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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 275 में से

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पृष्ठ 73

६८ • • हित चौरासी
राग विभास
मूल-आजु तौ जुवति तेरौ वदन आनंद भयौ,
पिय के संगम के सूचत सुख चैन।
आलस बलित बोल, सुरँग रँगे कपोल,
विथकित अरुन उनींदे दोउ नैन॥
रुचिर तिलक लेस, किरत कुसुम केस;
सिर सीमंत भूषित मानौं तैं न।
करुना करि उदार राखत कछु न सार;
दसन वसन लागत जब दैन॥
काहे कौं दुरत भीरु पलटे प्रीतम चीरु,
बस किये स्याम सिखै सत मैन।
गलित उरसि माल, सिथिल किंकनी जाल,
(जै श्री) हित हरिवंश लता गृह सैंन॥४॥
भावार्थ-“हे युवति ! तुम्हारा जो यह मुख आनन्द से प्रफुल्लित है उसी
से तुम्हारे प्रियतम सङ्गम जनित सुख की सूचना मिल रही है। जैसे तुम्हारे बोल
आलस्य से लटपटाये हुए हैं वैसे ही तुम्हारे कपोल भी सुरंङ्ग (ताम्बूल पीक) से
रँग गये हैं। दोनों नयन विशेष थकित से, अरुण एवं उनींदे हैं; ललाट पर
तिलक भी लेश मात्र ही रह गया है। वेणी से पुष्प खिसक खिसक कर गिर रहे
हैं और सिर में मानों आपने सीमन्त रेखा भूषित ही नहीं की है। तुम बड़ी उदार
हो हे उदार स्वामिनी जब तुम श्रीलालजी के लिए अपने अधरासव का दान
करने लगती हो तब कुछ भी शेष नहीं रखती, (सर्वस्व दे डालती हो ।) हे भीरु !
अब (रात्रि के अंधकार में धोखे से बदले हुए) प्रियतम के इन वस्त्रों को क्यों
छिपा रही हो? हे स्वामिनि ! तुम ऐसी रस विचक्षणा हो कि श्याम को शत् शत
मदन की घातों (शिक्षा) के द्वारा अपना वशवर्त्ती कर लिया है।
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं “अहो ! तुम्हारे तो उर की माला भी कुम्हला
गयी है तथा किङ्किणी जाल भी शिथिल है, अतः निश्चित है कि तुमने अवश्य
ही लता गृह में शयन विलास किया है।”