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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

६० • * हित चौरासी
ऐसे सुख पूर्ण, अवसर में रस का स्रोत प्रवाहित करती हुई रसेश्वरी
श्रीप्रियाजी ने अपनी निकट सहचरि श्रीहित सजनि से कहा-
श्रीहित अलि-राधावल्लभीय रसोपासना क्षेत्र में रसिक महानुभावों ने
रसिकाचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद के मुख्यतः चार रूप बताये हैं-
(१) आचार्य्य रूप – व्यास नन्दन एवं तारा तनय श्रीहित हरिवंश
(२) वंशीरूप – श्रीकृष्ण के अधरों से लगी श्रीराधा का यशोगान
कारिणी युगल की नित्य संगिनी
(३) श्रीराधा सहचरी रूप- निकुञ्जेश्वरी श्रीराधा की स्वरूप भूता
अन्तरङ्ग सहचरि, सखि, सहेली सजनि और दासी आदि रूपों से निरन्तर
छायावत् साथ रहते हुए सुख चिन्तन करने वाली एक अन्तरङ्ग सखि जिसे
हित अलि, हित सखि, हित सजनि आदि नामों से कहा गया है।
(४) सर्व व्यापक हित रूप – ब्रज साहित्य में 'हित' शब्द का सरलार्थ
प्रेम है। ये श्रीहित हरिवंशचन्द्र उसी 'हित' अर्थात् प्रेम के अवतार हैं। यह इस
प्रकार है कि आप भगवान श्रीकृष्ण की वंशी के अवतार हैं और वंशी साक्षात्
प्रेम रूपा है। जैसा कि पद्म पुराण में कहा है-
वंशी तत्प्रेम रूपिका।
वंशी उन (श्रीकृष्ण) की प्रेम रूपा है'। और श्रीहित हरिवंश चन्द्र स्वयमेव
वंशी हैं)
यथा-
त्वमसि हि हरिवंश श्याम चन्द्रस्य वंशः,
परम रसद्नादैर्मोहिताऽशेष विश्वः।
– श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती पाद
(हे हरिवंशचन्द्र ! यह निश्चय है कि आप स्वयं श्रीकृष्ण की वंशी के
अवतार हैं; जिस वंशी ने अपने परम रसमय नाद से सम्पूर्ण विश्व को मोहित
कर लिया था) प्रेम ही परमात्मा है, सर्वोपरि तत्व है। यह प्रेम निर्गुण सगुण
व्यापक, एवं महान् है। अतः प्रेम रूप श्रीहित हरिवंशचन्द्र भी व्यापक हैं।

हित चौरासी • • ६१
राग विभास
मूल – जोई जोई प्यारौ करै, सोई मोहिं भावै;
भावै मोहिं जोई, सोई सोई करें प्यारे।
मोकौं तो भाँवती ठौर प्यारे के नैननि में।
प्यारौ भयौ चाहै मेरे नैननि के तारे।।
मेरे तन मन प्रानहूँ तें प्रीतम प्रिय;
अपने कोटिक प्रान प्रीतम मोसौ हारे।
(जै श्री) हित हरिवंश हंस हंसिनी साँवल गौर
कहौ कौन करै जल तरंगनि न्यारे।।१।।
भावार्थ–(श्रीप्रियाजी ने कहा"हे सखि!) प्यारे श्रीलालजी जो जो भी कुछ
करते हैं, मुझे वह सभी प्रिय लगता है और मुझे जो कुछ प्रिय लगता है, वे भी
वही सब करते हैं। यदि मुझे केवल उनके ही नेत्रों में रहने योग्य सुहावना स्थल
है तो वह भी मेरे नयनों के तारे (पुतलियाँ) बन जाना चाहते हैं। सखि ! वे मुझे
मेरे अपने तन, मन और प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं परंतु उन्होंने तो मुझ पर
अपने कोटि कोटि प्राण न्यौछावर कर दिये हैं। श्रीराधा की प्रेम विभोरता से
भावित श्रीहित सजनी (हित हरिवंश) ने कहा–
"हे श्यामल गौर ! आप दोनों वृन्दावन प्रेम पयोधि रूप मान सरोवर के
हंस हंसिनी हैं। आप जल तरङ्गवत अपृथक हैं तब आपको पृथक कर ही कौन
सकता है ?
टिप्पणी-(१) जल तरंगनिः-
श्रीराधा और श्रीकृष्ण केवल कथनमात्र के लिये ही दो हैं, वास्तव में तो
ये एक ही प्रेम तत्व के दो विग्रह हैं। इनके तन दो हैं किन्तु मन, प्राण, आत्मा
एक ही हैं। क्रीड़ा के लिये ही एक प्रेम ने अपने दो और इसीप्रकार अनेक रूप
धारण कर रखे हैं। इनके युगल स्वरूप के एकत्व समर्थन के विषय में शास्त्रों
में अनेकों वाक्य मिलते हैं यथा-संहिता में–
यः कृष्णः सापि राधा या राधा कृष्ण एव सः।
(जो श्रीकृष्ण हैं, वही श्रीराधा हैं और जो श्रीराधा हैं वही श्रीकृष्ण हैं।)

६२ • • हित चौरासी
इसी प्रकार श्रीराधा तापिन्युपनिषद् में भी-
ये यं राधा यश्च कृष्णो रसाब्धि-
र्देहश्चैकः क्रीडनार्थं द्विधाऽभूत्।।
"(ये रससमुद्र श्रीराधा और श्रीकृष्ण वास्तव में एक देह हैं, केवल क्रीड़ा
के लिये ही दो होकर प्रकट हैं।)"
ऐसे ही वहीं श्रीराधातापिन्युपनिषद् में फिर भी
राधया सहिते देवो माधवे नैव राधिका।
योऽनयोर्भेदं पश्यति स संसृतेर्मुक्तो न भवति।
यस्तु राधां विना तं ध्यायति, प्रवदति, प्रपठति स मूढतमोत्तमः।
(श्रीराधा के सहित श्रीकृष्ण ही पूर्ण श्रीकृष्ण हैं। जो इन दोनों में भेद
दृष्टि रखता है, वह कभी संसृति (आवागमन रूप संसार) से मुक्त नहीं हो
सकता। जो श्रीराधा के बिना माधव का सेवन करता, पठन करता और कथन
वर्णन करता है वह मूढ़ों में भी महामूढ़ है)
अतएव श्रीहिताचार्य्य पाद ने यहाँ जल तरङ्गवत् कहकर दोनों की एकता
प्रकट की है।
(२) जोई जोई प्यारो करै सोई मोहिं भावै;
भावै मोहिं जोई सोई करैं प्यारे।
इस पंक्ति में श्रीप्रियाजी ने यह बताया है कि मुझे अपने प्रियतम की सब
चेष्टाएँ प्रिय लगती हैं और मुझे उनका कुछ भी अप्रिय नहीं है परन्तु विशेषता
यह है कि प्रियतम भी वही करते हैं जो कुछ मुझे प्रिय है और जो मुझे अप्रिय है
उसे तो वे कभी भूलकर भी नहीं करते इस कथन में दोनों के चित्तों की एकता
प्रकाश मिलता है।
दूसरी पंक्ति-
मोकौं तो भाँवती ठौर प्यारे के नैननिं में,
प्यारौ भयौ चाहै मेरे नैननिं के तारे।
इसमें यह बताया गया है कि दोनों-प्रिया प्रियतम एक दूसरे के
सौन्दर्य-माधुर्य्य पर पूर्ण मुग्ध हैं। इन दोनों की दृष्टियों में विश्व के अन्य

हित चौरासी • • ६३
सौन्दर्य आते तक नहीं। यदि श्रीप्रियाजी को प्रियतम के नयनों में भाँवती ठौर
है, तो प्रियतम भी उनकी आँखों के तारे बन जाना चाहते हैं। जब आखों के तारे
ही बन जायेंगे, तब तो अपने प्रिय-पात्र के सिवाय और कुछ दिखेगा ही नहीं,
प्रियतम मय त्रिलोकी बन जायगी। कितनी साध है आत्मसात हो जाने की ?
इस आत्म सात भावना के साथ साथ विश्व विस्मृति की भी कैसी अव्यक्त
सूचना मिलती है इस कथन में !
मेरे तन मन प्रानहूँ तें प्रीतम प्रिय
अपने कोटिक प्रान प्रीतम मोसों हारे।
इस पंक्ति में प्रेम के महान् उत्सर्ग का रूप है जहाँ युगल किशोर ने
अपने कोटि कोटि प्राण एक दूसरे पर न्योछावर कर रखे हैं।
स्पष्ट है कि प्रेम राज्य में प्रतिक्षण त्याग पूर्वक प्रेमास्पद के प्रति पूर्ण
तत्सुख भावना निवास करती है। और यही प्रेम का सहज स्वभाव है। उक्त पंक्ति
में दूसरी बात यह है कि प्रेमास्पद के प्रति किये गये अपने महान्तम प्रेम को भी
प्रेमी अत्यन्त नगण्य मानता है और प्रेमास्पद के अल्प प्रेम को भी महान
समझता है।
प्रेमी प्रेमास्पद एक विशाल 'प्रेम गरीबी' लिये रहते हैं यह प्रेम गरीबी
बहुत ही स्वाभाविक है। 'मेरे तन मन हारे' इस पंक्ति में प्रेम गरीबी का बड़ा ही
सरस चित्र अङ्कित किया गया है। प्रेम मणि श्रीप्रियाजी अपने प्रति किये गये
श्रीलालजी के प्रेम को स्वयं अपने प्रेम से कोटि कोटि गुना मान रही हैं।
इसके सिवाय एक बात और भी यह ध्वनित हो रही है कि जिस प्रेम में
कोटि कोटि तन मन और प्राण न्योछावर किये जा सकते हैं, उसमें फिर और
क्या शेष रह जाता है ? सबको अपने अपने तन, मन प्राण और आत्मा ही
सबसे अधिक प्रिय हैं वरं आत्मा की प्रियता से ही सर्वत्र प्रियता आभासित होती
है किन्तु जब वही प्राण, तन, मन आत्मा उस प्रेम पर न्यौछावर हो गये, तब
अन्यान्य लोक वैभव स्वर्ग-भोग किंवा मोक्ष पर्यन्त की क्या महत्ता है ? यथा-
'लोक वेद कुलकानि सब, देत बहाये प्रेम।
(रसखान)

६४ - • हित चौरासी
अस्तु दोनों प्रेमी हैं, दोनों प्रेमास्पद हैं। दोनों दोनों पर अपने कोटि कोटि
प्राणों को न्यौछावर करते हैं, दोनों प्रेम सरोवर के हंस हंसिनी हैं ये दो होकर भी
एक हैं ऐसा ही कुछ महात्मा श्रीभगवत रसिकजी ने कहा है-
परस्पर दोउ चकोर दोउ चंदा।
दोउ चातक, दोउ स्वाति, दोउ घन, दोउ दामिनी अमन्दा।।
दोउ अरविंद, दोऊ अलि लंपट, दोऊ लोहा, दोऊ चुम्बक।
दोऊ आशिक, महबूब दोऊ मिलि, जुरे जराफा अंबक।।
दोऊ मुदार, दोउ मोर, दोऊ मृग, दोऊ राग रस भीने।
दोउ मनि विसद, दोऊ पर पन्नग, दोऊ वारि दोउ मीने।।
'भगवत रसिक' विहारिनि प्यारी रसिक विहारी प्यारे।
दोउ मुख देखि जियत अधरामृत पियत होत नहिं न्यारे।।

  • २ -
    अवतरण-किसी विशेष सम्भ्रम से श्रीस्वामिनी को मान हो गया है। वे
    निकुञ्जान्तर भाग में विमना सी बैठी हैं। श्रीस्वामिनीजी को श्रीहित सजनि
    मधुर वचनों द्वारा चाटुकारी करती हुई प्रसन्न करना चाह रही हैं अतएव
    श्रीलालजी के गुण, रूप आदि के प्रशंसा पूर्ण शब्दों द्वारा उनके चित्त में प्रियतम
    मिलन का प्रलोभन उत्पन्न कर रही हैं। कुछ ही समय में उनका प्रयास सफल
    भी हो जाता है और सहज ही भोली श्रीराधा का मान कर्पूर की भाँति उड़ जाता
    है। पश्चात् वे शीघ्र ही अपने प्राणाधार प्रियतम से जा मिलती हैं। इस पद में
    उसी सरस वचन रचना और मान भञ्जन भावना का वर्णन है। मानवती श्रीप्रियाजी
    से हित सजनि ने कहा-
    राग -विभास
    मूल - प्यारे बोली भामिनी, आजु नीकी जामिनी;
    भेंटि नवीन मेघ सौं दामिनी।।
    मोंहन रसिक राइ री माई तासौं जु मान करै,
    ऐसी कौन कामिनी।

हित चौरासी • • ६५
(जै श्री) हित हरिवंश श्रवन सुनत प्यारी राधिका,
रमन सौं मिली गज गामिनी॥२॥
भावार्थ-(श्रीहित अलि ने कहा-) 'हे भामिनि ! (तुम्हें) प्यारे (श्रीकृष्ण)
ने बुलाया है। (देखो) आज (कैसी) सुन्दर रात्रि है ? अतः आप नवीन मेघ (रूप
श्रीलालजी) से ऐसे भेंटिये (मिलिये) जैसे दामिनि। अरी माई ! मोहन लाल
रसिक राज से मान करे भला ऐसी कौन कामिनी होगी ?
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (सखि के) उक्त शब्द सुनते ही गज
गामिनि प्यारी राधिका अपने रमण (प्रियतम) से जा मिलीं।
– ३ –
अवतरण-श्रीवृन्दावन के मञ्जुल निकुञ्ज भवन में सम्पूर्ण रात्रि युगल
किशोर ने ऐकान्तिक रति विहार किया है। प्रातः काल उनकी रति विगलित
स्थिति को देखकर सखियाँ परस्पर में युगल किशोर के रति सूचक चिह्नों का
दर्शन करती हुई आनन्द मग्न हो रही हैं। उसी समय श्रीहित सखीजी अन्यान्य
(ललितादि) सखियों से युगल किशोर की प्रातः कालीन सुखान्त छवि का
वर्णन करती हैं-
राग-विभास
मूल-प्रात समै दोऊ रस लंपट,
सुरत जुद्ध जय जुत अति फूल।
श्रम-वारिज घन बिंदु वदन पर
भूषन अंगहिं अंग विकूल।।
कछु रह्यौ तिलक सिथिल अलकावलि,
वदन कमल मानौं अलि भूल।
(जै श्री) हित हरिवंश मदन रँग रँगि रहे,
नैन बैन कटि सिथिल दुकूल॥३॥
भावार्थ-प्रातः काल दोनों रस लम्पट सुरत-युद्ध में विजय एवं प्रसन्नता
पूर्वक संलग्न हैं। मुख पर श्रम वारि (प्रस्वेद) की सघन बूँदें शुभ्र मौक्तिक जैसी

६६ • • हित चौरासी
शोभित हैं एवं समस्त अङ्ग प्रत्यङ्गों के आभरण अस्त व्यस्त हैं। (ललाट पटल
का) तिलक कुछ कुछ शेष रह गया है। अलकावलि शिथिल (ढीली) हो चुकी है
(और बिखर रही है, जिससे ऐसा) विदित होता है कि वदन कमल पर प्रमत्त
भ्रमर मँडरा रहे हैं।
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि (युगल किशोर) प्रेम (मदन) के (आनन्द) रङ्ग
में रञ्जित हो रहे हैं, उनके नयन वचन, कटि एवं कटि के वस्त्र (सारी आदि)
सभी तो शिथिल हैं।
टिप्पणी—
'मदन रँग रँगि रहे'
श्रीवृन्दावन विहार में शृङ्गार और शृङ्गारोत्तर रस की ही प्रधानता है। इस
रस का वर्णन करने में रसिकाचार्य्य एवं रसिक महानुभावों ने यत्र-तत्र प्रेम के
विशुद्ध अर्थ में काम, मदन, मार, स्मर, मन्मथ, मनसिज, मनोज आदि शब्दों
का प्रयोग किया है। चूंकि उक्त सभी शब्द 'कामदेव' के ही अर्थ के वाचक हैं,
तथापि उन महात्माओं का भाव और अर्थ इन प्रयोगों में प्रेम से ही रहा है।
शास्त्रों एवं सन्तों ने इसका बड़ा सुन्दर स्पष्टीकरण किया है। 'श्रीचैतन्य
चरितामृत' के प्रणेता श्रीकृष्ण दासजी ने काम और प्रेम का अर्थ समझाते हुए
कहा है—
आत्मेन्द्रिय प्रीति इच्छा तार काम नाम।
श्रीकृष्णोर प्रीति इच्छा तार प्रेम नाम।।
अतएव काम प्रेमे बहोत अन्तर।
काम अन्धतम प्रेम निर्मल भास्कर।।
अतएव गोपीगण न करे विचार।
कृष्ण सुख हेतु करे संगम विहार।।
(निज सुख की वासना ही काम है और प्रेमास्पद को सुखों की पूर्ति
करना ही प्रेम है। इस न्याय से सखियों किंवा श्रीप्रिया प्रियतम का प्रेम, पूर्ण
तत्सुख रूप होने से काम आदि शब्दों के द्वारा प्रकट किये जाने पर भी उज्ज्वल
प्रेम है।

हित चौरासी • • ६७
दूसरे इस दिव्य शृङ्गार रस को काम आदि शब्दों से प्रकट करने का एक
तात्पर्य और भी यह है कि यह वृन्दावन विहार रस स्थूल दृष्टि से देखने पर
'काम रस' जैसा ही दिखता है किंतु वास्तव में वह ऐसा है नहीं। इसे यों समझ
सकते हैं जैसे शुद्ध खाँड़ से एक तूँबी का आकार निर्मित कर दिया जाय; जो
केवल देखने में कड़वी तूँबी सी दिखने पर अन्तर बहिर माधुर्य से ओत प्रोत
हो।
उक्त प्रसङ्गों में व्यवहृत 'काम' शब्द के अर्थ को श्रीगोपाल तापिन्युपनिषद
में इस प्रकार समझाया गया है-
प्रेमैव गोप रामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्।
"(इन गोप रमणियों का प्रेम ही काम नाम से कहे जाने की परिपाटी है)
– ४ –
अवतरण—मनोरम प्रातः काल है। रुचिर कुञ्ज भवन में सम्पूर्ण रात्रि भर
श्रीयुगल किशोर रसिक राज किसी अनिर्वचनीय रस विहार में तल्लीन रहे हैं,
फिर भी दोनों के चित्तों से रस की लालसा न्यून नहीं हुई वरं वृद्धि को ही प्राप्त
हुई है किन्तु प्रातः काल होने से विवशता पूर्वक विहार–उपरत होना पड़ा है।
जिन प्रेम मयी सखियों ने सम्पूर्ण रात्रि कुञ्ज रन्ध्रों से लगकर विहार दर्शन
पूर्वक अपना जीवन रखा है, वे अरुणोदय काल में अनन्त अनन्त यूथों के रूप
में रुचिर कुञ्ज प्राङ्गण में उपस्थित हैं। समस्त साभिलाष सखियों की भावनाओं
की साक्षी श्रीहित सजनि कुञ्ज के अन्तर्भाग में प्रवेश करती हैं। वहाँ पर
श्रीस्वामिनी जी की रति विगलित दशा का अपूर्व दर्शन करके कुछ मुसका
देती हैं। हित सजनि की विशेषार्थ व्यञ्जिका हँसी से सङ्कुचित होकर श्रीप्रियाजी
लजा जाती हैं एवं अपने रति रस सूचक चिह्नों को छिपाने लगती हैं। तब उनके
संगोपन रूप व्यर्थ प्रयास की उपेक्षा पूर्वक रस–वृद्धि करती हुई श्रीहित अलिजी
कहती हैं–

६८ • • हित चौरासी
राग विभास
मूल-आजु तौ जुवति तेरौ वदन आनंद भयौ,
पिय के संगम के सूचत सुख चैन।
आलस बलित बोल, सुरँग रँगे कपोल,
विथकित अरुन उनींदे दोउ नैन॥
रुचिर तिलक लेस, किरत कुसुम केस;
सिर सीमंत भूषित मानौं तैं न।
करुना करि उदार राखत कछु न सार;
दसन वसन लागत जब दैन॥
काहे कौं दुरत भीरु पलटे प्रीतम चीरु,
बस किये स्याम सिखै सत मैन।
गलित उरसि माल, सिथिल किंकनी जाल,
(जै श्री) हित हरिवंश लता गृह सैंन॥४॥
भावार्थ-“हे युवति ! तुम्हारा जो यह मुख आनन्द से प्रफुल्लित है उसी
से तुम्हारे प्रियतम सङ्गम जनित सुख की सूचना मिल रही है। जैसे तुम्हारे बोल
आलस्य से लटपटाये हुए हैं वैसे ही तुम्हारे कपोल भी सुरंङ्ग (ताम्बूल पीक) से
रँग गये हैं। दोनों नयन विशेष थकित से, अरुण एवं उनींदे हैं; ललाट पर
तिलक भी लेश मात्र ही रह गया है। वेणी से पुष्प खिसक खिसक कर गिर रहे
हैं और सिर में मानों आपने सीमन्त रेखा भूषित ही नहीं की है। तुम बड़ी उदार
हो हे उदार स्वामिनी जब तुम श्रीलालजी के लिए अपने अधरासव का दान
करने लगती हो तब कुछ भी शेष नहीं रखती, (सर्वस्व दे डालती हो ।) हे भीरु !
अब (रात्रि के अंधकार में धोखे से बदले हुए) प्रियतम के इन वस्त्रों को क्यों
छिपा रही हो? हे स्वामिनि ! तुम ऐसी रस विचक्षणा हो कि श्याम को शत् शत
मदन की घातों (शिक्षा) के द्वारा अपना वशवर्त्ती कर लिया है।
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं “अहो ! तुम्हारे तो उर की माला भी कुम्हला
गयी है तथा किङ्किणी जाल भी शिथिल है, अतः निश्चित है कि तुमने अवश्य
ही लता गृह में शयन विलास किया है।”

हित चौरासी • • ६६

  • ५ -
    अवतरण-प्रातः पावन समीरण बह रहा है। समस्त वन खग-वृन्द कलरव
    से मुखरित है। यमुना तटवर्ती ललित लता मन्दिर से निकल कर रसिक युगल
    किशोर गल बहियाँ दिये झूमते डगमगाते से चले आ रहे हैं उनींदे नयन
    बार-बार झँप जाते हैं। वस्त्र एवं भूषण शिथिल हैं, कहीं कपोलों पर पीक है तो
    कहीं नयनों में मलिन मषि रेखा है। उर पर खण्डित मालावलि शोभित हैं। वस्त्र
    पलट चुके हैं, प्रियाजी के श्रीअंग में पीताम्बर की शोभा है और प्रियतम के
    नीलाम्बर की। श्रीअंग में ललिता, विशाखादि सखियाँ चँवर व्यजन ढुराती
    चल रहीं हैं, बीच बीच में युगल के विगलित वस्त्राभरणों को सम्हाल भी देती
    हैं। कुछ प्रशंसा परायण सहचरियाँ अपने कोकिल कण्ठ से मधुर मधुर विभास
    गाती हैं। गान वर्णित भाव का लक्ष्य अपनी ओर समझकर युगल एक दूसरे की
    ओर देखकर मुसकुराते और फिर प्रेमलज्जा से भर जाते हैं छटा का वर्णन
    श्रीहित हरिवंश जी इस प्रकार करते हैं
    राग विभास
    मूल-आजु प्रभात लता मंदिर में,
    सुख वरषत अति हरषि जुगल वर।
    गौर स्याम अभिराम रंग भरे,
    लटकि लटकि पग धरत अवनि पर॥
    कुच कुमकुम रंजित मालावलि,
    सुरत नाथ श्रीस्याम धाम धर।
    प्रिया प्रेम के अंक अलंकृत,
    चित्रित चतुर सिरोमनि निजु कर॥
    दंपति अति अनुराग मुदित कल,
    गान करत मन हरत परस्पर।
    (जै श्री) हित हरिवंश प्रसंसि परायन,
    गायन अलि सुर देत मधुर तर॥५॥

७० • • हित चौरासी
भावार्थ-मंगल प्रभात की वेला में हर्षोन्मादित युगल किशोर अलसाये
हुए लटक लटक कर लता भवन की मंजुल भूमि पर मादक गति से चलते हैं।
वृन्दावन निकुञ्ज धाम में सूरत-विलासी श्रीश्यामसुन्दर की मालाएँ श्रीराधा के
उरोज चर्चित केशर लेप से मण्डित हैं। इसी प्रकार श्रीप्रियाजी के श्रीअंगों में
प्रेम चिह्न (नख क्षत) अलङ्कृत हैं, जिन्हें चतुर शिरोमणि लाल ने अपने हाथों से
चित्रित किया है।
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि अत्यधिक प्रेम उल्लसित दम्पति मधुर मधुर
गान करते हुए एक दूसरे का मन हरण कर रहे हैं, और उस गान के साथ
प्रशंसा परायण सखियाँ अपना मधुर तर स्वर मिला रही हैं।

  • ६ -
    अवतरण- सम्पूर्ण रात्रि युगल किशोर ने लता मन्दिर में एकान्तिक रस
    विलास किया है। प्रभात हुआ जानकर श्रीलाल जी अकेले ही निकुञ्ज भवन से
    चल निकले किन्तु सामने से आते हुए श्रीहित अलिजी ने उन्हें देख लिया।
    श्याम सुन्दर के श्रीवपु में रति विहार के अनेकों चिह्न चिह्नित थे। उन्हें देख कर
    हित सखि मुसका गईं। श्याम सुन्दर ने लजाकर उन चिन्हों को छिपाना चाहा
    किन्तु दोनों प्रेमियों के एकान्त मिलन का भेद खुल ही चुका था। अतः उसका
    सुखवर्द्धन करती हुए श्रीहित सजनि ने कहा-
    राग विभास
    मूल-कौन चतुर जुवती प्रिया, जाहि मिलत लाल चोर ह्रै रैन।
    दुरवत क्यौंऽब दूरै सुनि प्यारे, रंग में गहले चैन में नैन।।
    उर नख चंद विराने पट, अटपटे से बैन।
    (जै श्री) हित हरिवंश रसिक राधापति प्रमथित मैन।।६।।
    भावार्थ-(श्रीहित अलि ने कहा-) “हे लाल ! ऐसी कौन चतुर युवती
    प्रेयसी है (जिससे) आप रात्रि में चोरी चोरी मिलते हैं ? हे प्यारे ! आनन्द
    विलास रंजित एवं सुख पूरित आपके नयन भला कहीं छिपाने से छिप सकते
    हैं ? वक्षस्थल पर ये नख चन्द्र के चिह्न पलटे हुए पराये वस्त्र और तिस पर

हित चौरासी • • ७१
यह अटपटे से बोल ? बहुत स्पष्ट है कि रसिक राधापति ! आप मदन के द्वारा
विशेष प्रमथित कर दिये गये हैं।"
टिप्पणी-
उर नख चन्द्र-यहाँ "उर नख चन्द्र, विराने पट, अटपटे से बैन, ये तीन
चिह्न विशेष बताये गये हैं। इनमें तीनों लक्षण नायिका में और नायक में अन्तिम
दो ही घटित होने चाहिये क्योंकि प्रथम लक्षण उर नख चन्द्र' नायिका के अङ्गों
में सम्भव है क्योंकि वही उसकी पात्र है, पयोधर मर्दन आदि के विचार से।
किन्तु इस पद में यह लक्षण-उर नख चन्द्र-नायक के अङ्ग में बताया गया है।
(१) श्रीहिताचार्य्य पाद ने अन्यत्र भी अपने कई पदों में नखाघात की
परिस्थितियाँ उपस्थित की हैं। एक स्थल में गौर-श्याम भुज की मनोहर
कलह दिखायी है, जिसमें हाथापाई से मालावलि टूट जाने का भी वर्णन है।
वहाँ अधिक सम्भव है कि प्रिया कर नखों से प्रियतम के उर पर नख क्षत हो
जायें; यथा-
गौर स्याम भुज कलह मनोहर नीबी बन्धन मोचत डोरी।
(जै श्री) हित हरिवंश करत कर धूनन प्रनय कोप मालावलि तोरी।।
(२) रस समतुल्य दम्पति किसी एकान्तिक क्रीड़ा में रत हैं। क्रीड़ा का
वर्णन है-
खंडन अधर करत परिरंभन ऐंचत जघन दुकूल।
उर नख पात, तिरीछी चितवन दम्पति रस सम तूल।।
वे भुज पीन पयोधर परसत वाम दृशा पिय हार।
-हित चौरासी पद संख्या ३२
रस समतुल्य दम्पति की प्रायः सभी क्रियाएँ दोनों ओर से समतुल्य
होंगी, अतः उर नख पात' भी नायक के वक्षस्थल पर हो तो कोई आश्चर्य नहीं।
(३) रस क्षेत्र की एक परम गोप्य भावना है-विपरीत रति। इसमें नायक
बन जाता है नायिका और नायिका बन जाती है नायक। तब उनकी समस्त
चेष्टाऐं तद्वत हो जाती है। ऐसी दशा में निर्मित नायिका के 'उर नख चन्द्र'
स्वभाविक हैं।

७२ • • हित चौरासी
उक्त पद संख्या छः में इसी प्रकार की रति विपरीत क्रीड़ा का कुशल
सङ्केत प्रतीत होता है।
– ७ –
अवतरण– शरद की रात्रि में शीतल एवं मन्द समीर सौरभ वासित
व्यजन झल रहा है। सुधाकर अपनी सुधा रश्मियों से वृन्दावन का सिञ्चन कर
रहा है। अतीव सुखमय अवसर है। किसी सघन नव पल्लव मण्डित लता
मण्डप में रसिक शेखर युगल किशोर अनिर्वचनीय रस क्रीडा में तल्लीन हैं
और बाहर कुअ रन्ध्रों से लगी रस लोलुप सहचरियाँ युगल किशोर की रसमयी
क्रीड़ा के दर्शन से परम सुख का अनुभव कर रही हैं। इस निभृत निकुअ विहार
रस का वर्णन श्रीहित हरिवंश महाप्रभु इस प्रकार करते हैं–
बिलावल
मूल–आजु निकुंज मंजु में खेलत,
नवल किसोर नवीन किसोरी।
अति अनुपम अनुराग परस्पर,
सुनि अभूत भूतल पर जोरी।।
विद्रुम फटिक विविध निर्मित धर,
नव कर्पूर पराग न थोरी।
कौंमल किसलय सैन सुपेसल,
तापर स्याम निवेसित गोरी।।
मिथुन हास परिहास परायन,
पीक कपोल कमल पर झोरी।
गौर स्याम भुज कलह मनोहर,
नीवी बंधन मोचत डोरी।।
हरि उर मुकुर बिलोकि अपनपौ,
विभ्रम विकल मान जुत भोरी।
चिबुक सुचारु प्रलोइ प्रबोधत,
पिय प्रतिबिंब जनाइ निहोरी।।

हित चौरासी • • ७३
'नेति नेति' बचनामृत सुनि सुनि,
ललितादिक देखतिं दुरि चोरी।
(जै श्री) हित हरिवंश करत कर धूनन,
प्रनय कोप मालावलि तोरी॥७॥
भावार्थ – सुन्दर निकुंज मंदिर में नवल किशोर स्याम एवं नवल किशोरी
श्रीराधा रस क्रीड़ा संलग्न हैं। दोनों का पारस्परिक अनुराग भी अति अनुपम
है। यह अनोखी जोड़ी भूतल (स्थित श्रीवृन्दावन) में ही सुनी एवं देखी जाती है
निकुंज मंदिर की भूमि दिव्य मूँगा स्फटिक आदि नाना मणियों से खचित है।
उस मणिमय भूमि पर नव कर्पूर की रज बिखर रही है। सुकोमल नव पल्लव
रचित एक शय्या सुशोभित है। उस शय्या पर श्याम सुन्दर ने श्रीप्रियाजी को
आग्रह पूर्वक विराजमान किया है। भाव यह है कि उन्हें निकुञ्जान्तर्गत शय्या में
पौढ़ाया है। हास परिहास परायण युगल किशोर ने परस्पर कपोल–कमल पर
ताम्बुल की पीक अंकित करके रस विस्तार किया है। उस समय गौर–श्याम
का बाहु कलह बड़ा मनोहर प्रतीत होता है। पश्चात् श्यामसुन्दर श्री प्रियाजी के
कटि बन्धन मुक्त करने का सरस प्रयास करते हैं। श्रीराधा प्रियतम के उज्ज्वल
वक्ष में अपनी छवि देखकर विभ्रम से व्याकुल तथा मान–युक्त हो जाती हैं। तब
प्रियतम उनके अत्यन्त सुन्दर चिबुक को सहलाकर अनुनयपूर्ण निवेदन करते
हुए यह स्पष्ट करते हैं कि यह आपकी सुन्दर छवि का ही प्रतिबिम्ब है। श्रीहित
हरिवंश कहते हैं कि इस प्रेम कलह में श्रीप्रिया के मुख से 'नेति–नेति' वचनामृत
सुनकर ललितादि सहचरी छिपकर चोरी चोरी इस प्रेम कलह का दर्शन कर
रही हैं। श्रीप्रियाजी ने हाथापाई करते हुए प्रणय कोप वश श्रीलालजी के वक्ष
स्थल की मालाएँ तोड़ दीं।
टिप्पणी–(१) मान जुत भोरी–
वृन्दावनेश्वरी श्रीराधा अद्भुत रूप लावण्य की वह पराकाष्ठा हैं। अपने
नित्य नवीन रूप सौन्दर्य पर स्वयं मुग्ध होकर द्वैतात्मक भ्रम से व्याप्त हो
जाती हैं। अतः प्रियतम के हृदय मुकुर में अपना प्रतिबिम्ब देखकर मानवती हो
गयीं कि जाने किस सुन्दरी ने इन के हृदय पर अधिकार कर लिया और
इन्होंने उसे स्थान दे रखा है।

७४ • • हित चौरासी
इसलिये वे विभ्रम से व्याकुल हो गयीं। इस भ्रम और मान का निवारण
श्रीलालजी ने बड़ी चतुरता से किया। उन्होंने अपने दीन अनुनय से श्रीप्रियाजी
को जँचा दिया कि मेरे हृदय की मणि चौकी में आपका ही प्रतिबिम्ब है; किसी
अन्य सुन्दरी का नहीं।
– ८ –
अवतरण – आज की रात्रि किसी अनिर्वचनीय विलास रस के आस्वादन
में बीती है। युगल किशोर रात भर के अनींदे हैं, प्रभात हुआ जान कर सखि
जन उन्हें शय्या कुञ्ज से मङ्गल कुञ्ज में ले जा रही हैं। सालस प्रिया के पग
डगमगाते जा रहे हैं। प्रभात की इस छबि को देखकर श्रीहित अलि ने श्रीप्रियाजी
से कहा–
बिलावल
मूल– अति ही अरुन तेरे नयन नलिन री।
आलस जुत इतरात रँगमगे,
भये निसि जागर मषिन मलिन री।।
सिथिल पलक में उठति गोलक गति,
बिंधयौ मोंहन मृग सकत चलि न री।
(जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि,
संभ्रम देत भ्रमरनि अलिन री।।८।।
भावार्थ – अरी सखि ! आज तुम्हारे नयन कमल बड़े अरुणिम हैं। रात्रि
के भर विलास एवं जागरण के चाव से अत्यन्त आलस्य युक्त हो रहे हैं। मिलन
के गौरव से गर्वित, प्रेम रंग से छलक रहे हैं एवं कज्जल रंजित श्यामलता से
शोभित है। सम्मोहन कारी नयनों की थकित पलकों में युग गोलक की मंथर
गति ने मोहन मृग (श्रीश्याम सुन्दर) को वेध सा दिया है वे रस मुग्ध अवस्था
में गति हीन से हो गये हैं।)
श्रीहित हरिवंश कहते हैं–हे मरालवत् सुन्दर गति शीले ! तुम तो एक
ओर भ्रमरों को अपने नेत्रों की सुन्दरता से कमल का संभ्रम उत्पन्न कर रही हो

हित चौरासी • • ७५
तथा दूसरी ओर अपनी सुन्दर मराल गति द्वारा सखियों से रात्रि के रति
विलास के गोपन की चेष्टा करती हुई प्रिय संगम के रहस्य का संशय उत्पन्न
कर रही हो मानो कि तुमने प्रियतम से समागम ही प्राप्त नहीं किया हो।
– ९ –
अवतरण—नाना तरु लताकीर्ण श्रीवृन्दावन के मध्य भाग में अत्यन्त
रमणीय नव निकुञ्ज मन्दिर है। मन्दिर के दिव्य कक्ष में महा महा मणि रत्नों से
खचित उच्च सिंहासन है। सिंहासन अनेक अनेक कोमल और स्वच्छ आस्तरणों
से मण्डित है। यथा योग्य स्थलों पर कनक तारों से जटिल उपवर्हण (तकिये)
रखे हैं। उन उपवर्हणों का सहारा लिये युगल किशोर सिंहासनासीन हैं। चारों
ओर प्रधान प्रधान सखियाँ चँवर, व्यजन, ताम्बूल, परिमल पात्र दर्पण आदि
लिये खड़ी हैं।
युगल किशोर की छबि छटा देखते ही बनती है। सखियों ने उन्हें बहुत
बहुत प्रकार से सजाया है। दिव्य वस्त्र आभूषण अंगों में झलक रहे हैं। ललाट
पटल पर खौर है। काले घुँघराले कुन्तल कहीं तो भ्रमर की तरह मुख कमल
मधु का पान कर रहे हैं; तो कहीं काली, कोमल नागिनियों की भाँति एकत्र
करके बाँध दिये गये हैं। अतुल शोभा है। जिसका वर्णन श्रीहिताचार्य पाद
करते हैं-
सारंग
मूल– बनी श्रीराधा मोहन की जोरी।
इंद्र नील मनि स्याम मनोहर,
सात कुंभ तनु गोरी॥
भाल बिसाल तिलक हरि,
कामिनि चिकुर चंद्र बिच रोरी।
गज नाइक प्रभु चाल, गयंदनि–
गति वृषभानु किसोरी॥

७६ • • हित चौरासी
नील निचोल जुवति, मोहन पट-
पीत अरुन सिर खोरी।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिक राधा पति,
सुरत रंग में बोरी॥९॥
भावार्थ-अति अनुपम जोड़ी है श्रीराधा मोहन की। मनोहर श्याम सुन्दर
इन्द्र नील मणि की भाँति हैं। तो वृषभानु किशोरी श्रीराधा काञ्चन तनु हैं। लाल
के विशाल भाल पर तिलक शोभित है, तो कामिनि प्रिया की केश चन्द्रिका के
मध्य (माँग) में रोरी लसित है। मोहन लाल की गति (चाल) मत्त गजराज जैसी
मोहक और श्रीवृषभानु नन्दिनी की मत्त करिणी जैसी मद मंथंर है। नव तरुणि
श्रीराधा के श्रीअंग में नीलाम्बर शोभिते हैं और श्याम सुन्दर के श्यामाङ्ग पर
पीत कौशेय धारण है। उपरोक्त नख शिख शृङ्गार की पूर्णता शिरोभाग पर
लसित अरुण खोरी (छोर) कर रहा है। श्रीहित हरिवंश कहते हैं यह जोड़ी
सौन्दर्य एवं रस की सीमा है। राधापति श्रीकृष्ण रसिक चूड़ामणि हैं और
श्रीराधा सुरत रस सिन्धु रूपा हैं।
टिप्पणी-इस पद में युगल किशोर के वाह्य और आन्तर शृङ्गार का
साम्य दिग्दर्शन है। क्रमशः वपु वर्ण से प्रारम्भ करके चन्दन लेप गमन गति,
पट धारण और अन्त में रस की ओर सङ्केत है। इसमें अन्तिम बात 'रसिक
राधा-पति, सुरत रंग में बोरी' यह पदांश श्रीहिताचार्य्य का हृदय और पूर्ण पद
का जीवन स्वरूप है।

  • १० -
    अवतरण-मध्याह्न शृंगार के उपरान्त युगल किशोर रास-रस परायण
    हैं जहाँ नृत्य-पूरक नाना सुमधुर ताल-स्वर युक्त वाद्य झंकृत हो रहे हैं। रास
    लास्य विचक्षणा श्रीराधा की अद्भुत नृत्य गति पर सहचरि वृन्द अपने प्राण
    बलिहार करता है-
    सारंग
    मूल-आजु नागरी किसोर, भाँवती विचित्र जोर,
    कहा कहौं, अंग अंग परम माधुरी।

हित चौरासी • • ७७
करत केलि कंठ मेलि बाहु दंड गंड-गंड,
परस, सरस रास लास मंडली जुरी।।
स्याम-सुंदरी विहार, बाँसुरी मृदंग तार,
मधुर घोष नूपुरादि किंकनी चुरी।
(जै श्री) देखत हरिवंश आलि, निर्त्तनी सुधंग चलि,
वारि फेरि देत प्राँन देह सौं दुरी।।१०।।
भावार्थ- आज रस विदग्धा श्रीराधा एवं ललित नायक श्याम सुन्दर
अनुपम छटा से शोभित हैं। अंग प्रत्यंग से प्रस्फुट रूप माधुर्य्य अवर्णनीय है।
सहचरि परिकर में अनुराग विवश युगल, परस्पर स्कन्ध वाहु परिवेष्टित,
कपोल का स्पर्श किये हुए सरस रास लास्य का विस्तार करते हैं। सुन्दर
श्यामा-श्याम के रास विहार में वंशी मृदंग और तार वाद्यों का मधुर घोष
क्षरित है एवं श्रीअंग पर धारण नूपुर किंकिणी वलयादि आभूषणों का मधुर
सिञ्अन स्वर सम्मिलित है।
नृत्यगति शीला श्रीराधा की तीव्र नृत्य गति को देखकर स्वामिनी की
अंग भूता रस विमुग्धा हित अलि अपने प्राणों को बारम्बार न्यौछावर करती हैं।

  • ११ -
    अवतरण-शरद की सुन्दर रजनी है। आकाश में निर्मल एवं पूर्ण चन्द्र
    सुशोभित है। मञ्जुल श्रीवृन्दावन में चन्द्र देव की शुभ्र किरणों का वितान तना
    हैं। शीतल पवन सौरभ भार लेकर मन्थर मन्थर गति से बह रहा है। यमुना के
    निकट तट पर एक रम्य कुञ्ज कुटी है लतावेष्टित, प्रसून पल्लव मण्डित।
    रस लम्पट श्रीमोहनलाल अनुनय एवं चाटुकारी पूर्ण वचनों से प्रियतमा
    श्रीराधा को प्रसन्न करना चाह रहे हैं। इस पद में दिव्य सौरत पूर्व रस का वर्णन
    किया गया है।
    विलावल
    मूल-मंजुल कल कुंज देस, राधा हरि विसद वेस,
    राका नभ कुमुद-बंधु, सरद जामिनी।

७८ • • हित चौरासी
साँवल दुति कनक अंग, विहरत मिलि एक संग;
नीरद मनि नील मध्य, लसत दामिनी।।
अरुन पीत नव दुकूल, अनुपम अनुराग मूल;
सौरभ जुत सीत अनिल, मंद गामिनी।
किसलय दल रचित सैन, बोलत पिय चाटु बैन;
मान सहित प्रति पद, प्रतिकूल कामिनी।।
मोहन मन मथत मार, परसत कुच नीवी हार;
वेपथ जुत ‘नेति–नेति,’ बदति भामिनी।
"नरवाहन" प्रभु सुकेलि, वहु विधि भर, भरत झेलि,
सौरत रस रूप नदी जगत पावनी।।११।।
भावार्थ—शरद् की मधुमयी राका निकुंज प्राङ्गण को पूर्ण चन्द्र की रजत्
रश्मियों से आलोकित कर रही हैं। सुन्दरातिसुन्दर निकुञ्जान्तर कक्ष में सौन्दर्य
धाम श्रीराधा एवं श्रीहरि सुन्दर श्रृंगार से सुसज्जित हैं। विहरणशील युगल की
श्याम और गौर अङ्ग कान्ति मिलकर ऐसे प्रतिबिम्बित हैं जैसे नील मणिवत्
जलधर में चपला का चाञ्चल्य। श्याम सुन्दर के सुभग अङ्ग पर पीत दुकूल
सज रहा है और श्रीराधा के गोराङ्ग पर लाल (सुरङ्ग) चूनरी फब रही मानो यह
अरुण पीत वस्त्र अनुराग प्रेम के मूलाधार हैं। इधर सुवासित शीतल समीर
मन्द मन्द व्यजन झल रहा है। निकुञ्ज भवन में किशलय दल निर्मित शय्या पर
(विराजित) प्रियतम अनेक अनुनय विनय एवं प्रणय वाक्यों के द्वारा प्रेयसी
श्रीराधा को सुरत केलि के हेतु सहमत करने का प्रयास करते हैं। किन्तु
कामिनी कणकण में रस तृषा वर्द्धन करती हुई प्रति पद क्षण क्षण में वामता
ग्रहण करती जा रही है। प्रेमावेशित मोहन का मन स्मर रुज से व्यथित हो गया
है। अतः बारम्बार उरोज कटि बन्धन एवं हार आदि का स्पर्श कर देते हैं तब
लज्जा क्रान्त कंपित कामिनी "नहीं" "नहीं" का मधुर शब्द रूप मौक्तिक क्षरित
करती है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि श्रीयुगल की इस कल्लोल माला
को नरवाहन हृदय में विविध प्रकार से अनवरत धारण करते हैं क्योंकि यह
सुख केलि सरिता जगमंगल मयी है।

हित चौरासी • • ७६
टिप्पणी-हित चौरासी के एकादश एवं द्वादश संख्या वाले दो पद श्रीहित
महाप्रभु ने किसी विशेष बात पर रीझ कर अपने शिष्य नरवाहन जी को भेंट
किये हैं। एवं उनके नाम की छाप दी है। वस्तुतः दोनों पद श्रीहित हरिवंश चन्द्र
रचित हैं।

  • १२ -
    अवतरण - आज वंशीवट के तट की शोभन यमुना पुलिन पर श्याम
    सुन्दर ने रास नृत्य की आकाँक्षा की है। सुखद शीतल एवं उज्ज्वल शारदीय
    राका रजनी है। अनन्त सहचरि समूह एकत्रित हो गया है। किन्तु रासेश्वरी
    राधा जिनके बिना रास नृत्य सम्भव नहीं, अन्यत्र मानिनी बनी बैठी हैं। हित
    अलि लाल पर करुणा करके प्रिया को मनाने गयीं। मानिनि के निकट जाकर
    उन्होंने कहा-
    मूल-चलहि राधिके सुजान, तेरे हित सुख निधान;
    रास रच्यौ स्याम तट कलिंद नंदिनी।
    निर्तत जुबती समूह, राग रंग अति कुतूह;
    बाजत रस मूल मुरलिका अनंदिनी।।
    बंसीवट निकट जहाँ, परम रमनि भूमि तहाँ;
    सकल सुखद मलय बहै वायु मंदिनी।
    जाती ईषद विकास, कानन अतिसै सुवास;
    राका निसि सरद मास, विमल चंदिनी।।
    नरवाहन' प्रभु निहारि, लोचन भरि घोष नारि,
    नख सिख सौंदर्य काम दुख निकंदिनी।
    विलसहि भुज ग्रीव मेलि भामिनि सुख सिंधु झेलि;
    नव निकुंज स्याम केलि जगत बंदिनी।।१२।।
    भावार्थ - हे रस विचक्षण राधिके चलकर देखो कि केवल तुम्हारे ही
    कारण श्याम सुन्दर ने कलिन्द नन्दिनी यमुना के तट पर रास की रचना की
    है। जहाँ समस्त युवति समूह अत्यधिक राग-रङ्ग और उत्साह पूर्वक नृत्य
    परायण है तथा श्याम सुन्दर की रस मूल एवं आनन्दमयी वंशी का मधुर गान
    मुखरित है परम रम्य स्थली वंशीवट के निकट सुखद मलयज पवन मन्द मन्द