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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 548 में से

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पृष्ठ 96

( ६४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
न चाऽप्यघृतशर्करम् ॥ ४५ ॥ लवणं दधि भुञ्जीत भुञ्जीताऽ-
प्युदकेन च॥तल्लवणाम्बुसंयुक्तं दधि शस्तं निशि ध्रुवम्॥४६॥
ज्वरासृक्पित्तवीसर्पकुष्ठिनां पाण्डुरोगिणाम् ॥ संप्राप्तकामला-
नाञ्च शोफिनाञ्च विशेषतः ॥४७॥ तथा च राजयक्ष्मणामप-
स्मारे च पीनसे॥प्रतिश्यायार्दितानाञ्च भोजने न हितं दधि॥४८॥
शरद, ग्रीष्म, वसंत, इन ऋतुओंमें दही दोषको करता है, हित नहीं है, रात्रिमें दहीको
नहीं खाना, घृत और खांडसे रहित दहीको नहीं खाना ॥ ४५ ॥ नमकसे मिलाहुआ और
पानीसे मिलाहुआ ऐसे दहीको खाना और रात्रिमें दहीको खावे तो नमक और पानीसे संयुक्त-
कर खाना ॥ ४६ ॥ ज्वर, रक्तपित्त, विसर्प, कुष्ठ, पांडुरोग, कामला, शोजा ॥ ४७ ॥ राजरोग,
मृगीरोग, पीनस, सखरमा रोगवालोंको भोजनमें दही हित नहीं है ॥ ४८ ॥
अथ दहीको खानेकी विधि ।
हिक्कार्शःश्वासःप्लीहानामतीसारे भगन्दरे ॥
शस्तं प्रोक्तं दधि चैषां लवणेन विमूर्च्छितम् ॥ ४९ ॥
हिचकी, श्वास, बवासीर, तिलीरोग, अतिसार, भगंदरमें नमकसे संयुक्त किया दही खाना
अच्छा है ॥ ४९ ॥
अथ गायके तक्र अर्थात् छाँछके गुण ।
गव्यं त्रिदोषशमनं पथ्यं श्रेष्ठं तदुच्यते ॥
दीपनं रुचिकृन्मेध्यमर्शोदरविकारजित् ॥ ५० ॥
गायका तक्र त्रिदोषको शांत करता है, पथ्यमें श्रेष्ठ है, अग्निको जगाता है, रुचिको करत
है, पवित्र है, बवासीर और उदरविकारोंको जीतता है ॥ ५० ॥
अथ भैंसके तक्रके गुण ।
माहिषं कफकृत्किञ्चिद्घनं शोफकरं नृणाम् ॥
शस्तं प्लीहाशग्रहणीदोषेऽतीसारिणामपि ॥ ५१ ॥
भैंसका तक्र कफको करता है, कुछ घना है, मनुष्योंदी शोजाको करता है और तिलीरोग,
बवासीर, संग्रहणी, अतीसार इन रोगवालोंको श्रेष्ठ है ॥ ५१ ॥
अथ बकरीके तक्रके गुण ।
छागलं लघु संस्निग्धं त्रिदोषशमनं परम् ॥
गुल्माशग्रहणीशूलपाण्ड्वामयविनाशनम् ॥५२॥