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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 548 में से

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पृष्ठ 382

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri

( ३५० ) हारीतसंहिता । [तृतीयस्थाने-
इनकी संधियोंके आश्रय होके जो नसोंको विस्तारित कर देता है वह स्नायुप्रतानक वायु
कहाता है ॥ २२ ॥ जो वायु बाहरकी नसोंमें विस्तारित हो जाता है अथवा कटिके आश्रय
हो जाता है और शल्य चोट लगी सरीखी पीडा हो ॥ २३ ॥ उसको बुद्धिमान् मनुष्य असाध्य
प्रतानक वात कहते हैं और चोटसे उत्पन्न होनेवाला चौथा आक्षेपक वात कहाता है ॥ २४ ॥
वह ऊपरले अंगोंमें फैलता है और शरीरमें शोष कर देता है ॥ २५ ॥ और मोह हो, तम
अर्थात् अंधेरी हो वह अस्थिसंगि इनको सुखानेवाला वायु कहाता है ।
अथ एकाङ्गवायु ।
कृच्छ्रार्द्धकर्ष भवति शुष्कतां च प्रकुप्यति ॥ २६ ॥
पृष्ठं प्रतानार्द्धं यो वै स तथैकाङ्गिको मतः ॥ २७ ॥
उससे आधा शरीरमें कष्ट रहे, खिंचा हुआ रहे और शोषका कोप हो ॥ २६ ॥ और जो
पीठको तथा आधे शरीरको बंध कर देता है वह एकांगिक वायु कहाता है ॥ २७ ॥
अथ एकांगपक्षघातवायु ।
एकांगपक्षघातश्च भवत्यन्यतमो यदि ॥
वातघ्नैरोषधैः सर्वैर्वायुः कष्टेन सिध्यति ॥ २८ ॥
और जो यदि अन्य पक्षघातसंज्ञक वायु एकओरके अंगमें प्राप्त हो जाता है वह संपूर्ण
वातनाशक औषधोंकरके कष्टसे सिद्ध होता है ॥ २८ ॥
अथ तूनी तथा प्रतितूनी वायु ।
तोदमूर्च्छा वेपनं स्याद्वेष्टता स्पर्शनाज्ञता ॥ यस्तु नश्यति
गात्राणि वायुस्तूनीतिशब्दतः ॥ २९ ॥ वेपनं तोद्वेष्टत्वं
स्पर्शनं वेत्ति यः पुनः ॥ प्रतूनयति गात्राणि प्रतितूनीति
गद्यते ॥ ३० ॥
शरीरमें पीडा हो, मूर्च्छा हो, कंपना हो, शरीर बंधा रहे, स्पर्श नहीं जाना जावे और अंगोंको
नष्ट कर देवे वह तूनीसंज्ञक वायु कहाता है ॥ २९ ॥ और शरीर कांपे, व्यथा हो,
शरीर बंध रहे और स्पर्श सह लेवे, शरीरको पीने अर्थात् पीने सरीखी पीडा हो वह प्रति-
तूनी वात कहाता है ॥ ३० ॥
अथ व्यानवायुके कोपका लक्षण ।
हृदिस्तम्भः पृष्ठस्तम्भ ऊरुस्तम्भश्च गृध्रसि ॥ पृथक्त्वेन च
कथितमये शृणुष्व कोविद् ॥ ३१ ॥ एते व्यानप्रकोपेण द्विषो-
डश प्रकीर्त्तिताः ॥ ३२ ॥

Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu