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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 548 में से

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पृष्ठ 90

( ५८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-

संशयको प्राप्त हुआ हारीत फिर पिताको पूछता भया हे विभो ! रसकी सिद्धि कैसे है ? और
कैसे रस संचित होता है ? ॥ ५ ॥ कैसे रक्तके स्थानमें सफेद रंगका दूध हो जाता है
कुमारी,कन्याके और वंध्या स्त्रियोंके कैसे नहीं होता ? ॥ ६ ॥
एवं पृष्टो महावीर्य्यः प्रोवाच मुनिपुंगवः ॥ शृणु पुत्र महाप्राज्ञ
यदुक्तं पूर्वसूरिभिः ॥७॥ क्षीरं स्निग्धं तथा रक्तं पित्तेन पाकतां
गतम् ॥ रक्तं श्वेतत्वमायाति तथा क्षीरं सितं भवेत् ॥ ८ ॥
ऐसे पूछे हुए महावीर्य्यवाले आत्रेयजी कहने लगे हे पुत्र ! हे महाप्राज्ञ ! जो पहले पंडितों-
ने कहा है वह सुनो ॥७॥ पहिले दूध गाढा और लाल रहता है, फिर पित्तसे पककर वही रक्त
सफेद होजाता है और वही श्वेत दूध हो जाता है ॥ ८ ॥
क्षीरनाडी कुमारीणां वन्ध्यानां च कथं भवेत्॥अल्पधातुबलं
यस्मात्तस्मात्क्षीरं न जायते ॥९॥ वन्ध्यानां क्षीरनाड्यस्तु
वातेन परिपूरिताः।क्षीरं च न भवेत्तस्मादार्त्तवं चाधिकं यतः१०
कुमारी,कन्याओंके और वंध्याओंके दूधकी नाडी कहां होती है? अल्पधातु और अल्पबल
होनेके कारण कुमारीके और वंध्याके दूध नहीं होता है ॥ ९ ॥ वंध्यस्त्रियोंकी दूधकी नाडी
वायुसे पूरित होती है इससे दूध नहीं उपजता है किंतु आर्तव अधिक होता है ॥ १० ॥
प्रसूतासु च नारीषु बलेन सह सूयते ॥ तेन स्रोतोविशुद्धिःस्यात्
क्षीरमाशु प्रवर्त्तते ॥ ११ ॥ तस्मात् सद्यःप्रसूतायां जायते
श्लैष्मिकं पयः॥तेन कठिनतां याति तस्मात्तत् परिवर्जयेत्॥१२॥
और बालकको जन्मानेवाली नारियोंमें बल करके बालक जन्मता है इससे विशेष करके स्रोतोंकी
शुद्धि होती है तब दूध शीघ्र प्रवृत्त होता है ॥ ११ ॥ इसलिये तत्काल प्रसूतहुई नारीमें कफकी
प्रकृतिवाला दूध उपजता है इसलिये वह दूध गाढा रहता हे उसका त्यागकर देना चाहिये ॥ १२॥
स्रोतोविशुद्धिकरणं बलकृद्दोषनाशनम् ॥
पयस्त्रिदोषशमनं वृष्यञ्चाग्निप्रवर्द्धनम् ॥ १३ ॥
स्रोतोंके विशेष करके शुद्धिको करनेवाला, बलको करनेवाला और दोषको नाशनेवाला
दूध त्रिदोषको शांत करता है, पुष्ट है और जठराग्निको बढ़ाता है ॥ १३ ॥
पृथक् २ स्त्रियोंके दूधके गुण ।
कृष्णा वृष्या च वातघ्नी पयस्तस्या विशिष्यते॥श्वेतापयः श्ले-
ष्मकृच्च वातलं रक्तिकापयः॥१४॥पित्तसंशमना पीता तस्याः
क्षीरं विशिष्यते ॥