कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(२९०)
कवीरपंथी—
वही देशसे, भई परदेशी नार । वह मारगमें भूलिया, बिसर गई
निज नाह ॥ जुगन जुगन भरमत फिरे, जमके हाथ बिकाय ।
करजोरि बिनती करो, माहि मिलके बिछुर मत जाव ॥ विषम नदी
बिकराल है, वाहित करिया धार । मोह मगरके घाटमें, खाये
सुर नर झार ॥ शब्द जहाज कवीरका, सतगुरु खेवनहार ॥
कोइ २ हंस उबारहीं, पलमें लेहिं गोहार ॥
साखी—चली जु पुतली नोनकी, थाह सिन्धुकी लैन ।
आपन गल पानी भई, उलट कहे को बैन ॥ ३ ॥
कौन मिलावै जोगिया, जोगिया विन रहो न जाय हो ॥
हों हरनीं पिय पारथी, मारा शब्दका बान । जाहि लगे सो जानिया,
और दरद नहिं आन ॥ पिय कारन पियरी भई, लोग कहे तन
रोग । जप तप लंघनमें करो, पिया मिलनके योग ॥ हुं तो प्यासी
पीव की, रटों सदा पिव पीव । पिया मिले तो जीविहों, ना तो
(सहजे) त्यागों जीव ॥ कहैं कवीर सुन जोगिनी, तनही में मनही
समाय । पिछली प्रीतके कारने, (जोगी) बहुरि मिलेंगे आय ॥
साखी—अस बीरा प्रताप बल, प्रबल काल ते होय ।
जेह सतगुरु बहियां मिले, हंस न जाय बिगोय ॥ ४ ॥
हंसा डुरमत छोड़ दे तूं तो, निर्मल होय घर आव हो ॥
दूधहि से दधि होत है दधि, मथ माखन होय । माखनसे घृत
होत है, बहुर न छाँछ समोय ॥ ऊँखहिसे गुड़ होत है, गुड़से
खाँड होइजाय । सतगुरु मिल मिसरी भये, बहुरि न ऊँख समाय ॥
खाँड जो बगरी रेतमें गजमुख, चुनी न जाय । जात बरण कुल
खांय के, चींटी होय चुन खाय ॥ दाग जो लागा नीलका, नौ मन
साबुन धोय । कोट यतन परमोधिये, कागा हंस न होय ॥ कहैं
कवीर सुन केशवा, तेरी गत अगम अपार । बाप बिनोरा हो रहे,
पूत भये चौतार ॥
शब्दावली
(२११)
साखी-बीरा पद जिन जानहु, पुरुष नाम निजमूल ।
जा दिन हंसा तन तजै, मेटै संशय शूल ॥ ६ ॥
शब्दसनेही हंसा तुम, जग तज होहु न्यारा हो ॥ सतशब्द
निज डोर है, तुम हंसा गहो बनाय । सतबीरा निज नाम है, (तुम)
चाखतही घर जाव ॥ बिना बीज को जामि है, बिन अंकुरको
झाड़ । बिन डोडी फल लागिया, कोइ साधू करे बिचार ॥
अजर केर अंकुरा भये, अजर केर लागी डार । अजर फूल फल
लागिया, (कोइ) साधू करे अहार ॥ मोहि अजर कर जानहु,
अमर देऊं बताय । जेहि भांडे निज साँच है, (हम) तामो रहें
समाय ॥ कहें कवीर धर्मदास सो, बेग जाहु संसार । सोहँगमके
बाँह से, (तुम) हंस उतारो पार ॥
साखी-उत्तर घाटी उत्तरे, पांजी बैठे जाय ।
तहवां सुर्त समावै, पुरुषके परसे पाय ॥ ६ ॥
चौपड़ ।
चल सखी चौपड़ खेलिये, तन मनसे बाजी लाय हो ॥
चौपड़ खेलौं सुन्नमें, खेलौं दिन औ रात । चल हंसा घर आपने,
जहां तेरी उतपात ॥ चौपड़ खेलौं पीवसे, बाजी लगावों जीव ।
जो हारों तो पीव की, जो जीतों तो पीव ॥ चार गली घर एक है,
चार बरन एक सार । पासो ढारा प्रेमका, जीत चली सोई नार ॥
चौपड़िया के खेलमें, जुग नाहनेको दाव । नरु अकेली हो रही,
छिन पल खावे घाव ॥ चौरासी घर भस्मके, पौमें अटकी आय ।
अबकी पौं जो ना परे तो, फिर चौरासी जाय ॥ पगरासे बाजी
लगी, परे अठारा दाव । सार गँवाई हाथसे, सिर पर लागे घाव ॥
जात बरन कुल मेटिके, पाये भक्ति अटूट । कहें कवीर धर्मदा-
ससों, कोई न पकड़े खूट ॥
(२९२)
कवीरपंथी—
साखी—मैं कवीर बिचलों नहीं, शब्द मोर समरन्थ ।
जाको लोक पठाइया, चढे शब्दके रथ ॥ ७ ॥
ज्ञान रतनकी आंखिया, तुम देखो जमके जाल हो ॥
जमके फंदा काटो हंसा, जग तज होहु न्यार । सतगुरु दर्शन
देयँगे, तुम उतरो भौजल पार ॥ जो तुम हंसा निर्गुन चाहो,
सर्गुन करो बिचार । निर्गुन सर्गुन छोड़िके, ( तुम ) दोउ तज
होहु न्यार ॥ अष्ट कमल दल ऊपरे, भँवर गुफाके घाट । सहस
पंखुरीको कमल है, पश्चिम दिशाके बाट ॥ नौ खंड हेत बिसारो
हंसा, शब्द सुरत चित धार । कहैं कवीर धर्मदाससों, तुम उतरो
भौजल पार ॥
साखी—नाद संघाती कवीर हो, बिंदहि देहु न भार ।
जुग जुग हंस हिरम्मर, नाद उबारन हार ॥ ८ ॥
बीकाकी आरती ।
मंगलरूप आरती साजे, अभय निशान ज्ञान धुन गाजे ॥
टे० ॥ अक्षे वृक्षकी अमर छाया । प्रेम प्रताप अमृत फल पाया ॥
निसि बासर जहाँ सूर न चंदा । परम पुरुष जहाँ करत अनंदा ॥
तन मन धन जिन अर्पन कीन्हा । पुरुष पुरुष परमात्म चीन्हा ॥
जरा मरनकी संसे मेटो । सुरत संतायेन सतगुरु भेटो ॥ कहैं
कवीर हिरंमर होई । निरख नाम निज चीन्हे सोई ॥
मंगल ।
बनजारिन बिनती करें सुन साजना । ( साधो ) नरियर लीन्हो
हाथ संत सुन साजना ॥ बिना बीजको वृक्ष है सुन साजना ।
( साधो ) बिन धरती अंकूर संत सुन साजना ॥ जाको मूल
पताल है संत सुन साजना । ( साधो ) नरियर सीस अकाश संत
सुन साजना ॥ बिना भेद जनि मोरहु सुन साजना । ( साधो )
जीव इकोतर हानि संत सुन साजना ॥ गुरुके शब्दले मोरहु सुन
शब्दावली
(२९३)
साजना । ( साधो ) खुले जमको कपाट संत सुन साजना ॥
सखियाँ पाँच सहेलरी सुन साजना । ( साधो ) नौ नारी विस्तार
संत सुन साजना । कहैं कवीर बचेलसे सुन साजना ॥ रानी इंद्रमती
सदाँर संत सुन साजना ॥
नारियलका शब्द ॥
मोरहु नरियर मोरहु हो, आपन अंस बचाय । बिना शब्द
जिन मोरहु, जिव परले तरजाय ॥ तीन अंश नरियर महाँ, तामों
एक हमार । आपन अंस बचायके, जमके अंस निनार ॥ जमको
अमल मिटावहू, पवन बतीस बिलोय । नीर नेह निवारहू, चलो
महातम खोय ॥ धरती रेख सुधारहू, पौरुष पवन अमान ।
बिना भेद जिन मोरहु, जीव एकोतर हान ॥ सोई पवन निज
गहि रहो, नरियर वास समोय । तो नौ तत्व सुधारहू, काल
निकट नहि होय ॥ धरती गुन गहि प्रगटहू, करो शब्द परकाश ।
साहब कवीर कर दीहल, दृढ मानो धर्मदास ॥
भोगका शब्द ।
सत पुरुषको भोग लागे, सिंगी शब्द अनाहद बाजे हो ॥
कदली पत्र साजो पनवारा । सीतल शब्द जोत उजियारा ॥
नरियर मोरि खुरौरी कीन्हो । आद नाम अंतर घट चीन्हो ॥
सुघर मिठाई मधुर मिठाई । प्रीत भावसे संत मंगाई ॥ लौंग
लायची किसमिस मेवा । सुघर मधुर रस दाख घनेवा ॥ सुख-
सागरको निर्मल नीरा । जापर सतगुरु तृप्त शरीरा ॥ सतपुरुषको
अर्पन कीन्हा ॥ शंख शब्द धुन बाजे बीना । सो पनवार दासको
दीन्हा । जाते काल भयो आधीना ॥ पान पसाद जीव जो पावे ।
अंकुरी सतलोक सिधावे ॥ ऐसा भेद करो परकाश । सत्य शब्द
मानो विश्वास ॥ कहैं कवीर सुनो धर्मदास । बीरानाम करो परकाश ॥
(२९४)
कबीरपंथी—
शब्द तिनूकाका ।
जमनियाके डार साहब तोड़ दीजे हो ॥
एक जमनियाकी चौदह डार, सार शब्द ले तोड़ दीजे हो ॥
सुरत हमारे अजब पियासै, प्रेम अमीरस घोर दीजे हो ॥ गुरु
हमारे ज्ञान जौहरी, हीरा पदारथ अमोल दीजे हो ॥ यह संसार
बिषैरस माते, भरम किंवरिया खोल दीजे हो ॥ धर्मदासकी
अरज गोसाईं, जीवनको बंध छोर दीजे हो ॥
शब्द कंठीका ।
पायो निजनाम गलेको हरवा ॥
सतगुरु पटवा अजब लहरवा । छोटी मोटी डोलिया चार
कहंरवा ॥ प्रेम प्रीतकी पहिर चुनरिया । निहुर नचो साहब दर-
बरवा ॥ सतगुरु कूंची दर्ई महलमें । जब चाहो तब खोल केवरवा ॥
एही मेरो ब्याह यही मेरो गवना । कहैं कबीर बहुर नहिं अवना ॥ १ ॥
शब्द नामका ।
गुरु पईयां लागों नाम लखाय दीजो हो ॥
जुगन जुगनके सोये मनुवा । दे सत शब्द जगाय लीजेहो ॥
घट अँधियार कछू नहि सूझे । ज्ञानकी दृष्टि खुलाय दीजे हो ॥
विषकी लहर उठे घट भीतर । अमृत बुंद चुवाय दीजेहो ॥ गहरी
नेदिया नाव पुरानी । खेयके पार लगाय दीजेहो ॥ धर्मदासकी
अरज गोसाईं । जीवन बंध छोड़ाय दीजे हो ॥ २ ॥
शब्द दीहल प्रारम्भः ।
आमिन बिनती बिनवई, सुनहु हो बंदीछोर । भौसागर मोहिं
तारहु, इतना मोर निहोर ॥ भौसागर अहैं भयावना, सूझे वार
न पार । झंझर नाव पुरातमा, खेइ उतारो पार ॥ कोट कर्म छूटे
नहीं, या जिव कीट समान । भुंगी होय गुरुतारहु, अधम उधारन
मान ॥ आसन आदि पुरुषको, धर्मदासको दीन्ह । चार अंश
शब्दावली
(२९५)
चौका महि, तामो लोन्हो चीन्ह ॥ कहें कवीर सुन आमिनी, रहो हमारी आस । जीवन पार उतारिहौं, होइ चूरामन दास ॥ १ ॥
दीहल कालज्ञान ।
पांच घरी वायें चले, सोई दहिने होय । दस स्वासा सुख-
मन चले, ताहि विचारो लोय ॥ आठ पहर जबही चले, पिंगला
माहीं स्वास । तीन बरस काया रहे, ता पीछे होय नास । आठ
दिना जबहीं चले, स्वासा रवि की ओर । दोय बरस काया रहे,
प्राण जाय तन छोर ॥ सोरह दिन जबहीं चले, भान दाहिने
होय । बरस दिना काया रहै, पीछे रहै न कोय ॥ बीस रैन औ
बीस दिन, चले दाहिनो स्वास । षष्ट मास काया रहै, ता पीछे
होय नास ॥ एक मास औ एक दिन, रविके पहरा होय । स्वास
सरोधा सत्य है, नर जीवे दिन दोय ॥ नहि चंदा नहि सूर है,
नहीं सुषुमना बास । सुख सेती स्वासा चले, पहरमें होय बिनास ॥
कहें कवीर विचारके, गहो शब्द टकसार । सत्य लोक हंसा चले,
आवा गमन निवार ॥ २ ॥ निज अनंद घर महलमें, करो सदा
सुखबास । सो वर चीन्हौं संतो, काटो जमके फांस ॥ निज
उत्तम घर आपनो, सो तुम चीन्हत नाहि । बिन चीन्है कहाँ
जैहो, यह बड़ अचरज आहि ॥ अबहुं कहो जो मानहु, उलखो
वचन हमार । दुबधा डुरमत छोड़के, चीन्हो वस्तु सम्हार ॥
पांचतत्व निज मूल है, करता इनहीं मांहि । नख सिख तन
निज ढारिया, सो कहुं अन्ते नाहि ॥ अनत होय तो को गढे,
यह तन सुंदर रूप । सकल साज एक बुंदमें, ऐसा ख्याल
अनूप ॥ अगिन पवन जल पृथवी, इनमें साहब जीव । पुहुप
मध्य ज्यों बास है, दूध मध्य ज्यों घीव ॥ घरमें जल जलमें
घर, बोलनहार संजोग । सांचे सांचे ढारिया सांचें सुख भोग ॥
(२९६)
कबीरपंथी—
तब जो हता सो अब है, फेर फार कछु नाहिं । बिन स्वरूपको साहब, सो कतहुं नहिं आहिं ॥ निगुण नाथ निरंजना, जिनके पिंड न प्रान । सो बर बरो सबन मिलि, कामिन रूप जहान ॥
गुरुमुख भई सगाई, सुमरन लागो नेह । तत्वको तेल चढ़ाय के, भूल गई गुन देह ॥ ज्ञानको मंडप छाइले, ध्यानको भराई ठाँव ।
बिन अक्षरको मंगल, बिन रसना गुण गाँव ॥ दूल्ह देव निरंजन, दृष्ट मुखसे चीन्ह । पृथी अकाशके बाहिरे, या विधि भाँवर दीन्ह ॥
भाँवर भई अनंद भये, अजहुं मिलना नाहिं । तन छूटे, गुरु दूटे तब वेगहि हैं बाँहिं ॥ ऐसी आशा अवधि बद, गये गुन राह बताय ।
नाम अधार सो रहगई, दुल्हिन अतिसुख पाय ॥ अवध पूजे जब आयके दुल्हिन, जोवैं बाट । तन छूटे वे ना मिले, कौन सहे अपघाट ॥
गोहरावे आवे नहीं, बिन देखेकी प्रीत । आप अपुन चीन्है बिना नहिं आवे, परतीत ॥ आशा भई निराशा, को आवे को जाय । भौजल नदिया भयावना, फिर फिर गोता खाय ॥
अगम अगाह अथाह है, थाह न पावे कोय ॥ सतगुरु थाह थहावे, जीवन मुक्ता होय ॥ जा कारण जग नाचिया, नाना भेष बनाय ॥
सो ना मिलौ ना मिलि हैं, नाहक गोता खाय ॥ बिन परचे जिन भूलियो, कहैं कबीर विचार । जिनको परचे अब भई, तिनके अटल दिदार ॥ ३ ॥
सुखसागर सुख विलसहू, छाँडो दुखकी आस अपने जिवन धन चीन्हहू, सब सुख तुम्हरे पास ॥
जुगल रूप जग भीतरे, कांता कामिनि नेह । अष्टधातको जुगल तन, एक प्रान दोय देह ॥ तन सूरत मन मूरत, साहब बोलन हार । नर नारी सुख बिलसो, करता सिरजन हार ॥
यह छबि आय सकल विधी, दुखका मूल बिसार । एक बुन्दते सिर-जिया, एकहि है करतार ॥ आपुहि तखत बनावै पानी पवन
शब्दावली
(२१७)
संयोग । अष्ट धातके महलमें क्रीडाकरे सुखभोग ॥ आपुहि राजा परजा, आपुहि रंक फकीर । आप सर्व गुन आगरे, आपुहि गुन गंभीर ॥ आपुहि जती सती है, आपुहि है दयापाल । आपुहि जोगी जंगम, आप कियो विस्तार ॥ आपुहि गावै बजावे, आपुहि तोरे ताल । आपुहि लखे अपन पौ, आप अपुनमें काल ॥ आपुहि करे करावै, लेय औरको नांव । आपुहि खलक ऊजरे, आप बसावे गांव । जुग असंखलो शंकर, धरे सुन्नमें ध्यान । उनहुँ न लखो अपुनपो, तू नर कयोँ वौरान ॥ ब्रह्मा विष्णु थकित भये, खोजत पार न पाय । औरन्हकी मति केतिक, नाहक गोता खाय ॥ शिव सनकादिक नारद, शारद शेष सुरेश । अस्तुति करत थकित भये, उनहुँ न कहा संदेश ॥ एके जपै निरंजन, निर्गुन और निरंकार । पाँच तत्वके बाहिरे, उनके भये अकार ॥ अलख अपार परम गुरु, अरु मूरत वे पिंड । औगह अगह अवीज है, जोत सरूप अखंड ॥ सुध बुध वा पहुँचे नहीं, महा कठिन ऊ पंथ । सुमिरन साखकी खबर नहीं, कथकथ मरे ग्रंथ ॥ हाथ माथ पग पिंड बिन, केतिक बडो वह कोड । किसबिध चेरी आगरी, किसबिध खसम निगोड ॥ कथकथ मुनिजन उडगये, जस भैवे अकाशे गिद्ध । चारा वाके भुई धरो, कहा उडे भये सिद्ध ॥ नौ नाथ चौरासी सिद्ध, कोट अनंतन दास । उनहुँ न लखो अपुनपो, भरमत फिरत उदास ॥ कस्तूरी है कुंगरंग, चले पवनके बास । मृगमध्य नाभी बसे, मृग दूँडे वन घास । कहैं कवीर अब कहतहुँ, डार भर्मकी मोट, अपनो भलो जो चाहऊ, परखलेउ खर खोट ॥ ४ ॥ सुन्न सरोवर भीतरे, तीरथ एक अनुप । तेज पुंज जहां झलकई, प्रगटे जोत स्वरूप ॥ कदल कमलदल अंतरे, रजनी बासर नाहिं । अनहद घंटा बाजई, पाँच
(२९८)
कवीरपंथी-
सुत्रके माहिं ॥ कंचन कूट औटाइले, भिन कबहुँ नहिं होय ।
परमल बास पलासकी, काष्ठ कहे नहिं कोय ॥ काष्ठ माहिं पावक
बसे, ज्यों तिल मद्धे तेल । जुक्ति बिना नहिं नीकसे, ऐसा अद्धुत
खेल ॥ परम पुरुष संग दुलहिन, खेलै आतम सार । एक वरण
एक अंक है, एक रूप अनुहार ॥ साहब कवीरके दीहल, सुनियो
संत सुजान । समुझत सुख ऊपजे, नातो दुकख निदान ॥ ५ ॥
सुकृत फूल गुलाबके, सबघट रहो समाय । कहु कैसेके पाहये,
गुरु बिन लखो न जाय ॥ तीन त्रिकुटीके ऊपरे, फुलै सोहंगम
फूल । जहां न धर्मकी आसना बिन अझर निजमूल ॥ चार
जोजनके ऊपरे, पुरुष विदेही पूर । जगरमगर वह नग्र है, बाजत
अनहद तूर ॥ अपने ठीका हम खडे, सतगुरु दिया बताय ।
खिरकी खोल दिखाइया, राह गगनकी जाय ॥ कहैं कवीर धर्म-
दास सों, प्रगट दीहल बताय । सो हंसा भल पावई, नहिं आवे
नहिं जाय ॥ ६ ॥ अचरज देखो कामिनी, कहतेको पतियाय ।
अधर साहब हम देखिया, सतगुरु डंडिया फँदाय ॥ चंद सूर
जहँवां नहीं, जहां न धरनि अकास । तीन पुरुष मोरे प्रीतम,
केहि विधि करो निवास ॥ गुरु दर्शनके कारने, सरवस देउँ
लुटाय । एक पलकके बीछुरे, अब मोहिं कहु न सोहाय ॥ गुरु
दरसन हम पायल, छूटल कुल परिवार । अब जहँ पुर आपने,
परख परख टकसार ॥ कहैं कवीर धर्मदाससों, हिरदे करो बिचार ।
अरस परस करो कामिनि, निर्गुण नाह तुम्हार ॥ ७ ॥ दरिया पार
हिंडोरना, दीन्हो कंथ बताय । कोई एक नार सुलक्षनी, हरदम
झूलै जाय ॥ अरध उरध दोय खंभ हैं, सुखमन लागी डोर ।
जेठी सुतं सम्हारले, रचले गगन मन मोर ॥ द्वादश केर हिंडोरना,
झूलै पाँचों नार । मेघ घटा घन गरजई, पिय बिन जग अंधियार ॥
शब्दावली
(२९९)
अव्वल घरी मोरे जोबन, समुझ न आई मोह । मैं सकुची दौय
नैनमें, पियसों परो विछोह ॥ चंद लहर मोरे अंचला, सूर लहर
मोरे पीठ । मनरे पवन गहि आसन, करले साहब सो डीठ ॥
कंथ हमारे निरगुन, हम अवगुनियां नार । एक पलक सुख सेजमें,
बात न पुछे हमार ॥ पोहप दीप बसे बालमा, उहांते आयेल
संदेश । छाडो छाडो जमपुरी, बिहँसि चलो वहि देस ॥ स्वेत
बरण एक सुंदरी, शोभा अगम अपार । कहें कवीर सुन धर्मनी,
आवौ लोक हमार ॥८॥ गुरुके वचन मोरे प्रीतम, हरदम खबर
जो लेय । जो चित अंते जाइहै, हँसि पिया तजि न देय ॥ पार
बसे मोरे प्रीतम, दुरवल भई मोर देह । पांच भइया संग दारुन,
तिनसो छूटल सनेह ॥ जाके आँगन नदिया बहे, सो कस कुवा
नहाय । जा घर नार सुलक्षनी, सो कस परघर जाय ॥ गुह अंगना
नहिं भावई, सुख संपत न सुहाय । निर्गुण नाह मोरे आवई,
सेज गई कुम्हिलाय ॥ जो साहब बर पाइहों, नइहर धरो उठाय ।
सेज बैठ सुख विलसही, गुरुमुख मंगल गाय ॥ कहें कवीर मैं
थाकल, छूटल यह संसार । चरन कमल चित राखहू, पूरण नाम
अधार ॥९॥ अरे ! अरे ! बालसंधातिनि, सखी सुनो तुम आय ।
हम जो भई परदेसिन, गुरुमुख मंगल गाय ॥ पिया हमारे तीन
जने, दुलहिन पांच पचीस । इन प्रपंच हम भूलिया, जन्म गयो
सब खीस ॥ सबे कहावे पीवकी, चहुँ दिस पिउ पिउ सोय । ना
जानों या झुंडमें, कौन सोहागिन होय ॥ है कोई प्रेम पियारी,
जस इतनो करलेव । जुगन जुगनके बीछुरे, पिया मिलन करदेव ॥
सतगुरु लगन लिखाइया, हमे दिहल वा देश । जा घर उगे न
आथवे, पवन नहीं परवेश ॥ गई धिया नहिं बहुरे, सुन ससुरेकी
बात । अन्न पानी नहिं भावई, सीतल भई सब गात ॥ साहब
(३००)
कवीरपंथी-
कवीर कहि दीहल, सुनियो हो धर्मदास । निर्गुन केर सुलच्छनी,
निर्गुण कियो निवास ॥ १० ॥ आरती साजहु दुलहिन, आवहि
कंथ सबेर । निर्गुण मंगल गावहु, अब जिन लावहु बेर ॥ तन
रुइया कर बातियां, मन तिलको कर तेल । सुरत हाथ दियना
धरो, निरत चली कर केल ॥ अच्छे पलंग जहाँ पचरंग, सो रे
बिछावौ झार । सुषुमन सेज सँवारहु, सुकृत गढवा धार ॥ हँसिके
प्रीतम आइया, बिहँसि के लीन्हो पाय । सुख देखत सुख ऊपजे,
सुमिरत कर्म कटाय ॥ ईगला लिये कर झारी, पिंगला पंखा गाँस ।
सतगुरु शब्द सहायक, पहुँच पियाके पास ॥ हियरा गहभर
भेटिया, सुक पलोटे पांय । सुख देखत सुख ऊपजे, तनकी तपन
बुझाय ॥ कहैं कवीर धर्मदाससो, सुनियो संत सुजान । पिया
मिलो सुख बिलसो, जम जीतो मैदान ॥ ११ ॥ भौसागर मोर
नइहर, निर्गुण सासुर मोर । आवत बटिया भुलानी, काल करे
घन घोर ॥ आग लगे वह नइहर, धोख परे असगार । सास ननद
झगरा करे, नित उठ माँडे रार ॥ अनचिन्ह ससुरे के लोगवा,
नित उठ लावे दोस । पार परोसिन बैरिन, एक पियाके भरोस ॥
बालम मंदिर छवायेल, झलके अघर अकास । छिन छिन बदन
निहारत, देखत बहुत हुलास ॥ प्रेम सुरत गहु कामिनि, जामों
निर्गुन बास । परम अनंद सुफल भये, जम माने (जाके) त्रास ॥
बहुर न या जग आइहो, बहुर न धरिहो देह । साहब कवीर
कहि दीहल, निरख परख कर लेह ॥ १२ ॥
मिलरहु सखी री तू मिलरहु, अपने पिया सुख जान । नइहर
आपन कोई नहीं, जासों करो पहिचान ॥ मोरे जीवको भावतो,
छाय रह्यो वही देस । मैं विरहिन निशदिन फिरों, कर जोगिनको
भेस ॥ तात मात कोई संग नहीं, संग नहीं सग भाय । काम न
शब्दावली ।
(३०१)
काहू कुटुम्ब सों चली, निसान बजाय ॥ चंद सूरकी पालकी,
तेहि चढ वैठी नार । मुखमन संग सहेलरी, दुलहिन उतरी पार ॥
कमल जो फुले अकासमें, अलि गुंजे चहुँओर । पियाको लै वैठी
तहाँ, डुरे सोहँगम चौर ॥ सोहँगम मूरत मोरे, हिरदे रही समाय ।
कहे कवीर धर्मदाससे, सो लाजो दरसाय ॥ १३ ॥
दीहल आगन तान ।
पांच सखी संग दुलहिन, सासुर झगरा होय । ससुर चौर
घर मुसही, कासों कहों दुख रोय ॥ वासर चंदा ऊगही, निस-
कर ऊगे सूर । गंग जमुन दौय सम बहे, हंस गवन बड़ दूर ॥
गंग जमुनके अंतरे, परवत धोल सुजाव । चितवन नजर न
आवई, जमको अमल अमान । ध्रुव मंडल नहिं दरसई, नेत्र
गुंज अनुसार । चित गहि चेतो संतहो, मास परे जमधार ॥
स्वासा सुर नहीं बंदई, केहर बंदन लेय । आठे पाखके भीतरे,
हंस पयाना देय ॥ कायापुर पाटन परचे, याका यही सुभाव ।
चितगहि चेतो कडिहारहो, औ घट लगे न नाव ॥ जैमुन लगन
संभारहु, सुमिरन निर्गुन सार । पान छत्रपति साजहु, हंस उतारो
पार ॥ पच्छिम लहर जुगावहु, पूरब चंदा तान । निर्गुन शब्द
उचारहु, कबहुँ न होय जिव हान ॥ चंद उदय सुर आयवे, कूच
नगारा होय । साहब कवीर कर दीहल, देखो शब्द विलोय ॥ १४ ॥
जुगत जान जुग बांधहु, चार पवन परवान । हंस हंस चलो
बिहँसत, जम जीतो मैदान ॥ काल कठिन दुर्गदानी, हंसनके
घटवार । तुरतहिं पार उतारई । जिन गहिले टकसार ॥ चौथे
पवन जुग बंधना पवन बहतार डोर । हंस हंस चल सत्तपुर,
उतरो घाट करोर ॥ दान मांगें जगातिया, ना रोके घटवार ।
जंबूद्वीप देव लेखा, परख परख टकसार ॥ भौजल नदिया भया-
वना, सूझे वार न पार । अमित पवन वासा रहे, जिनरे गहल
( ३०२ )
कवीरपंथी—
टकसार ॥ बिन हंस हंस न पहुंचई, बीचाहिं परे भुलाय । काल
कठिन भरमावई, कामिन परे उरझाय ॥ हंस हंस मिलि लेचले,
जहां पुरुष रहिवास । साहब कवीर कहि दीहल, निर्गुन अथर
निवास ॥ १५ ॥ सहतेजी चित् चेतहु, सुमिरो नाम अथार ।
हंसन पार उतारहु, परख २ टकसार ॥ भौसागर बड दारुन,
विषके लहर फिराय । बिन सतगुरु नहिं बांचिहो, सबै काल
धरखाय ॥ मोरहु नरियर मोरहु, आपन अंस विचार । काल
कठिन दुर्गदानिया, काह करे झखमार ॥ सहतेजी चित् चेतहु,
काल कठिन बल जोर । लगन साध परमोधहु, पला न पकडै
चोर ॥ निर्गुन नाम निअक्षर, सुमिरत कर्म कटाय । साहब
कवीर कहि दीहल, सहतेजी ससुझाय ॥ १६ ॥ चार कमल
चित् चेतहु, जहां जीवको बास । जुग जुग पान सुधारहु, मेटो
जमको त्रास ॥ कमल तत्त्वचित् चेतहु, जिव ना नसे तेह मांह ।
लगन सनेह बिचारहु, देउ हंसको बांह ॥ जाहि कमल बस
जीयरा, ताहि लगन देव पान । प्रीतम जैसुन जगपती, हंस होय
निरवान ॥ या बिधि भेद बिचारहु, निरखो तत्त्व निसान । तब
छुटिहै भौसागरा, जिव कहं पहुंचे यान ॥ कमल तत्त्व नहिं
दरसई, जिव धोखे पर जाय । परमोदिक भये दारुन, राखो
काल झुलाय ॥ राये बंकेज बिचारहु, जीवन करहु सुधार ।
साहब कवीर कहि दीहल, परख परख टकसार ॥ १७ ॥ राज
बरन जुग बांधहु, भांवर सती सनेह । येही गमन करो दुलहिन,
बहुर धरो जिन देह ॥ चंपा पहूम चमेलिया, लाये करेउ बनाय ।
तिलक लिलार सम्हारहु, जमकी दासी छुड़ाय ॥ हंस हंस जुग
बांधहु, चौदह पवन लखाय । शब्द चित्त गहु दुलहिन, कोटिन
कर्म कटाय ॥ जाहि पवन पर शशि बसे, चित्त गहि रहे चकोर ।
शब्दावली
(३०३)
और दिसा चितवे नहीं, ऐसा सुरत वहि ओर ॥ शिव शक्ती जल अर्पई, गुरुके बचन प्रमान । जन्म सो अम्बर दुलहिन, जम जीतो मैदान ॥ सीस मटुकिया गहिलहु, सुक्ती देहि सुधार । साहब कवीर कहि दीहल, परख परख टकसार ॥ १८ ॥ गुंज-वरन जुग बांधहु, लगनहिं लगन विचार । निरखके पान सुधारहु, कबहुं न होवे द्वार ॥ दीप दीप जम बैठल, पलक न लावे भोर । अमी बीज जिन बोयल, भये कालके चोर ॥ जम पाटन जे जीतले, तिनपर माँगे लेख । गुरुजी लगन सुधारहु, दिखलो जमहिं बिसेख ॥ अमी बीज जिन बोयल, भये कालके चोर । सुर नर मुनि सब खायल, काल कठित बल जोर ॥ शेष सहस मुख विनवई, ब्रह्मा जमकी ओर । साहब कवीर कहि दीहल, लेख देखहु सोर ॥ १९ ॥ मनहिं आनंद दुलहिन, बिहँसत बोली बात । भौसागर बड संकट, चौदह लगी जगात ॥ प्रभुजी लगन विचारले, देखले जमहिं बिसेख । जिन जम पाटन परसिले, तिनपर माँगे लेख ॥ दीपन दीप जगातियां, पलक न लावे भोर । अमी बीज जिन बोयल, भये कालके चोर ॥ सुर नर मुनि सब अटके, काल कठिन बलजोर । शेष सहस मुख विनवही, ब्रह्मा जाके चोर ॥ साहब कवीर कहि दीहल, लेखा देव चुकाय । जमको मस्तक तोरके, अमे निसान बजाय ॥ २० ॥ बासर लगन विचारहु । कटे कर्मकी डोर । सुखसागर पहुंचावहु, जमसों तितुका टोर ॥ राज बरन होती कामनी, तासम होते कान्ह । कर्म काट दे भाँवर, जमकर मरदोमान ॥ चंद लगन चित चेतहु, उतरो भौजल पार । निरख परख गुरु परसिहौ, परख परख टकसार ॥ धरती रथ चढो कामनी, कटे कर्मके फंद । हंस हंस जुग बांधहु, अब जिव करहु अनंद ॥ सहतेजी शरनागती,
(३०४)
कवीरपंथी-
कोटन कर्मकटाय । साहब कवीर कहि दीहल, अभै निसान बजाय ॥ २१ ॥ पान छत्रपत कर धरो, अनभो संधि विचार । विषम त्रिश् जमकी दसी, रेख गुंज निरवार ॥ जुगकी रेख सम्हारहु, पान अखंडित सार । जाते हंस न बीगरे, चंद लगन बिस्तार ॥ चार तत्व घटमें धरो, पाँचि लेहु समोय । जेहि अक्षरते जिव भयो, ताते हंसा होय ॥ वहि अक्षरते सब भयो, लोक दीप अस्थूल । ताको चीन्हो संतो, वहि अक्षर निजमूल ॥ चार कमल घट भीतरे, परखो संत सुजान । जामें बासा जीवको, तहां सुधारो पान ॥ आन कमलमें जिव बसे, अंते पान प्रकास । अघर पान जम लेत है, जीव परे जम फाँस ॥ चारों मोहर सुधरहु, अंक छत्रकी छाँह । लक्षण लगन बिचारिके, देहु हंसको बांह ॥ सतगुरु संधि सम्हारहु, सब बिधि पूरन होय । सुरत निरत गहि धर्मनी, देखो शब्द विलोय ॥ पान छत्रपति साजहु, जुगकी रेख सुधार । कहैं कवीर धर्मदाससो, हंस उतारो पार ॥ २२ ॥ सुमिरहु कामिन सुमिरहु सुमिरहु आपन नाह । अघर साहब हम देखिया, जहवाँ धूप न छाँह ॥ बिनही घटा घन गरजई, बिन जल तिरथ नहाय । देखतही सुख ऊपजे, सुमिरत कर्म कटाय ॥ बिन पानीको जीवन, बिन दीपक उजियार । ऐसो निर्गुण देखले, परख शब्द टकसार ॥ साहब कवीर कहि दीहल, अग्र सोहंगम फूल । अब मोरे जन्म सुफल भये, पाये मुक्तिको मूल ॥ २३ ॥ कौन हंसको खेल है, कौन मुक्तिको दाव ? । कौन अमृतको कूप है, कौन व्रजको घाव ? ॥ सुरत हंसको खेल है, भक्ति मुक्तिको दाव । छिमा अमृतको कूप है, शब्द वज्रको घाव ॥ बन बन टूटत का फिरे, अंदर फूली बेल । तोहीमें तेरो धनी, ज्यों तिल मद्धे तेल ॥ जब चाहे तब देखिले,
शब्दावली
(३०५)
अष्ट कमल के कोट । सतगुरु मिले तो पाइये, साहब तृणके ओट ॥ कहें कवीर यह तत्त्व है, सब तत्त्वनको सार । जुगन जुगन चल आयेऊं, बोलनहार अपार ॥ २४ ॥ सतगुरु कहे चेतावनी, कौन अमीको अंक ? । जासो हंसा बाँचई, जम सो रहे निशंक ? ॥ कौन शब्दकी लेखनी, कौन वरनको पान ? । कौन नाम अगुवा भये, कौन वचन परवान ? ॥ कौन नामको बीज है, कौन नाम की डोर ? । कौन शब्दकी बैठक, निरखो वस्तु अंजोर ॥ धर्मदासकी बीनती, सतगुरु देव लखाय । कौन दीप पर हंस है, बहुर न आवे जाय ॥ २५ ॥ सुनियो सुतं चेतावनी, अन्न अमीको अंक । जासो हंसा बाँचई, जम सो रहे निशंक ॥ अमी शब्दकी लेखनी, सत् वरनको पान । निहअक्षर निज बीज है, पुरुष वचन परमान ॥ सुकृत नाम अगुवा भये, सतनामकी डोर । मूल शब्द पर बैठके, निरखो वस्तु अंजोर ॥ साहब कवीर कहि दीहल, सुन सुकृत चितलाय । पुहुम दीप पर हंस है, बहुर न आवे जाय ॥ २६ ॥ अगम चरित चेतावनी, अधर अन्नपम धाम । अजर अमर है सोई, सो वह निर्गुन नाम ॥ कौने घर होय सुमिरन, कौने घर होय ध्यान ? । कौने घर होय देखहु, कौने घर अस्थान ? ॥ सहज सुरत घर सुमिरण, त्रिकुटी संगम ध्यान । अजपा घर होय देखहु, हिरदै कमल अस्थान ॥ कौन जुगत गढ साजहु, कौन जुगत गढ लेहु ? । कौन जुगत गढ तोरहु, कौन शब्द मन देहु ? ॥ मूल बांध गढ साजहु, आपा मेट गढ लेहु । गुरुके शब्द गढ तोरहु, सत् शब्द मन देहु ॥ सहजे
(३०६)
कवीरपंथी—
सहजे देखिये, सहजे सुरत समाय । कहवे की कछु ना रही, देखे
मन पतियाय ॥ साहब कवीर कहि दीहल, रहन गहन समुझाय ।
बूझे संत विचारिके, गुरुमुख मंगल गाय ॥ २७ ॥ पांच तत्वके
भीतरे, गुप्त वस्तु अस्थान । बिरले मरम कोइ पावई, सतगुरु
वचन प्रमान ॥ दिल अंदर दीदार है, बाद भ्रमें संसार । सतगुरु
शब्द के मसकला, मांज दिखावन हार ॥ महल लेत कोई सूरमा,
बाजे अनहद तूर । बिना पिंडका पुरुष है, झिलमिल दरसे नूर ॥
सहज समाधी लगिरही, मनका छूटा मैल । अनहद बाजा बाजते,
सहजे पहुँचा गैल ॥ बिना पांव को पंथ है, बिन बस्ती को देश ।
बिना पिंडको पुरुष है, कहै कवीर संदेश ॥ २८ ॥ पारब्रह्म जासों
कहो, ताहि निरंजन नाम । तहवांसे मन ऊपजो, तीन लोक लिये
ग्राम ॥ पारब्रह्म के अगुवा, मन राजा सरदार । जो चाहे सोई करो,
कोइ न पावे पार ॥ चौरासी उपजावई, आशा बीज जमाय ।
दशो जन्म राजा भये, ममता अमल चलाय ॥ तीन लोकके
भीतरे, सब जिव भये किसान । चौदह काल जगातिया, मारग
रोक समान ॥ तीन लोक के बाहिरें जहैं, सन्नथ को देश । चेतो
हंसा चित धरो, छाड़ सकल भर्म भेश ॥ पारब्रह्म की महिमा,
सुनो संत चितलाय । साहब कवीर के दीहल, परख परख टकसार ॥ २९ ॥
सत्यनाम ।
अथ आरतिदर्शन प्रारम्भः ।
ज्ञान आरती अमृत वानी । पूरन ब्रह्म लेहु पहिचानी ।
त्रिदेवा मिलि ज्योति बखानी । निरंकारकी अकथ कहानी ॥
यहि आशा सबही मिलि ठानी । भरमि भरमि सुये नर प्रानी ॥
दृष्टि विना दुनिया बौरानी । साहेब छाडि यम हाथ विकानी ॥
कहहि कवीर कोइ संत सुजाना । जिन जिन शब्द हमारा माना ॥ १ ॥
कैसे मैं आरति करों तुम्हारी । महामलिन साहेब देह हमारी ॥
मैलेसे उपज्यो संसारा । हौं छुतिया गुन गाउँ तुम्हारा ॥ झरना
झरे दशो दिशि द्वारे । कैसे मैं आवों निकट तुम्हारे ॥ जब तुम
देहु अग्रकी देही । तब हम होइब नाम सनेही ॥ मलयगिरिमें
बसे भुजंगा । विष अमृत गो एके संग ॥ तितुका तोरि देहु प्रवाना ।
तब हम पाएब पद निरवाना ॥ धनी धर्मदास कविर बल गाजे ॥
गुरु प्रताप आरती साजे ॥ २ ॥
अखण्ड आरती खण्ड न होई । कालहिं मारी रसातल खोई ॥
खण्डित पिंड इकइस ब्रह्मण्डा । खंडित नदी अठारह गण्डा ॥
खंडित रघुपति खंडित रावन । खंडित कृष्ण वीर बलि बावन ॥
खंडित धरती पवन अकासा । खंडित चाँद सूरज कैलासा ॥ खंडित
जहँ लगि सकल पसारा । खण्ड अखण्ड कवीर पुकारा ॥ ३ ॥
मंगल रूप आरती साजे । अभय निशान ज्ञान धुनि बाजे ॥
निसि बासर जहँ सूरज न चन्दा । परम पुरुष जहाँ करे अनन्दा ॥
अच्छे वृक्ष जाकी अम्बर छाया । प्रेम प्रकास अमृत फल पाया ॥
जरा मरनकी संशय मेटो । सुरति संतापन सतगुरु भेटो ॥ तन मन
(३०८)
कवीरपंथी-
धन जिन्ह अरपन कीन्हा । परम पुरुष परमात्म चीन्हा ॥ कहै
कवीर हिरम्बर होय । निरख नाम निज चीन्हे सोय ॥ ४ ॥
आरती सत कवीर तुम्हारी । दया करो जाऊँ बलिहारी ॥
पहली आरति पुहुमी आये । काशी प्रगटे दास कहाये ॥ दूसर
आरति देवल थपायो । आसा रोपि समुद्र हटायो ॥ तीसर आरति
चरण जल दारे । हरिके पंडा जरते उबारे ॥ चौथी आरति तुरतहि
घाये । तोर जंजीर तीर ले आये ॥ पांचे आरति बलख सिधाये ।
चौरासी सिधके बन्ध छुडाये ॥ छठई आरति अविगती धारे ।
मुखदासो जिन्दा कर दारे ॥ सतयें आरति पीर कहाये । मगहर
आमी नदी बहाये ॥ आठे आरति मंडल सिधाये । जन ज्ञानीको
संशय मिटाये ॥ कहैं लगि कहौं वरनि नहिं जाय । धर्मदास
आरती सच पाय ॥ ५ ॥
आरती कीजे बन्दीछोर समरत्यकी । चरन शरन सतनाम
पुरुषकी ॥ आरती कर पुहमी पग धारे । सतयुगमें सतनाम पुकारे ॥
आरति कर मुख मंगल गाये । त्रेता नाम सुनींद्र धराये ॥ कर
आरति जग पंथ चलाये । द्वापरमें करुनामय कहलाये ॥ आरति
युग २ बांधे आशा । कल्युग केवल नाम प्रकाशा ॥ चारों
युग धरे प्रगट शरीरा । आरति गावें बन्दीछोर कवीरा ॥ ६ ॥
आरती करहिं धनि धर्मदासा । पांच तत्त्व मुख भेद प्रकाशा ॥
प्रथमहिं वायु तेज है पानी । रहत अकास निरंतर जानी ॥ गगन
वायु गरजे असमाना । निज घर नित्य ध्वजा फहराना ॥ कोट
ब्रह्मा जहाँ कथे पुराना । कोट रुद्र जहाँ धरहीं ध्याना ॥ कोट विष्णु
बिन्वे कर जोरी । औरहु देव तेतीस करोरी ॥ शेष सहसमुख
निशि दिन गावे । स्तुति करे पार नहिं पावे ॥ जो गुरु मिले तो
शब्दावली
(३०९)
भेद बतावे । पांच तत्त्व सुख भेद लखावे ॥ कहै कवीर हंसा पतियाय । धर्मदास आरती सखुपाय ॥ ७ ॥
ऐसी आरती देउँ लखाई । निरखत अघर ज्योति फैलाई ॥ गहु निरच्छर गहु निज डोरी । धरमरायसो तितुका तोरी ॥ जुग बाँधो निरखो टकसारा । जासै उत्तरो भवजल पारा ॥ कोट जनमको कर्म कटाये । चौदह काल जीत घर आये ॥ हीरा कोटि होय परकाशा । विना सुगंध पुहुपकी बासा ॥ चन्द्र लगन गहि करो प्रकाशा । चौदह यम तब माने त्रासा ॥ धरती धर्मनि उदित अकाशा । जापर सूरज करे प्रकाशा ॥ कहै कवीर सुनो धर्मदासा । जम जालिम माने त्रासा ॥ ८ ॥
आरति नाम निरन्तर भावे । तेतीसो मिलि मंगल गावे ॥ चितकर थार ज्योति जिव गाजे । शब्द अनाहद झालर बाजे ॥ घटहीमें यंत्र बजावइ बाजा । सतगुरु मिले भय सब भाजा ॥ बिन करताल पखावज बाजे । श्वेत सिंघासन छत्र विराजे ॥ कर सनमान जीव भये आगे । (साहेब) कवीर गुरुके चरनन लागे ॥ ९ ॥
आरति सतनामकी कीजै । जीवन जनम सुफल कर लीजै ॥ अग्रकी थाल अन्नपम बाती । ज्योति प्रकाश बरे दिन राती ॥ सुरली ध्वनि अन्नपम बाजे । शब्द अनाहद धुन तहाँ गाजे ॥ त्रिकुटी संगम झलके हीरा । चरन कमल चित राखु शरीरा ॥ सतसुकृत आरति चित दीजै । तन मन धनहि निछावर कीजै ॥ १० ॥
जाघर आरति दास करत हैं । जनम जनमको पाप हरत हैं ॥ कदलीदल पुहुपके द्वारा । सतसुकृत जाघर पग धारा ॥ परिमल अग्र गुलाल सुवासा । जा घर हंस करे सुखवासा ॥ अनहद ताल पखावज बाजे । सप्त सिंघासन छत्र विराजे ॥ नाम एकोतर सुमिरे जबहीं । सतगुरु बैठ सिंहासन तबहीं । तत्वमता नरियर प्रवाना ।