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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 635

न जिताता या न हराता । स्वयं जीतता या हारता ।
न गुण होता या कराता । जैसा रण-रंग ॥ ३८ ॥
अथवा शरीर-गत प्राण । घरमें आतिथ्यका ब्राह्मण ।
या चौराहेपे खडा जो स्थाणु । वैसा उदास ॥ ३९ ॥
तथा गुणोंका आवागमन । उसको नहीं कंपाता जान ।
मृग-जलोर्मियोंसे अर्जुन । नहीं कांपता मेरू ॥ ४० ॥
इससे अधिक क्या बोलना । वायुसे गगनका हिलना ।
तमका सूर्यको निगलना । इसी भांति ॥ ४१ ॥
स्वप्न जैसा नहीं मोहता । जगता जो उसको पार्थ ।
वैसे उसे नहीं बांधता । गुणका जाल ॥ ४२ ॥
गुणमें वह नहीं फंसता । दूरसे वह है देखता ।
गुण-दोषकी नृत्य-कथा । साक्षी जैसा ॥ ४३ ॥
सात्विक करता सत्कर्म । रज करता रजो कर्म ।
भ्रम-आलस्यादिमें तम । करता कार्य ॥ ४४ ॥
सुन तू उसकी है सत्ता । होती गुण-क्रिया समस्त ।
जैसे सम्मुख हो सविता । लौकिकका ॥ ४५ ॥
समुद्र जैसे उमड आता । सोमकांत मणि पसीजता ।
अथवा है कुमुद खिलता । चंद्रिकासे ॥ ४६ ॥
या पवन बहता रुकता । गगन जैसे निश्चल रहता ।
वैसे गुणोंका हलचल होता । वह होता निश्चल ॥ ४७ ॥
ये हैं उसके लक्षण । गुणातीतके तू जान ।
कहता हूं आचरण । उसका मैं ॥ ४८ ॥
समदुःखसुखःस्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥
शांत जो स्तुति निंदामें धीर जो सुख दुःखमें ।
प्रियाप्रिय जिसे तुल्य स्वर्ण पाषाण मृत्तिका ॥ २४ ॥
५६३ गुण-निस्तारयोग