हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 380, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३४८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
अरुचि, जुकाम ये रोग उदानवायुके कोपसे होते हैं ॥ ८ ॥ यह उदान वायु कफके साथ दोष
करके हृदयमें कुपित होता है ॥ ९ ॥
अथ व्यानवायुके कोपके लक्षण ।
वक्ष्यामो व्यानको नाम मरुतस्य प्रकोपनम् ॥ वातः सर्वाङ्गको
धातुविकारं कुरुते भृशम् ॥ १० ॥ स च धातुगतो ज्ञेयस्तथा
प्रोक्तः पृथक् पृथक् ॥ त्वग्वाते रोमहर्षश्च मन्या चांसाभूरेव च ॥
॥११॥ मांसगे शोथतोदश्च मेदःस्वस्थे च कम्पता ॥ भङ्गता-
स्थिगते वाते पतनं मज्जगे भवेत्॥१२ ॥ शुक्रगे सन्धिशोथश्च
तस्मात्त्वग्वातलक्षणम्॥ एतैर्धातुगतान्वातान्साध्यासाध्यान्नि-
रोधयेत् ॥१३॥ संत्यक्तमांसमेदःस्थो वायुः सिध्यति भेषजैः॥
अन्ये कष्टेन सिध्यन्ति न सिध्यन्त्यथवा पुनः ॥ १४ ॥
अब व्याननामवाले वायुके कोपके लक्षणोंको कहते हैं, सब अंगमें रहनेवाला यह वायु अत्यन्त
धातुविकारको करता है ॥ १० ॥ सो वह धातुमें प्राप्त हुआ पृथक् २ जानना । यह वातके
त्वचा में कोप हो जानेपर रोम खड़े हों मन्यासंज्ञक नसोंका फुरणा हो॥११॥मांसमें प्राप्त हो जावे
तब शोजा हो, पीडा, मेदमें कंपना हो ॥१२॥ अस्थियोंमें प्राप्त होवे तब हाड़ टूट जावे, मज्जामें
कुपित होवे तब गिरना होवे, वीर्यमें होवे तब संधियोंमें शोजा होवे, ऐसे त्वचा आदिकोंमें
वायु प्राप्त होता है। इत्यादिक धातुओंमें प्राप्त हुए वायुओंको साध्य और असाध्योंको रोके॥१३॥
जो वायु मांससे रहित मेदमें प्राप्त होवे वह औषधोंसे सिद्ध होता है और अन्य वायु कष्टसे
सिद्ध होते हैं ॥ १४ ॥
अथ समानवायुका प्रकोप ।
लोमहर्षी भवेत्तोदो निद्रानाशोऽरुचिस्तमः॥गात्रं सूची च वि-
ध्येत भ्रमन्त्येव पिपीलिकाः ॥१५॥ रूक्षत्वं त्वयसे नेत्रे कृश-
त्वं जायते पुनः॥ गर्भरजसः शुक्रस्य नाशो भवति वेपथुः १६
मन्दाग्नित्वं च भवति स्वप्नानि च स पश्यति ॥ निद्रानाशः
क्षोभयति सामान्यं वातलक्षणम् ॥ १७ ॥
रोमहर्ष अर्थात् रोम खड़े हो जावें, शरीरमें व्यथा हो, निद्राका नाश हो, अरुचि हो,
अंधेरी हो, शरीरमें कीड़ीसी जले ॥ १५ ॥ त्वचा, नेत्र ये रूखे रहे और दुर्बल शरीर होजावे
और स्त्रीके गर्भ, रजस्वला इनका नाश हो जावे, वीर्य नष्ट हो जावे, कंपना हो ॥ १६ ॥