सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 386

( ३५४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
वेन ॥ सोष्णञ्च पानमिदमेव विरूक्षणं स्यान्नृणाञ्च पञ्चदिन-
कर्षकमात्रमेव ॥ ५५ ॥
रास्ना, वायविडंग, हल्दी सोंठ, कांजी, तुलसी, सेंधानमक इनको एक जगह मिला गरम
गरम पीना हित है और रूखा भोजन खाये और पांच दिनतक एक एक तोला प्रमाण इसको
खावे ॥ ५५ ॥
अथ पाचन तथा शमनका कथन ।
अतः स्यात्पाचनं सम्यग् दिनसप्तकमेव तत् ॥पाचिते चैव दोषे
च तस्मात्संशमनं ददेत्॥५६॥वक्ष्यामि ते पृष्ठिगते धमन्याः
समाश्रिते च बहुधाशमेन ॥ संस्विद्य नाशं च नयेत् समीरं
सप्ताहकं चोष्णजलेन सेकः ॥ ५७ ॥
इसके सेवनेसे वायु पक जाता है और फिर सात दिन पीछे दोष पक जावे तब संशमन
औषधको करे ॥ ५६ ॥ अब धमनी नाडीके आश्रय होके पृष्ठिस्थानमें प्राप्त हुए वायुके
इलाजको कहते हैं उस वायुको बहुत प्रकारसे शमन करके स्वेद अर्थात् पसीना दिवाके
वायुको शांत करे और सात दिनतक गरम जलसे सेके ॥ ५७ ॥
अथ सर्वांगवायुकी चिकित्सा ।
रास्नात्रिकण्टकैरण्डशतपर्वा पुनर्नवा ॥ क्वाथो वातामयं हन्ति
सर्वाङ्गगतमाशु च॥५८॥रास्नागुडूचिकादारुनागरैरण्डसंयुतः॥
क्वाथः सर्वाङ्गवातेऽपि समधातुगते हितः ॥५९॥ रास्नाश्वग-
न्धाकाशीशं वचा च कपिकच्छुकम् ॥ क्वाथस्त्वेरण्डतैलेन
पीतो हन्ति समीरणम् ॥६०॥ रास्नाधान्यकशुण्ठी च यवानी
दशमूलकम्॥क्वाथः पाचनके प्रोक्तो नरे वातविकारिणि॥६१॥
रास्नाद्यानि पाचनानि हितानि कथितानि च ॥ ६२ ॥
रास्ना, छोटी कटेहली, बडी कटेहली, गोखरू, अरंड, वच, सांठी इनका क्वाथ
बना पीनेसे वातोंके रोग दूर होते हैं और सर्वांगवात शीघ्र ही नष्ट होता है ॥ ५८ ॥ रास्ना,
गिलोय, देवदार, सोंठ, अरंड इनका क्वाथ सर्वांगवातमें और धातुगत वातमें हित है
॥ ५९ ॥ रास्ना, असगंध, हीराक्सीस, वच, कौंचके बीज इनके क्वाथको अरंडीके तेलके
संग पीनेसे वातका नाश होता है ॥ ६० ॥ रास्ना, धनियां, सोंठ, अजवायन, दशमूल
इनका क्वाथ वातविकारवाले पुरुषोंको पाचन कहा है ॥ ६१ ॥ ऐसे ये रास्ना आदिक क्वाथ
वातवालोंको हित और पाचन कहे हैं ॥ ६२ ॥