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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 548 में से

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पृष्ठ 88

( ५६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
अजीर्णे च तथा कासे न शीतमुदकं हितम्॥ प्रतिश्याय प्रसेके
च ज्वरे कुष्ठे व्रणेषु च ॥ ९४ ॥ शोफे नेत्रासये चैव मन्दाग्नौ
च तथा क्षये ॥ सूतिजातासुतानारीरक्तस्रावेऽप्यरोचके ॥९५॥
एतेषां सिद्धिमिच्छद्भिः पानीयं मन्दमाचरेत् ॥ जीर्णेच क्षुत्प्रप-
न्ने च पीतं हन्त्युदरानलम् ॥ ९६ ॥
मदात्यय रोग, दाह, शरीरके ऊपरले अंगोंमें प्राप्त हुआ रक्तपित्त, रक्तप्रमेह, इन्होंमें विशेष-
करके गर्मपानी श्रेष्ठ नहीं है ॥९२ ॥ पसली, शूल, जुकाम, वातरोग, गलग्रह, अफारा, स्तिमित,
श्वासदोष, कोष्ठरोग, तत्कालके जुलाब, वमनआदि, नवीनज्वर ॥९३॥ और अजीर्ण, खासीमें
शीतल पानी अच्छा नहीं है और पीनस रोग प्रसेक ( मुंहसे रालवहने ), ज्वर, कुष्ठ, घाव
॥ ९४ ॥ शोजा, नेत्रके रोग, मंदाग्नि, क्षयरोग, सूतिका नारी, रक्तस्राव, अरोचक ॥ ९५ ॥
इनसे सिद्धिको चाहनेवाला मनुष्य अल्पपानीको पीवे भोजनको जीर्ण होनेमें क्षुधाके समय पिया
हुआ पानी पेटके अग्निको नाशता है ॥ ९६ ॥
करोति गुल्मं शूलं वा तथा श्रान्ते बहूद्कम् ॥ तस्माज्जीर्णऽनलं
हन्ति अजीर्णे वारि भेषजम् ॥ ९७ ॥ भुक्तान्तः परतः शस्तं
पीतं वारि गुणात्मकम्॥ अध्वश्रान्तक्षुधाक्रान्ते शोकक्रोधातु-
रेषु च ॥ ९८ ॥ विषमासनोपविष्ट च पीत वारि रुजाकरम् ॥
तस्मात् प्रसन्ने मनासि पानीयं मन्दमाचरेत् ॥ ९९ ॥ आदौ
पीत्वा दहत्यग्निर्मध्ये पीत्वा रसायनम् ॥ तदन्ते च जलं पीत्वा
तज्जलं दुर्जरं भवेत् ॥ १०० ॥ भोजनादौ जलं पीत्वा चाग्नि-
सादःकृशाङ्गता ॥ अन्त करोति स्थूलत्वमूर्ध्वमामाशयात्क-
फम् ॥१०१ ॥ इति तोयपानविधिः ॥ इति जलवर्गो नाम
सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
परिश्रमसे थका हुआ मनुष्य बहुत पानीको पीवेतों गुल्म और शूलरोगकी उत्पत्ति होती है
और भोजनको जीर्ण होनेमें पियाहुआ पानी जठराग्निको हरता है और अजीर्णमें पानी औषधरूप है
॥ ९७ ॥ भोजन करनेके मध्यमें और पीछेसे पियाहुआ पानी गुणोंको करता है और मार्गके
चलनेसे श्रांत हुआ और भूखसे पीडित हुआ और शोक, क्रोध, रोगसे पीडित हुआ
॥ ९८ ॥ और विषम आसनपै स्थित हुआ ऐसा मनुष्य पानीको पीवे तो शीघ्र रोगकी
उत्पत्ति होती है इसलिये प्रसन्न हुए मनमें भी अल्प पानीको पीवे ॥ ९९ ॥