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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 647

किंतु अन्य वृक्ष सरीखा । नीचे मूल ऊपर शाखा ।
ऐसा नहीं जान इसका । अंत न लगता ॥ ४८ ॥
आग अथवा यदि कुठार । पड़ती जिसके मूल पर ।
वह पड़ता है टूटकर । कितना ही बड़ा हो ॥ ४९ ॥
मूल सब जब वृक्ष टूटता । शाखाओं सह वह है गिरता ।
किंतु इसका ऐसा नहीं होता । यह न है सहज ॥ ५० ॥
संसार वृक्षकी कल्पना--
इसका है अर्जुन ! कौतुक । कहनेमें यह अलौकिक ।
बढ़ता जाता है अधोमुख । यह वृक्ष ॥ ५१ ॥
जैसे सूर्यकी ऊंची नहीं जानता । उसका रश्मि-जाल नीचे फैलता ।
वैसे ही यह है आश्चर्य दिखाता । संसार-वृक्ष ॥ ५२ ॥
जैसे कल्पांतका उदक । फैलता है आकाश तक ।
वैसे यह संसार रुख । घेरता सर्वस्व ॥ ५३ ॥
अथवा होता रविका अस्त । तमसे घिरती सारी रात ।
यह वृक्ष ऐसा होता व्याप्त । आकाश सारा ॥ ५४ ॥
खाना चाहे तो नहीं फलता । सूंघना चाहे तो नहीं फूलता ।
जैसे हो यह वृक्ष रहता । केवल वृक्ष ॥ ५५ ॥
मूल जमा है इसका ऊपर । शाखयें फैली हैं नीचेकी ओर ।
किंतु नहीं पड़ा टूटकर । रहता खिला हुवा ॥ ५६ ॥
तथा ऊर्ध्व-मूल ऐसे । कहा है स्पष्ट रूपसे ।
किंतु फैलते नीचेसे । इसकी जड़ ॥ ५७ ॥
बढनेमें है जैसे शेवाल । ऊपर वट हो या पीपल ।
अंकुरमें फूटते हैं डाल । इसके सब ॥ ५८ ॥
इस भांति सुनो पार्थ । संसार-वृक्षके साथ ।
नीचे ही है डाल पात । ऐसे भी नहीं ॥ ५९ ॥
५७५ पुरुषोत्तमयोग