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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 643

१५
पुरुषोत्तम-दर्शनयोग
श्रीसद्गुरुकी मानस-पूजा—
अपना यह अंतःकरण । बना करके श्रीसिंहासन ।
उस पर रखेंगे चरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥
ऐक्य भावकी अंजली । इंद्रिय-कमल-कली ।
भरकर पुष्पांजली । देंगे अर्घ्य ॥ २ ॥
अनन्यता-उदक शुद्ध । संस्कार निष्ठाका सु-सिद्ध ।
लगावें अनामिका गंध । चंदन-तिलक ॥ ३ ॥
स्वर्णिम प्रेमके नूपुर । श्रीचरणमें सुकुमार
चढायें समर्पित कर । विशुद्धतासे ॥ ४ ॥
अनन्यतासे जो है दृढ । अव्यभिचारका निचोड़ ।
बनाके चरणोंके जोड़ । चढ़ायेंगे ॥ ५ ॥
आनंद-मोद बहुल । सात्विकताके मुकुल ।
खिले हुए अष्ट-दल । चढायें पदपे ॥ ६ ॥
जलायें अहंका धूप । उतारें नाहंका दीप ।
समरस होके आप । मिले निरंतर ॥ ७ ॥
बनाके मेरे तन औ' प्राण । चढाऊं पादुका श्रीचरण ।
करूं भोग-मोक्षका निंब-लोण । उन चरणों पर ॥ ८ ॥
इन गुरु-चरणोंकी सेवा । देती सकल पुरुषार्थ मेवा ।
प्राप्त हो हम वह सुदैव । ऐसा करें हम ॥ ९ ॥