कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 44, कुल 968 में से
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कबीरपंथी-
चार वेद अरु किताब पुनि, शास्त्र हदीस पुरान ।
भुगोल खगोल विज्ञान सब, शब्द प्रमाण ते जान ॥ ५ ॥
विना शब्द जगमें कहूँ, अहै न होवन हार ।
सतगुरु वचन प्रमाण है, मनमें लेहु विचार ॥ ६ ॥
शब्दे मारा गिर पड़ा, शब्दे छोड़ा राज ।
जिन जिन शब्द विवेकिया, तिनका सँबरा काज ॥ ७ ॥
इसलिये-
काज संवारे आपनो, वचन गुरुको मान । ८ ॥
“माने वचन सो वंश है” सतगुरु शब्द प्रमान ॥
परन्तु-
शब्द हमारा आदि का, सुनि मत जाहु सरख ।
जो चाहो निज तत्व को, शब्दे लेहु परख ॥ ९ ॥
इयोंकि-
शब्द विना सुरति आँधरी, कहो कहाँको जाय ।
द्वार न पावे शब्द का, फिर फिर भटका खाय ॥ १० ॥
किन्तु-
शब्द शब्द बहुअन्तरा, सार शब्द मथि लीजे ।
कहैं कबीर जहैं सार शब्द नहीं, धिग जीवन सोजीजे ॥ ११ ॥
सार शब्द पाये बिना, जीवहिँ चैन न होय ।
फन्द काल जेहि लखि पड़े, सार शब्द कहि सोय ॥ १२ ॥
सतगुरु शब्द प्रमान है, कहो सो बारम्बार ।
धर्मनिते सतगुरु कहै, नहिं बिनु शब्द उबार ॥ १३ ॥