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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 374

( ३४२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
चूर्णं शर्करामधुसंयुक्तम् ॥ ११ ॥ अपस्मारविनाशाय भक्षणे
हितमेव च॥ उन्मादे पित्तरक्ते तु वन्ध्याया गर्भदायकम्॥१२॥
कोहला, ब्राह्मी, वच, शंखपुष्पी, सांठी,तुलसी इनके चूर्णमें खांड और शहद मिला ॥११॥
खानेसे मृगीरोग, उन्माद, रक्तपित्त इनका नाश होता है और वन्ध्याके गर्भ ठहरता है ॥१२॥
अथ दीपघृत ।
रास्नामागाधिकामूलं दशमूलं शतावरी ॥ शणत्रिवृत्तथैरण्डो
भागान्द्विपलिकान्क्षिपेत् ॥१३॥ यष्टीमधुकमृद्वीका शंखपुष्पी
शतावरी ॥ रास्ना समङ्गा शृतकं त्रिसुगन्धञ्च भीरुकम् ॥ १४॥
कुष्ठं वैतद्दीपकं च घृतं योज्यं भिषग्वरैः॥ हन्त्यपस्मारमुन्मादं
रक्तपित्तं गुदामयम् ॥ १५ ॥
रास्ना, पीपलामूल, शतावरी, शण, निशोत, अरंड ये सब आठ २ तोले लेने ॥ १३ ॥
मुलहठी, मुनक्का, शंखपुष्पी, शतावरी, रायसन, मंजीठ, दालचीनी, इलायची, तेजपात,
शतावरीका भेद ॥ १४ ॥ कूठ इनमें घृतको पकावे । यह घृत मृगी रोग, उन्माद, रक्तपित्त,
गुदाका रोग इनको नाशता है ॥ १५ ॥
अथ ब्राह्मीघृत ।
ब्राह्मीरसवचाकुष्ठशंखपुष्पीभिरेव च ॥
पचेद्घृतं पुराणं च अपस्मारं नियच्छति ॥ १६ ॥
ब्राह्मीका रस, वच, कूठ, शंखपुष्पी इनमें पुराने घृतको पकावे । यह मृगी रोगको
नाशता है ॥ १६ ॥
अथ अन्य उपाय ।
महाबलाद्यं तैलं च बस्तौ नस्ये प्रशस्यते ॥ शतावर्यादिकं
चापि सदैव च हितं भवेत् ॥ १७ ॥ चन्दनाद्यं घृतं चैव
प्रयोज्यं चात्र चोत्तमैः ॥ अपस्मारे वाप्युन्मादे वातरोगे-
ऽथवा हितम् ॥ १८ ॥
महाबलादि तैल और शतावर्यादि तैल नस्यकर्म्ममें और बस्तिकर्म्ममें सदा हित है ॥१७॥
मृगीरोग, उन्माद, वातरोग इनमें चन्दनादि घृत युक्त करना ॥ १८ ॥
अथ त्र्यूषणादि गुटिका।
त्र्यूषणं त्रिफला हिङ्गु सैन्धवं कटुका वचा ॥ नक्तमालकबी-