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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

-३. १४० ] कलासवर्णव्यवहारः [ ६७

अत्रोद्देशकः

ड्यंशः पादोऽर्धोर्धं पञ्चमषष्ठत्रिपादहृतमेकम् ।
पञ्चार्धहृतं रूपं सषष्ठमेकं सपञ्चमं रूपम् ॥१३९॥
स्वीयतृतीययुग्दलम्तो निजषष्ठयुतो द्विसप्तमो
हीननवांशमेकमपनीतदशांशकरूपमष्टमः ।
स्वेन नवांशकेन रहितश्चरणः स्वकपञ्चमोज्झितो
ब्रूहि समस्य तान् प्रिय कलासमकोत्पलमालिकाविधौ ॥१४०॥
इति भागमातृजातिः ।
इति सारसङ्ग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ कलासवर्णो नाम द्वितीयव्यवहारस्समाप्तः ॥


उदाहरणार्थ प्रश्न

दिया गया है कि भिन्न २/३, १/४, १/२ का १/२, १/५ का १/६; १ / (३/४) , १ / (५/२) ; १ १/६, १ १/५; १/२ अपने १/३ भाग
से संयुक्त है; पुनः

४. प्रकीर्णक व्यवहारः
प्रणतानन्तगुणौघं प्रणिपत्य जिनेश्वरं महावीरम् । प्रणतजगत्त्रयवरदं प्रकीर्णकं गणितमभिधास्ये॥१॥
$^१$विध्वस्तदुर्नैयध्वान्तः सिद्धः स्याद्वादशासनः । विद्यानन्दो जिनो जीयाद्वादीन्द्रो मुनिपुङ्गवः ॥२॥
इतः परं प्रकीर्णकं तृतीयव्यवहारमुदाहरिष्यामः—
भागः शेषो मूलकं शेषमूलं स्यातां जाती द्वे द्विरग्रांशमूले ।
भागाभ्यासोऽतोंऽशवर्गोऽथ मूलमिश्रं तस्माद्द्विन्नदृश्यं दशामूः ॥ ३ ॥
१ B और M में यह श्लोक छूटा हुआ है ।
४. प्रकीर्णकव्यवहार
[ भिन्नों पर विविध प्रश्न ]
स्तवनीय अनन्त गुणों से पूर्ण और नमन करते हुए तीनों लोकों के जीवों को वर
देने वाले जिनेश्वर महावीर को नमस्कार कर मैं भिन्नों पर विविध प्रश्नों का प्रतिपादन करूँगा ॥१॥
जिन्होंने दुर्नय के अंधकार का विध्वंस कर स्याद्वाद शासन को सिद्ध किया है, जो विद्यानन्द हैं,
वादियों में अद्वितीय हैं और मुनिपुंगव हैं ऐसे जिन सदा जयवंत हों । इसके पश्चात्, मैं तीसरे विषय
(भिन्नों पर विविध प्रश्न) का प्रतिपादन करूँगा ॥२॥ भिन्नों पर विविध प्रश्नों के दस प्रकार हैं; भाग,
शेष, मूल, शेषमूल, द्विरग्रशेषमूल, अंशमूल, भागाभ्यास, अंशवर्ग, मूलमिश्र और भिन्नदृश्य ॥३॥
( ३ ) 'भाग' प्रकार में वे प्रश्न होते हैं जिनमें निकाली जानेवाली कुल राशि के कुछ विशिष्ट
भिन्नीय भागों को हटाने के पश्चात् शेष भाग का संख्यात्मक मान दिया गया होता है । हटाये गये
भिन्नीय भाग में से प्रत्येक 'भाग' कहलाता है और ज्ञात शेष का संख्यात्मक मान 'दृश्य' कहलाता है ।
'शेष' प्रकार में वे प्रश्न होते हैं जिनमें निकाली जानेवाली कुल राशि के ज्ञात भिन्नीय भाग को
हटाने के पश्चात् अथवा उत्तरोत्तर शेष के कुछ ज्ञात भिन्नीय भाग हटाने के पश्चात् शेष भाग का
संख्यात्मक मान दिया गया होता है ।
'मूल' प्रकार में वे प्रश्न होते हैं जिनमें कुल राशि में से कुछ भिन्नीय भाग अथवा उस कुल
राशि के वर्गमूल का गुणक घटाने के पश्चात् शेष भाग का संख्यात्मक मान दिया गया होता है ।
'शेषमूल', 'मूल' से केवल इस बात में भिन्न है कि यह वर्गमूल पूरी राशि के स्थान में उसका
वर्गमूल होता है जो दिये गये भिन्नीय भागों को घटाने के पश्चात् शेष रूप में बचता है ।
'द्विरग्र शेषमूल' प्रकार में वे प्रश्न होते हैं जिनमें ज्ञात वस्तुओं की संख्या पहिले हटाई जाती है;
तब उत्तरोत्तर शेष के कुछ भिन्नीय भाग और तब अग्र शेष के वर्गमूल का कोई गुणक हटाया जाता है;
और अन्त में, शेष भाग का संख्यात्मक मान दिया गया होता है । प्रथम हटाई गई ज्ञात संख्या पूर्वाग्र
कहलाती है ।
'अंशमूल' प्रकार में कुल संख्या के भिन्नीय भाग के वर्गमूल के एक गुणक को हटाया जाता है
और तब शेष भाग का संख्यात्मक मान दिया गया होता है ।

-४.५ ] प्रकीर्णकव्यवहारः [ .६९
तत्र भागजातिशेषजात्योः सूत्रम्—
भागोनरूपभक्तं दृश्यं फलमत्र भागजातिविधौ । अंशोनितरूपाहतिहृतमग्रं शेषजातिविधौ ॥ ४ ॥
भागजातावुद्देशकः
दृष्टोऽष्टमं पृथिव्यां स्तम्भस्य त्र्यंशको मया तोये ।
पादांशः शैवाले कः स्तम्भः सप्त हस्ताः खे ॥ ५॥
षड्भागः पाटलीषु भ्रमरवरततस्तत्त्रिभागः कदम्बे
पादश्चूतद्रुमेषु प्रदलितकुसुमे चम्पके पञ्चमांशः ।
भिन्नों पर विविध प्रश्नों में 'भाग' और 'शेष' भिन्नों सम्बन्धी नियम -
'भाग' प्रकार ( भाग प्रकार की प्रक्रियाओं ) में, ज्ञात भिन्न से ह्रासित १ के द्वारा दी
गई राशि को भाजित कर चाहा हुआ फल प्राप्त किया जाता है । 'शेष' प्रकार की प्रक्रियाओं में, ज्ञात
भिन्नों को एक में से क्रमशः घटाने से प्राप्त राशियों के गुणनफल द्वारा दी गई राशि को भाजित कर इष्ट
फल प्राप्त किया जाता है ॥४॥
'भाग' जाति के उदाहरणार्थ प्रश्न
मेरे द्वारा एक स्तम्भ का १/८ भाग जमीन में; १/३ पानी में १/४ काई में और ७ हस्त हवा में देखा
गया । बतलाओ स्तम्भ की लम्बाई क्या है ? ॥५॥ श्रेष्ठ भ्रमरों के समूह में से १/६ पाटली वृक्ष में, १/३
कदम्ब वृक्ष में, १/४ आम्र वृक्ष में, १/५ विकसित पुष्पों वाले चम्पक वृक्ष में, ३/१० सूर्य किरणों द्वारा पूर्ण
विकसित कमल वृन्द में आनन्द ले रहे थे और एक मत्त भृङ्ग आकाश में भ्रमण कर रहा था ।'
( ४ ) 'भाग' प्रकार के सम्बन्ध में नियम बीजीय रूप से यह है : क = अ / (१ - ब) . जहाँ क अज्ञात
समुच्चय राशि है, जिसे निकालना है; अ 'दृश्य' अथवा अग्र है; और, ब दिया गया भाग अथवा दिये
'भागाभ्यास' अथवा 'भाग सम्वर्ग' प्रकार में, कुल संख्या के कुछ भिन्नीय भागों के गुणनफल
अथवा गुणनफलों को दो, दो के संचय में लेकर उन्हें कुल संख्या में से घटाने से प्राप्त शेष भाग का
संख्यात्मक मान दिया गया होता है ।
'अंशवर्ग' प्रकार में वे प्रश्न होते हैं जिनमें कुल में से भिन्नीय भाग का वर्ग ( जहां, यह भिन्नीय
भाग दी गई संख्या द्वारा बढ़ाया अथवा घटाया जाता है ) हटाने के पश्चात् शेष भाग का संख्यात्मक
मान दिया गया होता है ।
'मूलमिश्र' प्रकार में वे प्रश्न होते हैं जिनमें कुछ दी गई संख्याओं द्वारा घटाई या बढ़ाई गई कुल
संख्या के वर्गमूल में कुल के वर्गमूल को जोड़ने से प्राप्त योग का संख्यात्मक मान दिया गया होता है ।
'भिन्न दृश्य' प्रकार में कुल का भिन्नीय भाग, दूसरे भिन्नीय भाग द्वारा गुणित होकर, उसमें से
हटा दिया जाता है और शेष भाग कुल के भिन्नीय भाग के रूप में निरूपित किया जाता है । यह
विचारणीय है कि इस प्रकार में, अन्य प्रकारों की अपेक्षा शेष को कुल के भिन्नीय भाग के रूप में
रखा जाता है ।

  • Line 31 (Text): दिशा में उड़े उनके अन्तर को निज की आधी राशि द्वारा ह्रासितकर और पुनः इस परिणामी राशि की
    • Line 32 (Text): (Blank space / separator line)
    • Line 33 (Text): गये भिन्नीय भागों का योग है। यह स्पष्ट है, कि यह समीकरण क - बक = अ द्वारा प्राप्त किया जा
    • Line 34 (Text): सकता है। शेष प्रकार का नियम, बीजीय रूप से निदर्शित करने पर,
    • Line 35 (Text): अ
    • Line 36 (Text): क = --------------------------------- होता है, जहाँ ब_१, ब_२, ब_३ आदि उत्तरोत्तर शेषों के
    • Line 37 (Text): (१ - ब_१) (१ - ब_२) (१ - ब_३) X .......
  1. Final Polish:
    • Ensure all Sanskrit words are spelled exactly as in the image (e.g., मयोपद्दष्टा -> wait, is it मयोपद्दष्टा or मयोपदृष्टा? The image says मयोपद्दष्टा with a double 'द' or 'दृ'? It looks like मयोपद्दष्टा or मयोपदृष्टा. Let's look closely: `मयोपद्दष्टा

[-४. २२ ] प्रकीर्णकव्यवहारः [ ७९

फलभारनम्रकम्रे शालिक्षेत्रे शुकाः समुपविष्टाः । सहसोत्थिता मनुष्यैः सर्वे संत्रासिताः सन्तः ॥१२॥
तेषामर्धं प्राचीमाग्नेयीं प्रति जगाम षड्भागः ।
पूर्वाग्नेयीशेषः स्वदलोनः स्वार्धवर्जितो यामीम् ॥१३॥
याम्याग्नेयीशेषः स नैर्ऋतिं स्वद्विपञ्चभागोनः । यामोनैर्ऋत्यंशकपरिशेषो वारुणीमाशाम् ॥१४॥
नैर्ऋत्यपरविशेषो वायव्यां सस्वकत्रिसप्तांशः । वायव्यपरविशेषो युतस्वसप्ताष्टमः सौमीम् ॥१५॥
वायव्युत्तरयोर्युतिरैशानीं स्वत्रिभागयुगहीना । दशगुणिताष्टाविंशतिरवशिष्टा व्योम्नि कति कीराः॥१६॥
काचिद्वसन्तमासे प्रसूनफलगुच्छभारनम्रोद्याने ।
कुसुमासवरसरञ्जितशुककोकिलमधुपमधुरनिस्वननिचिते ॥१७॥
हिमकरधवले पृथुले सौधतले सान्द्ररुन्द्रमृदुतल्पे ।
फणिफणनितम्बबिम्बा कनदमलाभरणशोभाङ्गी ॥१८

७२ ] गणितसारसंग्रहः [ ४. २३-
१स्फुरदिन्द्रनीलवर्णं षट्पदवृन्दं प्रफुल्लितोद्याने । दृष्टं तस्याष्टांशोऽशोके कुटजे षडंशको लीनः ॥२३॥
कुटजाशोकविशेषः षड्गुणितो विपुलपाटलीषण्डे ।
पाटल्याशोकशेषः स्वनवांशोनो विशालसालवने ॥२४॥
पाटल्याशोकशेषो युतः स्वसप्तांशकेन मधुकवने । पञ्चांशः संदृष्टो बकुलेषूत्फुल्लमुकुलेषु ॥२५॥
तिलकेषु कुरवकेषु च सरलेष्वाम्रेषु पद्मषण्डेषु । वनकरिकपोलमूलेष्वपि सन्तस्थे स एवांशः ॥२६॥
किञ्जल्कपुञ्जपिञ्जरकञ्जवने मधुकर्रास्त्रयस्त्रिंशत् । दृष्टा भ्रमरकुलस्य प्रमाणमाचक्ष्व गणक त्वम् ॥२७॥
गोयूथस्य क्षितिभृति दलं तद्दलं शैलमूले षट् तस्यांशा विपुलविपिने पूर्वपूर्वार्धमानाः ।
संतिष्ठन्ते नगरनिकटे धेनवो दृश्यमाना द्वा

[-४, ३५ ] प्रकीर्णकव्यवहारः [ ७३

कोष्ठस्य लेभे नवमांशमेकः परेऽष्टभागादिदलान्तिमांशान् ।
शेषस्य शेषस्य पुनः पुराणा दृष्टा मया द्वादश तत्प्रमा का ॥ ३२ ॥
इति शेषजात्युद्देशकः ।
अथ मूलजातौ सूत्रम्—
मूलाधंाग्रे छिन्द्यादंशोनैकेन युक्तमूलकृतेः । दृश्यस्य पदं सपदं वर्गितमिह मूलजातौ स्वम् ॥३३॥
अत्रोद्देशकः
दृष्टोऽटव्यामुष्ट्यूथस्य पादो मूले च द्वे शैलसानौ निविष्टे ।
२ऊष्ट्रास्त्रिघ्नाः पञ्च नद्यास्तु तीरे ३किं तस्य स्यादुष्ट्रकस्य प्रमाणम् ॥ ३४ ॥
श्रुत्वा वर्षाभ्रमालापटहपटरवं शैलशृङ्गोरुरङ्गे
नाट्यं चक्रे प्रमोदप्रमुदितशिखिनां षोडशांशोऽष्टमश्च ।
त्र्यंशः शेषस्य षष्ठो वरबकुलवने पञ्च मूलानि तस्थुः
पुन्नागे पञ्च दृष्टा भण गणक गणं बर्हिणां

७४ ] गणितसारसंग्रहः [ ४. ३६-
चरति कमलषण्डे सारसानां चतुर्थो नवमचरणभागौ सप्त मूलानि चाद्रौ ।
विकचबकुलमध्ये सप्तनिघ्नाष्टमानाः कति कथय सखे त्वं पक्षिणो दक्ष साक्षात् ॥ ३६ ॥
न भागः कपिवृन्दस्य त्रीणि मूलानि पर्वते । चत्वारिंशद्वने दृष्टा वानरास्तद्गणः कियान् ॥ ३७ ॥
कलकण्ठानामर्धं सहकारतरोः प्रफुल्लशाखायाम् ।
तिलकेऽष्टादश तस्थुर्नो मूलं कथय पिकनिकरम् ॥ ३८ ॥
हंसकुलस्य दलं बकुलेऽस्थात् पञ्च पदानि तमालकुजाग्रे ।
अत्र न किंचिदपि प्रतिदृष्टं तत्प्रमिति कथय प्रिय शीघ्रम् ॥ ३९ ॥
इतिमूलजातिः ।
अथ शेषमूलजातौ सूत्रम्—
पददलवर्गयुताग्रान्मूलं सप्राकपदार्धमस्य कृतिः ।
दृश्ये मूलं प्राप्ते फलमिह भागं तु भागजातिविधिः ॥ ४० ॥
पर

-४. ४६] प्रकीर्णकव्यवहारः [ ७५
अत्रोद्देशकः
गजयूथस्य त्र्यंशः शेषपदं च त्रिसंगुणं सानौ ।
सरसि त्रिहस्तिनीभिनगो दृष्टः कतीह गजाः ॥ ४१ ॥
निर्जन्तुकप्रदेशे नानाद्रुमषण्डमण्डितोद्याने । आसीनानां यमिनां मूलं तरुमूलयोगयुक्तम् ॥ ४२ ॥
शेषस्य दशमभागो मूलं नवमोऽथ मूलमष्टांशः । मूलं सप्तममूलं षष्ठो मूलं च पञ्चमो मूलं ॥ ४३ ॥
एते भागाः काव्यप्रवचनधर्मप्रमाणनयविद्याः ।
वादच्छन्दोज्योतिषमन्त्रालङ्कारशब्दज्ञाः ॥ ४४ ॥
द्वादशतपःप्रभावा द्वादशभेदाङ्गशास्त्रकुशलधियः ।
द्वादश मुनयो दृष्टाः कियती मुनिचन्द्र यतिसमितिः ॥ ४५ ॥
मूलानि पञ्च चरणेन युतानि सानौ शेषस्य पञ्चनवमः करिणां नगाग्रे ।
मूलानि पञ्च सरसीजवने रमन्ते नद्यास्तटे षडिह ते द्विरदाः कियन्तः ॥ ४६ ॥
इति शेषमूलजातिः ।
1 B में शेषस्य पदं त्रिसंगुणं पाठ है ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
हाथियों के यूथ (झुंड) का १/३ भाग तथा शेष भाग की वर्गमूल राशि के हाथो, पर्वतीय उतार
पर देखे गये । शेष एक हाथी ३ हस्तिनियों के साथ एक सरोवर के किनारे देखा गया । बतलाओ
कितने हाथी थे ? ॥ ४१ ॥ कई प्रकार के वृक्षों के समूह द्वारा मंडित उद्यान के निर्जन्तुक प्रदेश में
कई साधु आसीन थे । उनमें से कुल के वर्गमूल की संख्या के साधु तरुमूल में बैठे हुए योगाभ्यास
कर रहे थे । शेष के १/१०, (इसको घटाकर) शेष का वर्गमूल, (इसको घटाकर) शेष के १/९, (इसको
घटाकर) शेष का १/८; (इसको घटाकर) शेष का १/७; (इसको घटाकर) शेष का वर्गमूल; (इसको
घटाकर) शेष का १/६; (इसको घटाकर) शेष का १/५; इसको घटाकर शेष के वर्गमूल द्वारा निरूपित
संख्याओं वाले वे थे जो (क्रमशः) काव्य प्रवचन, धर्म, प्रमाण नयविद्या, वाद, छन्द, ज्योतिष, मंत्र,
अलंकार और शब्द शास्त्र (व्याकरण) जानने वाले थे, तथा वे भी थे जो बारह प्रकार के तप के प्रभाव
से प्राप्त होनेवाली ऋद्धियों के धारी थे, तथा बारह प्रकार के अंग शास्त्र को कुशलता पूर्वक जानने वाले
थे । इनके अतिरिक्त अंत में १२ मुनि देखे गये । हे मुनिचंद्र ! बतलाओ कि यति समिति का संख्यात्मक
मान क्या था ? ॥ ४२-४५ ॥ हाथियों के समूह के वर्गमूल का ५ १/४ गुना भाग पर्वतीय उतार पर
क्रीड़ा कर रहा है; शेष का ५/९ भाग पर्वत के शिखर पर क्रीड़ा कर रहा है । (इसको घटाकर) शेष का
वर्गमूल प्रमाण हस्तीगण कमल के वन में रमण कर रहा है । और, शेष ६ हस्ती नदी के तीर पर हैं ।
यहाँ सब हस्ती कितने हैं ? ॥ ४६ ॥
इस प्रकार, 'शेषमूल' जाति प्रकरण समाप्त हुआ ।
"द्विरग्र शेष मूल" जाति [शेषों की संरचना करने वाली दो ज्ञात राशियों वाले 'शेषमूल' प्रकार]
सम्बन्धी नियम-
(समूह वाचक अज्ञात राशि के) वर्गमूल का गुणांक, और (शेष रहने वाली) अंतिम ज्ञात•
(स√क - बक + अ) = ० द्वारा उपर्युक्त क - बक का मान सरलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है ।
यहाँ भी 'क' अज्ञात राशि है ।

)...: Ah, (१ - ब₁) (१ - ब₂) × ...इत्यादिis UNDERअ₂! Wait, where is the fraction bar between अ₂and(१ - ब₁)...? Wait, look at the image! Is there a fraction bar under अ₂? LOOK CLOSELY! Wait, there is NO horizontal line between अ₂and(१ - ब₁)?? Wait, let me look at ( १ - ब₁) ( १ - ब₂) × ...इत्यादि: Wait! Under स, there is a horizontal line: स --------------------------------- ( १ - ब₁) ( १ - ब₂) × ...इत्यादिNow look at the second one: अ₂Wait, is there a horizontal line? NO! Wait! Look atअ₂: It says: अ₂ ( १ - ब₁) ( १ - ब₂) × ...इत्यादि + अ₁, पद संहतियाँ प्राप्त होती हैं जिनका शेषमूल के सूत्र में स औरWAIT! Isअ₂just sitting above( १ - ब₁)without a line, or is there a line? Wait, look betweenअ₂and( १ - ब₁): Wait! There IS NO LINE between अ₂and( १ - ब₁)? Wait, look at + अ₁! + अ

? No, it's २ or ३ or ५?
Wait, why would it be २ and ३ or ५ and २?
Wait, could it be:
"के १/२ वें भाग से लेकर १/५ वें भाग तक"?
Wait, let's look at:
First: १/२? But the Sanskrit says "पञ्चांशकादिदलान्तिमाः"! पञ्चांशक = 1/5, आदि = first! Dal = 1/2, antima = last!
Wait, why would a translator write: "के १/२ वें भाग से लेकर १/५ वें भाग तक"?
Or did the translator write: "के १/५ वें भाग से लेकर १/२ वें भाग तक"?
Wait, look at the first fraction:
Could the bottom digit be ५?
Let's look at the bottom digit of the FIRST fraction:
It has a vertical-ish stroke, then a loop at the bottom?
Wait! In Gujarati/Devanagari 5 is ५. In Marathi 5 is ५.
Wait, look at the SECOND fraction:
It has a horizontal bar, and below it is... wait, look at it: it has a loop at the bottom, going right: it's २!
Wait, then the first fraction is ५!
Wait,

७८ ] गणितसारसंग्रहः [ ४. ५३-
अत्रोद्देशकः
पद्मानालत्रिभागस्य जले मूलाष्टकं स्थितम् । षोडशाङ्गुलमाकाशे जलनालोदयं वद ॥ ५३ ॥
द्वित्रिभागस्य यन्मूलं नवघ्नं हस्तिनां पुनः । शेषत्रिपञ्चमांशस्य मूलं षड्भिः समाहतम् ॥ ५४ ॥
विगलद्दानधाराद्र्रगण्डमण्डलदन्तिनः । चतुर्विंशतिरादृष्टा मयाटव्यां कति द्विपाः ॥ ५५ ॥
क्रोडौघार्धचतुःपदानि विपिनं शार्दूलविक्रीडितं प्रापुः शेषदशांशमूलयुगलं शैलै चतुस्ताडितम् ।
शेषार्धस्य पदं त्रिवर्गगुणितं वप्रं वराहा वने दृष्टाः सप्तगुणाष्टकप्रमितयस्तेषां प्रमाणं वद ॥ ५६ ॥
इत्यंशमूलजातिः ।
अथ भागसंवर्गजातौ सूत्रम्—
स्वांशाप्रहरादूनाच्चतुर्गुणाग्रेण तद्धरेण हतात् । मूलं योज्यं त्याज्यं तच्छेदे तद्दलं वित्तम् ॥ ५७ ॥
१ B में 'वारार्द्र' पाठ है ।
२ इस श्लोक के पश्चात् सभी हस्तलिपियों में निम्नलिखित श्लोक है जो केवल ५७ वें श्लोक का
व्याख्यानुवाद है—
अन्यच्च—
चतुर्हतदृष्टे नोनाद्भागाहर्त्यशहृतहारात् । तच्छेदेन हतान्मूलं योज्यं त्याज्यं तच्छेदे तदर्धंवित्तम् ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कमल की नाल के त्रिभाग के वर्गमूल का आठगुना भाग पानी के भीतर है और १६ अंगुल
पानी के ऊपर वायु में है । बतलाओ कि तली से पानी की ऊँचाई कितनी है तथा कमल नाल की
लम्बाई क्या है ? ॥५३॥ हाथियों के झुण्ड में से, उनकी संख्या के २/३ भाग के वर्गमूल का ९ गुना
प्रमाण, और शेषभाग के ३/५ भाग के वर्गमूल का ६ गुना प्रमाण; और, अंत में शेष २४ हाथी वन में ऐसे
देखे गये जिनके चौड़े गण्ड मण्डल से मद झर रहा था । बतलाओ कुल कितने हाथी हैं ? ॥५४-५५॥
वराहों के झुण्ड के अर्द्ध अंश के वर्गमूल की चौगुनी राशि जंगल में गई जहाँ शेर क्रीड़ा कर रहे थे । शेष
झुंड के दसवें भाग के वर्गमूल की अठगुनी राशि पर्वत पर गईं । शेष के अर्द्धभाग के वर्गमूल की ९ गुनी
राशि नदी के किनारे गई । और अन्त में ५६ वराह वन में देखे गये । बताओ कि कुल वराह कितने थे ? ॥५६॥
इस प्रकार, 'अंशमूल' जाति प्रकरण समाप्त हुआ ।
'भाग संवर्ग' जाति सम्बन्धी नियम—
(अज्ञात समूह वाचक राशि के विशिष्ट मिश्र भिन्नीय भाग के सरलीकृत) हर को स्व
सम्बन्धित (सरलीकृत) अंश द्वारा विभाजित करने से प्राप्त फल में से दिये गये ज्ञात भाग की
चौगुनी राशि घटाओ । तब इस अंतर फल को उसी (ऊपर वर्ते हुए सरलीकृत) हर द्वारा गुणित करो ।
इस गुणनफल के वर्गमूल को वर्ते हुए उसी हर में जोड़ो और फिर उसी में से घटाओ । तब योगफल
अथवा अंतर फल में से किसी एक की अर्द्ध राशि, इष्ट (अज्ञात समूह वाचक) राशि होती है । ॥५७॥
(५६) “शार्दूल विक्रीडित" का अर्थ शेरों की क्रीड़ा होता है । इसके सिवाय यह नाम उस
छन्द का भी है जिसमें कि यह श्लोक संरचित हुआ है ।
नफ _____ / नफ \ नफ
—— ± √ ( —— - ४अ ) ——
(५७) बीजीय रूप से कथन करने पर, क = मप \ मप / मप होता है । क की
——————————————————————
२

Here is the complete line-by-line transcription of the page in pure Devanagari Markdown:

-४. ६१ ] प्रकीर्णकव्यवहारः [ ७९
अत्रोद्देशकः
अष्टमं षोडशांशाघ्नं शालिराशेः कृषीवलः । चतुर्विंशतिवाहांश्च लेभे राशिः कियान् वद ॥ ५८ ॥
शिखिनां षोडशभागः स्वगुणश्रुते तमालषण्डेऽस्थात् ।
शेषनवांशः स्वहतरचतुरप्रदशापि कति ते स्युः ॥ ५९ ॥
जले त्रिंशदंशाहतो द्वादशांशः स्थितः शेषविंशो हतः षोडशेन ।
त्रिन्निघ्नेन पङ्के करा विंशतिः खे सखे स्तम्भदैर्घ्यस्य मानं वद त्वम् ॥ ६० ॥
इति भागसंवर्गजातिः ।
अथोनाधिकांशवर्गजातौ सूत्रम्—
स्वांशकभक्तह्रार्धं न्यूनयुगाधिकोनितं च तद्वर्गात् ।
न्यूनाधिकवर्गोत्रान्मूलं स्वर्णं फलं पर्देऽशाहतम् ॥ ६१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न

८० ] गणितसारसंग्रहः [ ४. ६२-
१हीनालाप उदाहरणम्
महिषीणामष्टांशो व्येको वर्गीकृतो वने रमते । पञ्चदशाद्रौ दृष्टास्तृणं चरन्त्यः कियन्त्यस्ताः ॥६२॥
अनेकपानां दशमो द्विवर्जितः स्वसंगुणः क्रीडति सल्लकीवने ।
चरन्ति षड्वर्गमिता गजा गिरौ कियन्त एतेऽत्र भवन्ति दन्तिनः ॥ ६३ ॥
२अधिकालाप उदाहरणम्
जम्बूवृक्षे पञ्चदशांशो द्विकयुक्तः स्वेनाभ्यस्तः केकिकुलस्य द्विकृतिघ्नाः ।
पञ्चाप्यन्ये मत्तमयूराः सहकारे रंरम्यन्ते मित्र वदैषां परिमाणम् ॥ ६४ ॥
इत्यूनाधिकांशवर्गजातिः ॥
अथ मूलमिश्रजातौ सूत्रम्—
मिश्रकृतिरूनयुक्ता व्यधिका च द्विगुणमिश्रसंभक्ता ।
वर्गीकृता फलं स्यात्करणमिदं मूलमिश्रविधौ ॥ ६५ ॥
१ M में 'हीन' छूट गया है । २ M में यह तथा अनुगामी श्लोक छूट गये हैं ।
हीनालाप प्रकार के उदाहरण
कुल झुंड के १/८ वें भाग के पूर्ण वर्ग से एक कम महिष (भैंसा) राशि वन में क्रीड़ा कर रही है ।
शेष १५, पर्वत पर घास चरते हुए दिखाई दे रहे हैं । बतलाओ कुल कितने भैंसे हैं ? ॥६२॥ कुल
झुंड के १/१० वें भाग से दो कम प्रमाण, उसी प्रमाण द्वारा गुणित होने से लब्ध हस्ति राशि सल्लकी
वन में क्रीड़ा कर रही है । शेष हाथी जो संख्या में ६ की वर्गराशि प्रमाण हैं, पर्वत पर विचर रहे हैं ।
बतलाओ वे कुल कितने हैं ? ॥६३॥
अधिकालाप प्रकार का उदाहरण
कुल झुंड के १/१५ भाग से २ अधिक राशि को स्व द्वारा गुणित करने से प्राप्त राशि प्रमाण
मयूर जम्बू वृक्ष पर खेल रहे हैं । शेष गर्वीले २² × ५ मयूर आम के वृक्ष पर खेल रहे हैं । हे मित्र !
उस झुंड के कुल मयूरों की संख्या बतलाओ ? ॥ ६४ ॥
इस प्रकार ऊनाधिक 'अंश वर्ग' जाति प्रकरण समाप्त हुआ ।
'मूलमिश्र' जाति सम्बन्धी नियम—
( विशिष्ट अज्ञात राशियों के वर्गमूलों के ) मिश्रित ( ज्ञात ) योग के वर्ग में ( दी गई )
ऋणात्मक राशि जोड़ दी जाती है, अथवा दी गई धनात्मक राशि उसमें से घटा दी जाती है । परिणामी
राशि को उपर्युक्त मिश्रित योग की दुगुनी राशि द्वारा विभाजित करते हैं । इसे वर्गित करने पर इष्ट
अज्ञात समूह की अर्घा ( value ) प्राप्त होती है । यही, 'मूलमिश्र' प्रकार के प्रश्नों का साधन करने
का नियम है ॥ ६५ ॥
( ६४ ) इस गाथा में 'मत्तमयूर' शब्द का अर्थ 'गर्वीला मयूर' होता है । यह इस छन्द का भी
नाम है जिसमें यह गाथा संरचित हुई है ।
( ६५ ) बीजीय रूप से, क = { (म² ± द) / २ म }² है यह क की अर्हा समीकार √क + √(क ∓ द)
= म द्वारा सरलता से प्राप्त हो सकती है । यहाँ 'म', नियम में उल्लिखित ज्ञात मिश्रित योग है ।

-४. ७० ] प्रकीर्णकव्यवहारः [ ८१
हीनालाप उद्देशकः
मूलं कपोतवृन्दस्य द्वादशोनस्य चापि यत् । तयोर्योगे कपोताः षड् दृष्टास्तन्निकरः कियान् ॥६६॥
पारावतीयसंघे चतुर्थनोनेऽपि तत्र यन्मूलम् । तद्द्वययोगः षोडश तद्वृन्दे कति विहङ्गाः स्युः ॥६७॥
अधिकालाप उद्देशकः
राजहंसनिकरस्य यत्पदं साष्टषष्टिसहितस्य चैतयोः ।
संयुतिर्द्विकविहीनषट्कृतिस्तद्गणे कति मरालका वद ॥ ६८ ॥
इति मूलमिश्रजातिः ।
अथ भिन्नदृश्यजातौ सूत्रम्—
दृश्यांशोने रूपे भागाभ्यासेन भाजिते तत्र । यल्लब्धं तत्सारं प्रजायते भिन्नदृश्यविधौ ॥ ६९ ॥
अत्रोद्देशकः
सिकतायामष्टांशः संदृष्टोऽष्टादशांशसंगुणितः । स्तम्भस्यार्धं दृष्टं स्तम्भायामः कियान् कथय ॥७०॥
१ B में 'योगः', पाठ है । २ B, M और K में 'गगने' पाठ है ।
हीनालाप के उदाहरणार्थ प्रश्न
कपोतों की कुल संख्या के वर्गमूल में १२ द्वारा ह्रासित कपोतों की कुल संख्या के वर्गमूल को
जोड़ने पर ( ठीक फल ) ६ कबूतर प्रमाण देखने में आता है । उस वृन्द के कपोतों की कुल संख्या
क्या है ? ॥ ६६ ॥ कपोतों के कुल समूह का वर्गमूल, तथा ४ के घन द्वारा ह्रासित कपोतों की कुल
संख्या का वर्गमूल निकालकर इन ( दोनों राशियों ) का योग १६ प्राप्त होता है । बतलाओ समूह में
कुल कितने विहंग हैं ? ॥ ६७ ॥
अधिकालाप का उदाहरणार्थ प्रश्न
राजहंसों के समूह के संख्यात्मक मान का वर्गमूल तथा ६८ अधिक उसी समूह की संख्या का
वर्गमूल ( निकालने से प्राप्त ) इन ( दोनों राशियों ) का योग ६² - २ होता है । बतलाओ उस समूह
में कितने हंस हैं ? ॥ ६८ ॥
इस प्रकार 'मूल मिश्र' जाति प्रकरण समाप्त हुआ ।
'भिन्न दृश्य' जाति सम्बन्धी नियम—
जब एक को ( अज्ञात राशियों से सम्बन्धित दी गईं ) भिन्नीय शेष राशि द्वारा ह्रासित कर
( सम्बन्धित विशिष्ट ) भिन्नीय भागों के गुणन फल द्वारा भाजित करते हैं, तब प्राप्त फल ( भिन्नों पर
प्रश्नों के ) 'भिन्न दृश्य' प्रकार का साधन करने में, इष्ट उत्तर होता है ॥ ६९ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी स्तम्भ का १/८ भाग, उसो स्तम्भ के १/१८ भाग द्वारा गुणित होता है । इससे प्राप्त भाग
प्रमाण रेत में गढ़ा हुआ पाया गया । उस स्तम्भ का १/२ भाग ऊपर दृष्टिगोचर हुआ । बतलाओ कि
स्तम्भ की ( उदग्र vertical ) लम्बाई क्या है ? ॥ ७० ॥ कुल हाथियों के झुंड के २/३ वें भाग
( ६९ ) बीजीय रूप से, क = ( १ - र/य ) ÷ मप/नफ है । यह, समीकरण क - म/न क × प/फ क -
ग० सा० सं०-११

प्रकीर्णक व्यवहार एवं त्रैराशिक व्यवहार (Proportion & Ratios)

८२ ] गणितसारसंग्रहः ४. ७१- ]
द्विभक्तनवमांशकप्रहतसप्तविंशांशकः प्रमोदमवतिष्ठते करिकुलस्य पृथ्वीतले ।
विनीलजलदाकृतिर्विहरति त्रिभागो नगे वद त्वमधुना सखे करिकुलप्रमाणं मम ॥ ७१ ॥
साधूत्कृतेर्निवसति षोडशांशकस्त्रिभाजितः स्वकगुणितो वनान्तरे ।
पादो गिरौ मम कथयाशु तन्मितिं प्रोत्तीर्णवान् जलधिसमं प्रकीर्णकम् ॥ ७२ ॥
इति भिन्नदृश्यजातिः ॥
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ प्रकीर्णको नाम तृतीयव्यवहारः समाप्तः ॥
को उसी झुंड के १/९ वें भाग से गुणित करने तथा २ द्वारा विभाजित करने से प्राप्त फल प्रमाण के
हाथी मैदान में प्रसन्न दशा में तिष्ठे हैं । शेष ( बचा हुआ ) १/३ भाग झुंड जो बादलों के समान अत्यन्त
काले हाथियों का है, पर्वत पर क्रीड़ा कर रहा है । हे मित्र ! बतलाओ कि हाथियों के झुंड का
संख्यात्मक मान क्या है ? ॥ ७१ ॥ साधुओं के समूह का १/१६ वां भाग ३ द्वारा विभाजित करने के
पश्चात् स्व द्वारा गुणित ( अर्थात् १/१६ ÷ ३ द्वारा गुणित ) करने से प्राप्त भाग प्रमाण वन के अन्तः भाग
में रह रहा है; उस समूह का ( बचा रहने वाला ) १/४ भाग पर्वत पर रह रहा है । हे जलधि सम
प्रकीर्णक के प्रोत्तीर्णवान् ! मुझे शीघ्रही साधुओं के समूह का संख्यात्मक मान बतलाओ । ॥७२॥
इस प्रकार, 'भिन्न दृश्य' जाति प्रकरण समाप्त हुआ ।
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणित शास्त्र में 'प्रकीर्णक' नामक तृतीय
व्यवहार समाप्त हुआ ।

  • र/य क = ० से स्पष्ट है ।
    (७१) 'पृथ्वी' शब्द जो इस गाथा में आया है, उसका अर्थ पृथ्वी है तथा यह उस छन्द का
    नाम भी है जिसमें यह गाथा संरचित हुई है ।

५. त्रैराशिकव्यवहारः
त्रिलोकबन्धवे तस्मै केवलज्ञानभानवे । नमः श्रीवर्धमानाय निर्धूताखिलकर्मणे ॥ १ ॥
इतः परं त्रैराशिकं चतुर्थव्यवहारमुदाहरिष्यामः ।
तत्र करणसूत्रं यथा—
त्रैराशिकेऽत्र सारं फलमिच्छासंगुणं प्रमाणाप्तम् ।
इच्छाप्रमयोः साम्ये विपरीतेयं क्रिया व्यस्ते ॥ २ ॥
पूर्वार्धोद्देशकः
दिवसैस्त्रिभिः सपादैर्योजनषट्कं चतुर्थभागोनम् । गच्छति यः पुरुषोऽसौ दिनयुतवर्षेण किं कथय ॥३॥
व्यर्धाष्टाभिरहोभिः क्रोशाष्टांशं स्वपञ्चमं याति ।
पङ्गुः सपञ्चभागैर्वर्षैस्त्रिभिरत्र किं ब्रूहि ॥ ४ ॥
अङ्गुलचतुर्थभागं प्रयाति कीटो दिनाष्टभागेन । मेरोर्मूलाच्छिखरं कतिभिरहोभिः समाप्नोति ॥५॥
१ P, K और M में स्व के लिये स पाठ है ।
५. त्रैराशिकव्यवहार
तीनों लोकों के बन्धु तथा सूर्य के समान केवल ज्ञान के धारी श्री वर्द्धमान को नमस्कार है
जिन्होंने समस्त कर्म ( मल ) को निर्धूत कर दिया है । ॥१॥
इसके पश्चात्, हम त्रैराशिक नामक चतुर्थ व्यवहार का प्रतिपादन करेंगे ।
त्रैराशिक सम्बन्धी नियम—
यहाँ त्रैराशिक नियम में, फल को इच्छा द्वारा गुणित कर प्रमाण द्वारा विभाजित करने से
इष्ट उत्तर प्राप्त होता है, जब कि इच्छा और प्रमाण समान ( अनुक्रम direct अनुपात में ) होते
हैं । जब यह अनुपात प्रतिलोम ( inverse ) होता है तब यह गुणन तथा भाग की क्रिया विपरीत हो
जाती है ( ताकि भाग की जगह गुणन हो और गुणन के स्थान में भाग हो ) । ॥२॥
पूर्वार्ध, अनुक्रम त्रैराशिक पर उदाहरणार्थ प्रश्न
वह मनुष्य जो ३ १/४ दिन में ५ ३/४ योजन जाता है, १ वर्ष और १ दिन में कितनी दूर जाता है ?
॥३॥ एक लंगड़ा मनुष्य ७ १/२ दिन में एक क्रोश का १/८ तथा उसका १/५ भाग चलता है । बतलाओ वह
३ १/५ वर्षों में कितनी दूरी तय करता है ? ॥४॥ एक कीड़ा १/८ दिन में १/४ अंगुल चलता है । बतलाओ कि
वह मेरुपर्वत की तली से उसके शिखर पर कब पहुँचेगा ? ॥५॥ वह मनुष्य जो ३ १/२ दिन में १ १/४ कार्षा-
( २ ) प्रमाण और फल के द्वारा अर्घ ( rate ) प्राप्त होती है । फल, इष्ट उत्तर के समान
राशि होती है और प्रमाण, इच्छा के समान होता है । 'इच्छा' वह राशि है जिसके विषय में, किसी अर्घ
( दर ) से, कोई वस्तु निकालना होती है । जैसे कि गाथा ३ के प्रश्न में ३ १/४ दिन प्रमाण है, ५ ३/४ योजन
फल है, और १ वर्ष १ दिन इच्छा है ।
( ५ ) मेरु पर्वत की ऊँचाई ९९,००० योजन अथवा ७६,०३२,०००,००० अंगुल मानी जाती है ।

८४ ] गणितसारसंग्रहः [ ५. ६-

कार्षापणं सपादं निर्विशति त्रिभिरहोभिरर्धयुतैः । यो ना पुराणशतकं सपणं कालेन केनासौ ॥६॥

कृष्णागुरुसत्खण्डं द्वादशहस्तायतं त्रिविस्तारम् । क्षयमेत्यङ्गुलमहः क्षयकालः कोऽस्य वृत्तस्य ॥७॥

स्वर्णैर्दशभिः सार्धैर्द्रोणाढककुडुबमिश्रितः क्रीतः । वरराजमाषवाहः किं हेमशतेन सार्धेन ॥ ८ ॥

सार्धैस्त्रिभिः पुराणैः कुङ्कुमपल मष्टभागसंयुक्तम् । संप्राप्यं यत्र स्यात् पुराणशतकेन किं तत्र ॥ ९ ॥

सार्धार्द्रक सप्रपलैश्चतुर्दशार्धोनिताः पण लब्धाः । द्वात्रिंशदार्द्रकपलैः सपञ्चमैः किं सखे ब्रूहि ॥१०॥

कार्षापणैश्चतुर्भिः पञ्चाशायुतैः पलानि रजतस्य । षोडश सार्धानि नरो लभते किं कर्षनियुतेन ॥११॥

कर्पूरस्याष्टपलैस्त्र्यंशोनैर्नात्र पञ्च दीनारान् । भागांशकलायुक्तान् लभते किं पलसहस्रेण ॥ १२ ॥

सार्धैस्त्रिभिः पणैरिह घृतस्य पलपञ्चकं सपञ्चांशम् । क्रीणाति यो नरोऽयं किं सार्धमकर्षशतकेना ॥१३॥

सार्धैः पञ्चपुराणैः षोडश सदलानि वस्त्रयुगलानि । लब्धानि सैकषष्ट्या कर्षाणां किं सखे कथय ॥१४॥

वापी समचतुरश्रा सलिलवियुक्ताष्टहस्तघनमाना । शैलस्तस्यास्तीरे संमुत्थितः शिखरतस्तस्य ॥१५॥

वृत्ताङ्गुलविष्कम्भा जलधारा स्फटिकनिर्मला पतिता ।

वाप्यन्तरजलपूर्णा नगोच्छ्रितिः का च जलसंख्या ॥ १६ ॥

१ B में सत्कृष्णागुरुखण्डं पाठ है । २ M और B में लभ्याः पाठ है । ३ B में समुत्थिता शि पाठ है ।

पण उपयोग में लाता है वह १ पण सहित १०० पुराण कितने दिन में खर्च करेगा ।॥६॥ १२ हाथ

लम्बे ( आयत ) तथा ३ हाथ व्यास ( विस्तार ) वाले कृष्णागुरु का सत्खंड ( अच्छा टुकड़ा ) एक दिन

में एक घन अंगुल के अर्घ ( rate ) से क्षय होता है । बतलाओ कुल बेलनाकार टुकड़े को क्षय

होने में कितना समय लगेगा ? ॥७॥ १० १/२ स्वर्ण में श्रेष्ठ काले चने का १ वाह, १ द्रोण, १ आढक और

१ कुडव खरीदे जाते हैं । बतलाओ १०० १/२ स्वर्ण में कितना कितना प्रमाण खरीदा जा सकेगा ? ॥८॥

यदि ३ १/२ पुराणों के द्वारा १ १/८ पल कुङ्कुम प्राप्त हो सकता हो तो १०० पुराणों में कितना प्राप्त हो सकेगा ?

॥९॥ ७ १/२ पल 'आर्द्रक' के द्वारा १३ १/२ पण प्राप्त किये गये । हे मित्र ! ३२ २/५ पल आर्द्रक में क्या प्राप्त

होगा ? ॥१०॥ ४ ३/४ कार्षापण में एक मनुष्य १६ १/२ पल रजत प्राप्त करता है तो उसे १००,००० कर्ष में

कितनी रजत प्राप्त होगी ? ॥११॥ ७ २/३ पल कर्पूर के द्वारा एक मनुष्य ५ दीनार तथा १ भाग, १ अंश

और १ कला प्राप्त करता है । बतलाओ कि उसे १००० पल के द्वारा क्या प्राप्त होगा ? ॥१२॥ वह

मनुष्य जो ३ १/२ पण में ५ ३/५ पल घी प्राप्त करता हो तो वह १०० १/२ कर्ष में कितना प्राप्त करेगा ? ॥१३॥ ५ १/२

पुराण के द्वारा एक मनुष्य १६ १/२ युगल वस्त्र प्राप्त करता है । हे मित्र ! ६१ कर्ष में उसे कितने प्राप्त होंगे ?

जल रहित एक वर्गाकार कूप ५१२ घन हस्त है । उसके तीर पर एक पहाड़ी है । उसके

शिखर से स्फटिक की भाँति निर्मल जल धारा जिसके वर्त्तुल छेद ( circular section ) का व्यास

१ अंगुल है, तली में गिरती है और कूप पानी से पूरी तरह भर जाता है । पहाड़ी की ऊँचाई क्या है

तथा पानी का माप ( संख्यात्मक मान में ) क्या है ? ॥१५-१६॥ किसी राजा ने संक्रांति के अवसर पर

( ७ ) यहाँ क्रिया में दिये गये व्यास से रंभ ( बेलन ) के अनुप्रस्थ छेद ( cross-section )

का क्षेत्रफल शत मान लिया जाता है । वृत्त का क्षेत्रफल अनुमानतः व्यास के वर्ग को ४ द्वारा भाजित

कर और ३ द्वारा गुणित करने से प्राप्त राशि मान लिया जाता है ।

कृष्णागुरु एक प्रकार की सुगन्धित लकड़ी है जिसे सुगन्ध के लिए अग्नि में जलाते हैं ।

(१५-१६) इस प्रश्न में पानी की धारा की लम्बाई पर्वत की ऊँचाई के बराबर है, जिससे ज्योंही

वह पर्वत की तली में पहुँचती है, त्योंही वह शिखर से बहना बंद हुई मान ली जाती है । वाहों में

-५. २० ] त्रैराशिकव्यवहारः [ ८५
मुद्गद्रोणयुगं नवाज्यकुडुबान् षट् तण्डुलद्रोणका-
नष्टौ वस्त्रयुगानि वत्ससहिता गाष्षट् सुवर्णत्रयम् ।
संक्रान्तौ ददता नराधिपतिना षड्भ्यो द्विजेभ्यः सखे
षट्त्रिंशत्त्रिशतेभ्य आशु वद किं तद्दत्तमुद्गादिकम् ॥ १७ ॥
इति त्रैराशिकः ।
व्यस्तत्रैराशिके तुरीयपादस्योद्देशकः
कल्याणकनकनवतेः कियन्ति नववर्णकानि कनकानि ।
साष्टांशकदशवर्णकसगुञ्जहेम्नां शतस्यापि ॥ १८ ॥
व्यासेन दैर्घ्येण च षट्कराणां चीनाम्बराणां त्रिशतानि तानि ।
त्रिपञ्चहस्तानि कियन्ति सन्ति व्यस्तानुपातक्रमविद्वद त्वम् ॥ १९ ॥
इति व्यस्तत्रैराशिकः ।
व्यस्तपञ्चराशिक उद्देशकः
पञ्चनवहस्तविस्तृतदैर्ध्यायां चीनवस्त्रसप्तत्याम् । द्वित्रिकरव्यासायति तच्छ्रुतवस्त्राणि कति कथय ॥२०॥
१ इस श्लोक के स्थान में B और K में निम्न

८६ ] गणितसारसंग्रहः [ ५. २१-
व्यस्तसप्तराशिक उद्देशकः
व्यासायामोदयतो बहुमाणिक्ये चतुर्नवाष्टकरे ।
द्विषडेकहस्तमितयः प्रतिमाः कति कथय तीर्थकृताम् ॥ २१ ॥
व्यस्तनवराशिक उद्देशकः
विस्तारदैर्घ्योदयतः करस्य षट्त्रिंशदष्टप्रमिता नवार्घा ।
शिला तया तु द्विषडेकमानास्ताः पञ्चकार्घाः कति चैत्ययोग्याः ॥ २२ ॥
इति व्यस्तपञ्चसप्तनवराशिकाः ।
गतिनिवृत्तौ सूत्रम् —
निजनिजकालोद्गतयोर्गमननिवृत्त्योर्विशेषणाज्जाताम् ।
दिनशुद्धगतिं न्यस्य त्रैराशिकविधिमतः कुर्यात् ॥ २३ ॥
अत्रोद्देशकः
क्रोशस्य पञ्चभागं नौर्याति दिनत्रिसप्तभागेन । वोधौ¹ वाताविद्धा प्रत्येति क्रोशनवमांशम् ॥ २४ ॥
कालेन केन गच्छेत् त्रिपञ्चभागोनयोजनशतं सा ।
संख्याब्धिसमुत्तरणे बाहुबलिंस्त्वं समाचक्ष्व ॥ २५ ॥
१ B और K में तस्मिन्काले वार्धौ, पाठ है ।
व्यस्त सप्तराशिक पर उदाहरणार्थ प्रश्न
बतलाओ कि ४ हस्त चौड़े, ९ हस्त लम्बे, ८ हस्त ऊंचे बड़े मणि में से २ हस्त चौड़ी ६
हस्त लम्बी तथा १ हस्त ऊँची तीर्थंकरों की कितनी प्रतिमाएँ बन सकेंगी ? ॥२१॥
व्यस्त नव राशिक पर उदाहरणार्थ प्रश्न
जिसकी कीमत ९ है ऐसी ६ हस्त चौड़ी ३० हस्त लम्बी तथा ८ हस्त ऊँची एक शिला दी
गई है। बतलाओ कि जिन मंदिर बनवाने के लिये इस शिला में से, जिसकी कीमत ५ है ऐसी २
हस्त चौड़ी ६ हस्त लम्बी तथा १ हस्त ऊँची कितनी शिलायें प्राप्त हो सकेंगी ? ॥२२॥
इस प्रकार व्यस्त पंचराशिक, सप्तराशिक और नवराशिक प्रकरण समाप्त हुआ।
गति निवृत्ति सम्बन्धी नियम—
दिन की शुद्ध गति को लिखो जो अग्र तथा पश्च ( आगे तथा पीछे की ओर होने वाली )
गतियों के दिये गये अर्घों ( rates ) के अन्तर से प्राप्त होती है, जबकि इन अर्घों में से प्रत्येक को
प्रथम उनके विशिष्ट समयों द्वारा विभाजित कर लिया जाता है। और तब, इस शुद्ध दैनिक गति के
सम्बन्ध में त्रैराशिक नियम की क्रिया करो।
उदाहरणार्थ प्रश्न
३/७ दिन में, एक जहाज समुद्र में १/५ क्रोश जाती है; उसी समय वह पवन के विरोध से १/९
क्रोश पीछे हट जाती है। हे संख्या समुद्र को पार करने के अर्थ बाहुबल धारी ! बतलाओ कि वह
जहाज ९९ २/५ योजन कितने समय में जावेगी ? ॥२४-२५॥ एक मनुष्य जो ३½ दिनों में १४½ स्वर्ण