ॥
भौजल में बहु काग हैं, कोइ कोइ हंस हमार ।
कहे कबीर धर्मदास सो, खेड़ उतारो पार ॥ ८ ॥
अविनासी की आरती, गावैं सत्य कबीर ।
कहैं कबीर सुर नर सुनी, कोइ न लागे तीर ॥ ९ ॥
सांझ भये दिन आथवे, चकई दीन्हौं रोय ।
चल चकवा तहैं जाइये, रैन दिवस ना होय ॥ १० ॥
रैन की बिछुरी चाकई, आन मिली परभात ।
जो जन बिछुरे नाम से, दिवस मिले नहिं रात ॥ ११ ॥
हौं कबीर विचलों नहीं, शब्द मोर समरत्थ ।
ताहि लोक पहुँचाइहौं, चढ़ै शब्द के रत्थ ॥ १२ ॥
तर ऊपर धर्मदास है, जती सती को रेख ।
रहता पुरुष कबीर है, चलता है सब भेष ॥ १३ ॥
भेष बरोबर भेष है, भेद बरोबर नाहिं ।
तौल बरोबर घूँघची, मोल बरोबर नाहिं ॥ १४ ॥
शब्दावली
(४७)
निर्विकार निर्भय तुही, और सकल भय माहिं ।
सबपर तेरी साहिबी, तुझ पर साहेब नाहिं ॥ १५ ॥
भय भञ्जन दुख परिहरन, अम्बर करन शरीर ।
आदि युगादि आप हौ, अदली अदल कबीर ॥ १६ ॥
विनवतहों कर जोरि के सुनु गुरु कृपानिधान ।
संतन का सुख दीजिये, दया गरीबी जान ॥ १७ ॥
दया गरीबी वन्दगी, समिता शील सुभाव ।
इतने लक्षण साधुके, कहैं कबीर विभाव ॥ १८ ॥
बहुत दिननसे जोहता, बाट तुम्हारी राम ।
जिव तरसे तुव मिलनको, मन नाहीं विश्राम ॥ १९ ॥
सो दिन कैसा होगा, गुरु गद्दोगे बांह ।
अपना कर बैठावगे, चरण कमल की छांह ॥ २० ॥
क्या मुखले विन्ती कहुँ, लाज आवत है मोहि ।
हमतो औगुन बहु किये, कैसे भावो तोहि ॥ २१ ॥
सुरति करु मोरि साइयाँ, हम हैं भव जल माहिं ।
आपेही बहिजायँगे जो नहिं पकडो बांहि ॥ २२ ॥
मैं अपराधी जनम का, नख सिख भरा विकार ।
तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो उबार ॥ २३ ॥
औगुन मेरे बापजी, बखशो गरीब निवाज ।
जो हौं पूत कपूत हौं, तोहु पिताको लाज ॥ २४ ॥
साहब तुम जनि वीसरो, लाख लोग लगि जाहिं ।
हम सन तुम्हरे बहुत हैं, तुम सन हमरे नाहिं ॥ २५ ॥
कर जोरे विन्ती कहुँ, भवसागर आपार ।
बन्दा ऊपर मिहर करी, आवागमन निवार ॥ २६ ॥
(४८)
कबीरपंथी-
अन्तरजामी एक तू, आतम के आधार ।
जो तू छाडे साथको, कौन उतारे पार ॥ २७ ॥
अबकी जो साई मिले, सब दुख आँखों रोय ।
चरणों ऊपर शिर धरूँ, कहूँ जो कहना होय ॥ २८ ॥
साहब तुमहिं दयाल हो, तुम लग मेरी दौर ।
जैसे काग जहाज को, सुझे और न ठौर ॥ २९ ॥
मुझमें अवगुन तुझहि गुन, तुझगुन अवगुन मुझ ।
जो मैं विसरूँ तुझको, तू नहिं विसरे मुझ ॥ ३० ॥
तेरे विसरे क्यों बने, मैं किस शरने जाँव ।
शिवविरंचि मुनि नारदा, तिन हृदय नसमाव ॥ ३१ ॥
मैं तो भूल बिगारिया, जनिकर मैला चित्त ।
साहब गुरुवा चाहिये, नफर विगारे नित्त ॥ ३२ ॥
औगुन किया तो बहु किया, करत न मानी हार ।
भावे बन्दा बखशिये, भावे गर्दन मार ॥ ३३ ॥
साई केरा बहुत गुन, औगुन एको नाहिं ।
जो दिल खोजा आपना, सब अवगुनमुझ माहिं ॥ ३४ ॥
मुझमें गुन एको नहीं, जान राय शिर मौर ।
तेरे नाम प्रतापसे, पाऊँ आदर ठौर ॥ ३५ ॥
मैं खोटा साई खरा, मैं गादा मैं गारि ॥
मैं अपराधी आत्मा, साई सरन उबारि ॥ ३६ ॥
और पतित तो कूप हैं मैं हूँ समुद्र समान ।
मोहि टेक तोहि नामकी, सुनियो कृपानिधान ॥ ३७ ॥
अवसर बीता अलप तन, पीव रहा परदेश ।
कलंक उतारो रामजी, भानो भरम संदेश ॥ ३८ ॥
शब्दावली
(४९)
साई मोर सावध अहै, मैही भया अचेत ।
मन बच कर्म न हरि भजा, ताते निरफल खेत ॥ ३९ ॥
मन परतीत न प्रेमरस, ना कोइ तनमें ढंग ।
ना जानो वा पीवसो, कयोंकर रहसी रंग ॥ ४० ॥
साई तो जब मिलेंगे, पूछेंगे कुशलात ।
आदि अन्तकी सब कहूँ, उरअन्तरकी बात ॥ ४१ ॥
अब सागर तो भारी भया, गहरा अगम अथाह ।
तुम दयाल दयाकरो, तब पाऊँ कछुथाह ॥ ४२ ॥
सतगुरु बडे दयाल हैं, संतनके आधार ।
भव सागर अथाहसो, खेइ उतारें पार ॥ ४३ ॥
विज्ञानतोत्र
सत्य सत्यके नामसों सत्य सागर भरा, सत्यके नाम तिहुँ
लोक छाजा ॥ सन्तजन आरति करें प्रेमतारी भरेँ, ढोलनिश्शान
मिरदंग बाजा ॥ भक्ति सांची किया नाम निश्चैलिया, शून्यकी
शिखर ब्रह्माण्ड गाजा ॥ सत्य कवीर सर्वज्ञ साहब मिले; भजो
सत्यनामका रंक राजा ॥ कबीर, हम दीन दुनी दरवेशा । हम
किया सकल परवेशा ॥ हम दुवा सलामत लेखा । हम शब्द
सरूपी पेखा ॥ हम रुंध मुंड में फीरा । हम फाका फकर
फकीरा ॥ हम रमे कौन की नाल । हम चलैं कौन की चाल ॥
हम सरबझी सहजे रमे, हमरी वार न पार ॥ वार भी हमही पार
भी हमही, नाना दरिया तीर ॥ सकल निरंतर हम रमे, हम
गहिरे गहर गंभीर ॥ खाली खलक खलक के माँही, यों गुरु
कहैं कबीर ॥ सत्यनाम की आरती, निरमल भया शरीर ॥ सत
सुकृत लौलीन है, ज्ञान ध्यान लो थीर । “धर्मदास लोके गये
गुरु बहिंयां मिले कबीर” धर्मदास लोके गये, छाड़ि सकल
(५०)
कबीरपंथी—
संसार ॥ हंसन पार उतारहीं, गुरु धर्मदास परिवार ॥ अजावन से जावन भया, जावन से भयै मूल ॥ चहुँ दिशि फूटी बासना रही कली में फूल ॥ जब फूले तब गिरि पडे, चरन कमल की धूर ॥ कली फावरी हो रही साहब हाल हजूर ॥ कबीर मिले धर्मदासको, लिख परवाना दीन्ह ॥ आदि अन्त की बीनती, यही लोक को चीन्ह ॥
“ बिना देह साहब निरालम्ब जानी ”
अति लौलीन चीन्हन्त ज्ञानी । शब्देसरूपी सुनाकाशवानी ॥ जानेजनावैकहावैन देवा । ऐसातत्वपुजेपुजावैलगावै न सेवा ॥ सदाध्यानधारी अखंडेनिगसा । सदासिंधुपीवै न जावेपियासा ॥ प्रेमधामधीरा उदासी अकेला । लौलीन योगी गुरु ज्ञान मेला ॥ मिलन्ताचलन्तारहन्ता अपारी । ऐसीदृष्टिदेखोअनंतोविचारी ॥ सदा चेत चेतंत चितवंत सूर। ऐसा रूयाल खेलंत बूझंत पूरा न ज्ञानो न ध्यानो न मान मानों । नहीं चंद्र तारा ऊगे न भानो ॥ आगे न पीछे न मध्ये न कोई । ज्यों काजला ब्रह्म त्यों तत सोई ॥ डारो न मूलो न वृक्षो न छाया । जीवो न शीवो न कालो न काया ॥ दृष्टी न मुष्टी न देवी न देवा । जापो न थापो न पूजा न सेवा ॥ नहीं पौन पानी न चंदे न सूर। अखंडित ब्रह्म सोई सिद्धपूरा । हमनाहीं तुमनाहीं बंधू न भाई । निराधार आधार रंको न राई ॥ गावै न ध्यावै न हेली न हेला । नारी न पुरुषो न खेली न खेला ॥ नहीं पेट पुष्टि न पावों न माथा । न जीवो न शीवो न नाथो अनाथा ॥ शेषो महेशो गनेशो न ग्वालं । गोपी न ग्वाले न कंसे न कालं ॥ आसे न पासे न दासे न देवा । आवै न जावे लगावै न सेवा ॥ नहीं वार पारे न नियरे हजुर। ज्योंका त्यों तत्त गहिरे गंभीरा ॥ यंत्रे न मंत्रे न दरदे
शब्दावली
(५१)
न थोका । नरके न सरगे न संसे शोका ॥ सेते न पीते न सञ्जे
न लालं । गोरै न सँवरे न बृद्धे न बालं ॥ भेदा अभेदा न खेदा
न कोई । सदा सुरति सोहँग एकै न दोई ॥ जाने जनावे जनावे
न झूरा । वारे न पारे न नियरे हजूर ॥ नादे न विंदे न जिदे न
जीवा । निरंतर ब्रह्म एकै शक्ती न शीवा ॥ नहींयोगयोगी न भोगी
न भुक्ता । सच्चिदानंदसाहब बंधो न मुक्ता ॥ खेले खेलावै खेलावे
औ खेले । चेत चेतावे चेतावे औ चेत ॥
“एके अनेके अनेके सो एकै”
चितगुण चित विलास दास सो अंतर नाही । आदि अंत
में मध्य गोसाई अगह गहन में नाही ॥ गहनीगहिए सो कैसा,
सोहं शब्दसमानआदिब्रह्मजैसेका तैसा ॥ “कहैं कबीर हम खेलैं
सहज सुभावा” अकह अडोल अबोल सोहं समिता । तामो आन
बसा एकरमिता ॥ वा रमता को लखे जो कोई । ता को आवा-
गमन न होई ॥ “ओऽहं सोऽहं सोहं सोई ।”
ओहम्म कीलक सोहम्मवाला । ओऽहं सोऽहम्म बोले रिसाला ॥
किलक कमत कंमोद कंकवत, ये चारों गुरु पीर ॥ धर्मदास
को शब्द सुनायो, सतगुरु सत्य कबीर ॥ बाजा नाद भया पर
तीत । सतगुरु आये भौजल जीत ॥ बाजबाज साहब का राज
मारा कूटा दगाबाज ॥ हाजिरको हजूर गाफिलको दूर हिंदूका
गुरुमुसलमानका पीर “सात द्वीत नौखंड में, सोहं सत्यकबीर”
इति श्रीविज्ञानस्तोत्र समाप्तः ।
दयासागरस्तुति ।
गुरु दयासागर ज्ञान आगर, शब्दरूपी सतगुर । तामु चरण
मरोज बंदों, सुखदायक सुखसागर ॥ योगजीत अजीत अम्मर,
(५२)
कबीरपंथी—
भाषते सत सुकृतं । दयापाल दयाल स्वामी, ज्ञानदाता इस्थितं ।
क्षमाशील संतोष समिता, आनंदरूपी हिरदयं । सहजभाव विवेक
इस्थिर, निरमाया निहसंशयं ॥ निरमोही निरवैर निरभै, अकथ
कथिता अविगतं ॥ उपकार औ उपदेशदाता, मुक्तिमार्ग सत-
गुरं ॥ दास भाव की प्रीति बिनती, भक्ति करन करावनं ।
चौरासी बन्धन कर्म खण्डन, बन्दीछोर कहावनं ॥ त्रिगुणरहिता
सत्य बकता, सत्लोक निवासितं । सतपुरुष जहाँ सत्साहब,
तहाँ आप विराजितं ॥ युगन युगन सतपुरुष आज्ञा, जीवन
कारण पगुधरं । दीन लीन अचान ह्वैके, जगतमें डोलत फिरं ॥
करुणामय कवीर केवल, सुखदायक सर्व लायकं । जम भयंकर
मान मरदन, दुखित जीव सहायकं ॥
जीवके उद्धारका मार्ग
धर्मदास करजोर बिनवे, दया करो मन बसकरं । कहूँसेवा
गुरुभक्ति अविचल, निसदिनअराधोसुमिरणं ॥ सदगुरु की अधिक
महिमा, ज्ञान कुण्ड नहाइये । भ्रमति मन तब होय स्थिर, बहुरि
न भौजल आइये ॥ साधुसन्त की अधिक महिमा, रहनि कुण्ड
नहाइये ॥ काम कोष विकार परिहरि बहुरि न भौजल आइये ।
दासतनकी अधिक महिमा, सेवाकुण्ड नहाइये ॥ प्रेमभक्ति पति
व्रत हटकरि, बहुरि न भौजल आइये । योगीजन की अधिक
महिमा, मुक्तिकुण्ड नहाइये । चन्दसूर मन गगन थिरकरि,
बहुरि न भौजल आइये ॥ श्रोता बक्ता की अधिक महिमा,
विचारकुण्ड नहाइये । सारशब्दनिवेरि लीजे, बहुरि न भौजल
आइये । गुरु साधुसन्त समाज मध्ये, भक्ति मुक्ति हटाइये ।
सुरतिकर सत्लोक पहुँचे, बहुरि न भौजल आइये ॥ धर्मदास
प्रकाश कीन्हो, अकह कुण्ड नहाइये । सकल कलविष धोय