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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 633

अर्जुनकी जिज्ञासा, गुणातीत कैसे होता है ?--
उसी तोषसे पूछता अर्जुन । दीखते उसके क्या लक्षण ।
जिसमें बसता है ऐसा ज्ञान । कह तू श्रीहरि ॥ २० ॥
उसका होता कैसा आचरण । करता कैसे गुण-निस्तरण ।
कृपाका तू नैहर श्रीकृष्ण । यह कह कृपाकर ॥ २१ ॥
अर्जुनका सुन यह प्रश्न । षड्गुणैश्वर्य-युत श्रीकृष्ण ।
उत्तर देता है कृपा-पूर्ण । सुनिये अब ॥ २२ ॥
विचित्र है तेरी यह बात । पूछता तू प्रश्न विसंगत ।
यह सत्य कैसे असत् पार्थ । ऐसा यह प्रश्न ॥ २३ ॥
जिसका नाम गुणातीत । नहीं होता गुण-संयुत ।
होता भी यदि गुण-युत । मुक्त रहता वह ॥ २४ ॥
कृष्ण प्रश्नका वास्तविक रूप समझाता है --
किंतु गुणमें है उलझता । तब गुणाधीन वह होता ।
अथवा गुण-मुक्त रहता । जानना कैसे ॥ २५ ॥
ऐसा है यदि तेरा प्रश्न । पूछ तू सुखसे अर्जुन ।
करता हूं समाधान । तेरे संदेहका ॥ २६ ॥
भगवान् उवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥
गुणोंके कल्लोलमें वह निर्लिप्त रहता है-
जब रजोगुणका मद । देहमें लाता कर्म साध ।
प्रवृत्ति लेती है उसे बांध । कर्मांकुरसे ॥ २७ ॥
श्री भगवानने कहा
प्रकाश मोह उद्योग गुण-कार्य स्वभाविक ।
पानेसे न करे खेद न धरे चाह लोपसे ॥ २२ ॥
(71) ५६१ गुण-निस्तारयोग