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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

अ० १६ ] भाषाटीकासमेता । ( ३३७ )
अमृतके समान हो जाता है वैसे ही योगसे युक्तकरी मदिरा हित है और अयोगसे युक्तकरी अत्यन्त
कष्टको करती है ॥ ३ ॥ क्षुधासे पीडितको, तृषासे पीडितको, भोजनसे रहितको, क्षीणको,
आहार और पानसे वर्जितको ॥ ४ ॥ भोजनपर भोजन करनेवालेको और अजीर्णवालेको
पानकरी मदिरा रोगको करती है ॥ ५ ॥
अथ वातादिदोषजन्य मदात्यय ।
यस्य प्रलपनं चापि वाचा वातमदात्ययः॥दाहमूर्च्छातिसारश्च
ज्वरः पित्तमदात्यये ॥६॥ छर्द्यरोचकहृल्लासतन्द्रास्तैमित्यगौ-
रवम् ॥शीतता च प्रतिश्यायः कफजे च मदात्यये ॥७॥ त्रिषु
दोषेषु समता लिंगैर्यैषामुपक्रमः॥स त्रिदोषसमुद्भूतो मदात्ययो
भिषग्वर ॥ ८ ॥
जिसके बहुत प्रलाप उपजे उसके वातका मदात्यय जानना और जिसके दाह, मूर्च्छा, अती-
सार, ज्वर ये उपजें उसके पित्तका मदात्यय जानना ॥ ६ ॥ जिसके छर्दि, अरोचक, थुकथुकी,
तंद्रा, शरीरका गीलापन, भारीपन, शीतलपना, जुखाम ये उपजें उसके कफका मदात्यय जानना
॥ ७ ॥ जिसके तीन दोषोंके लक्षण मिलें उसके सन्निपातका मदात्यय जानना ॥ ८ ॥
मदात्ययकी चिकित्सा ।
वमनं च प्रशस्तं च निद्रासंसेवनं पुनः ॥ स्नानं हितं पयःपानं
भोजने सगुडं दधि॥ ९॥मस्तुखण्डं सखर्जूरं मृद्वीका सारि-
वाम्लिका ॥ आमला च परूषं च लेहो हन्ति मदात्ययम्
॥ १० ॥ द्राक्षामलकखर्जूरपरूषकरसेन वा ॥ कल्कयेत्पयसा
तत्तु पानं सर्वमदात्यये ॥११॥ पथ्याक्वाथेन संयुक्तं पयःपानं
मदात्यये ॥ १२ ॥
वमन, नींदको सेवना, स्नान, दूधका पीना, भोजनमें गुड़ सहित दही ये मदात्ययमें हित
हैं ॥ ९ ॥ दहीका पानी, खांड़, छुहारा, मुनक्का, सारिवा, अमली, आंवला, फालसा,
इनकी चटनी मदात्ययको नाशती है ॥ १० ॥ दाख, आंवला अथवा छुहारा,
फालसा इनके रस करके बनायी चटनी मदात्ययको नाशती है ॥ ११ ॥ सब
प्रकारके मदात्ययमें दूधसे कल्क बना पीवे और मदात्ययरोगमें हरडैके क्वाथसे संयुक्त किये
दूधको पीना हित है ॥ १२ ॥
२२

( ३६८ ) \qquad हारीतसंहिता । \qquad [ तृतीयस्थाने-
अथ सुपारीके मदका निदान और चिकित्सा ।
पूगीफलमदे कम्पो मोहो मूर्च्छा क्लमस्तमः ॥ प्रस्वेदो विधुरत्वं
च लालास्रावश्च जायते ॥ १३॥ भ्रमक्लमपरीतत्वं विज्ञेयं पूग-
मूर्च्छिते ॥ मानवो लक्षणैरेभिर्ज्ञेयः पूगविमूर्च्छितः ॥ १४॥ तस्य
शीतं जलं पीतं बस्तिर्वा तु हितं भवेत् ॥ शर्करा भक्षणे देया
मुस्ता वा शर्करान्विता ॥ १५ ॥
सुपारीके मदमें कंप, मोह, मूर्च्छा, ग्लानि, अँधेरी, पसीना, लारका पड़ना ये उपजते हैं
॥ १३ ॥ इन लक्षणोंके होनेसे मनुष्य सुपारीसे मूर्च्छित हुआ जानना । उसको शीतल पानीका
पीना और बस्तिकर्म्म हित कहा है ॥ १४ ॥ इस रोगीको खानेवास्ते अकेली खांड़
अथवा नागरमोथासहित खांड़का देना हित है ॥ १५ ॥
अथ कोदूआदिसे उपजे मदात्ययकी चिकित्सा ।
कोद्रवाणां भवेन्मूर्च्छा देयं क्षीरं सुशीतलम् ॥ धत्तूरकमदे देयं
शर्करासहितं दधि ॥ १६॥ हलिनी करवीरं च मोहिनी मद्य-
न्तिका ॥ अन्येषामपि कन्दानां वमनं चाशु कारयेत् ॥ १७॥
पाययेच्छर्करायुक्तं क्षीरं वा दधि शर्कराम् ॥ १८ ॥ इत्यात्रेय-
भाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने मदात्ययचिकित्सा नाम
षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
कोदूसे उपजी मूर्च्छामें अच्छीतरह शीतल किया दूध हित है, धतूराके मदमें खांड़सहित
दही हित है ॥ १६ ॥ कलहारी, कनेर, भांग, मोगरी, अन्य प्रकारके सब कंद इनके
मदोंमें शीघ्र वमनको करवावे ॥ १७ ॥ अथवा खांड़से युक्त किये दूधको अथवा खांड़ते
युक्त करी दहीको पान करावे ॥ १८ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशा-
स्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
सप्तदशोऽध्यायः १७.
अथ दाहकी संप्राप्ति आदिक ।
आत्रेय उवाच ॥ समानः संक्रुद्धो रुधिरमपि पित्तं त्वचि गतं
नरस्याङ्गे दाहं भवति नितरां घोरमपि च ॥ कदा दन्तोद्धर्षो
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अ० १७ ] भाषाटीकासमेता । ( ३३९ )
भवति मनुजां दाहउदये भवेच्छीतस्यार्त्तिः श्वसनमपि वा शो-
षमरतिः ॥ १ ॥ पित्तज्वरसमानानि लक्षणानि भिषग्वर ॥
पित्तज्वरवदारभ्य क्रिया दोषोपशान्तये ॥ २ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-जब समान वायु और रक्त कुपित होता है और पित्त त्वचामें
प्राप्त होता है तब मनुष्यके अंगोंमें घोर दाह उपजता है और दाहके उदयमें कभी २ दंतोंको
घसता है और शीतलकी भी पीड़ा होती है, शोष और ग्लानि उपजती है ॥ १ ॥ हे वैद्यवर !
दाहरोगके लक्षण पित्तज्वरके समान होते हैं इस कारणसे दोषकी शांतिके लिये पित्तज्वरकी
तरह क्रिया करनी चाहिये ॥ २ ॥
अथ दाहकी चिकित्सा ।
कुशकासेक्षुमूलानामुशीरं घनवालकौ ॥ क्वाथः शर्करया युक्तः
शीतदाहं नियच्छति ॥३॥ पर्पटः सघनोशीरः क्वथितः शर्करा-
न्वितः॥शीतपानं निहन्त्याशु दाहं पित्तज्वरं नृणाम् ॥४॥लाम-
ज्जचन्दनोशीरैर्लेपनं दाहशान्तये ॥वीजयेत्तालवृन्तैश्च कदलय-
म्भोजसंस्तरे॥५॥कालीयकरसोपेतं दाहे शस्तं प्रलेपनम् ॥श-
स्यते शीतलं वारि दाहतृष्णानिवारणम्॥६॥उत्तानस्य प्रसुप्तस्य
नाभेरुपार संदधेतू॥कांस्यपात्रमये सौख्यं धाराभिःशीतवारिणा
७पूरयेत्सुरतं यत्नात्तेन सौख्यं समाप्नुते॥शतधौतं घृतमपि तद्दा-
होपरि धारयेत्॥८॥मतिर्धात्रीफलं वापि जलशीतेन लेपनम्॥
दाहशोषातुरस्यापि लेह्यं वा सुखकारकम्॥९॥जम्ब्वाम्रपल्लवा
निम्बं बीजपूररसेन तु॥पिष्ट्वा प्रलेपनं दाहेशीघ्रं सुखमभीप्सते
॥१०॥धारागारमथापि शीतलशशी ज्योत्स्ना तु पानानि च
वातः शीतलचन्दनं च कमलं प्रेमानुबन्धस्तथा॥रामागूहनम-
र्दनं स्तनयुगे शुक्लाद्ववस्त्राणि च क्षीरं शर्करशङ्खलोहरजतं दाहप्र-
शान्त्यै हितम् ॥११॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीय-
स्थाने दाहचिकित्सा नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
डाभकी जड़, कांसकी जड़, ईखकी जड़, खस, नागरमोथा, नेत्रवाला इनके क्वाथमें खांड
मिला पीवे यह शीतसहित दाहको नाशता है ॥ ३ ॥ पित्तपापड़ा, नागरमोथा, खस इनके

( ३४० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
क्वाथमें खांड मिला पीवे परन्तु यह शीतकषाय बनाके पीना चाहिये । यह मनुष्योंके दाहको और
पित्तज्वरको नाशता है ॥ ४ ॥ रोहिषतृण, चन्दन, खस इनका लेप दाहकी शांतिके लिये
हित है और दाहवालेको केलाके या कमलपत्तोंकी सेजपर शयन करा ताड़के यामलके वीजनेसे
हवा करवावे ॥५॥ दारुहलदीके रससे लेप करना दाहरोगमें हित है और शीतल पानी भी
श्रेष्ठ है। वह तृषाको और दाहको निवारण करता है॥६॥ दाहवाले मनुष्यको सीधा शयन करा
उसकी नाभिके ऊपर कांसीके पात्रको धर उसमें शीतल पानीकी धारा देनेसे सुख उपजता है
॥ ७ ॥ सुन्दर स्त्रीसे मिलाप होनेसे भी दाह दूर होता है और सौ सौ वार धोये हुए घृतकी
मालिस करनेसे भी दाह दूर होता है ॥ ८ ॥ मचकनको अथवा आंवलाको शीतल पानीसे
पीस लेप करावे अथवा चटावे तब दाहमें सुख होता है ॥ ९ ॥ जामन, आंव, नींव इनके
पत्तोंको बिजौराके रससे पीस लेप करनेसे दाहरोगीको सुख मिलता है ॥ १० ॥ फुहारेका
स्थान, चन्द्रमाकी शीतल चांदनी, शीतल पन्ने, शीतल वायु, सफेद चन्दन,कमल, प्रेमका होना,
स्त्रीका मिलाप और स्त्रीकी चूंथियोंको मसलना, सफेद वस्त्रको गीला बना धारण करना, दूब,
खांड, शंख, लोहा, चांदी ये सब दाहकी शांतिके लिये हित हैं ॥ ११
इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविद्वत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
तृतीयस्थाने दाहचिकित्सा नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

अष्टादशोऽध्यायः १८.

अथ मृगीरोगकी संप्राप्ति आदिक ।
आत्रेय उवाच॥पित्तं मरुच्च श्लेष्मा च उदानः कुपितो भृशम् ॥
प्राणः शिरसि संकुप्य कुरुते नष्टचेष्टताम् ॥१॥ प्राणाश्नयत्यचै-
तन्यं नाडीं चेन्द्रियरोधनम्॥पतते काष्ठवल्लोको मुखे लालां
विमुञ्चति ॥ २ ॥ कण्ठञ्च घुर्घुरोयेत फेनमुद्गिरतेऽथवा॥कम्पेते
हस्तपादौ च रक्तव्यावर्त्त लोचनम् ॥ ३ ॥ अपस्मारे च
लिङ्गानि जायन्ते भिषजां वर ॥ व्यावृत्तं लोचनं क्षामं
तमो दाहः शिरोव्यथा ॥ ४ ॥ हताभेन्द्रियसञ्ज्ञश्चापस्मारी
विनश्यति ॥ ५ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-पित्त, वात, कफ, उदानवायु ये अत्यन्त कुपित होके और प्राण-
१ यह एक तरहका शाक होता है ।

अ० १८ ] भाषाटीकासमेता । ( ३४१ )
वायु शिरमें कुपित होके चेष्टाको नष्ट करते हैं ॥१॥ तब चेतन नहीं रहता और नाड़ी भी
अचेत हो जाती है और इन्द्रियां रुक जाती हैं और काष्ठकी तरह मनुष्य गिर जाता है और मुखसे
लार पड़ती है ॥ २ ॥ कण्ठमें घुर्घुर शब्द होता है अथवा झागको मुखसे गेरता है, हाथ और
पैर कंपते हैं और रक्तसे विशेषकरके आवृत हुए नेत्र हो जाते हैं ॥ ३ ॥ हे वैद्यवर ! मृगीरोगमें
ये लक्षण होते हैं ॥ ४ ॥ जिसके नेत्र पलट जावें और शरीर कृश हो जावे और अन्धेरी,दाह,
शिरमें पीड़ा ये उपजें, इन्द्रियोंकी कांति और संज्ञा जाती रहे ऐसा अपस्मारी अर्थात् मृगी रोगी
मर जाता है ॥ ५ ॥
अथ मृगीरोगकी चिकित्सा ।
तस्य पानाञ्जनालेपमर्द्दनं पानमेव च ॥ अपस्मारे चोपचार्य्य
घृतं तैलं च धीमता ॥६॥ अगस्तिपत्रं मरिचं मूत्रेण परिपेषि-
तम्॥नस्ये शस्तमपस्मारं हन्ति शीघ्रं नरस्य तु ॥७॥वन्ध्या-
कर्कोटिकामूलं घृतं शर्करयान्वितम्॥नस्ये वापि प्रयोक्तव्यम-
पस्मारप्रशान्तये ॥ ८ ॥
इस रोगवालेके लिये कुशल वैद्यको पान करनेके पदार्थ, अंजन, आलेप, मर्दन, घृत, तैल,
इनसे इलाज करना चाहिये ॥ ६ ॥ अगस्ति वृक्षके पत्तेको और काली मिर्चको गोमूत्रमें पीस
नासिकामें चढ़ानेसे मृगीरोग शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥ ७ ॥ वांझककोड़ी की जड़के रसमें घृत
और खांड़ मिला नासिकामें चढ़ानेसे मृगीरोग शांत होता है ॥ ८ ॥
अथ कूष्माण्डलेह ।
कूष्माण्डखण्डांश्च रसेन पाचिताः सञ्यूषणैलादलनागकेशरम्॥
कुमेथिकाग्रन्थकधान्यकानां समांशकेनापि सिता प्रयोज्या॥
॥ ९॥ उषस्सु वै भक्षणकं विधेयं तस्योपरि क्षीरमितं प्रशस्तम्॥
विहन्त्यपस्मारविकारमाशु विनाशयेच्छीघ्रमसृग्विकारम्॥१०॥
जलसे पके हुए कोहलेके टुकड़े ले उसमें सोंठ, मिर्च, पीपल, इलायची, तेजपात, नागकेशर,
रानीमेथी, पीपलामूल, धनियां इन सबोंके चूर्ण मिला सबोंके समान मिश्री मिलावे, पीछे
प्रभातमें खावे और उसके ऊपर प्रमाणसे दूधको पीवे । यह मृगी रोगको और रक्तके विकारको
शीघ्र हरता है ॥ ९ ॥ १० ॥
अथ कूष्मांडघृत ।
कूष्मांडब्राह्मी षड्ग्रन्था शंखपुष्पी पुनर्नवा ॥ सुरसासहितं

( ३४२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
चूर्णं शर्करामधुसंयुक्तम् ॥ ११ ॥ अपस्मारविनाशाय भक्षणे
हितमेव च॥ उन्मादे पित्तरक्ते तु वन्ध्याया गर्भदायकम्॥१२॥
कोहला, ब्राह्मी, वच, शंखपुष्पी, सांठी,तुलसी इनके चूर्णमें खांड और शहद मिला ॥११॥
खानेसे मृगीरोग, उन्माद, रक्तपित्त इनका नाश होता है और वन्ध्याके गर्भ ठहरता है ॥१२॥
अथ दीपघृत ।
रास्नामागाधिकामूलं दशमूलं शतावरी ॥ शणत्रिवृत्तथैरण्डो
भागान्द्विपलिकान्क्षिपेत् ॥१३॥ यष्टीमधुकमृद्वीका शंखपुष्पी
शतावरी ॥ रास्ना समङ्गा शृतकं त्रिसुगन्धञ्च भीरुकम् ॥ १४॥
कुष्ठं वैतद्दीपकं च घृतं योज्यं भिषग्वरैः॥ हन्त्यपस्मारमुन्मादं
रक्तपित्तं गुदामयम् ॥ १५ ॥
रास्ना, पीपलामूल, शतावरी, शण, निशोत, अरंड ये सब आठ २ तोले लेने ॥ १३ ॥
मुलहठी, मुनक्का, शंखपुष्पी, शतावरी, रायसन, मंजीठ, दालचीनी, इलायची, तेजपात,
शतावरीका भेद ॥ १४ ॥ कूठ इनमें घृतको पकावे । यह घृत मृगी रोग, उन्माद, रक्तपित्त,
गुदाका रोग इनको नाशता है ॥ १५ ॥
अथ ब्राह्मीघृत ।
ब्राह्मीरसवचाकुष्ठशंखपुष्पीभिरेव च ॥
पचेद्घृतं पुराणं च अपस्मारं नियच्छति ॥ १६ ॥
ब्राह्मीका रस, वच, कूठ, शंखपुष्पी इनमें पुराने घृतको पकावे । यह मृगी रोगको
नाशता है ॥ १६ ॥
अथ अन्य उपाय ।
महाबलाद्यं तैलं च बस्तौ नस्ये प्रशस्यते ॥ शतावर्यादिकं
चापि सदैव च हितं भवेत् ॥ १७ ॥ चन्दनाद्यं घृतं चैव
प्रयोज्यं चात्र चोत्तमैः ॥ अपस्मारे वाप्युन्मादे वातरोगे-
ऽथवा हितम् ॥ १८ ॥
महाबलादि तैल और शतावर्यादि तैल नस्यकर्म्ममें और बस्तिकर्म्ममें सदा हित है ॥१७॥
मृगीरोग, उन्माद, वातरोग इनमें चन्दनादि घृत युक्त करना ॥ १८ ॥
अथ त्र्यूषणादि गुटिका।
त्र्यूषणं त्रिफला हिङ्गु सैन्धवं कटुका वचा ॥ नक्तमालकबी-

अ० १८ ] भाषाटीकासमेता । ( ३५३ )
जानि तथा च गौरसर्षपाः ॥ १९ ॥ बस्तमूत्रेण पिष्टैस्तु
गुटिका छायाशोषिता ॥ अञ्जनं हन्त्यपस्मारमुन्मादं चैव
दारुणम् ॥२०॥ स्मृतिभ्रंशभ्रमीदोषभूतदोषविनाशनम्॥ ऐका-
हिकं द्व्याहिकञ्च चातुर्थिकं ज्वरं हरेत् ॥ २१ ॥ हन्ति तिमिर-
पटलं रात्र्यान्ध्यंच शिरोरुजम्॥सन्निपातविस्मरणं चेतयत्याशु
मानवम् ॥ २२ ॥
सोंठ, मिर्च, पीपल, हरडै, बहेडा, आंवला, हींग, सेंधानमक, कुटकी, वच, करंजुवाके बीज,
सपेद सरसों ॥ १९ ॥ इनको बकरेके मूत्रमें पीस गोलियां बना छायामें सुखावे । पीछे
गोलीको घिस नेत्रोंमें आंजनेसे मृगीरोग, दारुणरूप उन्माद ॥ २० ॥ स्मृतिभ्रंश, भ्रम,
भूतदोष, ऐकाहिकज्वर, द्व्याहिकज्वर चातुर्थिकज्वर ॥ २१ ॥ तिमिर, पटलगतरोग, रतौंध,
शिरकी पीडा इनका नाश होता है और सन्निपातसे मूर्च्छित हुआ रोगी जागता है ॥ २२ ॥
चन्दनादि चूर्ण ।
चन्दनं तगरं कुष्ठं यष्टीत्रिसुगन्धवासकम्॥मञ्जिष्ठाभीरुमृद्वीका-
पाठाश्यामाप्रियङ्गुभिः ॥ २३ ॥ स्वयंगुप्ता पीलुपर्णी विषा
रास्ना गवादिनी ॥ काकोल्यौ जीरकं मेदे पुष्करं घनवालुकम् ॥
॥ २४ ॥ विदारी वासुमन्ती च वृद्धदन्ती विडङ्गकम् ॥ पद्मकं
चैन्द्रवृक्षश्च तथारग्वधचित्रकम् ॥ २५ ॥ धान्यकं पञ्चजीरेण
तथा तालीसपत्रकम् ॥ खदिरं निर्यासतगरं कालीयकं च कै-
थकम् ॥ २६ ॥ नागकेसरं परूषञ्च खर्जूरं चैकत्र मर्दयेत् ॥
भावितं पुनरेवं च मधुना सघृतेन च ॥२७ ॥ लेहोऽयञ्च सदा
शस्तश्चापस्मारेऽति दारुणे॥उन्मादे कामलारोगे पांडुरोगे हली-
मके ॥ २८ ॥ राजयक्ष्मे रक्तपित्ते पित्तातीसारपीडिते ॥
रक्तातिसारे शोषे च शिरोरोगे सदाज्वरे ॥२९ ॥ तमकभ्रमके
छर्दिर्दाहे च समदात्यये ॥ अश्मर्य्याञ्च प्रमेहेषु कासे श्वासे
च पीनसे ॥ ३० ॥ एतेषां च प्रयोक्तव्यः सर्वरोगनिवारणः ॥
वन्ध्यानां च प्रयोक्तव्यो वृद्धानां च विशेषतः ॥३१॥ बालानां
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( ३४४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
च हितश्चैव शृणु चात्र प्रमाणकम् ॥ एवं प्रयोजितो रोगे महा-
कल्को मतो बुधैः ॥ ३२ ॥ बलवान्गुणवांश्चैव भवतीह फल-
प्रदः ॥ भिषग्भिः कथ्यते लेहः कृष्णात्रेयेण पूजितः ॥ ३३ ॥
चंदन, तगर, कूठ, मुलहटी, दालचीनी, इलायची, तेजपात, बांसा, मंजीठ, शतावरी,
मुनक्का, स्योनापाठा, काली निशोत, मालकांगनी ॥ २३ ॥ कौंचके बीज, मीठी तोरी,
अतीश, रास्ना, इंद्रायन, काकोली, क्षीरकाकोली, जीरा, मेदा, महामेदा, पोहकरमूल, नागर-
मोथा, नेत्रवाला ॥ २४ ॥ विदारीकंद, शालवण, विधायरा, जमालघोटाकी जड, वायवि-
डंग, पद्माक, इंद्रायणविशेष, अमलताश, चीता ॥ २५ ॥ धनियाँ, पांचों तरहके जीरे,
तालीशपत्र, खर, तगर, दारुहलदी, कैथ ॥ २६ ॥ नागकेशर, फालसा, छुहारा ये सब
समान भाग लेके मर्दित करने पीछे घृत और शहदमैं मिला खावे ॥ २७ ॥ यह लेह भयंकर-
रूपी मृगीरोग, उन्माद, कामला, पांडुरोग, हलीमक ॥ २८ ॥ राजरोग, रक्तपित्त, पित्तका
अतिसार, शोष, शिरका रोग, सब कालमें रहनेवाला ज्वर ॥ २९ ॥ तमक, श्वास, भ्रम, छर्दि,
दाह, मदात्यय, पथरीरोग, प्रमेह, खांसी, श्वासरोग, पीनस ॥ ३० ॥ इनमें प्रयुक्त करना
चाहिये । यह सब रोगोंको निवारण करता है, वंध्या स्त्रियोंको और वृद्ध मनुष्योंको विशेष करके हित
है ॥ ३१ ॥ और बालकोंको हित है ऐसे यह कल्क बुद्धिमानोंने माना है ॥ ३२ ॥ यह चूर्ण
बलको देता है, गुणोंको प्रकाशित करता है। यह चूर्ण अथवा कल्क वृद्ध वैद्यों ने कहा है
और कृष्णात्रेयजीने पूजित किया है ॥ ३३ ॥
अथ द्राक्षावलेह ।
द्राक्षा दारु तथा निशा च मधुकं कृष्णा कलिंगा त्रिवृद्यष्टीका
त्रिफला विडंगकटुकासृक्चन्दनं दाडिमम् ॥ चातुर्जातकनिम्ब-
का च तुरगी तालीसपत्रं घना मेदे द्वे सुरदारु कुष्ठकमलं रोध्रं
समङ्गा वरी ॥ ३४॥ भार्ङ्गीकोलकदाडिमाम्लसहितं काश्मर्य्य-
शृङ्गाटकं काम्बोजा शणघण्टिका लघुतरा क्षुद्रा च रास्नायुतम्॥
चूर्ण शर्करया समं मधु घृतं खर्जूरके संयुतं लिह्यात्कर्षमिदं सम-
स्तबलकृद्धन्त्याश्वपस्मारकम् ॥ ३५ ॥ उन्मादञ्च सुदारुणं
क्षयमथो यक्ष्मा च पाण्डुश्वसन् कासासृग्रुधिरप्रमेहगुदजं स्त्रीणां
हितं शस्यते ॥ ३६ ॥
मुनक्का, देवदार, हलदी, मुलहटी, पीपल, सफेद निशोत, काली निशोत, महुवा, हरडैं,
बहेडा, आंवला, वायविडंग, कुटकी, रक्तचंदन, अनार, दालचीनी, इलायची, नागकेशर,

अ० १९ ] भाषाटीकासमेता । ( ३४५ )
तेजपात, नींवकी छाल, कालानमक, असगंध, तालीशपत्र, नागरमोथा, मेदा, महामेदा,
देवदार, कूठ, कमल, लोध, मजीठ, शतावरी ॥ ३४ ॥ भारंगी, बेर, अनार, अमली,
कंभारी, सिंगाड, पदमाख, तानीवेल, छोटी कटेहली, राक्षा, खिजूरि वे अथवा छुहारे
इनके चूर्णमें खांड, घृत, शहद इनको मिला १ तोलभरको चाटे । यह बलको करता है,
मृगी रोगको हरता है ॥ ३५ ॥ उन्माद, दारुणरूपी क्षय, राजरोग, पांडु, श्वास्रोग,
खांसी, रक्तके रोग, प्रमेहरोग, गुदाके रोग इनको भी नाशता है और स्त्रियोंको हित्त
कहा है ॥ ३६ ॥
अथ अन्य उपाय ।
एतैर्यदि न सौख्यं स्याद्दहेल्लोहशलाकया॥ललाटे च भ्रुवोर्मध्ये
दहेद्वा मूर्ध्नि मानवम् ॥३७॥ वर्जयेत्कटुकं चाम्लं रक्तपित्तवि-
कारिणाम्॥विशेषेण वर्जनीयं सुरापूगकषायकम् ॥ ३८.॥ न
सेव्यानि ह्यपस्मारे मोहमूर्च्छाकराणि वा॥३९॥ इत्यात्रेयभा-
षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने अपस्मारचिकित्सा नामाष्टा-
दशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
जो इन योगोंसे सुख नहीं होवे तब लोहेकी सलाईको गर्म कर मस्तक,भ्रुकुटियोंका बीच,
शिर इनमें दाग देवे ॥ ॥ ३७ ॥ चर्चरा, खट्टा, रक्तपित्तविकारवालोंको वर्जित करे,
मदिरा, सुपारी,कसैला पदार्थ ॥ ३८ ॥ मोह और मूर्च्छाको करनेवाले पदार्थ इनको मृगी-
रोगमें त्यागे ॥ ३९ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्रयुत्रादितहारीतसंहिता-
भाषाटीकायां तृतीयस्थानेऽपस्मारचिकित्सा नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
ऊनविंशोऽध्यायः १९.
अथ उन्मादानिदान ।
आत्रेय उवाच॥अयं मानसिको व्याधिरुन्माद इति कीर्तितः॥
प्रमत्ता ऊर्ध्वगा दोषा ऊर्ध्वं गच्छन्त्यमार्गताम् ॥१॥ उन्मादो
नाम दोषोऽयं कष्टसाध्यो भिषग्वरैः॥सोऽपि पृथग्विधैर्दोषैर्द्वन्द्व-
जोऽन्यः प्रकीर्त्तितः ॥ तथान्यः सन्निपातेन विषाद्भवति चापरः
॥ २ ॥ अशुचिविपथशून्यागारकेऽरण्यम ध्ये समयगहनवीथी-
देवतागारके च ॥ अथ कथमपि भीत्या शङ्कया स्विन्न चेतः

( ३४६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
क्षुभितमनसमार्गत्याज्यमुन्मार्गेयेति ॥३॥ चिन्ताव्यथासुभय-
हर्षविमर्षलोभाद्देवातिथिद्विजनरेन्द्रगुर्वपमानात्॥ प्रेमाधिकाच्च
युवतौ हितविप्रयोगादुन्मादजन्म च नृणां कथितं वरिष्ठैः ॥४॥
तेन गायति वा रौति विरूपं पठते यदा ॥ लोलयेच्छर्द्दते वापि
कम्पते हसते तथा ॥ ५ ॥ धावते हनने चैव तथा जिह्वा विन-
श्यति ॥ जवे भासयतेऽत्यर्थं पश्येद्धनमथातुरः ॥ ६ ॥ तस्या-
पस्मारकं कर्म कर्त्तव्यं भिषजां वरैः ॥ विशेषेण भूतविद्यामध्ये
वक्ष्यामि चाग्रतः ॥ ७ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीय-
स्थाने उन्मादनिदानं नामोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
आत्रेयजी कहते हैं:—मनमें होनेवाली व्याधि उन्मादसंज्ञक कहाती है, प्रमत्त अर्थात्
बिगड़के बढ़े हुए दोष ऊपरके मार्गमें प्राप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥ तब यह उन्माद रोग होत
है यह वैद्यों ने कष्टसाध्य कहा है वह उन्माद वात, पित्त, कफ इनसे और द्वंद्वज होता है
और एक सन्निपातसे उन्माद होता है, एक विषसे होता है ॥ २॥ और अशुद्ध होके भयंकर
मार्गमें, शून्य मकानमें, वनमें तथा भयवाले गहर मार्गमें, देवताके मंदिरमें, किसी प्रकारसे
भयकी शंकासे, खिन्न मन होनेसे मन क्षोभको प्राप्त हो अपने मार्गको त्याग उन्मादको प्राप्त
हो जाता है ॥ ३ ॥ चिंता, व्यथा, भय, हर्ष, क्रोध, लोभ इनसे और देवता, अतिथि,
ब्राह्मण, राजा, गुरुः इनके अपमान करनेसे और अधिक प्रेमवाले जनका तथा स्त्रीका
वियोग होनेसे बुद्धिमान् पुरुषों ने उन्मादका हेतु कहा है ॥ ४ ॥ उस उन्मादके होनेसे कभी
गावे, कभी रोवे, विरूप हो जावे, कभी पढे, चंचलपना हो, छर्द्दि करे कांपे, हंसे ॥ ५ ॥
मारनेके समय भाग जावे, जिह्वाको छिपा लेवे और वेगसमय अत्यंत तेज हो जावे और पीडित
होके वनको देखे ॥ ६ ॥ ऐसे पुरुषके वैद्यजनोंको मृगीरोगमें कहे हुए कर्म करने चाहिये और
विशेष करके भूतविद्यामध्यमें इसे कहेंगे ॥ ७ ॥
इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
तृतीयस्थाने उन्मादनिदानं नाम ऊनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
विंशोऽध्यायः २०.
अथ वातव्याधिचिकित्सा तहां सोलह प्रकारके शिरोगत
प्राणवायुका प्रकोप ।
आत्रेय उवाच ॥ चतुरशीतिर्विख्याता वाता नृणां रुजाकराः॥

अ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( ३४७ )
तेषां निदानं वक्ष्यामि समासेन पृथक्पृथक् ॥१ ॥ विरुद्धाचि-
न्ताशनजागराच्च व्यायामतश्चातितमोऽभिषङ्गात् ॥असृग्विरे-
काद्विषमासनेन प्राणस्तथापानसमानरोधात् ॥ अध्वाश्रमे क्षी-
णबलेन्द्रियाणामसन्नतो धातुगतोऽपि वायुः॥२॥ प्राणोऽपानः
समानश्चोदानो व्यान एव च॥ एषां दोषाद्भवन्त्येते वातदोषाः
पृथक्पृथक् ॥ ३ ॥ शिरःशूलं कर्णशूलं शङ्खशूलमसृग्गदः ॥
अर्द्धशीर्षविकारश्च दिनवृद्धिसमुद्भवः ॥४॥ नासिकोपद्रवो वापि
मन्यास्तम्भो हनुग्रहः ॥ जिह्वास्तम्भस्तालुशूलं तथा च तमकं
भ्रमः ॥५॥ तन्द्राश्वासगलाद्याश्च षोडशैते शिरोगताः ॥ प्राण-
प्रकोपतो यान्ति पित्तेन सममीरिताः ॥ ६ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-वातसे उत्पन्न होनेवाले विकार मनुष्योंके ८४ होते हैं सो
संक्षेप करके जुदे २ उनके निदानोंको कहेंगे ॥ १ ॥ विरुद्ध भोजन, चिंता, जागरण,
कसरत, अत्यंत तमोगुणके अभिषंगसे, रुधिरके विरेक अर्थात् फस्तसे, विषमभोजनसे, प्राण,
अपान, समान इन वायुओंके रोकनेसे, मार्गके श्रमसे, क्षीणबल इंद्रियवाले पुरुषोंके धातुके
समीपमें वायु प्राप्त हो ॥२॥ प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान इन वायुओंके दोषसे जुदे २
वातदोष हो जाते हैं ॥ ३ ॥ शिरमें शूल हो, कानमें शूल हो, कनपटियोंमें शूल हो, रुधिरकी
पीडा हो, दिनके चढ़नेके समय आधे शिरमें पीडा हो ॥ ४ ॥ नासिकामें उपद्रव हो, मन्यास्तंभ
हनुग्रह अर्थात् ठोडी बंध रहे, जिह्वास्तंभ, तालुवामें शूल, तमकश्वास, भ्रम ॥ ५ ॥ तंद्रा,श्वास,
गलके रोग ये सोलह शिरमें प्राप्त होनेवाले वायुके रोग हैं और प्राण वायुके कोपसे पित्तके संग
कोप पा जाते हैं ॥ ६ ॥
अथ सोलह प्रकारके उदानवायुके कोप ।
हिक्का श्वासः परिश्वासः कासः शोषार्त्तिघण्टिका ॥ हल्लासो
हृदि शूलञ्च यकृद्धातादिका वमिः ॥७॥ क्षवथुर्जृम्भणं चैव तथा
वैस्वर्यपीनसः ॥ अरुचिश्च प्रतिश्याय एते प्रोक्ता उदानतः ॥
॥ ८ ॥ उदानः श्लेष्मसंयुक्तो दोषाद्धृदि प्रकुप्यति ॥ ९ ॥
हिचकी, श्वास, अत्यन्त श्वास, खांसी, शोषकी पीड़ा, गलघंटिका रोग, थुकथुकी, हृदयमें शूल
यकृत्, वात आदिकोंकी छर्दि ॥ ७ ॥ छींक आना, जँभाई आना, स्वर बिगड़ना, पीनस,
१ अत्र षट्पदवृत्तम् ।

( ३४८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
अरुचि, जुकाम ये रोग उदानवायुके कोपसे होते हैं ॥ ८ ॥ यह उदान वायु कफके साथ दोष
करके हृदयमें कुपित होता है ॥ ९ ॥
अथ व्यानवायुके कोपके लक्षण ।
वक्ष्यामो व्यानको नाम मरुतस्य प्रकोपनम् ॥ वातः सर्वाङ्गको
धातुविकारं कुरुते भृशम् ॥ १० ॥ स च धातुगतो ज्ञेयस्तथा
प्रोक्तः पृथक् पृथक् ॥ त्वग्वाते रोमहर्षश्च मन्या चांसाभूरेव च ॥
॥११॥ मांसगे शोथतोदश्च मेदःस्वस्थे च कम्पता ॥ भङ्गता-
स्थिगते वाते पतनं मज्जगे भवेत्॥१२ ॥ शुक्रगे सन्धिशोथश्च
तस्मात्त्वग्वातलक्षणम्॥ एतैर्धातुगतान्वातान्साध्यासाध्यान्नि-
रोधयेत् ॥१३॥ संत्यक्तमांसमेदःस्थो वायुः सिध्यति भेषजैः॥
अन्ये कष्टेन सिध्यन्ति न सिध्यन्त्यथवा पुनः ॥ १४ ॥
अब व्याननामवाले वायुके कोपके लक्षणोंको कहते हैं, सब अंगमें रहनेवाला यह वायु अत्यन्त
धातुविकारको करता है ॥ १० ॥ सो वह धातुमें प्राप्त हुआ पृथक् २ जानना । यह वातके
त्वचा में कोप हो जानेपर रोम खड़े हों मन्यासंज्ञक नसोंका फुरणा हो॥११॥मांसमें प्राप्त हो जावे
तब शोजा हो, पीडा, मेदमें कंपना हो ॥१२॥ अस्थियोंमें प्राप्त होवे तब हाड़ टूट जावे, मज्जामें
कुपित होवे तब गिरना होवे, वीर्यमें होवे तब संधियोंमें शोजा होवे, ऐसे त्वचा आदिकोंमें
वायु प्राप्त होता है। इत्यादिक धातुओंमें प्राप्त हुए वायुओंको साध्य और असाध्योंको रोके॥१३॥
जो वायु मांससे रहित मेदमें प्राप्त होवे वह औषधोंसे सिद्ध होता है और अन्य वायु कष्टसे
सिद्ध होते हैं ॥ १४ ॥
अथ समानवायुका प्रकोप ।
लोमहर्षी भवेत्तोदो निद्रानाशोऽरुचिस्तमः॥गात्रं सूची च वि-
ध्येत भ्रमन्त्येव पिपीलिकाः ॥१५॥ रूक्षत्वं त्वयसे नेत्रे कृश-
त्वं जायते पुनः॥ गर्भरजसः शुक्रस्य नाशो भवति वेपथुः १६
मन्दाग्नित्वं च भवति स्वप्नानि च स पश्यति ॥ निद्रानाशः
क्षोभयति सामान्यं वातलक्षणम् ॥ १७ ॥
रोमहर्ष अर्थात् रोम खड़े हो जावें, शरीरमें व्यथा हो, निद्राका नाश हो, अरुचि हो,
अंधेरी हो, शरीरमें कीड़ीसी जले ॥ १५ ॥ त्वचा, नेत्र ये रूखे रहे और दुर्बल शरीर होजावे
और स्त्रीके गर्भ, रजस्वला इनका नाश हो जावे, वीर्य नष्ट हो जावे, कंपना हो ॥ १६ ॥

अ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( ३४९ )
मंद अग्नि हो जावे, अनेक सुपने आवे, निद्राका नाश हो जावे शरीरमें क्षोभ होवे ये सामान्य
वातके लक्षण हैं ॥ १७ ॥
अथ आक्षेपकवायुका लक्षण तथा अपतन्त्रकवायुका लक्षण ।
मुहुराक्षेपयेद्गात्रं मेदस्तोदो बहुस्वरः ॥ स चैवाक्षेपको नाम
जातो व्यानप्रकोपतः ॥ १८ ॥ धनुर्वन्नाम्यते गात्रमाक्षिपेच्च
मुहुर्मुहुः ॥ प्रक्लिन्ननेत्रस्तब्धाक्षः कपोत इव कूजति ॥ तमाहु-
र्भिषजां श्रेष्ठा अपतन्त्रकनामतः ॥ १९ ॥
और जो वारंवार शरीर कांपे, मेदमें व्यथा हो, ज्वर बहुत हो जावे ऐसा आक्षेपकनाम-
वाला वायु होता है, यह व्यानवायुके कोपसे होता है ॥ १८ ॥ शरीर वारंवार धनुष्यकी तरह
नवे, गीले और गर्वसरीखे नेत्र रहें, कपोतकी तरह कूजे ये लक्षण हों उस वायुको वैद्यजन
“ अपतंत्रकनामवाला ” कहते हैं ॥ १९ ॥
अथ अप्रतानकवायुप्रकोप ।
मतान्तरे वदन्त्यन्ये प्रह्वप्रतानको मतः ॥
गृहीताङ्गं ततो वायुरप्रतानकः संस्मृतः ॥ २० ॥
कईक मतोंमें इस वायुको अप्रतानक कहते हैं अथवा जो आधा शरीरको बंध कर देवे
उसको “ अप्रतानक ” वायु कहते हैं ॥ २० ॥
सोऽपि कफाश्रितो वायुः संपीडयति दण्डवत् ॥ स्तम्भयत्याशु
गात्राणि सोऽपि दण्डाप्रतानकः॥२१॥हृद्वक्षोजकराङ्गुलौ गुल्फ-
सन्धौ समाश्रितः॥स्नायुं प्रतानयेद्यस्तु सोऽपि स्नायुप्रतानकः
॥२२॥ बाह्यानामथ नाडीनां प्रतानयति मारुतः ॥ कट्या-
श्रितो वा भवति सशल्यमिव कुर्वते ॥ २३ ॥ तमसाध्यं बुधाः
प्राहुस्तञ्च वातं प्रतानकम्॥ अन्धं चतुर्थमाक्षेपमभिघातसमुद्भवम्
॥२४॥ अभिघातेन यो जातो न स साध्यः प्रतानकः ॥
ऊर्ध्वं तानयते यस्तु विशोषयति गात्रकम् ॥ २५ ॥ मोहतमः
कृते वास्थिसन्धिसंशुष्कको मतः ॥
और वही वायु कफके आश्रय होके लाठीकी चोट सरीखी पीडा करता है, गात्रोंको बंध
कर देता है वह दंडप्रतानक वायु कहाता है ॥ २१ ॥ हृदय, छाती, हाथोंकी अंगुली, गुल्फ-

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri

( ३५० ) हारीतसंहिता । [तृतीयस्थाने-
इनकी संधियोंके आश्रय होके जो नसोंको विस्तारित कर देता है वह स्नायुप्रतानक वायु
कहाता है ॥ २२ ॥ जो वायु बाहरकी नसोंमें विस्तारित हो जाता है अथवा कटिके आश्रय
हो जाता है और शल्य चोट लगी सरीखी पीडा हो ॥ २३ ॥ उसको बुद्धिमान् मनुष्य असाध्य
प्रतानक वात कहते हैं और चोटसे उत्पन्न होनेवाला चौथा आक्षेपक वात कहाता है ॥ २४ ॥
वह ऊपरले अंगोंमें फैलता है और शरीरमें शोष कर देता है ॥ २५ ॥ और मोह हो, तम
अर्थात् अंधेरी हो वह अस्थिसंगि इनको सुखानेवाला वायु कहाता है ।
अथ एकाङ्गवायु ।
कृच्छ्रार्द्धकर्ष भवति शुष्कतां च प्रकुप्यति ॥ २६ ॥
पृष्ठं प्रतानार्द्धं यो वै स तथैकाङ्गिको मतः ॥ २७ ॥
उससे आधा शरीरमें कष्ट रहे, खिंचा हुआ रहे और शोषका कोप हो ॥ २६ ॥ और जो
पीठको तथा आधे शरीरको बंध कर देता है वह एकांगिक वायु कहाता है ॥ २७ ॥
अथ एकांगपक्षघातवायु ।
एकांगपक्षघातश्च भवत्यन्यतमो यदि ॥
वातघ्नैरोषधैः सर्वैर्वायुः कष्टेन सिध्यति ॥ २८ ॥
और जो यदि अन्य पक्षघातसंज्ञक वायु एकओरके अंगमें प्राप्त हो जाता है वह संपूर्ण
वातनाशक औषधोंकरके कष्टसे सिद्ध होता है ॥ २८ ॥
अथ तूनी तथा प्रतितूनी वायु ।
तोदमूर्च्छा वेपनं स्याद्वेष्टता स्पर्शनाज्ञता ॥ यस्तु नश्यति
गात्राणि वायुस्तूनीतिशब्दतः ॥ २९ ॥ वेपनं तोद्वेष्टत्वं
स्पर्शनं वेत्ति यः पुनः ॥ प्रतूनयति गात्राणि प्रतितूनीति
गद्यते ॥ ३० ॥
शरीरमें पीडा हो, मूर्च्छा हो, कंपना हो, शरीर बंधा रहे, स्पर्श नहीं जाना जावे और अंगोंको
नष्ट कर देवे वह तूनीसंज्ञक वायु कहाता है ॥ २९ ॥ और शरीर कांपे, व्यथा हो,
शरीर बंध रहे और स्पर्श सह लेवे, शरीरको पीने अर्थात् पीने सरीखी पीडा हो वह प्रति-
तूनी वात कहाता है ॥ ३० ॥
अथ व्यानवायुके कोपका लक्षण ।
हृदिस्तम्भः पृष्ठस्तम्भ ऊरुस्तम्भश्च गृध्रसि ॥ पृथक्त्वेन च
कथितमये शृणुष्व कोविद् ॥ ३१ ॥ एते व्यानप्रकोपेण द्विषो-
डश प्रकीर्त्तिताः ॥ ३२ ॥

Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( ३५१ )
हृदय बंध रहे पीठ बंध रहे, जांघ बंध रहे, गृध्रसी रोग हो जावे सो जुदे २ बत्तीस प्रकारके
रोग पहले व्यान वायुके कोपसे कहे हैं । अब आगे कहे हुए अन्य वायुओंके लक्षणोंको
सुनो ॥ ३१ ॥ ३२ ॥
अथ सोलह प्रकारके समानवायुके कोप ।
शूलं गुल्म उदावर्त्त आध्मानोदावर्त्तमेव च ॥ परिणामो विषमा-
ग्निर्जीर्णं वाति गुल्मकः ॥ ३३ ॥ परिक्लेदी रसशेषो रसश्च मल-
वालकः ॥ बन्धी भेदी विलासी च षोडशैते समानतः ॥३४॥
शूल हो, गुल्म, उदावर्त्त, अफारा, परिणामशूल, विषमाग्नि, अजीर्ण, वातका गोला ॥३३॥
परिक्लेद, पीड़ा, रसशेष, रस नहीं पकना, मल कच्चा रहना, मलका बंधा, तथा
पतला मल होना, भोग करनेकी इच्छा रहे ये सोलह विकार समान वायुके कोपसे
होते हैं ॥ ३४ ॥
अथ सोलह प्रकारके अपानवायुके लक्षण ।
भगन्दरो बस्तिशूलो मेहार्शाश्चातिकोठकः ॥ लिङ्गदोषौ गुदभ्रं-
शस्तथान्यौ गुदशूलकः ॥ ३५ ॥ मूत्ररोधोःविड्रोधश्च षोडशैते
विजानता ॥ अपानस्य प्रकोपेन विज्ञेयास्तु प्रधानतः ॥ ३६ ॥
एते विकाराः कथिताः विस्ताराश्च प्रकीर्त्तिताः ॥ दाहः सन्तापः
शोषश्च मूर्च्छा पित्तान्वितो मरुत् ॥ ३७ ॥ शैत्यं शोफारुचि-
र्जाड्यं वातश्लेष्मसमन्वितम् ॥ यो द्वन्द्वजाश्रितो धीर तं
साध्यं मारुतं विदुः ॥ ३८ ॥ केवलोऽपि समीरोऽपि सोऽपि
साध्यतमः स्मृतः ॥ ३९ ॥
भगंदर रोग हो, वस्तिमें शूल,प्रमेह, बवासीर, शीत, पित्त, लिंगदोष, गुदभ्रंश, गुदामें शूल
॥ ३५ ॥ मूत्रबंध होना मलबंध होना, ये सोलह विकार वैद्योंको अपानवायुके कोपसे जानने
चाहिये ॥ ३६ ॥ ये विकार विस्तार करके यहां कह दिये हैं, और दाह, संताप, शोष,मूर्च्छा ये
पित्तवातसे होते हैं ॥ ३७ ॥ शीतलता, शोजा, अरुचि, जडपना ये वातकफसे होते हैं
और जो दो दोषोंसे मिला हुआ वायु है उसको साध्य कहते हैं ॥३८॥ तथा एक दोषवाला भी
वायु सुखसाध्य कहा है ॥ ३९ ॥
अथ अर्दित अर्थात् लकुआके लक्षण ।
वक्रं भवति वक्रार्द्धं ग्रीवा चाप्युपवर्त्तते ॥ वैकृत्यं नयनानाञ्च

( ३६२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
विसंगो वेदनातुरः ॥ ग्रीवायां गण्डयोर्दन्तपार्श्वे यस्यातिवेदना
॥ ४० ॥ तमर्दितमिति प्राहुर्वातव्याधिविचक्षणाः ॥ ४१ ॥
मुख टेढ़ा हो जावे तथा ग्रीवा ऊपरको हो जावे, नेत्र बिगड़ जावे, वायु बन्ध हो जावे,
पीडा रहे और ग्रीवा, कपोल, दांतोंके मसूढ़े इनमें ज्यादे पीडा हो ॥ ४० ॥ उसको व्याधिको
जाननेवाले वैद्य अर्दित अर्थात् लकुआ कहते हैं ॥ ४१ ॥
अथ द्वन्द्वज अर्दितका लक्षण ।
लालास्रावोऽथ शोषश्च हनुग्रहो विरस्यता॥दन्तशूलं भवेद्यस्य
वातेनार्दितमेव च ॥४२॥ पीतांगं सज्वरं तृष्णा पित्तजो मोह
एव च ॥ शोफस्तम्भोऽस्य भवति कफोद्भूतेऽथवार्दिते ॥४३॥
लार गिरे, शोष हो, ठोड़ी बन्ध रहे, मुखका रस बिगड़ा रहे, दांतोंमें शूल हो ये
अर्दित वातके लक्षण हैं ॥ ४२ ॥ पीला शरीर हो, ज्वर हो, तृषा हो, मोह हो ये पित्तसे
उपजे अर्दित वायुके लक्षण हैं और शोजा हो गात्र बन्ध रहे ये कफसे उपजे वायुके
लक्षण हैं ॥ ४३ ॥
अथ असाध्य अर्दित ।
भाविनो लक्षणं यस्य वेपथुर्नेत्रमाविलम् ॥ क्षीणस्यानिमिषाक्ष-
स्य प्रसक्ताव्यक्तभाषिणः ॥४४॥ न सिध्यत्यर्दितं गाढं विषमं
चापि तस्य च ॥ कण्ठो घोरो भक्षणार्थं जृम्भा प्रस्तारिते
मुखे ॥४५॥ हनुस्तम्भो भवत्येते कृच्छ्रसाध्या भवन्ति हि ॥
विषमे वा दिवास्वप्ने विवर्तितनिरीक्षणे ॥ ४६ ॥ मन्यास्तम्भं
जनयति कृच्छ्रात्पार्श्व विलोकते ॥ वाग्वादिनीं शिरां रुद्ध्वा
स्तम्भयेद्रसनानलः ॥ ४७ ॥ रक्ताश्रितोऽपि पवनः शिरो-
नाड्यां समाश्रितः ॥ शिरोऽर्तिं कुरुते यस्तु सोऽप्यसाध्यः
शिरोग्रहः ॥ ४८ ॥
जिसके कम्पना हो, नेत्र गड जावे, आखोंकी पलक क्षीण हो जावे और अव्यक्त अप्रकट
बोले उसके जानना कि अब अर्दित वात होवेगा ॥ ४४ ॥ और जिसके विषम तथा अत्यन्त
लक़ुवा वात हो जाता है उसके अच्छा नहीं होता है और जिसका कण्ठ घोर हो, भक्षण करनेके
वास्ते तथा जंभाई लेनेके वास्ते फाढा हुआ मुखसरीखा मुख रह जावे ॥४५॥ ठोड़ी बन्द हो जावे
ये कष्टसाध्य लकुआके लक्षण हैं और जिसके दिनमें विषम सोनेसे उलटे देखनेके समय ॥४६॥

अ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( ३५३ )
ठोड़ीकी नस बन्ध रहें और बगलकी ओर बड़े कष्टसे देखा जावे और वाणीको बोलनेवाली
नाड़ीको श्वासवायु बन्ध कर देवे यह भी कष्टसाध्य वात है ॥ ४७ ॥ और रक्तके आश्रय
हुआ वायु शिरकी नाड़ियोंके आश्रय हो जो शिरमें पीडा कर देता है वह भी शिरोग्रह-
वायु असाध्य कहाता है ॥ ४८ ॥
अथ अपान आदिक वातोंकी चिकित्सा ।
अतः प्रतिक्रियां वक्ष्ये यथा सिध्यति मारुतः ॥ स्नेहनं
रूक्षणं कार्यं पाचनं शमनानि च ॥ ४९ ॥ स्वेदनं मर्दनाभ्यङ्गो
बस्तिस्नेहो निरूहणम् ॥ स्नायुसन्ध्यस्थिसंप्राप्ते भेदनं कारये-
त्सुधीः ॥ ५० ॥ माणिमन्थेन यन्त्रेण ततः संभूषयानिलम् ॥
असाध्ये शुक्रगे व्याने बीजवत्समुपाचरेत् ॥ ५१ ॥
अब जैसे वायु सिद्ध होता है वैसे चिकित्साको कहते हैं-स्नेहन, रूक्षण, पाचन, शमन
ऐसे इलाज करने चाहिये ॥ ४९ ॥ पसीना दिवाना, मालिस करनी, बस्तिस्नेह, निरूहण
बस्ति ये चिकित्सा करनी चाहिये और स्नायु, संधि, अस्थि इनमें वायु प्राप्त हो जावे तो
भेदन अर्थात् गहावे ॥ ५० ॥ और माणिमंथ यंत्र करके वायुको शांत करे और जो असाध्य
व्यानवायु शुक्रमें प्राप्त होवे तो वीर्यवृद्धिसरीखी औषध करे ॥ ५१ ॥
अथ स्नेहननाम घृत ।
मुण्डी गुडूची बृहतीद्वयं च रास्ना समङ्गा कथितः कषायः ॥
समुत्थितेनापि विमिश्रितं च दुग्धं दधि स्यान्नवनीतकञ्च ५२॥
पचेत्सुधीमान्मृदुवह्निना च सिद्धं घृतं स्नेहनमेव पुंसाम् ॥
कर्षप्रमाणं विहितं च पाने चाभ्यञ्जके भोजनके तथैव ॥५३॥
बस्तौ हितं स्नेहनमेव पुंसां सप्ताहकं वातविकारिणाञ्च॥५४॥
गोरखमुंडी, गिलोय, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली, रास्ना, मंजीठ इनका काथ बना लेवे
पीछे इस काथमें दूध, दही, नूनीघृत ॥ ५२ ॥ इनको मिला फिर मंद मंद अग्निसे पकावे फिर
यह घृत सिद्ध हो जावे तब इसकी मालिस करनी वातवाले पुरुषोंको हित है और एक तोला
प्रमाण इसको पीवे अथवा मालिसमें और भोजनमें वरते ॥ ५३ ॥ बातके विकारवाले पुरुषोंको
यह घृत सात दिनतक सेवन करना चाहिये ॥ ५४ ॥
अथ निरूहणबस्ति ।
रास्नाविडङ्गरजनी सह नागरेण सौवीरकेण सुरसा सह सैन्ध-
२३

( ३५४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
वेन ॥ सोष्णञ्च पानमिदमेव विरूक्षणं स्यान्नृणाञ्च पञ्चदिन-
कर्षकमात्रमेव ॥ ५५ ॥
रास्ना, वायविडंग, हल्दी सोंठ, कांजी, तुलसी, सेंधानमक इनको एक जगह मिला गरम
गरम पीना हित है और रूखा भोजन खाये और पांच दिनतक एक एक तोला प्रमाण इसको
खावे ॥ ५५ ॥
अथ पाचन तथा शमनका कथन ।
अतः स्यात्पाचनं सम्यग् दिनसप्तकमेव तत् ॥पाचिते चैव दोषे
च तस्मात्संशमनं ददेत्॥५६॥वक्ष्यामि ते पृष्ठिगते धमन्याः
समाश्रिते च बहुधाशमेन ॥ संस्विद्य नाशं च नयेत् समीरं
सप्ताहकं चोष्णजलेन सेकः ॥ ५७ ॥
इसके सेवनेसे वायु पक जाता है और फिर सात दिन पीछे दोष पक जावे तब संशमन
औषधको करे ॥ ५६ ॥ अब धमनी नाडीके आश्रय होके पृष्ठिस्थानमें प्राप्त हुए वायुके
इलाजको कहते हैं उस वायुको बहुत प्रकारसे शमन करके स्वेद अर्थात् पसीना दिवाके
वायुको शांत करे और सात दिनतक गरम जलसे सेके ॥ ५७ ॥
अथ सर्वांगवायुकी चिकित्सा ।
रास्नात्रिकण्टकैरण्डशतपर्वा पुनर्नवा ॥ क्वाथो वातामयं हन्ति
सर्वाङ्गगतमाशु च॥५८॥रास्नागुडूचिकादारुनागरैरण्डसंयुतः॥
क्वाथः सर्वाङ्गवातेऽपि समधातुगते हितः ॥५९॥ रास्नाश्वग-
न्धाकाशीशं वचा च कपिकच्छुकम् ॥ क्वाथस्त्वेरण्डतैलेन
पीतो हन्ति समीरणम् ॥६०॥ रास्नाधान्यकशुण्ठी च यवानी
दशमूलकम्॥क्वाथः पाचनके प्रोक्तो नरे वातविकारिणि॥६१॥
रास्नाद्यानि पाचनानि हितानि कथितानि च ॥ ६२ ॥
रास्ना, छोटी कटेहली, बडी कटेहली, गोखरू, अरंड, वच, सांठी इनका क्वाथ
बना पीनेसे वातोंके रोग दूर होते हैं और सर्वांगवात शीघ्र ही नष्ट होता है ॥ ५८ ॥ रास्ना,
गिलोय, देवदार, सोंठ, अरंड इनका क्वाथ सर्वांगवातमें और धातुगत वातमें हित है
॥ ५९ ॥ रास्ना, असगंध, हीराक्सीस, वच, कौंचके बीज इनके क्वाथको अरंडीके तेलके
संग पीनेसे वातका नाश होता है ॥ ६० ॥ रास्ना, धनियां, सोंठ, अजवायन, दशमूल
इनका क्वाथ वातविकारवाले पुरुषोंको पाचन कहा है ॥ ६१ ॥ ऐसे ये रास्ना आदिक क्वाथ
वातवालोंको हित और पाचन कहे हैं ॥ ६२ ॥

अ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( ३५५ )
अथ रसोनकयोग ।
अर्द्धपलं रसोनञ्च हिङ्गुसैन्धवजीरकैः ॥ सौवर्चलेन संयुक्तं
तथैव कटुकत्रिकम् ॥६३॥घृतेन संयुक्तं भक्ष्येन्मासमेकं दिने दिने॥
निहन्ति वातरोगञ्च अर्दितं च प्रतानकम्॥६४॥ एकाङ्गरोगि-
णाञ्चापि तथा सर्वाङ्गरोगिणाम्॥ऊरुस्तम्भं क्रिमेदोषं गृध्रसी-
र्वापि कर्षति॥६५॥ पलार्द्धञ्च पलं चापि रसोनञ्च सुकुट्टितम्॥
हिङ्गुजीरकसिन्धूत्थं सौवर्चलकटुत्रयम् ॥ ६६ ॥ एभिः संचू-
र्णितैः सर्वैस्तुल्यं तैलेन संयुक्तम् ॥ यथाग्नि भक्षयेत्प्रातः रुबु-
क्वाथानुपानवत्॥६७॥मासमेकं प्रयोगेण सर्ववातामयाञ्जयेत्॥
एकाङ्गं चैव सर्वाङ्गमूरुस्तम्भं च गृध्रसीः ॥ ६८ ॥ कटिपृष्ठा-
स्थिसन्धिस्थमर्द्दितं चापतन्त्रकम्॥ज्वरं धातुगतं जीर्णं नित्यञ्च
शीतलाह्वयम् ॥ ६९ ॥
लहसन २ तोले, हींग, सेंधानमक, जीरा, कालानमक, सोंठ, मिर्च, पीपल इनको
समान भाग ले ॥ ६३ ॥ घृतमें मिला दिन २ प्रति एक २ मास प्रमाण भक्षण करे । यह
वातरोग, लकवा, प्रतानकवात इनको नाशता है ॥ ६४ ॥ एकांगवातरोग, सर्वांगवात,
ऊरुस्तंभ, क्रिमिदोष, गृध्रसी वात इनको दूर करता है ॥ ६५ ॥ चार तोले अथवा दो
तोले लहसनको कूट उसमें हींग, जीरा, सेंधानमक, कालानमक, सोंठ, मिर्च, पीपल
॥ ६६ ॥ इन सबोंको समान भाग ले चूर्ण बना उसमें बराबरका तैल मिला फिर प्रातः-
काल जठराग्निके अनुसार इसको भक्षण करे और इसपै अरंडके क्वाथका अनुपान करे ॥ ६७ ॥
इसके एक मासे खानेसे सब प्रकारके वातरोगोंका नाश होता है । एकांगवात, सर्वांगवात,
ऊरुस्तंभ, गृध्रसीवात ॥ ६८ ॥ कटि, पृष्ठ, अस्थि, संधि इनको मर्दन करनेवाला वात,
अपतंत्रकवात, धातुगत ज्वर, तथा जीर्णज्वर और नित्य आनेवाला ज्वर, शीतज्वर
इनको नाशता है ॥ ६९ ॥
अथ वातको शमन करनेवाले क्वाथ ।
नागरा च हरिद्रा च कणाजाज्यजमोदिका॥वचा सैन्धवरास्ना
च मधुकं समभागिकम् ॥ ७० ॥ श्लक्ष्णचूर्ण पिबेच्चैव सर्पिषा
प्रत्यहं नरः॥एकविंशतिदिनैर्वा रोगान् हन्ति न संशयः ॥ ७१॥
भवेच्छ्रुतिधरः श्रीमान्मेघदुन्दुभिनिस्वनः ॥ हन्ति वातामयान्

( ३५६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-

सर्वांल्लिहो यश्च सुखावहः ॥ ७२ ॥ शतावरी वचा शुण्ठी
रास्ना कदरशल्लकी॥दशमूली बलाकिण्वस्तुम्बुरु च गुडूचिका
॥ ७३ ॥ एष कल्को घृतैर्युक्तो हन्ति वातं शरीरगम् ॥७४ ॥
शल्लकीचिक्कणीत्वचोक्वाथस्तैलेनसंयुक्तः॥कुर्याद्वातादितंस्वस्थ-
मेकविंशतिदिनैर्नरम् ॥ ७५ ॥ अतोऽभ्यङ्गश्च कर्त्तव्यस्तैलैरपि
घृतैरपि ॥ गुग्गुलुञ्च रसोनञ्च कारयेद्विधिपूर्वकम् ॥ ७६ ॥
सोंठ, हलदी, पीपल, जीरा, अज्मोद, वच, सेंधानमक, रास्ना, मुलहटी इनको समान
भाग ले ॥ ७० ॥ बारीक चूर्ण बना घृतके संग पीनेसे इक्कीस दिनोंमें वातके रोग नष्ट होते हैं
इसमें संदेह नहीं ॥ ७१ ॥ और श्रोत्र इंद्रिय बलवान् हो जाती हैं। मेघके समान स्वर हो जाता
है इसमें संदेह नहीं और यह लेह सब प्रकारके वातरोगोंको नाशता है, सुख करनेवाला
है ॥ ७२ ॥ शतावरी, वच, सोंठ, रास्ना, छोटा शल्यकी वृक्ष, दशमूल, खरेहटी,
मदिरासे बाकी रहा द्रव्य, धनियां, गिलोय ॥ ७३ ॥ इन औषधोंका कल्क बना
घृतके संग खानेसे शरीरमें प्राप्त हुए वातका नाश होता है ॥ ७४ ॥ शालवृक्ष,
सुपारीका वृक्ष इनकी छालके क्वाथमें तैल मिला मालिस करनेसे इक्कीस दिनमें वातसे
पीडित मनुष्य स्वस्थ आनंदित होता है ॥ ७५ ॥ इसवास्ते तैलोंकरके तथा घृत-
करके मालिस करनी हित है और विधिपूर्वक लहसनमें गूगलको सिद्ध कर उसका सेवन
करना हित है ॥ ७६ ॥
अथ बलाआदिक औषध ।
भागाश्चाष्टौ बलामूलं चत्वारो दशमूलकम् ॥ क्वाथश्चतुर्गुणे
तोयेऽथवा द्रोणस्य संख्यया ॥७७॥ तत्राढकं क्षिपेत्क्षीरमाढकं
मिश्रयेद्दधि ॥ कुलत्थाढकयूषं वै चाशु पर्युषितं क्षिपेत् ॥
॥ ७८॥ तैलं तिलानां द्रोणं तु कटाहै पाचयेच्छनैः॥ जीवन्ती
जीवनीया च काकोल्यौ जीवकर्षभौ ॥ ७९ ॥ मेदे द्वे सरलं
दारु शल्लक्य कुचन्दनम्॥कालीयकं सर्जरसं मञ्जिष्ठा त्रिसुग-
न्धिकम् ॥८०॥ मांसी शैलेयकं कुष्ठं वचा कालाष्टशारिवा ॥
शतावरी चाश्वगन्धा शतपुष्पा पुनर्नवा ॥ ८१ ॥ किण्वकं च
सुरा मुस्ता तथा तालीसपत्रकम् ॥ कटुत्रयं वालुकौ च सर्व