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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

अं० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( ( ४९ ) )
अथ सारसपानीकें गुणदोष ।
क्षारं घनं वातकफानुकारि त्वग्दोषदं वा कटु दीपनं च ॥
प्रोक्तं विपाके श्रमशोषकारि स्यात् सारसं नो सुखकारि वारि ४३
पर्वतकी शिला आदिसें रुकी हुई नदीका पानी जहां झिरके इकट्ठा होवे उसको सारसपानी
कहते हैं। यह पानी खारा है, भारी है, वातको और कफको करता है और खालमें दोषको उप-
जाता है, कडुआ है, अग्निको जगाता है, पाककालमें श्रमको और शोषको करता है और सुखको
देनेवाला नहीं है ॥ ४३ ॥
अथ बावड़की जलके गुण ।
क्षारं कवोष्णं कफवातरोगविनाशनं पित्तकरं कटु स्यात् ॥
शस्तं सदा पित्तविकारिणाञ्च शस्तं न वाप्यं शरदि प्रदिष्टम् ॥४४
बावड़ीका पानी खारा, कुछ थोडा गरम, कफ वात रोगोंको नाश करनेवाला, पित्तकारक,
तीखा और पित्तविकारी मनुष्योंको सदा हितकारी है, परन्तु शरदऋतुमें हितकारी
नहीं है ॥ ४४ ॥
अथ नदियोंकी प्रकृति ।
इति चाष्टविधं प्रोक्तं जलं भिषजसत्तमैः ॥
नादेयं संप्रवक्ष्यामि समुद्रंगामिस्रोतसाम् ॥ ४५ ॥
ऐसे उत्तम वैद्योंने पानी आठ प्रकारसे कहा है। अब नदियोंमें समुद्रको जानेवाली नदियोंका
जल कहूँगा ॥ ४५ ॥
तथा प्राच्यां गमाश्र्वान्याः पश्चिमानुगमास्तथा ॥ तासां गुणागु-
णान्वक्ष्ये समासेन गुणोत्तम ! ॥ ४६ ॥ ससैकता सपाषाणा
द्विविधा चाम्बुवाहिनी ॥ एवं चतुर्विधा नद्यो वातपित्त-
कफात्मिकाः ॥ ४७ ॥
पूर्वमें गमन करनेवाली और पश्चिममें गमन करनेवाली जो नदियां हैं उनके गुणदोषोंको
हेगुणोत्तम ! विस्तार करके कहूंगा ॥ ४६ ॥ वालुरेतवाली और पत्थरोंवाली ऐसे नदी दो
प्रकारसे हैं और पूर्वोक्त दोनोंके मिलनेसे चार प्रकारकी नदी हैं, ये वात पित्त कफसे
संयुक्त हैं ॥ ४७ ॥
अथ सदा बहनेवाली नदीकें गुण दोष ।
सदावहा वा घनवारिकोष्णा मरुत्कफानां शमनञ्च तस्याः ॥
नीरं वसन्ते हितकृद्विशेषान्नदीभवं नैव हिमागमे च ॥ ४८ ॥
४

( ५० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
सब कालमें बहनेवाली नदियां भारी पानीवाली होती हैं, कुछ गर्म होती हैं, वायुको और
कफको शांत करती हैं; तिन्होंका पानी चैत्र और वैशाख मासमें विशेष करके हितको करता है
और जाडेके आगमनमें अच्छा नहीं है ॥ ४८ ॥
अथ पत्थरोंवाली नदीके गुण दोष ।
घनविमलशिलानां स्फालनाज्जातफेनं बहलसजलवीचीच्छन्न-
संक्षोभदत्तम् ॥ ननु लघु सुखशीतं नाति चोष्णं घनञ्च हरति
पवनपित्तं श्लेष्मकृद्वारि सम्यक् ॥ ४९ ॥
भारी और विशेषकरके मलोंवाले ऐसे पत्थरोंके संयोगसे झागोंवाला और बहुतसे तरंगोंके
क्षोभसे गर्मको प्राप्त हुआ और सुन्दर शीतल और अतिगर्म नहीं और भारी ऐसा पानी
वातको और पित्तको अच्छीतरह हरता है और कफको पैदा करता है ॥ ४९ ॥
अथ वालूरेतवाली नदीके पानीके गुण दोष ।
सघनविमलतोयं सैकतायाः प्रवाहे न च भवति लघुत्वं श्लेष्म-
कृद्धन्ति पित्तम् ॥ भवति मधुरमेवं किञ्चिदुष्णं कषायं भवति
पवनकारि शोषमूर्च्छा निहन्ति ॥ ५० ॥
वालू रेतके प्रवाहमें यह पानी भारी नहीं है, विशेष करके मलसे रहित नहीं है, हलका भी
नहीं है, कफको करता है, पित्तको हरता है, मधुर है कुछ गर्म है, कसैला है, पवनको करता
है, शोषको और मूर्च्छाको नाशता है ॥ ५० ॥
अथ उत्तरसे बहनेवाली नदियोंके और पानीके गुण दोष ।
हिमवत्प्रभवा नद्यःपुण्या देवर्षिसेविताः॥ घनपाषाणसिकतावा-
हिन्यो विमलोदकाः ॥ ५१ ॥ हन्ति वातकफं तोयं श्रमशोषवि-
नाशनम् ॥ किञ्चित्करोति वा पित्तं त्रिदोषशमनं जलम् ॥ ५२ ॥
मलयप्रभवा नद्यः शीततोयामृतोपमाः ॥ घ्नंति वातञ्च पित्तञ्च
शोषभ्रमश्रमापहाः ॥ ५३ ॥ गङ्गा सरस्वती शोणो यमुना सरयू
शची ॥ वेणा शरावती नीला उत्तरापूर्ववाहिनी ॥ ५४ ॥ हिम-
वत्प्रभवा ह्येता हिमसंभवशीतलाः॥ समाः सर्वगुणैर्नद्यो वात-
श्लेष्महरा नृणाम् ॥ ५५ ॥ आसां नवशतैर्युक्ता गङ्गा प्रोक्ता
मनीषिभिः ॥ तथा चर्म्मण्वती वेत्रवती पारावती तथा ॥ ५६ ॥
क्षिप्रा महापदी पीता मृत्सकान्या मनस्विनी ॥ शेवती शैवलि-

अ० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( ५१ )
न्यश्च सिन्धुयुक्ताः समुद्रगाः॥५७॥ वातपित्तहरं नीरं त्रिदोषघ्नं
मतं परम् ॥ श्रमग्लानिहरं वृष्यमुत्तराशानुगामि च ॥ ५८ ॥
हिमालय पर्वतसे उत्पन्न हुई नदियां पवित्र हैं देवता और मुनियोंसे सेवित हैं मोटें पत्थर
और वालरेतको बहानेवाली हैं मलसे रहित पानीवाली हैं, ॥ ५१ ॥ इनका पानी वातको और
कफको नाशता है,श्रमको और शोषको दूर करता है अथवा कुछ पित्तको करता है और त्रिदो-
षको शांत करता है ॥५२॥ मलय पर्वतसे उपजी नदियाँ शीतपानीवाली हैं अमृतके समानपानी
बहती हैं और वात, पित्त, शोष, भ्रम, और श्रमको नाशती है ॥ ५३ ॥ गंगाजी, सरस्वती,
शोण,यमुना,सरयू,शची,वेणा,शरावती, नीला ये नदियां उत्तरको और पूर्वको बहती हैं ॥५४॥
हिमालय पर्वतसे उत्पन्न हुई और बर्फके सम्भवसे शीतल हुई ऐसी ये नदी सर्वगुणोंसे समान हैं
और मनुष्योंके वातको और कफको हरती हैं ॥ ५५ ॥ इन्होंनेसे नौसौ ९०० नदियोंसे युक्त
हुई गंगाजी पंडितोंने कही है तैसेही चर्मण्वती, वेत्रवती, पारावती, ॥ ५६ ॥ क्षिप्रा, महापदी,
पीता,मृत्सका, मनस्विनी, शैवती, शैवलिनी,सिंधु ये सब नदी समुद्रमें गमन करती हैं ॥५७॥
इनका पानी वातको और पित्तको हरता है और त्रिदोषको हरनेवाला मानाहै परिश्रमको और
ग्लानिको हरता है वीर्य्यमें हित हैऔर उत्तर दिशासे आता है ॥ ५८ ॥
अथ तापीआदिनदियोंके गुण दोष ।
तापी तापा च गोलोमी गोमती सलिला मही ॥ सरस्वतीयुता
नद्यो नर्म्मदा पश्चिमानुगाः ॥ ५९॥ आसां जलं घनं पीतं
पित्तघ्नं कफकृत्तथा॥ वातदोषहरं हृद्यं कण्डूकुष्ठविनाशनम्॥६०॥
तापी, तापा, गोलोमी, गोमती,सलिला, मही, सरस्वती,नर्मदा,ये पश्चिमसे बहती हैं॥५९॥
इनका पानी मीठाहै पीनेसे पित्तको नाशकरता है कफको करता है वातदोषको हरता है सुन्दर है
खाजको और कुष्ठको नाशता है ॥ ६० ॥
पश्चिमाद्रिसमुद्भूता गौतमी पुण्यभावना ॥अस्या शीतं जलं
वापि कफवातविकारकृत्॥पित्तदं शमनं बल्यं मूत्रदोषविकार-
कृत् ॥ ६१ ॥ पूर्णा पयस्विनी वेत्रा प्रणीता च वरानना ॥
द्रोणा गोवर्द्धनी यान्या गौतम्यानुगता इमाः ॥ ६२॥ आसां
जलं घनं नातिवातश्लेष्मविकारकृत् ॥ पूर्वसामुद्रगाश्चैव नद्यो
नवशतैर्युताः ॥ ६३ ॥ कावेरी वीरकांता च भीमा चैव पय-
स्विनी ॥ विभावरी विशाला च गोविन्दी मदनस्वसा ॥ पार्वती

( ५२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
चापरा नद्यो दक्षिणादिग्गमा इमाः ॥ ६४ ॥ प्रत्यकशो न सेवेत
युक्तायाश्च पृथक् पृथक् ॥ सर्वासां परिसंख्या च शतानां चैक-
विंशतिः ॥ ६५ ॥
पश्चिमके पर्वतसे उपजी गौतमी पवित्रहै, इसका पानी शीतलहै, कफ और वातके विकारको करता
है, पित्तकारक है, दोषशामक है, बलकारक है, मूत्रदोषके विकारको करता है ॥ ६१ ॥ पूर्ण,
पयस्विनी, वेत्रा, प्रणीता, वरानना, द्रोणा, गोवर्द्धनी इत्यादि नदी गौतमी नदीके अनुगमन करती
हैं ॥ ६२ ॥ इनका पानी अति भारी नहीं है, वातके और कफके विकारको करता है और पूर्वके
समुद्रमें गमन करनेवाली नौसौ ९०० नदियां हैं ॥ ६३ ॥ कावेरी, वीरकांता, भीमा, पयस्विनी,
विभावरी, विशाला, गोविंदी, मदनस्वसा, पार्वती इत्यादि नदी दक्षिणदिशाको गमन करती हैं ६४ ॥
एक एक नदीको नहीं सेवे, मिली हुई नदीकासेवन करे क्योंकि सब नदियोंकी २१०० इक्की-
ससौ संख्या अर्थात् गिनती ॥ ६५ ॥
क्रोशे क्रोशे भवेत् कुल्या योजने योजने नदी ॥
द्वियोजना च विज्ञेया महानीरा बुधैर्नदी ॥ ६६ ॥
कोश कोश में विस्तारंवाली कुल्या कहाती है और चार चार कोशमें विस्तार वाली नदी
कहाती हैं और आठ आठ कोशमें विस्तारवाली महानदी कहाती है ॥ ६६ ॥
॥ अथ पृथिवीके भागका पानी ।
भूमिः पञ्चविधा ज्ञेया कृष्णा रक्ता तथा सिता ॥ पीता नीला
भवेच्चान्या गुणास्तासां प्रकीर्त्तिताः ॥ ६७ ॥ कृष्णा च मधुरा
रूक्षा कषाया पीतवर्णिनी ॥ रक्ता सा च भवेत्तिक्ता मधुरामला-
सिता स्मृता ॥ ६८ ॥ नीला सकटुका चैवं भूमिभागजलं
विदुः ॥ सघनं मधुरं नीरं कृष्णं भूमिपरिश्रितम् ॥ ६९ ॥ पी-
ताश्रितं कषायञ्च रक्तायाः क्षारमाधुरम् ॥ सितायामम्लमधुरं
भूमिभागेन लक्षयेत् ॥ ७० ॥ तथा चतुर्विधं तोयं वक्ष्यामि शृणु
कोविद् ॥ पापोदकं रोगोदकमंशुदकारोग्योदकौ ॥ ७१ ॥
काली, लाल, सफेद, पीली, नीली, इन भेदोंसे पृथ्‍वी पांचप्रकारकी है उनके गुण कहते हैं
॥ ६७ ॥ काली पृथ्‍वी मधुर है, रुखी है, पीली पृथ्वी कसली है, लाल पृथिवी कडुवी है
सफेद पृथिवी मधुर और खट्टी है ॥ ६८ ॥ नीली पृथिवी चर्चरी जाननी ऐसेही पृथिवीके
भागका पानी कहा है, काली भूमिक जल घना, मीठा, होता है ॥ ६९ ॥ पीली पृथिवीका
कसैला पानी है, लाल पृथिवीका पानी खारा और मधुर है, सफेद पृथिवीका

अ० ७ ] भाषाटीकासमेत। ( ५३ )
पानी खट्टा है, मधुर है, ऐसे पृथिवीके भागसे पानीकोलक्षित करे ॥ ७० ॥ अब
पापोदक, रोगोदक, अंशूदक, आरोग्योदक इन भेदोंसे पानीको चार प्रकारसे कहता हूं, हे
कोविद ! सुन ॥ ७१ ॥
अथ पापोदकका गुण दोष।
पापं पापोदकं चैव करोत्येवमरोचकम् ॥ विष्ठायुक्तं ग्राहि नीरं
कृमिकीटसमाकुलम्॥७२ ॥ समलं नीलशैवालं पापन्तु नर्दि-
तञ्च यत् ॥ स्नाने पाने न तच्छस्तं नराणां वा हयेषु च ॥७३॥
स्नानेन त्वग्भवान्रोगान्कण्डूकुष्ठविसर्पकृत् ॥ पानेन कफगु-
ल्मानां कृमीणां वरसम्भवन् ॥ करोति विविधान्रोगंस्तस्मा-
त्तत् परिवर्जयेत् ॥ ७४ ॥
पापोदकसंज्ञक पानी पापरूप है, और रुचिको विगाडता है, मलसे संयुक्त हुआ पानी कब्ज
को करता है और कीडे आदिसे संयुक्त ॥ ७२ ॥ मलसे सहित, नीले शिवालसे संयुक्त,
उसका शब्द भी पापसे भरा है, यह मनुष्यों और घोडोंको स्नानमें और पानमें अच्छा नहीं है
॥ ७३ ॥ यह पानी स्नानके करनेसे खालके रोग, खाज, कुष्ठ, विसर्पको करता है और पीनेसे
कफको, गुल्मरोगको कृमिरोगको और, त्वचाके रोगोंको उपजाता है इससे इसे त्यागना ही
चाहिये ॥ ७४ ॥
अथ रोगोदकके गुणदोष ।
बहुवृक्षलताकुञ्जे छायाकूपोऽथ वा सरः ॥ अव्ययश्चेदपोऽप्येवं
कृमिशैवालसंयुक्तम्॥७५॥क्लिन्नं सपिच्छलं कृष्णं वृक्षमूलाश्चितं
भवेत् ॥ बहुवृक्षपर्णयुक्तंच दुर्गन्धं मूत्रगन्धवत् ॥ ७६॥ रोगो-
दकं विजानीयात्करोति विषमान्गदान् ॥ शूलं कुष्ठं च कण्डूञ्च
सेवितेन करोति हि ॥ ७७ ॥ विण्मूत्रतृणनीलिकाविषयुतं तप्तं
घनं फेनिलं दन्तग्राह्यमनात्तवं हि सजलं दुर्गन्धि शैवालजम्॥
नानाजीवविमिश्रितं गुरुतरं पर्णौघपङ्काविलं चन्द्राकार्कशुसुगो-
पितं न च पिबन्नींरं सदा दोषलम् ॥ ७८ ॥ गुल्मप्लीहार्शः
पाण्डुश्च जलं वापि जलोदरात् ॥ ७९ ॥
१ वरसंभवान् त्वक्सम्भवान् वेष्टनत्वात् वरशब्दः त्वचि वर्तते ।

( ५४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
व बहुतसे वृक्ष और वेलोंके समूहकी छायामें जो कूप अथवा तलाव हो और उसमें पानी
सदा बना रहता हो, कीडे और शिवालसे वह पानी संयुक्त हो ॥७५॥ और क्लेदपनेको प्राप्त हो
और झागोंसे संयुक्त हो काला हो और वृक्षोंकी जडमें आश्रित हो और बहुतसे वृक्षोंके पत्तोंसे
व्याप्त हो दुर्गन्धित हो और मूत्रके गंधके समान गंधवाला हो ॥७६॥ उसे रोगोदक जानना यह
विषमरोगोंको करता है और सेवनेसे शूल, कुष्ठ, खाज इन्होंको करता है ॥७७॥ अथवा विष्ठा,
मूत्र, तृण, नीला शिवाल, विष इनसे संयुक्त हो और गर्म हो, गढाहो, झागोंसेसंयुक्त हो दंतोंको
ग्रहण करता हो, अकालमें वर्षा हो दुर्गंधसे युक्त हो, शिवालसे संयुक्त हो अनेकप्रकारके जीवोंसे मिश्रि-
तहो, अत्यंत भारी हो, पत्तोंके समूह और कीचड़से मैला हो, चंद्रमा और सूर्यकी किरणोंसे रक्षि-
त हो, ऐसा पानी भी रोगोदक कहाता है इसको भी नहीं पीना, यह सबकालमें दोषोंको उपजाता
है॥७८॥ और सेवनेसे गुल्मरोग, तिल्लीरोग, बवासीर, पांडु, जलोदर इनको उपजाता है॥७९॥
अथ अंशूदकके गुणदोष ।
दिवा सूर्यांशुसन्तप्तं रात्रौ चन्द्रांशुशीतलम् ॥ अंशूदकमिति
ख्यातं सर्वरोगनिवारकम् ॥ ८० ॥ कफमेदोऽनिलघ्नं च दीपनं
बस्तिशोधनम् ॥ श्वासकासहरं नीरं चक्षुष्यं नेत्ररोगहत्॥ ८१ ॥
दिनमें सूर्यके किरणोंसे तप्त हुआ और रात्रिमें चंद्रमाके किरणोंसे शीतल हुआ ऐसा पानी
अंशूदक कहा है, यह सब रोगोंको दूर करता है ॥ ८० कफ, मेद, वात इन्होंको नाश करता है,
जठराग्निको जगाता है, बस्तिको शोधता है, श्वासको और खाँसीको हरता है, नेत्रोंमें हित है
और नेत्रके रोगोंको हरता है ॥ ८१ ॥
अथ आरोग्योदकके गुणदोष ।
पादशेषन्तु कथितं तच्चारोग्यजलं विदुः ॥ कासश्वासहरं पथ्यं
मारुतं चापकर्षति ॥ ८२ ॥ सद्यो ज्वरं हरत्याशु समेदं कफना-
शनम् ॥ प्रतिश्यायं पाचयति शूलगुल्मार्शनाशनम् ॥ ८३ ॥
दीपनञ्च हुताशस्य पाण्डुशोफोदरापहम् ॥ अजीर्णञ्च जरत्याशु
पीतमुष्णोदकं निशि ॥ ८४ ॥
अग्निके द्वारा पकानेसे जो चौथाई भाग शेष रहे वह आरोग्योदक कहाता है, यह खाँसीको
और श्वासको हरता है, पथ्य है, वायुको नाशता है॥ ८२ ॥नये ज्वरको शीघ्र हरता है, मेदको
और कफको नाशता है, जुकाम पकाता है और शूल, गुल्मरोग, बवासीरको नाशता है ॥८३॥
अग्निको जगाता है और पांडुरोग, शोजा, उदररोगको हरता है और रात्रिमें पियाहुआ गर्मपानी
अजीर्णको जलाता है ॥ ८४ ॥

अ० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( ५५ )
अथ शीतपानीके गुण ।
मद्यपानसमुद्भूते रोगे पित्तान्विते पुनः ॥
सन्निपातसमुत्थे च तत्र शीतोदकं हितम् ॥ ८५ ॥
मदिराके पीनेसे उपजे रोगमें और पित्तसे अन्वित हुए रोगमें और सन्निपातसे उपजे रोगमें
शीतल पानी हित है ॥ ८५ ॥
गर्मपानीके गुण !
शरदृतौ तथा ग्रीष्म क्वथेत्पादावशेषितम् ॥ शिशिरे च वस-
न्ते च कुर्यादर्द्धावशेषितम् ॥ ८६ ॥ विपरीतऋतौ दृष्ट्वा प्रावृषि
वार्द्धभागिकम् ॥ ८७॥ क्वाथ्यमानं च निर्वेगं निष्फेनं निर्मलञ्च
यत् ॥ अर्द्धावशिष्टं भवति तदुष्णोदकमुच्यते ॥८८॥ तत्पाद-
हीनं वातघ्नं चार्द्धं पित्तविकारजित् ॥ कफघ्नं पादशेषन्तु पानीयं
लघुपाचनम् ॥८९॥ धारापाते हि विष्टम्भि दुर्जरं पवनापहम् ॥
शृतशीतं त्रिदोषघ्नं कफान्तआमि शीतलम् ॥९०॥ दिवसे क्व-
थितं तोयं रात्रौ तद्गुरू वर्जयेत्॥रात्रौ शृतं तु दिवसे गुरुत्वम-
धिगच्छति ॥ ९१ ॥
शरदऋतुमें और ग्रीष्मऋतुमें पकानेमें चौथाई भाग शेष रहा पानी हित है, शिशिरमें और वसंतऋतुमें
पकानेमें आधा शेष रहा पानी हित है ॥ ८६॥ हेमंतऋतुमें पकानेसे तीनहिस्से शेषरहा
पानी हित है और वर्षाऋतुमें पकानेमें आधा भाग शेषरहा पानी हित है ॥ ८७ ॥ अग्निपे पका-
नेमें वेगसे रहितहो, झागोंसे वर्जितहो मलसे रहितहो, पकानेमें आधा भाग शेषहो तिसको उष्णोदक
कहते हैं ॥८८॥ पकानेमें चौथाई भाग जलाहुआ पानी वातको हरता है आधा भाग जलाहुआ
पानी पित्तको हरता है तीन भाग जलाहुआ पानी कफको हरता है, ऐसा पानी हलका है पाचन
है ॥ ८९ ॥ धाराके पातसे लिया पानी विष्टंभको करता है, मुश्किलसे जरता है, वायुको हरता
है, अग्निपै पकाके शीतल किया पानी त्रिदोषको नाशता है कफको हरता है, शीतल है, ॥९०॥
दिनमें पकाये हुए पानीको रात्रिमें नहीं पीवै, यह भारी होजाता है और रात्रिमें पकाये हुए पानीको
दिनमें नहीं पीवै यह भी भारी हो जाता है ॥ ९१ ॥
अथ पानीविषयकविधि ।
मदात्यये सदाहे च रक्तपित्ते तथोर्ध्वगे॥रक्तमेहे विशेषेण नोष्णं
तोयं प्रशस्यते ॥९२॥ पार्श्वशूले प्रतिश्याये वातरोगे गलग्रहे॥
आध्माने स्तिमिते कोष्ठे सद्यःशुद्धौ नवज्वरे ॥ ९३ ॥

( ५६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
अजीर्णे च तथा कासे न शीतमुदकं हितम्॥ प्रतिश्याय प्रसेके
च ज्वरे कुष्ठे व्रणेषु च ॥ ९४ ॥ शोफे नेत्रासये चैव मन्दाग्नौ
च तथा क्षये ॥ सूतिजातासुतानारीरक्तस्रावेऽप्यरोचके ॥९५॥
एतेषां सिद्धिमिच्छद्भिः पानीयं मन्दमाचरेत् ॥ जीर्णेच क्षुत्प्रप-
न्ने च पीतं हन्त्युदरानलम् ॥ ९६ ॥
मदात्यय रोग, दाह, शरीरके ऊपरले अंगोंमें प्राप्त हुआ रक्तपित्त, रक्तप्रमेह, इन्होंमें विशेष-
करके गर्मपानी श्रेष्ठ नहीं है ॥९२ ॥ पसली, शूल, जुकाम, वातरोग, गलग्रह, अफारा, स्तिमित,
श्वासदोष, कोष्ठरोग, तत्कालके जुलाब, वमनआदि, नवीनज्वर ॥९३॥ और अजीर्ण, खासीमें
शीतल पानी अच्छा नहीं है और पीनस रोग प्रसेक ( मुंहसे रालवहने ), ज्वर, कुष्ठ, घाव
॥ ९४ ॥ शोजा, नेत्रके रोग, मंदाग्नि, क्षयरोग, सूतिका नारी, रक्तस्राव, अरोचक ॥ ९५ ॥
इनसे सिद्धिको चाहनेवाला मनुष्य अल्पपानीको पीवे भोजनको जीर्ण होनेमें क्षुधाके समय पिया
हुआ पानी पेटके अग्निको नाशता है ॥ ९६ ॥
करोति गुल्मं शूलं वा तथा श्रान्ते बहूद्कम् ॥ तस्माज्जीर्णऽनलं
हन्ति अजीर्णे वारि भेषजम् ॥ ९७ ॥ भुक्तान्तः परतः शस्तं
पीतं वारि गुणात्मकम्॥ अध्वश्रान्तक्षुधाक्रान्ते शोकक्रोधातु-
रेषु च ॥ ९८ ॥ विषमासनोपविष्ट च पीत वारि रुजाकरम् ॥
तस्मात् प्रसन्ने मनासि पानीयं मन्दमाचरेत् ॥ ९९ ॥ आदौ
पीत्वा दहत्यग्निर्मध्ये पीत्वा रसायनम् ॥ तदन्ते च जलं पीत्वा
तज्जलं दुर्जरं भवेत् ॥ १०० ॥ भोजनादौ जलं पीत्वा चाग्नि-
सादःकृशाङ्गता ॥ अन्त करोति स्थूलत्वमूर्ध्वमामाशयात्क-
फम् ॥१०१ ॥ इति तोयपानविधिः ॥ इति जलवर्गो नाम
सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
परिश्रमसे थका हुआ मनुष्य बहुत पानीको पीवेतों गुल्म और शूलरोगकी उत्पत्ति होती है
और भोजनको जीर्ण होनेमें पियाहुआ पानी जठराग्निको हरता है और अजीर्णमें पानी औषधरूप है
॥ ९७ ॥ भोजन करनेके मध्यमें और पीछेसे पियाहुआ पानी गुणोंको करता है और मार्गके
चलनेसे श्रांत हुआ और भूखसे पीडित हुआ और शोक, क्रोध, रोगसे पीडित हुआ
॥ ९८ ॥ और विषम आसनपै स्थित हुआ ऐसा मनुष्य पानीको पीवे तो शीघ्र रोगकी
उत्पत्ति होती है इसलिये प्रसन्न हुए मनमें भी अल्प पानीको पीवे ॥ ९९ ॥

अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( ५७ )
भोजनकी आदिमें पिया पानी अनिको नाशता है, भोजनके मध्यमें पिया पानी रसायन अर्थात्
अमृतके समान है, भोजनके अंतमें पिया पानी दुःखसे जरता है॥ १०९ ॥ भोजनकी आदिमें
पानीको पीनेसे मंदाग्नि और अंगोंका कृशपना होता है और भोजनके अंतमें पिया हुआ पानी
मुटापेको करता है और आमाशयसे ऊपर कफको करता है ॥ ११०॥
इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरत्नशालिग्रामवैद्यशास्त्रविशारदहारीतसंहिताभाषाटीकायां
प्रथमस्थाने जलवर्गो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः ८.
अथ दुग्धवर्गवर्णन ।
अथातः संप्रवक्ष्यामि क्षीरवर्गन्तु वत्सक ॥
दधिसर्पिर्वसातक्रं तेषां सर्वगुणागुणम् ॥ १ ॥
हे पुत्र ! अब क्षीरवर्गको कहता हूँ और दही, घृत, वसा, तक्र इनके सब गुण और
दोष कहूँगा ॥ १ ॥
॥ अथ दूधकी उत्पत्ति ।
यद्यदाहारजातन्तु रसं क्षीरशिरानुगम् ॥ रसो जलं च भुक्तं च
तथा पित्तेन संयुतम् ॥२॥ पाचितं जाठरे वह्नौ पित्तेन सह मू-
र्च्छितम् ॥ पच्यमानं शिराप्राप्तं क्षीरतोयेन पुत्रक ॥ ३॥ तन
क्षीरमिति ख्यातमग्निसाम्रात्मकं पयः ॥ अमृतं सर्वभूतानां
जीवनं बलकृन्मतम् ॥ ४ ॥
जो जो भोजनसे रस उपजता है वही दूधकी नाड़ीके अनुगत होता है रस पदार्थ, पानी,
और भोजन पित्तसे संयुक्त होके ॥ २ ॥ जठराग्निके द्वारा पच्यमान होकर अन्नजल रस शिरामें
दुग्धजलके साथ प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ इससे दूध ऐसा कहाता है। यह दूध जठराग्निके समान
स्वभाववाला होता है और यही दूध अमृत है, सब जीवोंका जीवन है और बलको करने-
वाला माना है ॥ ४ ॥
हारीतः संशयापन्नः पप्रच्छ पितरं पुनः॥कथं रसस्य सम्पत्तिः
कथं संचीयते विभो ॥ ५ ॥ कथं रक्तस्य संस्थाने क्षीरं पाण्डुं
समीरिम॥कथ तत्र कुमारीणां वन्ध्यानां न कथं भवेत् ॥६॥
१. 'पाण्डुर्ना मृत्तौ सिते'इति मेदिनी ।

( ५८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-

संशयको प्राप्त हुआ हारीत फिर पिताको पूछता भया हे विभो ! रसकी सिद्धि कैसे है ? और
कैसे रस संचित होता है ? ॥ ५ ॥ कैसे रक्तके स्थानमें सफेद रंगका दूध हो जाता है
कुमारी,कन्याके और वंध्या स्त्रियोंके कैसे नहीं होता ? ॥ ६ ॥
एवं पृष्टो महावीर्य्यः प्रोवाच मुनिपुंगवः ॥ शृणु पुत्र महाप्राज्ञ
यदुक्तं पूर्वसूरिभिः ॥७॥ क्षीरं स्निग्धं तथा रक्तं पित्तेन पाकतां
गतम् ॥ रक्तं श्वेतत्वमायाति तथा क्षीरं सितं भवेत् ॥ ८ ॥
ऐसे पूछे हुए महावीर्य्यवाले आत्रेयजी कहने लगे हे पुत्र ! हे महाप्राज्ञ ! जो पहले पंडितों-
ने कहा है वह सुनो ॥७॥ पहिले दूध गाढा और लाल रहता है, फिर पित्तसे पककर वही रक्त
सफेद होजाता है और वही श्वेत दूध हो जाता है ॥ ८ ॥
क्षीरनाडी कुमारीणां वन्ध्यानां च कथं भवेत्॥अल्पधातुबलं
यस्मात्तस्मात्क्षीरं न जायते ॥९॥ वन्ध्यानां क्षीरनाड्यस्तु
वातेन परिपूरिताः।क्षीरं च न भवेत्तस्मादार्त्तवं चाधिकं यतः१०
कुमारी,कन्याओंके और वंध्याओंके दूधकी नाडी कहां होती है? अल्पधातु और अल्पबल
होनेके कारण कुमारीके और वंध्याके दूध नहीं होता है ॥ ९ ॥ वंध्यस्त्रियोंकी दूधकी नाडी
वायुसे पूरित होती है इससे दूध नहीं उपजता है किंतु आर्तव अधिक होता है ॥ १० ॥
प्रसूतासु च नारीषु बलेन सह सूयते ॥ तेन स्रोतोविशुद्धिःस्यात्
क्षीरमाशु प्रवर्त्तते ॥ ११ ॥ तस्मात् सद्यःप्रसूतायां जायते
श्लैष्मिकं पयः॥तेन कठिनतां याति तस्मात्तत् परिवर्जयेत्॥१२॥
और बालकको जन्मानेवाली नारियोंमें बल करके बालक जन्मता है इससे विशेष करके स्रोतोंकी
शुद्धि होती है तब दूध शीघ्र प्रवृत्त होता है ॥ ११ ॥ इसलिये तत्काल प्रसूतहुई नारीमें कफकी
प्रकृतिवाला दूध उपजता है इसलिये वह दूध गाढा रहता हे उसका त्यागकर देना चाहिये ॥ १२॥
स्रोतोविशुद्धिकरणं बलकृद्दोषनाशनम् ॥
पयस्त्रिदोषशमनं वृष्यञ्चाग्निप्रवर्द्धनम् ॥ १३ ॥
स्रोतोंके विशेष करके शुद्धिको करनेवाला, बलको करनेवाला और दोषको नाशनेवाला
दूध त्रिदोषको शांत करता है, पुष्ट है और जठराग्निको बढ़ाता है ॥ १३ ॥
पृथक् २ स्त्रियोंके दूधके गुण ।
कृष्णा वृष्या च वातघ्नी पयस्तस्या विशिष्यते॥श्वेतापयः श्ले-
ष्मकृच्च वातलं रक्तिकापयः॥१४॥पित्तसंशमना पीता तस्याः
क्षीरं विशिष्यते ॥

अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । (५९)
काली स्त्री पुष्टिको करती है, वातको नाशती है, उसका दूध अच्छा होता है,सफेद रंगकी
स्त्रीका दूध कफको करता है, लाल रंगकी स्त्रीका दूध वातको करता है ॥ १४ ॥ पीलीका दूधः
पित्तको शांत करता है और यह अच्छा है ॥
पृथक् पृथक् रंगकी गायोंका दूध ।
कृष्णासृक्पित्तसंयुक्ता श्वेता श्लेष्मगुणान्विता॥ १५ ॥ कफवा-
ताश्रिता पीता रक्ता वातगुणान्विता ॥ यद्यद्द्रव्यगुणास्ते तु
ज्ञातव्याः सुमहात्मना ॥ १६ ॥
काली गाय रक्त और पित्तसे संयुक्त होती है, सफेद रंगवाली कफके गुणोंसे संयुक्त होती हैः
॥ १५ ॥ पीली कफ और वातसे संयुक्त होती है, लाल रंगवाली वातके गुणसे संयुक्त होती-
है, ऐसे जो जो उत्तम गुण हैं वे सब महात्मा वैद्यको जानने चाहिये ॥ १६ ॥
धारोष्णं शस्यते गव्य धाराशीतन्तु माहिषम् ॥
शृतोष्णमाविकं पथ्यं शृतशीतमजापयः ॥१७ ॥
गायका दूध धारोंसे गर्म हुआ ही हित है,भैंसका दूध धारोंसे पीछे शीतल हुआ हित है,भेडके
दूधको गर्म करके पीछे गरम रूप ही पथ्य है,बकरीके दूधको गर्म कर पीछे शीतल करा पथ्य है १७-
अथ गायके दूधके गुण ।
गव्यं पवित्रं च रसायनं च पथ्यं च हृद्यं बलपुष्टिदं स्यात् ॥
आयुष्यप्रदं रक्तविकारपित्तत्रिदोषहद्रोगविषापहं स्यात् ॥ १८ ॥
गायका दूध पवित्र है,रसायन है, पथ्य है, मनोहर है, बलको और पुष्टिको देता है, आयुको
देता है, और रक्तविकार, पित्तरोग, त्रिदोष, हृद्रोग और विषको नाशता है ॥ १८ ॥
अथ बकरीके दूधके गुण ।
छागं कषायं मधुरञ्च शीतं पयो लघु ग्राहि क्षयापहारि ॥
कासज्वराणां रुधिरातिसारे पित्ते त्रिदोषे विहितं हितं वै॥१९॥
बकरीका दूध कसैला है, मधुर है, शीतल है, कब्ज करता है, हलका है, क्षयको नाशता है,
खांसीसहित ज्वर, रक्तका अतीसार, पित्त और त्रिदोषमें हित कहा गया है ॥ १९ ॥
अथ भेडके दूधके गुण ।
औरभ्रं मधुरं रूक्षमुष्णवातकफापहम् ॥
न शस्तं रक्तपित्तानां वातिकानां हितं भवेत् ॥ २० ॥
भेडका दूध मधुर है, रूखा है, उष्ण है, वातको और कफको नाशता है, रक्तपित्तवालोंको
अच्छा नहीं है और वातवालोंको अच्छा है ॥ २० ॥

( ६० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने
अथ भैंसके दूधके गुण ।
स्निग्धं मरुच्छीतकरं च तन्द्रानिद्राकरं वृष्यतमं श्रमघ्नम् ॥
बलप्रदं पुष्टिकं कफस्य सञ्जीवनं चास्ति पयो महिष्याः ॥२१॥
भैंसका दूध चिकना है, वायुको और शीतको उपजाता है, तन्द्राको और नींदको करता है,
अति पुष्ट है, परिश्रमको नाशता है, बलको देता है, कफको करता है और कफको
बढ़ाता है ॥ २१ ॥
अथ ऊँटनीके दूधके गुण ।
रूक्षं तथोष्णं लवणं कफस्य निवारणं वातविकारहारि ॥
लघु प्रशस्तं कटुकं कृमीणां शोफार्शसामौष्ट्रपयोऽनुकूलम् ॥२२॥
ऊँटनीका दूध गर्म है, सलौना है, रूखा है, कफको दूर करता है, वातके विकारको नाशता
है, हलका है, अच्छा है, चर्चरा है, कीड़ोंको निकालता है, शोजाको और बवासीरको शांत
करता है ॥ २२ ॥
स्त्रियोंके दूधका गुण ।
सञ्जीवनं बृंहणमेव सात्म्यं सन्तर्पणं नेत्ररुजापहं च ॥
पित्तस्य रक्तस्य च नाशनं च नारीपयः स्नेहनमेव शस्तम् ॥ २३ ॥
स्त्रियोंका दूध सजीवन है, पुष्टिकारक है, स्वभावसे हित है, तृप्ति करता है, नेत्रोंकी पीडा
दूर करता है, दुष्टपित्तका और रक्तका नाश करता है, चिकनाई देता है, ऐसा स्त्रियोंका दूध
अच्छा है ॥ २३ ॥
अथ दूधके गुण ।
निशाशीतांशुसंशीतं निद्रालस्यश्रमानुगम् ॥
सघनं शीतकफकृत्क्षीरं प्राभातिकं भवेत् ॥ २४ ॥
रात्रिके चन्द्रमाकी किरणोंसे शीतल हुआ नींद, आलस्य और परिश्रम करनेवाला है, गाढ़ा
है, शीतको और कफको करनेवाला ऐसा प्रभातका दूध होता है ॥ २४ ॥
अथ दिनके दूधके गुण ।
वासरे सूर्य्यसन्तापात्सद्योष्णं कफवातजित् ॥
दिनमें सूर्यके सन्तापसे तत्काल गर्म हुआ दूध कफ और वातको जीतनेवाला है ॥
अथ रात्रिके दूधके गुण ।
हितं तत्पित्तशमनं सुशीतं भोजने निशि ॥ २५ ॥
रात्रिमें भोजनके समय अच्छा शीतल किया दूध हित है और पित्तको शांत करता है॥२५॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

॰अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । (६१)
अथ दूधके पीनेकी विधि।
अल्पाम्बुपानव्यायामात्कटुतिक्ताशने लघु ॥ पिण्याकाम्ला-
शिनीनां तु गुर्वभिष्यन्दि शीतलम् ॥ २६ ॥
थोडा पानी पीनेवाली, फिरनेवाली, कडवा तीखा खानेवाली, गौआदिका दूध हलका होता
है और खली तथा खट्टे पदार्थ खानेवाली गौआदिका दुग्ध भारी, अभिष्यंदी और शीत होता
है ॥ २६ ॥
क्षीणानां दुर्बलानाञ्च तथा जीर्णज्वरार्दिते॥दीप्ताग्नीनामतन्द्राणां
श्रमशोषविकारिणाम् ॥ २७ ॥ श्वासिनां विषमाग्नीनां रेतो-
ऽल्पानां व्यवायिनाम्॥तथा च राजरोगाणां क्षीरपानं विधीयते
॥ २८ ॥ न शस्तं लवणैर्युक्तं क्षीरं चाम्लेन वा पुनः॥ करोति
कुष्ठं त्वग्दोषं तस्मान्नैव हितं मतम् ॥ २९ ॥
क्षीण, दुर्बल, जीर्णज्वरसे पीडित, दीप्त अग्निवाला, तंद्रासे वर्जित, श्रम और शापके विकार
वाले ॥ २७ ॥ श्वासवाले, विषम अग्निवाले, अल्पवीर्यवाले मैथुन करनेवाले, और राजरोगवाले
इन सबोंको दूधका पान कराना चाहिये ॥ २८ ॥ नमकसे संयुक्त अथवा खट्टे पदार्थसे संयुक्त
किया दूध अच्छा नहीं है यह कुष्ठको और खालमें रोगको करता है इसलिये यह हित
नहीं है ॥ २९ ॥
अथ गायके दहीके गुण ।
अम्लं स्वादुरसं ग्राहि गुरूष्णं वातरोगजित् ॥ मेदःशुक्रबलश्ले-
ष्मरक्तपित्ताग्निशोफकृत् ॥ ३० ॥ स्निग्धं विपाके मधुरं दीपनं
बलवर्द्धनम् ॥ वातापहं पवित्रं च दधि गव्यं रुजापहम् ॥ ३१ ॥
गायका दही खट्टा है । स्वादु रसवाला है, कब्जको करता है, भारी है, गर्म है, वातरोगको
जीतता है और मेद, बल, वीर्य, कफ, रक्त, पित्त, अग्नि शोजाको करता है ॥ ३० ॥ स्निग्ध
है और विशेष करके पाककालमें मधुर है, अग्निको जगाता है, बलको बढाता है, वायुको नाशता
है, पवित्र है और रोगको हरता है ॥ ३१ ॥
अथ बकरीके दहीके गुण ।
आजं दधि भवेच्छोष्णं क्षयवातविनाशनम् ॥ दुर्नामश्वासकासेषु
हितमग्निप्रदीपनम् ॥ ३२ ॥ विपाके मधुरं वृष्यं रक्तपित्तप्रसाद-
नम् ॥ शस्तं प्राभातिकं प्रोक्तं वातपित्तनिबर्हणम् ॥ ३३ ॥

( ६२ ) हारितसंहिता । [ प्रथमस्थाने ]
बकरीका दही गर्म है, क्षयको और वातको नाशता है और बवासीर, श्वास, खांसीमें हित है,
अग्निको जगाता है ॥ ३२ ॥ पाककालमें मधुर है, वीर्यमें हित है, रक्तपित्तको साफ करता है
उसमें भी प्रभातका दही अच्छा है वात और पित्तको दूर करता है ॥ ३३ ॥
अथ भैंसके दहीके गुण ।
घनं माहिषमुद्दिष्टं मधुरं रक्तदोषकृत् ॥
कफशोफहरं स्वस्थं पित्तकृद्वातकोपनम् ॥ ३४॥
भैंसका दही गाढ़ा है, मधुर है, रक्तदोषको करता है, कफको और शोजको हरता है, स्वस्थ
है, पित्तको करता है, वातको कोपता है ॥ ३४ ॥
अथ ऊँटनीके दहीके गुण ।
विपाके कटु सक्षारं गुरु भेद्यौष्ट्रकं दधि ॥
वातमर्शांसि कुष्ठानि क्रिमीन्हंत्युदरं परम् ॥ ३५ ॥
ऊंटनीका दही विपाकमें तीखा, खारा, भारी, मलका भेदनेवाला, वायु, अर्श, कोढ, कृमि
और उदररोगोंका नाश करता है ॥ ३५ ॥
अथ स्त्रीके दहीके गुण ।
स्निग्धं विपाके मधुरं बल्यं संतर्पणं हितम् ॥
चक्षुष्यं ग्राहि दोषघ्नं दधि नार्या गुणोत्तमम् ॥ ३६ ॥
स्त्रियोंका दही चिकना, विपाकमें मधुर, बल देनेवाला, धातुओंको तृप्त करनेवाला, ठंडा,
नेत्रोंको हितकर, ग्राही वातादिदोषोंको नाशनेवाला और बडा गुणकारी है ॥ ३६ ॥
अथ भेडके दहीके गुण ।
कोपनं कफवातानां दुर्नाम्नां चाविकं दधि ॥ दीपनीयं तु चक्षुष्यं
पांडुकृच्चापि वातुलम् ॥३७ ॥ रूक्षमुष्णं कषायं स्यादत्यभिष्यं-
दि दोषलम् ॥ रसे पाके च मधुरं कषायं कुष्ठवर्द्धनम् ॥ ३८॥
भेड़ का दही कफ और वात तथा अर्शरोगको कोपनेवाला, जठराग्निको प्रदीप्त करनेवाला,
नेत्रको हितकर, पांडुरोगको उपजानेवाला, और वायु उत्पन्न करनेवाला होता है॥३७॥ रूखा,
गरम, कसैला, श्लेष्माको पैदा करनेवाला, दोषोंको उपजानेवाला, रसमें और पाकमें मधुर और
कसैला, कुष्ठरोगको बढ़ानेवाला होता है ॥ ३८ ॥
अथ वर्षाकालके दहीके गुण ।
वार्षिकं पित्तकृद्वातशमनं कफकोपनम् ॥
गुल्मार्शः कुष्ठरोगे च रक्तपित्ते न शस्यते ॥ ३९ ॥

अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । (६३)
वर्षाकालका दही पित्तकारक है, वात शांत करता है और कफको कोपता है और गुल्मरोग,
बवासीर, कुष्ठ, रक्तपित्तमें अच्छा नहीं है ॥ ३९ ॥
अथ शरद्ऋतुके दहीका गुण ।
शारदं दधि गुर्व्वम्लं रक्तपित्तविवर्द्धनम् ॥
शोफतृष्णाज्वरार्त्तानां करोति विषमज्वरम् ॥ ४० ॥
शरद्ऋतुका दही भारी है, खट्टा है, रक्तपित्तको बढ़ाता है और शोजा,तृषा, ज्वरसे पीडितोंके
विषमज्वरको करता है ॥ ४० ॥
अथ हेमंतऋतुके दहीका गुण ।
गुरु स्निग्धं सुमधुरं कफकृद्वलवर्द्धनम् ॥
वृष्यं मेध्यं च हैमन्तं पुष्टिदं तुष्टिवृद्धिदम् ॥ ४१ ॥
हेमंतऋतुका दही भारी है, मधुर है, कफको करता है, बलको बढ़ाता है, वीर्यमें हित है,
पवित्र है, पुष्टिको देता है और तुष्टिको बढ़ाता है ॥ ४१ ॥
अथ शिशिरऋतुके दहीका गुण ।
वृष्यं बलकरं पैत्तं श्रमस्यापहरं परम् ॥
शैशिरं सघनं चाम्लं पिच्छलं गुरु चैव च ॥ ४२ ॥
शिशिरऋतुका दही कडा है, खट्टा है, कफकारी है, भारी है, वीर्यमें हित है, बलको करता
है, पित्तमें अच्छा है, श्रमको हरता है ॥ ४२ ॥
अथ वसंतऋतुके दहीका गुण ।
वातलं मधुरं स्निग्धं किञ्चिदम्लं कफात्मकम् ॥
बलकृद्वीर्य्यकृत्प्रोक्तं वसन्ते न प्रशस्यते ॥ ४३ ॥
वातल है, मीठा है, चिकना है, कुछ खट्टा है, कफकी प्रकृतिवाला है, बलको और वीर्यको
करता है, कफकारक है, इसलिये वसंतऋतुमें दही अच्छा नहीं है ॥ ४३ ॥
अथ ग्रीष्मऋतुके दहीका गुण ।
लघु चाम्लं भवेद्ग्रीष्मे चात्युष्णं रक्तपित्तकृत् ॥
शोषभ्रमपिपासाकृद्दधि प्रोक्तं न ग्रैष्मिकम् ॥ ४४ ॥
ग्रीष्मऋतुका दही हलका है, खट्टा है, अतिगर्म है, रक्तपित्तको करता है और शोष, भ्रम,
पिपासाको करता है इसलिये ग्रीष्ममें दधि अच्छा नहीं कहा गया ॥ ४४ ॥
अथ दहीका वर्जना ।
शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु दोषकृन्न हितं भवेत् ॥ न नक्तं दधि भुञ्जीत

( ६४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
न चाऽप्यघृतशर्करम् ॥ ४५ ॥ लवणं दधि भुञ्जीत भुञ्जीताऽ-
प्युदकेन च॥तल्लवणाम्बुसंयुक्तं दधि शस्तं निशि ध्रुवम्॥४६॥
ज्वरासृक्पित्तवीसर्पकुष्ठिनां पाण्डुरोगिणाम् ॥ संप्राप्तकामला-
नाञ्च शोफिनाञ्च विशेषतः ॥४७॥ तथा च राजयक्ष्मणामप-
स्मारे च पीनसे॥प्रतिश्यायार्दितानाञ्च भोजने न हितं दधि॥४८॥
शरद, ग्रीष्म, वसंत, इन ऋतुओंमें दही दोषको करता है, हित नहीं है, रात्रिमें दहीको
नहीं खाना, घृत और खांडसे रहित दहीको नहीं खाना ॥ ४५ ॥ नमकसे मिलाहुआ और
पानीसे मिलाहुआ ऐसे दहीको खाना और रात्रिमें दहीको खावे तो नमक और पानीसे संयुक्त-
कर खाना ॥ ४६ ॥ ज्वर, रक्तपित्त, विसर्प, कुष्ठ, पांडुरोग, कामला, शोजा ॥ ४७ ॥ राजरोग,
मृगीरोग, पीनस, सखरमा रोगवालोंको भोजनमें दही हित नहीं है ॥ ४८ ॥
अथ दहीको खानेकी विधि ।
हिक्कार्शःश्वासःप्लीहानामतीसारे भगन्दरे ॥
शस्तं प्रोक्तं दधि चैषां लवणेन विमूर्च्छितम् ॥ ४९ ॥
हिचकी, श्वास, बवासीर, तिलीरोग, अतिसार, भगंदरमें नमकसे संयुक्त किया दही खाना
अच्छा है ॥ ४९ ॥
अथ गायके तक्र अर्थात् छाँछके गुण ।
गव्यं त्रिदोषशमनं पथ्यं श्रेष्ठं तदुच्यते ॥
दीपनं रुचिकृन्मेध्यमर्शोदरविकारजित् ॥ ५० ॥
गायका तक्र त्रिदोषको शांत करता है, पथ्यमें श्रेष्ठ है, अग्निको जगाता है, रुचिको करत
है, पवित्र है, बवासीर और उदरविकारोंको जीतता है ॥ ५० ॥
अथ भैंसके तक्रके गुण ।
माहिषं कफकृत्किञ्चिद्घनं शोफकरं नृणाम् ॥
शस्तं प्लीहाशग्रहणीदोषेऽतीसारिणामपि ॥ ५१ ॥
भैंसका तक्र कफको करता है, कुछ घना है, मनुष्योंदी शोजाको करता है और तिलीरोग,
बवासीर, संग्रहणी, अतीसार इन रोगवालोंको श्रेष्ठ है ॥ ५१ ॥
अथ बकरीके तक्रके गुण ।
छागलं लघु संस्निग्धं त्रिदोषशमनं परम् ॥
गुल्माशग्रहणीशूलपाण्ड्वामयविनाशनम् ॥५२॥

[अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( ६५ )

बकरीका तक्र हलका चिकना, त्रिदोषको नाशनेमें उत्तम है और गुल्म, बवासीर, संग्रह-
णीरोग, शूल, पांडुरोग इन्होंको नाशता है ॥ ५२ ॥
अथ तक्रका वर्णन ।
तथा च त्रिविधं तक्रं कथ्यते शृणु पुत्रक ॥ यथा योगेन त-
त्सम्यक्शस्यते येषु रोगिषु ॥५३॥ समुद्धृतघृतं तक्रमर्द्धोद्धृत-
घृतं च यत् ॥ अनुद्धृतघृतं चान्यदित्येतत्त्रिविधं मतम्॥५४॥
सव लघु च पथ्यं च त्रिदोषशमनं परम् ॥ ततः परं वृष्यतरं
क्रमेण समुदीरितम् ॥ ५५ ॥ अनुद्धृतघृतं सान्द्रं गुरु विद्या-
त्कफात्मकम् ॥ बलप्रदं तु क्षीणानामामाशोफातिसारकृत्॥५६॥
तक्र ३ प्रकारका है, हे पुत्र ! जिस उत्तमयोगसे जिन रोगियोंमें उचित है सो कहता हूँ,
सुनो ॥ ५३ ॥ बिना घीका, आधे घीका और पूर्ण इस तरह तीन प्रकारका तक्र कहा गया
है ॥ ५४ ॥ घृतसे वर्जित तक्र हलका है, पथ्य है, त्रिदोषको शांत करता है। घृतसहित तक्र
वीर्यमें हित कहा है ॥ ५५ ॥ अनुद्धृतघृतसंज्ञक तक्र कठिन है, भारी है, कफकी प्रकृतिवाला
है, क्षीणमनुष्योंको बल देता है और आमदोष, शोजा, अतीसार इनको करता है ॥ ५६ ॥
अथ साधारण तक्रके गुण ।
गरोदराशोग्रहणीपाण्डुरोगे ज्वरातुरे ॥ वर्चोमूत्रग्रहे वापि प्लीह-
व्यापद्मेहिषु ॥ ५७ ॥ हितं संप्रीणनं बल्यं पित्तरक्तविरोध-
कृत् ॥ मधुरं पित्तरक्तघ्नमत्युष्णं रक्तपित्तकृत् ॥ ५८ ॥
कृत्रिमविष, उदररोग, बवासीर, ग्रहणीदोष, पांडुरोग, ज्वर, दिशापेशाबकी रोकपर, तिल्लीरोग,
प्रमेह इन रोगवालोंको ॥ ५७॥ साधारण तक्र हित है, प्रीतिको करता है, बलमें हित है, पित्तरक्तका
विरोधी है, मधुर है, पित्तरक्तको नाशता है, अतिगरम है, रक्त और पित्तको करता है॥ ५८ ॥
अथ बहुत पानीवाले तक्रका गुण ।
बहूदकं दीपनीयं रक्तपित्तप्रकोपनम् ॥
पीनसे श्वासकासे च न शस्तमिह कथ्यते ॥ ५९ ॥
बहुत पानीवाला तक्र अग्निको जगाता है, रक्तपित्तको कुपित करता है और पीनस खांसी,
श्वास इन रोगोंमें अच्छा नहीं है ॥ ५९ ॥
अथ विशेषवर्णन ।
आर्द्धोदकमुदश्वित्स्यात्तक्रं पादजलान्वितम् ॥
वातं कफं हरेद्घोरमुदश्विच्छ्लेष्मलं भवेत् ॥ ६० ॥
५

यहाँ पृष्ठ का शुद्ध एवं सटीक लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:

( ६६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
... आधे पानीसे संयुक्तको उदश्वित् कहते हैं और चौपाई पानीसे संयुक्तको तक्र कहते हैं
...वात कफनाशक है और उदश्वित् कफकारी है ॥ ६० ॥
अथ हाथसे मर्दित किये तक्रका गुण ।
करेण मर्दितं जन्तुतर्पणं बलकृन्मतम् ॥
श्रमापहरणं स्निग्धं ग्रहयर्शोऽतिसारनुत् ॥ ६१ ॥
हाथसे मर्दित किया तक्र जीवोंको तृप्त करता है, बलको करनेवाला है, परिश्रमको हरता
है, चिकना है और ग्रहणीदोष, बवासीर, अतीसारको नाशता है ॥ ६१ ॥
अथ तक्रका निषेध ।
ऋते शोफे च क्षीणानां नोष्णकाले शरत्सु च ॥ न मूर्च्छाभ्रम-
तृष्णासु तथा रक्ते सपैत्तिके ॥ न शस्तं तक्रपानं च करोति विवि-
धान्गदान् ॥ ६२ ॥
शोफाके बिना क्षीणोंको और गरम कालमें, शरदऋतुमें और मूर्च्छा, भ्रम और तृषा इनमें
और रक्तपित्तमें तक्रको पीना अच्छा नहीं है क्योंकि अनेक प्रकारके रोगोंको करता है ॥ ६२ ॥
तक्रपानविधि ।
शीतकालेऽग्निमान्द्ये च कफोच्छ्रायामयेषु च ॥ मार्गावरोधे दुष्टे-
ऽग्नौ गुल्मार्शसि तथामये ॥ ६३ ॥ शस्तं प्रोक्तं च तक्रं स्यादमीषां
सर्वदा हितम् ॥ सर्वकालेषु तच्छस्तमजाँ¹जिलवणान्वितम् ६४॥
शीतकालमें, मन्दाग्निमें, कफकी अधिकतासे उपजे रोगोंमें, स्रोतोंके रुकजानेमें दुष्ट हुए अग्निमें,
गुल्मरोगमें, बवासीरमें ॥ ६३ ॥ मनुष्योंको तक्र हित कहा है, जीरा और नमकसे संयुक्त किया तक्र
सब कालमें उत्तम है ॥ ६४ ॥
अथ नेनूकी विधि ।
नवनीतं नवं ग्राहि हृद्यं चोलबणदीपकम् ॥ क्षयारुच्यर्दितप्लीहग्र-
हण्यर्शोविकारनुत् ॥ ६५ ॥ चक्षुष्यं शिशिरं स्निग्धं वृष्यं जी-
वनबृंहणम् ॥ क्षीणे द्रवं हिमं ग्राहि रक्तपित्ताक्षिरोगनुत् ॥ ६६ ॥
स्मृतिवाय्वग्निशुक्रौजः कफमेदोविवर्द्धनम् ॥ वातपित्तकफोन्मा-
दशोफालक्ष्मीज्वरापहम् ॥ सर्वदोषापहं शीतं मधुरं रसपाकयोः ६७
१ “जीरको जरणोऽजाजी कणा कृष्णो तु जीरके ” इत्यमरसिंहः ।

अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( ६७ )
नवीन नेनू ग्राही है, सुन्दर है, उल्बण है, अग्निको जगाता है और क्षय, अरुचि,
लकुवावात, तिल्लीरोग, ग्रहणी, बवासीर इनको नाशता है ॥ ६५ ॥ नेत्रोंमें हित
है, शीतल है चिकना है, वीर्यको करता है, जीवोंके जीवनको बढ़ानेवाला है, क्षीणमनुष्यके
धातुओंको पुष्ट करता है, अर्थात् द्रवरूप है, शीतल स्वभाववाला है, कब्जको करता है, रक्त-
पित्तको और नेत्ररोगको नाशता है ॥ ६६ ॥ और स्मृति, वायु, अग्नि, वीर्य, पराक्रम, कफ
और मेद इनको बढ़ाता है और वात, पित्त, कफ, उन्माद, शोजा, कान्तिहीनता और ज्वर
इनको नाशता है, सब दोषोंको हरता है, शीत है, रसमें और पाकमें मधुर है ॥ ६७ ॥

अथ फेनविधि ।
कृष्णगोऽश्वपयःफेनमजानां वेति शस्यते ॥ मन्दाग्नीनां कृशा-
नां च विशेषादतिसारिणाम् ॥ ६८ ॥ उत्साहदीपनं बल्यं मधुरं
वातनाशनम् ॥ सद्यो बलकरं चैव तस्य क्षीरविलोदितम् ॥ ६९॥
क्षीणज्वरातिसारे च सामे च विषमज्वरे ॥ मन्दाग्नौ कफमा-
श्रित्य पयःफेनं प्रशस्यते ॥ ७०॥ क्षीरं गवां क्षीरफेनं तक्रं वा
हितमेव च ॥ पक्वाम्रभक्षणाद्वापि ग्रहणी तस्य नश्यति॥ ७१॥
ताम्बूलं नैव सेवेत क्षीरं पीत्वा तु मानवः ॥ यावत्तच्च द्रवे-
त्क्षीरं भुक्तान्ताद्वापि शस्यते ॥ ७२ ॥

काली गाय और घोड़ीके दूधका झाग अथवा बकरीके दूधका झाग मंदाग्निवालोंको और
कृशमनुष्योंको और विशेष करके अतिसारवालोंको अच्छा होता है ॥ ६८ ॥ दूधको मथनेसे
उत्पन्नहुए झाग उत्साहको करते हैं, बलमें हित है, मधुर हैं, वातको नाशते हैं, शीघ्र बलको
करते हैं ॥ ६९ ॥ क्षीणज्वर, अतीसार, आमज्वर, विषमज्वर, मंदाग्नि, कफको आश्रित होके
दूधका फेन श्रेष्ठ है ॥ ७०॥ गायका दूध अथवा गायके दूधके झाग अथवा गायके दूधका तक्र
हित होता है और गायके तक्रको पीनेवाला पके हुए आंबको खावे तो ग्रहणीदोषका नाश होता
है ॥ ७१ ॥ दूधका पान करके नागरपानको सेवे नहीं, जबतक वह दूध द्रवभावको नहीं
प्राप्त होवे और अन्यभोजनके अंतमें नागरपान अच्छा है अथवा भोजनके अंतमें दूधका पीना
अच्छा है ॥ ७२ ॥

अथ गायके घृतका गुण ।
विपाके मधुरं वृष्यं वातपित्तकफापहम् ॥
चक्षुष्यं बलकृन्मेध्यं गव्यं सर्पिर्गुणोत्तमम् ॥ ७३ ॥

( ६८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
गायका घृत पाक कालमें मधुर है, वीर्यमें हित है और वात, पित्त, कफ इनको नाशता है,
नेत्रोंमें हित है, बलको करता है, पवित्र है, गुणोंमें उत्तम है ॥ ७३ ॥
अथ बकरीके घृतका गुण ।
आज्यं सन्दीपनीयं च चक्षुष्यं बलवर्द्धनम् ॥
कासश्वासक्षयाणाञ्च हितं पाके कफापहम् ॥ ७४ ॥
बकरीका घृत जठराग्निको जगाता है, नेत्रोंमें हित है, बलको बढ़ाता है और खांसी, श्वास,
क्षय, इन रोगवालोंको हित है और पाक कालमें कफको नाशता है ॥ ७४ ॥
अथ भैसके घृतका गुण ।
सवातपित्तशमनं सुशीतं माहिषं घृतम् ॥
मधुरं गुरु विष्टम्भि बल्यं श्रेष्ठगुणात्मकम् ॥ ७५ ॥
भैसका घृत वातको और पित्तको शांत करता है, सुन्दर शीतल है, मधुर है, भारी है, विष्टंभी
है, बलमें हित है और श्रेष्ठगुणोंवाला है ॥ ७५ ॥
अथ ऊंटनीके घृतके गुण ।
औष्ट्रं कटु घृतं पाके शोषकृमिविषापहम् ॥
दीपनं कफवातघ्नं कुष्ठगुल्मोदरापहम् ॥ ७६ ॥
ऊंटनीका घृत पाककालमें चर्रचरा है और शोष, कृमि, विष इनको नाशता है, अग्निको
जगाता है, कफ और वातको नाशता है और कुष्ठ, गुल्म और उदररोग इनको हरता है ॥७६॥
अथ भेड़के घृतका गुण।
पाके लघ्वाविकं सर्पिः सर्वरोगविषापहम् ॥
वृद्धिं करोति चास्थां वै वाश्मरीशर्करापहम् ॥ ७७ ॥
मेड़का घृत पाककालमें हलका है, सब तरहके रोगोंको और विषको हरता है, हथियोंको
बढ़ाता है, पथरीको और शर्कराको नाशता है ॥ ७७ ॥
अथ घोड़ीके घृतका गुण ।
वृद्धिं करोति देहाग्नेः पय आश्वं विषापहम् ॥
चक्षुष्यमूषणं चाग्नेर्वातदोषनिवारणम् ॥ ७८ ॥
घोड़ीका घृत देह और जठराग्निको बढ़ाता है, विषको हरता है, नेत्रोंमें हित है, शरीरमें
जलन पैदा करता है या वीर्याग्नि बढ़ाता है और वातदोष हटाता है ॥ ७८ ॥