हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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मंद अग्नि हो जावे, अनेक सुपने आवे, निद्राका नाश हो जावे शरीरमें क्षोभ होवे ये सामान्य
वातके लक्षण हैं ॥ १७ ॥
अथ आक्षेपकवायुका लक्षण तथा अपतन्त्रकवायुका लक्षण ।
मुहुराक्षेपयेद्गात्रं मेदस्तोदो बहुस्वरः ॥ स चैवाक्षेपको नाम
जातो व्यानप्रकोपतः ॥ १८ ॥ धनुर्वन्नाम्यते गात्रमाक्षिपेच्च
मुहुर्मुहुः ॥ प्रक्लिन्ननेत्रस्तब्धाक्षः कपोत इव कूजति ॥ तमाहु-
र्भिषजां श्रेष्ठा अपतन्त्रकनामतः ॥ १९ ॥
और जो वारंवार शरीर कांपे, मेदमें व्यथा हो, ज्वर बहुत हो जावे ऐसा आक्षेपकनाम-
वाला वायु होता है, यह व्यानवायुके कोपसे होता है ॥ १८ ॥ शरीर वारंवार धनुष्यकी तरह
नवे, गीले और गर्वसरीखे नेत्र रहें, कपोतकी तरह कूजे ये लक्षण हों उस वायुको वैद्यजन
“ अपतंत्रकनामवाला ” कहते हैं ॥ १९ ॥
अथ अप्रतानकवायुप्रकोप ।
मतान्तरे वदन्त्यन्ये प्रह्वप्रतानको मतः ॥
गृहीताङ्गं ततो वायुरप्रतानकः संस्मृतः ॥ २० ॥
कईक मतोंमें इस वायुको अप्रतानक कहते हैं अथवा जो आधा शरीरको बंध कर देवे
उसको “ अप्रतानक ” वायु कहते हैं ॥ २० ॥
सोऽपि कफाश्रितो वायुः संपीडयति दण्डवत् ॥ स्तम्भयत्याशु
गात्राणि सोऽपि दण्डाप्रतानकः॥२१॥हृद्वक्षोजकराङ्गुलौ गुल्फ-
सन्धौ समाश्रितः॥स्नायुं प्रतानयेद्यस्तु सोऽपि स्नायुप्रतानकः
॥२२॥ बाह्यानामथ नाडीनां प्रतानयति मारुतः ॥ कट्या-
श्रितो वा भवति सशल्यमिव कुर्वते ॥ २३ ॥ तमसाध्यं बुधाः
प्राहुस्तञ्च वातं प्रतानकम्॥ अन्धं चतुर्थमाक्षेपमभिघातसमुद्भवम्
॥२४॥ अभिघातेन यो जातो न स साध्यः प्रतानकः ॥
ऊर्ध्वं तानयते यस्तु विशोषयति गात्रकम् ॥ २५ ॥ मोहतमः
कृते वास्थिसन्धिसंशुष्कको मतः ॥
और वही वायु कफके आश्रय होके लाठीकी चोट सरीखी पीडा करता है, गात्रोंको बंध
कर देता है वह दंडप्रतानक वायु कहाता है ॥ २१ ॥ हृदय, छाती, हाथोंकी अंगुली, गुल्फ-