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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 275 में से

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पृष्ठ 70

हित चौरासी • • ६५
(जै श्री) हित हरिवंश श्रवन सुनत प्यारी राधिका,
रमन सौं मिली गज गामिनी॥२॥
भावार्थ-(श्रीहित अलि ने कहा-) 'हे भामिनि ! (तुम्हें) प्यारे (श्रीकृष्ण)
ने बुलाया है। (देखो) आज (कैसी) सुन्दर रात्रि है ? अतः आप नवीन मेघ (रूप
श्रीलालजी) से ऐसे भेंटिये (मिलिये) जैसे दामिनि। अरी माई ! मोहन लाल
रसिक राज से मान करे भला ऐसी कौन कामिनी होगी ?
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (सखि के) उक्त शब्द सुनते ही गज
गामिनि प्यारी राधिका अपने रमण (प्रियतम) से जा मिलीं।
– ३ –
अवतरण-श्रीवृन्दावन के मञ्जुल निकुञ्ज भवन में सम्पूर्ण रात्रि युगल
किशोर ने ऐकान्तिक रति विहार किया है। प्रातः काल उनकी रति विगलित
स्थिति को देखकर सखियाँ परस्पर में युगल किशोर के रति सूचक चिह्नों का
दर्शन करती हुई आनन्द मग्न हो रही हैं। उसी समय श्रीहित सखीजी अन्यान्य
(ललितादि) सखियों से युगल किशोर की प्रातः कालीन सुखान्त छवि का
वर्णन करती हैं-
राग-विभास
मूल-प्रात समै दोऊ रस लंपट,
सुरत जुद्ध जय जुत अति फूल।
श्रम-वारिज घन बिंदु वदन पर
भूषन अंगहिं अंग विकूल।।
कछु रह्यौ तिलक सिथिल अलकावलि,
वदन कमल मानौं अलि भूल।
(जै श्री) हित हरिवंश मदन रँग रँगि रहे,
नैन बैन कटि सिथिल दुकूल॥३॥
भावार्थ-प्रातः काल दोनों रस लम्पट सुरत-युद्ध में विजय एवं प्रसन्नता
पूर्वक संलग्न हैं। मुख पर श्रम वारि (प्रस्वेद) की सघन बूँदें शुभ्र मौक्तिक जैसी