हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( ३४७ )
तेषां निदानं वक्ष्यामि समासेन पृथक्पृथक् ॥१ ॥ विरुद्धाचि-
न्ताशनजागराच्च व्यायामतश्चातितमोऽभिषङ्गात् ॥असृग्विरे-
काद्विषमासनेन प्राणस्तथापानसमानरोधात् ॥ अध्वाश्रमे क्षी-
णबलेन्द्रियाणामसन्नतो धातुगतोऽपि वायुः॥२॥ प्राणोऽपानः
समानश्चोदानो व्यान एव च॥ एषां दोषाद्भवन्त्येते वातदोषाः
पृथक्पृथक् ॥ ३ ॥ शिरःशूलं कर्णशूलं शङ्खशूलमसृग्गदः ॥
अर्द्धशीर्षविकारश्च दिनवृद्धिसमुद्भवः ॥४॥ नासिकोपद्रवो वापि
मन्यास्तम्भो हनुग्रहः ॥ जिह्वास्तम्भस्तालुशूलं तथा च तमकं
भ्रमः ॥५॥ तन्द्राश्वासगलाद्याश्च षोडशैते शिरोगताः ॥ प्राण-
प्रकोपतो यान्ति पित्तेन सममीरिताः ॥ ६ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-वातसे उत्पन्न होनेवाले विकार मनुष्योंके ८४ होते हैं सो
संक्षेप करके जुदे २ उनके निदानोंको कहेंगे ॥ १ ॥ विरुद्ध भोजन, चिंता, जागरण,
कसरत, अत्यंत तमोगुणके अभिषंगसे, रुधिरके विरेक अर्थात् फस्तसे, विषमभोजनसे, प्राण,
अपान, समान इन वायुओंके रोकनेसे, मार्गके श्रमसे, क्षीणबल इंद्रियवाले पुरुषोंके धातुके
समीपमें वायु प्राप्त हो ॥२॥ प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान इन वायुओंके दोषसे जुदे २
वातदोष हो जाते हैं ॥ ३ ॥ शिरमें शूल हो, कानमें शूल हो, कनपटियोंमें शूल हो, रुधिरकी
पीडा हो, दिनके चढ़नेके समय आधे शिरमें पीडा हो ॥ ४ ॥ नासिकामें उपद्रव हो, मन्यास्तंभ
हनुग्रह अर्थात् ठोडी बंध रहे, जिह्वास्तंभ, तालुवामें शूल, तमकश्वास, भ्रम ॥ ५ ॥ तंद्रा,श्वास,
गलके रोग ये सोलह शिरमें प्राप्त होनेवाले वायुके रोग हैं और प्राण वायुके कोपसे पित्तके संग
कोप पा जाते हैं ॥ ६ ॥
अथ सोलह प्रकारके उदानवायुके कोप ।
हिक्का श्वासः परिश्वासः कासः शोषार्त्तिघण्टिका ॥ हल्लासो
हृदि शूलञ्च यकृद्धातादिका वमिः ॥७॥ क्षवथुर्जृम्भणं चैव तथा
वैस्वर्यपीनसः ॥ अरुचिश्च प्रतिश्याय एते प्रोक्ता उदानतः ॥
॥ ८ ॥ उदानः श्लेष्मसंयुक्तो दोषाद्धृदि प्रकुप्यति ॥ ९ ॥
हिचकी, श्वास, अत्यन्त श्वास, खांसी, शोषकी पीड़ा, गलघंटिका रोग, थुकथुकी, हृदयमें शूल
यकृत्, वात आदिकोंकी छर्दि ॥ ७ ॥ छींक आना, जँभाई आना, स्वर बिगड़ना, पीनस,
१ अत्र षट्पदवृत्तम् ।