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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 275 में से

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पृष्ठ 84

हित चौरासी • • ७६
टिप्पणी-हित चौरासी के एकादश एवं द्वादश संख्या वाले दो पद श्रीहित
महाप्रभु ने किसी विशेष बात पर रीझ कर अपने शिष्य नरवाहन जी को भेंट
किये हैं। एवं उनके नाम की छाप दी है। वस्तुतः दोनों पद श्रीहित हरिवंश चन्द्र
रचित हैं।

  • १२ -
    अवतरण - आज वंशीवट के तट की शोभन यमुना पुलिन पर श्याम
    सुन्दर ने रास नृत्य की आकाँक्षा की है। सुखद शीतल एवं उज्ज्वल शारदीय
    राका रजनी है। अनन्त सहचरि समूह एकत्रित हो गया है। किन्तु रासेश्वरी
    राधा जिनके बिना रास नृत्य सम्भव नहीं, अन्यत्र मानिनी बनी बैठी हैं। हित
    अलि लाल पर करुणा करके प्रिया को मनाने गयीं। मानिनि के निकट जाकर
    उन्होंने कहा-
    मूल-चलहि राधिके सुजान, तेरे हित सुख निधान;
    रास रच्यौ स्याम तट कलिंद नंदिनी।
    निर्तत जुबती समूह, राग रंग अति कुतूह;
    बाजत रस मूल मुरलिका अनंदिनी।।
    बंसीवट निकट जहाँ, परम रमनि भूमि तहाँ;
    सकल सुखद मलय बहै वायु मंदिनी।
    जाती ईषद विकास, कानन अतिसै सुवास;
    राका निसि सरद मास, विमल चंदिनी।।
    नरवाहन' प्रभु निहारि, लोचन भरि घोष नारि,
    नख सिख सौंदर्य काम दुख निकंदिनी।
    विलसहि भुज ग्रीव मेलि भामिनि सुख सिंधु झेलि;
    नव निकुंज स्याम केलि जगत बंदिनी।।१२।।
    भावार्थ - हे रस विचक्षण राधिके चलकर देखो कि केवल तुम्हारे ही
    कारण श्याम सुन्दर ने कलिन्द नन्दिनी यमुना के तट पर रास की रचना की
    है। जहाँ समस्त युवति समूह अत्यधिक राग-रङ्ग और उत्साह पूर्वक नृत्य
    परायण है तथा श्याम सुन्दर की रस मूल एवं आनन्दमयी वंशी का मधुर गान
    मुखरित है परम रम्य स्थली वंशीवट के निकट सुखद मलयज पवन मन्द मन्द