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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 548 में से

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पृष्ठ 95

अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । (६३)
वर्षाकालका दही पित्तकारक है, वात शांत करता है और कफको कोपता है और गुल्मरोग,
बवासीर, कुष्ठ, रक्तपित्तमें अच्छा नहीं है ॥ ३९ ॥
अथ शरद्ऋतुके दहीका गुण ।
शारदं दधि गुर्व्वम्लं रक्तपित्तविवर्द्धनम् ॥
शोफतृष्णाज्वरार्त्तानां करोति विषमज्वरम् ॥ ४० ॥
शरद्ऋतुका दही भारी है, खट्टा है, रक्तपित्तको बढ़ाता है और शोजा,तृषा, ज्वरसे पीडितोंके
विषमज्वरको करता है ॥ ४० ॥
अथ हेमंतऋतुके दहीका गुण ।
गुरु स्निग्धं सुमधुरं कफकृद्वलवर्द्धनम् ॥
वृष्यं मेध्यं च हैमन्तं पुष्टिदं तुष्टिवृद्धिदम् ॥ ४१ ॥
हेमंतऋतुका दही भारी है, मधुर है, कफको करता है, बलको बढ़ाता है, वीर्यमें हित है,
पवित्र है, पुष्टिको देता है और तुष्टिको बढ़ाता है ॥ ४१ ॥
अथ शिशिरऋतुके दहीका गुण ।
वृष्यं बलकरं पैत्तं श्रमस्यापहरं परम् ॥
शैशिरं सघनं चाम्लं पिच्छलं गुरु चैव च ॥ ४२ ॥
शिशिरऋतुका दही कडा है, खट्टा है, कफकारी है, भारी है, वीर्यमें हित है, बलको करता
है, पित्तमें अच्छा है, श्रमको हरता है ॥ ४२ ॥
अथ वसंतऋतुके दहीका गुण ।
वातलं मधुरं स्निग्धं किञ्चिदम्लं कफात्मकम् ॥
बलकृद्वीर्य्यकृत्प्रोक्तं वसन्ते न प्रशस्यते ॥ ४३ ॥
वातल है, मीठा है, चिकना है, कुछ खट्टा है, कफकी प्रकृतिवाला है, बलको और वीर्यको
करता है, कफकारक है, इसलिये वसंतऋतुमें दही अच्छा नहीं है ॥ ४३ ॥
अथ ग्रीष्मऋतुके दहीका गुण ।
लघु चाम्लं भवेद्ग्रीष्मे चात्युष्णं रक्तपित्तकृत् ॥
शोषभ्रमपिपासाकृद्दधि प्रोक्तं न ग्रैष्मिकम् ॥ ४४ ॥
ग्रीष्मऋतुका दही हलका है, खट्टा है, अतिगर्म है, रक्तपित्तको करता है और शोष, भ्रम,
पिपासाको करता है इसलिये ग्रीष्ममें दधि अच्छा नहीं कहा गया ॥ ४४ ॥
अथ दहीका वर्जना ।
शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु दोषकृन्न हितं भवेत् ॥ न नक्तं दधि भुञ्जीत