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सर्वकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( ५७ )
भोजनकी आदिमें पिया पानी अनिको नाशता है, भोजनके मध्यमें पिया पानी रसायन अर्थात्
अमृतके समान है, भोजनके अंतमें पिया पानी दुःखसे जरता है॥ १०९ ॥ भोजनकी आदिमें
पानीको पीनेसे मंदाग्नि और अंगोंका कृशपना होता है और भोजनके अंतमें पिया हुआ पानी
मुटापेको करता है और आमाशयसे ऊपर कफको करता है ॥ ११०॥
इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरत्नशालिग्रामवैद्यशास्त्रविशारदहारीतसंहिताभाषाटीकायां
प्रथमस्थाने जलवर्गो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः ८.
अथ दुग्धवर्गवर्णन ।
अथातः संप्रवक्ष्यामि क्षीरवर्गन्तु वत्सक ॥
दधिसर्पिर्वसातक्रं तेषां सर्वगुणागुणम् ॥ १ ॥
हे पुत्र ! अब क्षीरवर्गको कहता हूँ और दही, घृत, वसा, तक्र इनके सब गुण और
दोष कहूँगा ॥ १ ॥
॥ अथ दूधकी उत्पत्ति ।
यद्यदाहारजातन्तु रसं क्षीरशिरानुगम् ॥ रसो जलं च भुक्तं च
तथा पित्तेन संयुतम् ॥२॥ पाचितं जाठरे वह्नौ पित्तेन सह मू-
र्च्छितम् ॥ पच्यमानं शिराप्राप्तं क्षीरतोयेन पुत्रक ॥ ३॥ तन
क्षीरमिति ख्यातमग्निसाम्रात्मकं पयः ॥ अमृतं सर्वभूतानां
जीवनं बलकृन्मतम् ॥ ४ ॥
जो जो भोजनसे रस उपजता है वही दूधकी नाड़ीके अनुगत होता है रस पदार्थ, पानी,
और भोजन पित्तसे संयुक्त होके ॥ २ ॥ जठराग्निके द्वारा पच्यमान होकर अन्नजल रस शिरामें
दुग्धजलके साथ प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ इससे दूध ऐसा कहाता है। यह दूध जठराग्निके समान
स्वभाववाला होता है और यही दूध अमृत है, सब जीवोंका जीवन है और बलको करने-
वाला माना है ॥ ४ ॥
हारीतः संशयापन्नः पप्रच्छ पितरं पुनः॥कथं रसस्य सम्पत्तिः
कथं संचीयते विभो ॥ ५ ॥ कथं रक्तस्य संस्थाने क्षीरं पाण्डुं
समीरिम॥कथ तत्र कुमारीणां वन्ध्यानां न कथं भवेत् ॥६॥
१. 'पाण्डुर्ना मृत्तौ सिते'इति मेदिनी ।