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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 275 में से

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पृष्ठ 76

हित चौरासी • • ७१
यह अटपटे से बोल ? बहुत स्पष्ट है कि रसिक राधापति ! आप मदन के द्वारा
विशेष प्रमथित कर दिये गये हैं।"
टिप्पणी-
उर नख चन्द्र-यहाँ "उर नख चन्द्र, विराने पट, अटपटे से बैन, ये तीन
चिह्न विशेष बताये गये हैं। इनमें तीनों लक्षण नायिका में और नायक में अन्तिम
दो ही घटित होने चाहिये क्योंकि प्रथम लक्षण उर नख चन्द्र' नायिका के अङ्गों
में सम्भव है क्योंकि वही उसकी पात्र है, पयोधर मर्दन आदि के विचार से।
किन्तु इस पद में यह लक्षण-उर नख चन्द्र-नायक के अङ्ग में बताया गया है।
(१) श्रीहिताचार्य्य पाद ने अन्यत्र भी अपने कई पदों में नखाघात की
परिस्थितियाँ उपस्थित की हैं। एक स्थल में गौर-श्याम भुज की मनोहर
कलह दिखायी है, जिसमें हाथापाई से मालावलि टूट जाने का भी वर्णन है।
वहाँ अधिक सम्भव है कि प्रिया कर नखों से प्रियतम के उर पर नख क्षत हो
जायें; यथा-
गौर स्याम भुज कलह मनोहर नीबी बन्धन मोचत डोरी।
(जै श्री) हित हरिवंश करत कर धूनन प्रनय कोप मालावलि तोरी।।
(२) रस समतुल्य दम्पति किसी एकान्तिक क्रीड़ा में रत हैं। क्रीड़ा का
वर्णन है-
खंडन अधर करत परिरंभन ऐंचत जघन दुकूल।
उर नख पात, तिरीछी चितवन दम्पति रस सम तूल।।
वे भुज पीन पयोधर परसत वाम दृशा पिय हार।
-हित चौरासी पद संख्या ३२
रस समतुल्य दम्पति की प्रायः सभी क्रियाएँ दोनों ओर से समतुल्य
होंगी, अतः उर नख पात' भी नायक के वक्षस्थल पर हो तो कोई आश्चर्य नहीं।
(३) रस क्षेत्र की एक परम गोप्य भावना है-विपरीत रति। इसमें नायक
बन जाता है नायिका और नायिका बन जाती है नायक। तब उनकी समस्त
चेष्टाऐं तद्वत हो जाती है। ऐसी दशा में निर्मित नायिका के 'उर नख चन्द्र'
स्वभाविक हैं।