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सर्वकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

हित चौरासी • • ७५
तथा दूसरी ओर अपनी सुन्दर मराल गति द्वारा सखियों से रात्रि के रति
विलास के गोपन की चेष्टा करती हुई प्रिय संगम के रहस्य का संशय उत्पन्न
कर रही हो मानो कि तुमने प्रियतम से समागम ही प्राप्त नहीं किया हो।
– ९ –
अवतरण—नाना तरु लताकीर्ण श्रीवृन्दावन के मध्य भाग में अत्यन्त
रमणीय नव निकुञ्ज मन्दिर है। मन्दिर के दिव्य कक्ष में महा महा मणि रत्नों से
खचित उच्च सिंहासन है। सिंहासन अनेक अनेक कोमल और स्वच्छ आस्तरणों
से मण्डित है। यथा योग्य स्थलों पर कनक तारों से जटिल उपवर्हण (तकिये)
रखे हैं। उन उपवर्हणों का सहारा लिये युगल किशोर सिंहासनासीन हैं। चारों
ओर प्रधान प्रधान सखियाँ चँवर, व्यजन, ताम्बूल, परिमल पात्र दर्पण आदि
लिये खड़ी हैं।
युगल किशोर की छबि छटा देखते ही बनती है। सखियों ने उन्हें बहुत
बहुत प्रकार से सजाया है। दिव्य वस्त्र आभूषण अंगों में झलक रहे हैं। ललाट
पटल पर खौर है। काले घुँघराले कुन्तल कहीं तो भ्रमर की तरह मुख कमल
मधु का पान कर रहे हैं; तो कहीं काली, कोमल नागिनियों की भाँति एकत्र
करके बाँध दिये गये हैं। अतुल शोभा है। जिसका वर्णन श्रीहिताचार्य पाद
करते हैं-
सारंग
मूल– बनी श्रीराधा मोहन की जोरी।
इंद्र नील मनि स्याम मनोहर,
सात कुंभ तनु गोरी॥
भाल बिसाल तिलक हरि,
कामिनि चिकुर चंद्र बिच रोरी।
गज नाइक प्रभु चाल, गयंदनि–
गति वृषभानु किसोरी॥