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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अर्जुनकी जिज्ञासा, गुणातीत कैसे होता है ?--
उसी तोषसे पूछता अर्जुन । दीखते उसके क्या लक्षण ।
जिसमें बसता है ऐसा ज्ञान । कह तू श्रीहरि ॥ २० ॥
उसका होता कैसा आचरण । करता कैसे गुण-निस्तरण ।
कृपाका तू नैहर श्रीकृष्ण । यह कह कृपाकर ॥ २१ ॥
अर्जुनका सुन यह प्रश्न । षड्गुणैश्वर्य-युत श्रीकृष्ण ।
उत्तर देता है कृपा-पूर्ण । सुनिये अब ॥ २२ ॥
विचित्र है तेरी यह बात । पूछता तू प्रश्न विसंगत ।
यह सत्य कैसे असत् पार्थ । ऐसा यह प्रश्न ॥ २३ ॥
जिसका नाम गुणातीत । नहीं होता गुण-संयुत ।
होता भी यदि गुण-युत । मुक्त रहता वह ॥ २४ ॥
कृष्ण प्रश्नका वास्तविक रूप समझाता है --
किंतु गुणमें है उलझता । तब गुणाधीन वह होता ।
अथवा गुण-मुक्त रहता । जानना कैसे ॥ २५ ॥
ऐसा है यदि तेरा प्रश्न । पूछ तू सुखसे अर्जुन ।
करता हूं समाधान । तेरे संदेहका ॥ २६ ॥
भगवान् उवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥
गुणोंके कल्लोलमें वह निर्लिप्त रहता है-
जब रजोगुणका मद । देहमें लाता कर्म साध ।
प्रवृत्ति लेती है उसे बांध । कर्मांकुरसे ॥ २७ ॥
श्री भगवानने कहा
प्रकाश मोह उद्योग गुण-कार्य स्वभाविक ।
पानेसे न करे खेद न धरे चाह लोपसे ॥ २२ ॥
(71) ५६१ गुण-निस्तारयोग

तब कर्म-जन्य अभिमान । नहीं आता उसमें अर्जुन ।
या कर्म रह जानेसे मन । खिन्न नहीं होता ॥ २८ ॥
या सत्व होता है जब अधिक । इंद्रियां होती हैं ज्ञान प्रकाशक ।
तब न होता सु-विधाका तोष । या अविधाका खेद ॥ २९ ॥
अथवा बढ़ता है जब तम । तब न भासता मोह या भ्रम ।
या नहीं होता अज्ञानका श्रम । या न करे स्वीकार ॥ ३० ॥
आता जब मोहका अवसर । नहीं चाहता ज्ञान धनुर्धर ।
या ज्ञानसे कर्म-स्वीकार कर । न होता दुःखी ॥ ३१ ॥
प्रातः माध्यान्ह सायंकाल । गणना करके त्रिकाल ।
न तपता सूर्य निर्मल । वैसे वह रहता ॥ ३२ ॥
उसको भिन्न क्या प्रकाश । ज्ञानसे मिलाता है शेष ।
नहीं सुखाती अनावर्षा । जैसे सागरको ॥ ३३ ॥
या करनेसे कर्म-प्रवर्तन । नहीं होगा कर्मका अभिमान ।
कहो कहींसे होगा क्या कंपन । हिमालयको ॥ ३४ ॥
होनेसे मोहका आगमन । भूल जायेगा क्या वह ज्ञान ।
घामसे जलेगा क्या अर्जुन । प्रलयाग्नि कभी ॥ ३५ ॥
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३ ॥
गुणोंके जालमें निर्लिप्त और निष्कंप रहता है—
गुण और गुणका कार्य । आप है पूर्ण धनंजय ।
तभी है एकेकका कार्य । न डिगाता उसे ॥ ३६ ॥
करके ऐसी प्रतीति । देहमें मैने की वसति ।
जैसे राहमें कोई पंथी । मान लेके ॥ ३७ ॥
रहे जैसे उदासीन गुणोंसे जो न कांपता ।
जानके उनका खेल न डिगे लेश-मात्र भी ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६२

न जिताता या न हराता । स्वयं जीतता या हारता ।
न गुण होता या कराता । जैसा रण-रंग ॥ ३८ ॥
अथवा शरीर-गत प्राण । घरमें आतिथ्यका ब्राह्मण ।
या चौराहेपे खडा जो स्थाणु । वैसा उदास ॥ ३९ ॥
तथा गुणोंका आवागमन । उसको नहीं कंपाता जान ।
मृग-जलोर्मियोंसे अर्जुन । नहीं कांपता मेरू ॥ ४० ॥
इससे अधिक क्या बोलना । वायुसे गगनका हिलना ।
तमका सूर्यको निगलना । इसी भांति ॥ ४१ ॥
स्वप्न जैसा नहीं मोहता । जगता जो उसको पार्थ ।
वैसे उसे नहीं बांधता । गुणका जाल ॥ ४२ ॥
गुणमें वह नहीं फंसता । दूरसे वह है देखता ।
गुण-दोषकी नृत्य-कथा । साक्षी जैसा ॥ ४३ ॥
सात्विक करता सत्कर्म । रज करता रजो कर्म ।
भ्रम-आलस्यादिमें तम । करता कार्य ॥ ४४ ॥
सुन तू उसकी है सत्ता । होती गुण-क्रिया समस्त ।
जैसे सम्मुख हो सविता । लौकिकका ॥ ४५ ॥
समुद्र जैसे उमड आता । सोमकांत मणि पसीजता ।
अथवा है कुमुद खिलता । चंद्रिकासे ॥ ४६ ॥
या पवन बहता रुकता । गगन जैसे निश्चल रहता ।
वैसे गुणोंका हलचल होता । वह होता निश्चल ॥ ४७ ॥
ये हैं उसके लक्षण । गुणातीतके तू जान ।
कहता हूं आचरण । उसका मैं ॥ ४८ ॥
समदुःखसुखःस्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥
शांत जो स्तुति निंदामें धीर जो सुख दुःखमें ।
प्रियाप्रिय जिसे तुल्य स्वर्ण पाषाण मृत्तिका ॥ २४ ॥
५६३ गुण-निस्तारयोग

गुणातीतकी सम-वृत्ति-
कपडेके अंदर बाहर । होता है तंतू ही धनुर्धर ।
वैसे देखता है चराचर । विश्वमें मद्रूप ॥ ४९ ॥
रिपु भक्तमें जैसे समान । रहता है परमात्मा जान ।
वैसे ही सुख दुःख अर्जुन । एकसे उसको ॥ ३५० ॥
वैसे भी स्वाभाविक । भोगना सुख दुःख ।
देह-रूप उदक । पाता मीन ॥ ५१ ॥
अब उसने वह छोड़ दिया । अपना स्व-स्वरूप जान लिया ।
जैसे भूसेसे दाना चुन लिया । खेतीहरने ॥ ५२ ॥
अथवा ओघ छोड़कर गांग । बन गया समुद्रका ही अंग ।
भूलकर अपना लगभग । कलकल ध्वनि ॥ ५३ ॥
हो गयी जब उसकी निश्चित । आत्म-रूपमें वसति सतत ।
देहमें तब उसको समस्त । एकसे सुख दुःख ॥ ५४ ॥
रात-दिवस समान । मानता स्तंभ अर्जुन ।
आत्म रत होता तन । द्वंद्व वैसे ॥ ५५ ॥
जैसे नींदमें रत शरीर । अप्सरा अथवा अजगर ।
एक मानता है धनुर्धर । वैसे देहके द्वंद्व ॥ ५६ ॥
देखता उसका मन । सुवर्ण रत्न पाषाण ।
सदैव एक समान । बिना भेदके ॥ ५७ ॥
घरमें उतर आता स्वर्ग । अथवा ऊपर आता बाघ ।
न होता आत्म-बुद्धिका भंग । उसका कभी ॥ ५८ ॥
जैसे मृत न होता जागृत । या भूना बीज न अंकुरित ।
वैसी होती है बुद्धि आत्मस्थ । सदा अभंग ॥ ५९ ॥
ब्रह्म है तू ऐसा स्तवन । या निंदा करो नीच मान ।
जलने बुझनेका ज्ञान । नहीं जानती राख ॥ ३६० ॥
ज्ञानेश्वरी ५६४

वैसे निंदा अथवा स्तवन । जानता नहीं वह अर्जुन ।
तम और प्रकाशका ज्ञान । न होता सूर्यको ॥ ६१ ॥
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥
ईश्वर-बुद्धिसे किया पूजन । या चोर मानके किया ताडन ।
वृष-गजसे किया दलन । या दिया राज ॥ ६२ ॥
जैसे पास आये आप्त-मित्र । या घिर आये शत्रु-सर्वत्र ।
किंतु न जानता सूर्य रात्र । अथवा दिवस ॥ ६३ ॥
सभी ऋतुमें जैसे गगन । निर्लिप्त रहता है अर्जुन ।
ऐसा वैषम्य रहित मन । होता उसका ॥ ६४ ॥
वैसे ही उसका एक आचार । कहता हूं तुझे पांडुकुमार ।
नहीं होता कभी कोई व्यापार । वहां प्रारंभ ॥ ६५ ॥
सर्वारंभ वहां समाप्त । प्रवृत्तिका होता है अस्त ।
जले हैं कर्म-फल पार्थ । सभी वहां ॥ ६६ ॥
दृष्ट्यादृष्ट्य भोगकी पार्थ । नहीं होती चाह जागृत ।
प्रारब्धसे होता जो प्राप्त । पाता वह सहज ॥ ६७ ॥
सुख या दुखमें जैसे । पाषाण रहता वैसे ।
त्याग-स्वीकार मनसे । मिट गया है ॥ ६८ ॥
कितना करना विस्तार । जिसका है ऐसा आचार ।
उसे मान तू धनुर्धर । गुणातीत ॥ ६९ ॥
गुणोंका अतिक्रमण । करनेका क्या साधन ।
कहता वह श्रीकृष्ण । सुनिये अब ॥ ३७० ॥
मानापमानमें जैसे समान शत्रु-मित्रमें ।
गुणातीत वही मान आरंभ जिसने तजा ॥ २५ ॥
५६५ गुण-निस्तारयोग

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥
गुण-निस्तारका साधन--
ऐसे जो अव्यभिचार चित्त । भक्ति-योग-रत हो सतत ।
मेरा सेवन करता पार्थ । लांघता गुण ॥ ७१ ॥
अव्यभिचारी भक्तिका विवेचन--
तब कौन हूं मैं कैसी भक्ति । अव्यभिचारकी अभिव्यक्ति ।
होना उसकी पूर्ण निश्चिति । अत्यावश्यक ॥ ७२ ॥
तब तू सुन अर्जुन । यहां है मेरा क्या स्थान ।
रत्नमें तेज जो रत्न । वैसा हूं मैं ॥ ७३ ॥
या द्रवणवत है नीर । या अवकाश है अंबर ।
या मिठास ही है शक्कर । नहीं भिन्न ॥ ७४ ॥
या अग्नि ही है ज्वाल । दल ही है कमल ।
वृक्ष जो वही डाल । फलादिक ॥ ७५ ॥
हिम होता जो संघटित । कहलाता वह हिमवंत ।
या जामन लगा दूध पार्थ । कहलाता दही ॥ ७६ ॥
यहां विश्व है जो अर्जुन । स्वयं मैं हूं वह संपूर्ण ।
चंद्र-बिंबका तरासना । न होता वैसे ॥ ७७ ॥
अजी ! जमा हुवा घृत । जमकर भी रहता घृत ।
या कंकण रूपमें भी पार्थ । होता सोना ही ॥ ७८ ॥
न उघड़ कर भी वस्त्र । स्पष्ट ही रहता सूत्र ।
जैसे न तोडके भी पात्र । रहती मृत्तिका ॥ ७९ ॥
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जो एक-निष्ठ भक्तीसे करता मम सेवन ।
लांघके गुणको सारे पाता ब्रह्मत्व है वह ॥ २६ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६६

इसलिये विश्वत्वका निवारण । कर फिर करना मेरा ग्रहण ।
ऐसा नहीं जान तू यह संपूर्ण । विश्व-सह मै हूं ॥ ३८० ॥
इस प्रकार जो मुझको जानना । उसको अव्यभिचारी भक्ति कहना ।
विश्वमें औ' मुझमें भेद देखना । व्यभिचारी भक्ति ॥ ८१ ॥
इसलिये भेद तज पार्थ । तथा करके अभेद-चित्त ।
जानना है अपने सहित । मुझको सदैव ॥ ८२ ॥
सोनेपे जैसे सुवर्ण । जडा जाता है अर्जुन ।
वैसे अपनेसे भिन्न । न मानना मुझे ॥ ८३ ॥
तेजसे जो होता उत्पन्न । तेजोमय होता किरण ।
तेजसे होता है अभिन्न । ऐसा होना बोध ॥ ८४ ॥
भूतलमें जैसे परमाणु । हिमाचलमें है हिम-कण ।
वैसे मुझमें कर अर्पण । अपनेको तू ॥ ८५ ॥
तरंग होता छोटा अर्जुन । किंतु न होता सिंधुसे भिन्न ।
वैसे ईश्वरसे नहीं भिन्न । कुछ भी यहां ॥ ८६ ॥
इसी भांति समरस । दृष्टि रख स-उल्लास ।
भक्तिका वह निवास । कहते हम ॥ ८७ ॥
ज्ञान और योगका समन्वय, अद्वय-दृष्टि—
तथा ज्ञानकी भी अर्जुन । सही दृष्टि यह है जान ।
तथा योगका है संपूर्ण । सार भी यही ॥ ८८ ॥
सिंधुसे जैसे जल-धर । लेते हैं अखंड जो धार ।
वैसी वृत्ति पांडुकुमार । बनती तन्मय ॥ ८९ ॥
जैसे कूप मुखका आकाश । सांधा न जाता महाकाश ।
होता है वैसे परम-रस । ऐक्य-रूप ॥ ३९० ॥
प्रति-बिंब तक बिंबसे । प्रभा-ज्योति होती है जैसे ।
सोऽहम् वृत्ति होती है वैसे । धनंजय ॥ ९१ ॥
५६७ : गुण-निस्तारयोग

ऐसे ही फिर परस्पर । सोऽहम् वृत्तिका अवतार ।
वह भी मिटती फिर । अपने आप ॥ ९२ ॥
जैसे नूनका एक कण । समुद्रमें पिघला जान ।
गलना भी फिर अर्जुन । भूलता जैसे ॥ ९३ ॥
अथवा जलकर तृण । बुझ जाता है अग्नि-कण ।
भेद-नाशका वैसे ज्ञान । मिटता आप ॥ ९४ ॥
रहता हूं मैं उस पार । भक्त रहता इस पार ।
यह दोनों ही मिटकर । रहता अनादि ऐक्य ॥ ९५ ॥
गुणोंको है वह लांघता । यह भी अब न रहता ।
न रहती एक वाक्यता । एकत्वकी भी ॥ ९६ ॥
इसीको ब्रह्मत्व कहते हैं जो मेरी एक-निष्ठ भक्तिसे मिलता है—
यह जो है ऐसी स्थिति । ब्रह्मत्व है कहलाती ।
मेरी अव्यभिचारी भक्ति । देती है यह ॥ ९७ ॥
तथा ऐसे लक्षण-युक्त । जगतमें मेरा जो भक्त ।
ब्रह्मत्व उससे संयुक्त । पतिव्रता जैसे ॥ ९८ ॥
पानी जो गंगामें बहता । सिंधुसे निश्चित मिलता ।
इसमें नहीं है अन्यथा । उसी भांति ॥ ९९ ॥
ज्ञान-दृष्टिसे जो अर्जुन । करता है मेरा सेवन ।
होता है वह जुडा रत्न । ब्रह्म-पदका ॥ ४०० ॥
ऐसे ब्रह्म-पदका पार्थ । सायुज्य ऐसी व्यवस्था ।
उसीका नाम है चौथा । पुरुषार्थ जो ॥ १ ॥
किंतु मेरा यह आराधन । होता है ब्रह्मत्वका सोपान ।
इससे मैं इसका साधन । मानेगा तू ॥ २ ॥
यदि एसा है तेरा मन । करता कल्पना अर्जुन ।
नहीं है अन्य मेरे बिन । कोई ब्रह्म ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६८

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥
सबका मूल आधार मैं हूं--
ब्रह्म नामका आधार । मैं हूं यहां धनुर्धर ।
औ' अन्य शब्दका सार । वह भी मैं हूं ॥ ४ ॥
जैसा मंडल औ' चंद्रमा । अभेद होते हैं जान मर्म ।
वैसे ही मैं और हे ब्रह्म । एक-रूप ॥ ५ ॥
तथा नित्य जो निष्कंप । अनावृत्त धर्मरूप ।
सुख-रूप जो अमाप । अद्वितीय ॥ ६ ॥
विवेक अपना काम । करके मिलता धाम ।
निष्कर्षका है निःसीम । वह भी मैं हूं ॥ ७ ॥
विजय गया अब दूर-
अजी ! कीजिये यह श्रवण । अनन्य भक्त-प्रिय श्रीकृष्ण ।
करता है पार्थसे कथन । कहता संजय ॥ ८ ॥
धृतराष्ट्र कहता यह सुन । तुझसे यह पूछता है कौन ।
बिन पूछे ही व्यर्थका भाषण । करता क्यों तू ? ॥ ९ ॥
विजयकी वार्ता तू कहकर । हमारी व्यग्रता .दूर कर ।
कहता है "विजय गया दूर" । संजय मनमें ॥ ४१० ॥
संजय है मनमें विस्मित । वैसे ही है अतिशय त्रस्त ।
किस भांति यह द्वेश-रस । श्रीकृष्णसे है ॥ ११ ॥
फिर भी वह कृपालु हो तुष्ट । इन्हें करें आत्म-विवेक पुष्ट ।
जिससे हो इनका रोग नष्ट । महा-मोहका ॥ १२ ॥
आधार ब्रह्मका मैं हूं वैसे ही अमृतत्वका ।
शाश्वत धर्मका भी मैं तथा निस्सीम सुखका ॥ २७ ॥
(72) ५६९ गुण-निस्तारयोग

करता है संजय ऐसा चिंतन । तथा करता संवादका श्रवण ।
जिससे उमडकर आता मन । हर्षातिरेकसे ॥ १३ ॥
ऐसा हो वह उत्साहित । अब श्रीकृष्णार्जुनकी बात ।
कहेगा तो देकर चित्त । सुनियेगा ॥ १४ ॥
उन अक्षरोंका जो है भाव । पहुंचाऊंगा आपके ठांव ।
कहता सुनिये ज्ञानदेव । निवृत्तिका दास ॥ १५ ॥
गीता श्लोक २७
ज्ञानेश्वरी ओवी ४१५.

१५
पुरुषोत्तम-दर्शनयोग
श्रीसद्गुरुकी मानस-पूजा—
अपना यह अंतःकरण । बना करके श्रीसिंहासन ।
उस पर रखेंगे चरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥
ऐक्य भावकी अंजली । इंद्रिय-कमल-कली ।
भरकर पुष्पांजली । देंगे अर्घ्य ॥ २ ॥
अनन्यता-उदक शुद्ध । संस्कार निष्ठाका सु-सिद्ध ।
लगावें अनामिका गंध । चंदन-तिलक ॥ ३ ॥
स्वर्णिम प्रेमके नूपुर । श्रीचरणमें सुकुमार
चढायें समर्पित कर । विशुद्धतासे ॥ ४ ॥
अनन्यतासे जो है दृढ । अव्यभिचारका निचोड़ ।
बनाके चरणोंके जोड़ । चढ़ायेंगे ॥ ५ ॥
आनंद-मोद बहुल । सात्विकताके मुकुल ।
खिले हुए अष्ट-दल । चढायें पदपे ॥ ६ ॥
जलायें अहंका धूप । उतारें नाहंका दीप ।
समरस होके आप । मिले निरंतर ॥ ७ ॥
बनाके मेरे तन औ' प्राण । चढाऊं पादुका श्रीचरण ।
करूं भोग-मोक्षका निंब-लोण । उन चरणों पर ॥ ८ ॥
इन गुरु-चरणोंकी सेवा । देती सकल पुरुषार्थ मेवा ।
प्राप्त हो हम वह सुदैव । ऐसा करें हम ॥ ९ ॥

देता अंतिम-विश्रांति-स्थान । वहां तक खिलता जो ज्ञान ।
बनाता सुधा-सिंधु महान । वाचाका वह ॥ १० ॥
असंख्य पूर्ण-सुधाकर । करें जिसपे न्योच्छावर ।
होता है वक्तृत्व मधुर । जिस दैवसे ॥ ११ ॥
सूर्य उदय जो पूर्व-दिशा । देती है जगतको प्रकाश ।
करती दीवाली ज्ञान-दशा । वैसे श्रोताओंकी ॥ १२ ॥
जिससे स्फुरता है व्याख्यान । लगता नाद-ब्रह्म भी बौना ।
मोक्ष-धाम भी है शोभा-हीन । उसके सम्मुख ॥ १३ ॥
मंडपमें श्रवण सुखके । जगतको वसंत ऋतुके ।
सुख मिले व्याख्यान-वल्लीके । ऐसा बहार आता ॥ १४ ॥
नहीं लगनेसे जिसकी थाह । लौटती है वाचा मनके सह ।
उसके शब्दमें आता है वह । कितना आश्चर्य ॥ १५ ॥
ज्ञान जिसे नहीं जानता । ध्यानमें भी जो नहीं आता ।
वह है अगोचर रमता । उसकी गोष्ठियोंमें ॥ १६ ॥
इतना बड़ा जो सौभग । बनता है वाचाका अंग ।
गुरु-पद-पद्म-पराग । प्राप्त होता ॥ १७ ॥
ऐसा यह भाग्य है नहीं । मेरे बिन अन्यको कहीं ।
कहता है आपसे यहीं । ज्ञानदेव ॥ १८ ॥
रहा हूं अबोध बालक । श्रीगुरुका इकलौता एक ।
इसी लिए कृपा स्वाभाविक । मिली मुझको मात्र ॥ १९ ॥
मेघमाला जैसे संपूर्ण । देती है चातकको प्राण ।
मेरे लिए गुरु-चरण । बने वैसे ॥ २० ॥
तभी मेरा रीता ही मुख । करने लगा बकबक ।
किंतु निकला स्वाभाविक । गीता तत्व मधुर ॥ २१ ॥
होता है जब दैव अनुकूल । रेती बनते मोति अनमोल ।
शत्रु भी बन जाते हैं सकल । ऐश्वर्य सह मित्र ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५७२

चुल्हेपे चढाये हुए हरल । पक जाते अमृतसे चावल ।
भूखेका रखना यदि काल । जगन्नाथको ॥ २३ ॥
ऐसे ही जिसे श्रीगुरुवर । करते हैं जब अंगीकार ।
बन जाता है सारा संसार । मोक्षधाम ॥ २४ ॥
देखो कैसे नारायण । पांडवोंके अवगुण ।
बना देते हैं पुराण । विश्व-वंद्य ॥ २५ ॥
ऐसे श्री निवृत्तिराज । मुझ अज्ञानिमें आज ।
लाते हैं ज्ञानका ओज । स्व-कृपासे ॥ २६ ॥
रहने दे यह गुरु-गुण वर्णन । वर्णनसे होती है महिमा मलीन ।
गुरुवर्णनका मुझमें कहां ज्ञान । इसीलिए ॥ २७ ॥
उनकी कृपासे सदय । कहते गीता साभिप्राय ।
धोता हूं मैं आपके पूज्य । अब श्री चरण ॥ २८ ॥
करता चौदहका अंत । कह कर यह सिद्धांत ।
अर्जुनसे श्री भगवंत । कैवल्य पति जो ॥ २९ ॥
ज्ञानी ज्ञानसे मोक्ष पाता है—
करता जो ज्ञान हस्तगत । मोक्ष पाता है वही समर्थ ।
होता इंद्रपद हस्तगत । जैसे शत-मखसे ॥ ३० ॥
अथवा लेकर शत जन्म । करता सतत ब्रह्म-कर्म ।
वही बनता अंतमें ब्रह्म । अन्य नहीं कोई ॥ ३१ ॥
या करता है सूर्य दर्शन । केवल मात्र एक नयन ।
वैसे केवल ज्ञानसे मान । मोक्ष प्राप्त ॥ ३२ ॥
ऐसे ज्ञान के लिए कौन । होता यहां सामर्थ्यवान ।
खो जानेसे हुवा दर्शन । अकेलेका ॥ ३३ ॥
पातालमें भी जो है निधान । दिखाएगा लगाके अंजन ।
इसके लिए होना लोचन । पाव्जके ही ॥ ३४ ॥
वैसे ही मोक्ष देगा ज्ञान । यहां बात नहीं भिन्न ।
इसके लिए होना मन । परम-शुद्ध ॥ ३५ ॥
५७३ पुरुषोत्तमयोग

ज्ञानके लिए वैराग्य आवश्यक—
तब विरक्तिके बिन । टिकता नहीं ज्ञान ।
निर्णय है यह जान । हरि चित्तका ॥ ३६ ॥
विरक्तिका कौनसा प्रकार । करेगा मनका अंगीकार ।
कर रखा यह भी विचार । सर्वज्ञ हरिने ॥ ३७ ॥
यह है विष मिश्रित अन्न । अतिथिको हो इसका ज्ञान ।
छोड़ उठता वह भोजन । इसी भांति ॥ ३८ ॥
अनित्य यह सब संसार । जानता है जो इसका सार ।
वह करता विरक्ति दूर । तो भी वह चिपकती ॥ ३९ ॥
पंद्रहवे अध्यायकी भूमिका—
अनिश्चितताका रूप निश्चित । वृक्ष-रूपकसे है जगन्नाथ ।
सुनायेंगे सुने सब यथार्थ । पंद्रहवेंमें ॥ ४० ॥
सहज पडा जो हो उन्मूलन । डाली जड़ उलट कर जान ।
सूखेगा वह जैसे क्षण क्षण । वैसे नहीं यह ॥ ४१ ॥
मिटाते हैं ऐसा दिखाकर । रूपकका भला चमत्कार ।
जन्म-मरणका जो चक्कर । संसारका ॥ ४२ ॥
दिखाके संसारका अनित्यत्व । स्वरूपमें अहंताका लयत्व ।
कहा जायेगा अब सार-तत्व । पंद्रहवेंमें ॥ ४३ ॥
अब यहीं ग्रंथ हृद्गत । कहेंगे सिद्धांत विस्तृत ।
सुने आप देकर चित्त । श्रोतृ-वृंद ॥ ४४ ॥
वह ब्रह्मानंद समुद्र । जो पूर्ण-पूर्णिमाका चंद्र ।
तथा द्वारकाका नरेंद्र । कहता ऐसा ॥ ४५ ॥
अजी ! सुन तू पांडुकुमार । आते हुए स्वरूपके घर ।
रुकावट करता समीर । विश्वाभासका ॥ ४६ ॥
वह जो जगडंबर । नहीं है यहां संसार ।
जान महा तरुवर । पड़ा है यहां ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी : ५७४

किंतु अन्य वृक्ष सरीखा । नीचे मूल ऊपर शाखा ।
ऐसा नहीं जान इसका । अंत न लगता ॥ ४८ ॥
आग अथवा यदि कुठार । पड़ती जिसके मूल पर ।
वह पड़ता है टूटकर । कितना ही बड़ा हो ॥ ४९ ॥
मूल सब जब वृक्ष टूटता । शाखाओं सह वह है गिरता ।
किंतु इसका ऐसा नहीं होता । यह न है सहज ॥ ५० ॥
संसार वृक्षकी कल्पना--
इसका है अर्जुन ! कौतुक । कहनेमें यह अलौकिक ।
बढ़ता जाता है अधोमुख । यह वृक्ष ॥ ५१ ॥
जैसे सूर्यकी ऊंची नहीं जानता । उसका रश्मि-जाल नीचे फैलता ।
वैसे ही यह है आश्चर्य दिखाता । संसार-वृक्ष ॥ ५२ ॥
जैसे कल्पांतका उदक । फैलता है आकाश तक ।
वैसे यह संसार रुख । घेरता सर्वस्व ॥ ५३ ॥
अथवा होता रविका अस्त । तमसे घिरती सारी रात ।
यह वृक्ष ऐसा होता व्याप्त । आकाश सारा ॥ ५४ ॥
खाना चाहे तो नहीं फलता । सूंघना चाहे तो नहीं फूलता ।
जैसे हो यह वृक्ष रहता । केवल वृक्ष ॥ ५५ ॥
मूल जमा है इसका ऊपर । शाखयें फैली हैं नीचेकी ओर ।
किंतु नहीं पड़ा टूटकर । रहता खिला हुवा ॥ ५६ ॥
तथा ऊर्ध्व-मूल ऐसे । कहा है स्पष्ट रूपसे ।
किंतु फैलते नीचेसे । इसकी जड़ ॥ ५७ ॥
बढनेमें है जैसे शेवाल । ऊपर वट हो या पीपल ।
अंकुरमें फूटते हैं डाल । इसके सब ॥ ५८ ॥
इस भांति सुनो पार्थ । संसार-वृक्षके साथ ।
नीचे ही है डाल पात । ऐसे भी नहीं ॥ ५९ ॥
५७५ पुरुषोत्तमयोग

वैसे ही ऊर्ध्वकी ओर । शाखाओंके ढेर ढेर ।
दिखाई देते अपार । फैले हुए ॥ ६० ॥
या फैला हो वृक्ष रूपसे गगन । या वृक्ष रूपसे वायु-प्रसरण ।
या अवस्था-त्रयका विस्तार मान । हुवा वृक्ष रूपसे ॥ ६१ ॥
ऐसा है यह ऊर्ध्व-मूल । फैला है सर्वत्र बहुल ।
विश्वाकार लेके सकल । जान तू यह ॥ ६२ ॥
अब है इसका ऊर्ध्व-भाग कौन । इसके ऊर्ध्व-मूलके क्या कारण ।
इसके अधो-वृद्धिके क्या लक्षण । औ' डालियां हैं कैसी ॥ ६३ ॥
अथवा इस वृक्षकी । जड कैसी है नीचेकी ।
डालियाँ कैसी ऊर्ध्वकी । सुनो आब ॥ ६४ ॥
तथा यह अश्वत्थ है ऐसे । प्रसिद्धिके कारण क्या कैसे ।
आत्म-विद्या-विदोंने है ऐसे । किया क्यों निर्णय ॥ ६५ ॥
यह सब तू अर्जुन । अनुभवेगा जो ज्ञान ।
ऐसे करूंगा कथन । सुन तू अब ॥ ६६ ॥
तेरा ही यह है सौभाग्य । इसके लिए है तू योग्य ।
आया है सुन यह भाग्य । सर्वांगके कान कर ॥ ६७ ॥
प्रेम-रसका ऐसे हो स्फुरण । यदु-पति बोला जब श्रीकृष्ण ।
प्रकट हुवा तब अवधान । अर्जुनके रूपमें ॥ ६८ ॥
अति व्यापक जो कृष्ण-कथन । किंतु फैला पार्थका अवधान ।
जैसे घेरती दिशायें महान । आकाशको जैसे ॥ ६९ ॥
अजी ! श्रीकृष्ण वचन सागर । प्राशन करता है धनुर्धर ।
मानो है अगस्ति ऋषि दूसरा । एक घोंटमें ॥ ७० ॥
फूट पडी ऐसी श्रवणाशा निर्मळ । पार्थमें प्रतीत कर कृष्ण सरळ ।
करता है देव वह सुख सकल । न्योच्छावर पार्थपै ॥ ७१ ॥
ज्ञानेश्वरी ५७६

भगवान उवाच
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥
ऊर्ध्व-मूल ब्रह्मका वर्णन—
फिर कहता है पांडव । इस तरुका है जो ऊर्ध्व ।
वृक्षके कारण सदैव । दीखता सहज ॥ ७२ ॥
वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ऐसा नहीं जहां भेद ।
कहते हो एकवद् । उस अद्वयका ॥ ७३ ॥
वह है अश्रवणीय नाद । तथा असौरभ्य मकरंद ।
तथा जो निरालंब आनंद । बिना रतिका ॥ ७४ ॥
जिसको जो आर-पार । तथा आगे-पीछेकी ओर ।
दृश्यादृश्यसे अगोचर । देखना है ॥ ७५ ॥
उपाधिका जो दूसरा । फैलानेसे है पसारा ।
नाम-रूपका संसार । होता जहां ॥ ७६ ॥
ज्ञाता ज्ञेयसे विहीन । केवल मात्र जो ज्ञान ।
सुखसे भरे गगन- । से चूता है ॥ ७७ ॥
नहीं है जो कार्य अथवा कारण । या अन्यसे आया जो अकेलापन ।
जिसको अपनेमें ही आप जान । भली भांति ॥ ७८ ॥
संसार-वृक्षका बीज और जड़—
ऐसी सत्य-वस्तु जिसकी । जड़ है ऊपर इसकी ।
वहांसे निकली इसकी । कोंपल ऐसे ॥ ७९ ॥
श्री भगवानने कहा
ऊंचे मूल तले शाख नित्य अश्वत्थ है कहा ।
उसके दलमें वेद पढे जो वेद जानता ॥ १ ॥
(73) ५७७ पुरुषोत्तमयोग

अजी ! माया ऐसी ख्याति । चलती है जो है नास्ति ।
जैसे वंध्याकी संतति । बातोंमें ही ॥ ८० ॥
वह होती अथवा नहीं होती । विचारका नाम नहीं सहती ।
यहां वह अनादि कहलाती । इस प्रकारकी ॥ ८१ ॥
यह है भव-द्रुम बीजिका । या प्रपंचकी भूमिका ।
औ, विपरीतज्ञान-दीपिका । प्रज्वलित है जो ॥ ८२ ॥
अनेक शक्तियोंकी पेटिका । आकाश मानो विश्वदभ्रका ।
वस्त्र है जो आकार मात्रका । तह किया हुवा ॥ ८३ ॥
माया साथ ही है ब्रह्मके । होकर भी जैसे नहींके ।
प्रकट होती है वस्तुके । प्रकाश रूप जो ॥ ८४ ॥
अपनेको आती है जब नींद । करती तब अपनेको मुग्ध ।
कजली करती प्रकाश मंद । दीपकका जैसे ॥ ८५ ॥
प्रियके साथ तरुणांगी स्वप्नमें । सोई हुई उठकर शीघ्रातमें ।
आलिंगनके बिना आलिंगनमें । करती सकाम ॥ ८६ ॥
ऐसे स्वरूपमें हुई जो माया । स्वाश्रयमें अज्ञान धनंजय ।
वही इस भव-तरुका भया । पहला मूल ॥ ८७ ॥
वस्तुका अपना जो अबोध । ऊपर वह बांधता कंद ।
वेदांतमें भी यही प्रसिद्ध । कहा बीज-भाव ॥ ८८ ॥
घना अज्ञान भाव जो सुषुप्ति । बीजांकुर-भाव सुभद्रापति ।
अन्य दो जो स्वप्न और जागृति । उसका फल भाव ॥ ८९ ॥
ऐसा वेदांत प्रतिपादन । संज्ञा है ये प्रसिद्ध तू जान ।
रहने दो यहां है अर्जुन । अज्ञान मूल ॥ ९० ॥
उस अतीत आत्माको निर्मळ । अधोर्ध्व सूचित करके मूल ।
तथा चारों ओर बना वर्तुळ । माया-योगका ॥ ९१ ॥
फिर हो अनेक देहांतर । छूटते हैं उसके अपार ।
सभी ओरसे बना अंकुर । गहरे उतरते ॥ ९२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५७८

ऐसा भव-द्रुमका मूल । ऊपर पाकरके बल ।
उसके हैं दलके दल । उतरते नीचे ॥ ९३॥
संसार-वृक्षका पहला पल्लव—
वहां चिद्वृत्तिके पहला । महतत्व कोंपल खिला ।
पल्लव जो हरा निकला । कोंपल एक ॥ ९४ ॥
फिर सत्व-रज-तमात्मक । त्रिविध अहंकार जो एक ।
वह तिगुना हो अधोमुख । फूटी डाल ॥ ९५ ॥
बुद्धिका लेकर अंकुर । बढ़ाता भेदको अपार ।
तन मनकी डाल सुंदर । बढ़ने लगती ॥ ९६ ॥
ऐसे ले कर मूलकी दृढता । विकल्प रसकी जो कोमलता ।
चित्त-चतुष्टयकी विविधता । फूटते पल्लव ॥ ९७ ॥
भवद्रुमका विस्तार—
आकाश वायु द्योतक । और है पृथ्वी उदक ।
फूटती ये पांच शाख । उसमें जोरसे ॥ ९८ ॥
वैसे ही श्रोत्रादि तन्मात्रा । उसके अंगभूत पत्र ।
जो हैं अति चित्र विचित्र । फूटते रहते ॥ ९९ ॥
तब शब्दांकुर पर्यंत । होते हैं श्रोत्र विकसित ।
आकांक्षाके नूतन पार्थ । चढती डालियां ॥ १०० ॥
अंग-त्वचाका जो लता पल्लव । स्पर्शांकुर तक होते फैलाव ।
वहां बढते हैं नित नव । विकार विविध ॥ १ ॥
तब रूप-पत्रके दलके दल । दूर तक फैलाती हैं आंखें सरल ।
फैलता है तब बड़ा भ्रम-जाल । सविस्तृत ॥ २ ॥
और रसनाका शाखा खंड । वेगसे बढता है उदंड ।
जिव्हा चापल्यके जो प्रचंड । फूटते शाख ॥ ३ ॥
वैसे ही गंधकी जो कोंपल । घ्राणेंद्रियको करती प्रबल ।
तब गंध-लोभ फैलाता विपुल । आनंद पल्लव ॥ ४ ॥
५७९ पुरुषोत्तमयोग

ऐसी जो महदहं-बुद्धि । मन महाभूत संसृष्टि ।
इस संसारकी अवधि । बना लेते हैं ॥ ५ ॥
भव-द्रुमका स्वरूप —
अजी ! यह इन्ही आठ अंगसे । फैलता जाता है अति वेगसे ।
किंतु है रजत-रूपसे जैसे । दीखती सीप ॥ ६ ॥
या सागरका जितना विस्तार । उतना ही तरंगत्व संचार ।
वैसे है ब्रह्म ही वृक्ष-आकार । अज्ञान मूल ॥ ७ ॥
यही अब इसका विस्तार । और इसका है यही प्रसार ।
स्वप्नमें अपना परिवार । होता जैसे एकका ही ॥ ८ ॥
रहने दो अब यह वर्णन । इस भांति यह बढ़ता जान ।
महदादि बोझसे है अर्जुन । अधोशाख ॥ ९ ॥
इसको अश्वत्थ क्यों कहते हैं—
इसको अश्वत्थ ऐसे । कहते हैं जो क्यों कैसे ।
वह भी सुन तू इसे । कहता हूं मैं ॥ ११० ॥
अजी ! श्वः कहा तो कल । तब तक प्रति पल ।
रहना नहीं निश्चल । इसका कभी ॥ ११ ॥
जैसे है बीतता है क्षण । मेघ बदलता नाना वर्ण ।
या बिजली न होती संपूर्ण । निमिष एक ॥ १२ ॥
या कांपता हुआ पद्म-दलं । उस पर पड़ा हुआ जल ।
या चित्त जैसे होता व्याकुल । मनुष्यका ॥ १३ ॥
वैसे ही है इसकी स्थिति । नासता जाता क्षण प्रति ।
इसीलिये हे शुद्ध-मति । कहते अश्वत्थ ॥ १४ ॥
तथा अश्वत्थ ऐसी संज्ञा । पीपलको पड़ी सुविज्ञा ।
नहीं वह भाव सर्वज्ञ - । श्रीहरिका यहां ॥ १५ ॥
वैसे पीपल कहा तो एक । मैंने मान लिया होता देख ।
किंतु रहने दे जो लौकिक । इसमें क्या अर्थ ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८०