हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ • • हित चौरासी
नील निचोल जुवति, मोहन पट-
पीत अरुन सिर खोरी।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिक राधा पति,
सुरत रंग में बोरी॥९॥
भावार्थ-अति अनुपम जोड़ी है श्रीराधा मोहन की। मनोहर श्याम सुन्दर
इन्द्र नील मणि की भाँति हैं। तो वृषभानु किशोरी श्रीराधा काञ्चन तनु हैं। लाल
के विशाल भाल पर तिलक शोभित है, तो कामिनि प्रिया की केश चन्द्रिका के
मध्य (माँग) में रोरी लसित है। मोहन लाल की गति (चाल) मत्त गजराज जैसी
मोहक और श्रीवृषभानु नन्दिनी की मत्त करिणी जैसी मद मंथंर है। नव तरुणि
श्रीराधा के श्रीअंग में नीलाम्बर शोभिते हैं और श्याम सुन्दर के श्यामाङ्ग पर
पीत कौशेय धारण है। उपरोक्त नख शिख शृङ्गार की पूर्णता शिरोभाग पर
लसित अरुण खोरी (छोर) कर रहा है। श्रीहित हरिवंश कहते हैं यह जोड़ी
सौन्दर्य एवं रस की सीमा है। राधापति श्रीकृष्ण रसिक चूड़ामणि हैं और
श्रीराधा सुरत रस सिन्धु रूपा हैं।
टिप्पणी-इस पद में युगल किशोर के वाह्य और आन्तर शृङ्गार का
साम्य दिग्दर्शन है। क्रमशः वपु वर्ण से प्रारम्भ करके चन्दन लेप गमन गति,
पट धारण और अन्त में रस की ओर सङ्केत है। इसमें अन्तिम बात 'रसिक
राधा-पति, सुरत रंग में बोरी' यह पदांश श्रीहिताचार्य्य का हृदय और पूर्ण पद
का जीवन स्वरूप है।
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अवतरण-मध्याह्न शृंगार के उपरान्त युगल किशोर रास-रस परायण
हैं जहाँ नृत्य-पूरक नाना सुमधुर ताल-स्वर युक्त वाद्य झंकृत हो रहे हैं। रास
लास्य विचक्षणा श्रीराधा की अद्भुत नृत्य गति पर सहचरि वृन्द अपने प्राण
बलिहार करता है-
सारंग
मूल-आजु नागरी किसोर, भाँवती विचित्र जोर,
कहा कहौं, अंग अंग परम माधुरी।