ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥
तीनों गुणोंका परिणाम--
श्रुतिका यह निरूपण । बन जाता है सत्व-गुण ।
सुकृत-कर्मका कारण । धनुर्धर ॥ २६० ॥
इसीलिये है निर्मल । सुकृतका जो सरल ।
देता सुख ज्ञान फल । सात्विक ॥ ६१ ॥
फिर है जो रजकी प्रक्रिया । इंद्रवणिका फल पकाया ।
सुख चितार अंतमें दिया । दुःख अपार ॥ ६२ ॥
अथवा जैसे निंबोणीका फल । बाहर मृदु अंदर गरल ।
वैसे होते राजस-क्रिया-फल । यहां अर्जुन ॥ ६३ ॥
जैसे है विषका अंकुर । देता विष फल आखर ।
वैसे है रूप भयंकर । फलता तम ॥ ६४ ॥
सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥
इसीलिये हे अर्जुन । सत्वका हेतु है ज्ञान ।
जैसे मानो दिनमान । होता सूर्यका ॥ ६५ ॥
तथा वैसे ही यह जान । लोभका है रज कारण ।
जैसे स्वरूप विस्तारण । जीव-दशाका ॥ ६६ ॥
मोह अज्ञान प्रमाद । यहां है ये दोष-वृन्द ।
आगे जो बढता प्रबुद्ध । तमका मूल ॥ ६७ ॥
फल सात्विक कर्मोंका पुण्य निर्मल है कहा ।
रजका फल है दुःख तमका ज्ञान-शून्यता ॥ १६ ॥
सत्वसे फैलता ज्ञान रजसे जान लालसा ।
प्रमाद मोह अज्ञान होते हैं तमके गुण ॥ १७ ॥
५५५ गुण-निस्तारयोग
ऐसे विचारोंके नयन । तीनों गुण करके भिन्न ।
दिखाते हैं जान अर्जुन । करतलामलकसा ॥ ६८ ॥
रज-तम हैं ये दोनों गुण । होते हैं पतनके कारण ।
सत्व बिन अन्य नहीं जान । पहुंचाते ज्ञानके पास ॥ ६९ ॥
इसीलिये सात्विक-वृत्ति । स्वीकार व्रत जन्म-वृत्ति ।
सर्व त्याग करके भक्ति । करते जान ॥ २७० ॥
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥
गुण-बद्धोंके स्थान—
जिनमें होता सत्वका उत्कर्ष । जीते-मरते उसीमें सहर्ष ।
तन त्याग वे पाते सत्पुरुष । स्वर्गका राज ॥ ७१ ॥
ऐसे ही रजमें जो रहते । उसीमें जीते तथा मरते ।
वे मनुष्य होके जन्मते । मृत्यु-लोकमें ॥ ७२ ॥
सुख दुःखकी खिचडी जिसमें । खानी पड़ती एक ही थालीमें ।
फंसते हैं जो मरण-चक्रमें । कभी नहीं छूटते ॥ ७३ ॥
तथा तममें जो उसी भांति । जीते मरते हैं उसी स्थिति ।
पाते हैं नरक अधोगति । प्राप्ति-पत्र ॥ ७४ ॥
इस भांति जो वस्तु-सत्ता । त्रिगुणको कैसे प्रभावित ।
करती है कारण सहित । कहा मैंने ॥ ७५ ॥
वस्तु होती है वस्तुत्वमें । किंतु आप गुण-रूपमें ।
देख गुणके स्वभावमें । बरतती है ॥ ७६ ॥
राजा देखता जैसे स्वप्नमें । घिरा है राज-पर-चक्रमें ।
जीतता हारता अपनेमें । आप ही एक ॥ ७७ ॥
सत्वस्थ चढते ऊंच मध्यमें व्यक्ति राजस ।
अधःपतित होते हैं तामसी हीन वृत्तिके ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५६
वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ये जो गुण-वृत्ति भेद ।
दृष्टि तज दी तो शुद्ध । वस्तु आप ॥ ७८ ॥
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥
गुण-निस्तारका विवेचन—
रहने दे अब यह विषय । कहने दे पीछेका जो विषय ।
इसे विषयांतर धनंजय । नहीं मान तू ॥ ७९ ॥
मानो यह तीन जो गुण । अपने सामर्थ्यसे जान ।
होते जैसे देह अर्जुन । गुण ही आप ॥ ८० ॥
जैसे ईंधनका आधार । अग्नि होता है धनुर्धर ।
या उगता है तरुवर । भूमिका रस ॥ ८१ ॥
या दधि-घृतके रूपमें जैसे । होता है केवल दूध ही वैसे ।
या लेता है ईखका रस जैसे । गूडका रूप ॥ ८२ ॥
ऐसे हैं ये सांतःकरण । देह बनते तीन गुण ।
तभी होते बंध-कारण । धनंजय ॥ ८३ ॥
किंतु आश्चर्य धनुर्धर । यह बंधका जो गुब्बार ।
मुक्त दशामें संसार । कभी नहीं ॥ ८४ ॥
यदि गुण ये अपने धर्मानुसार । होते हैं शरीरके आगे पीछे स्वैर ।
आत्माके गुणातीतावस्थामें अंतर । नहीं आता ॥ ८५ ॥
ऐसी मुक्ति होती है सहज । तुझको कहता हूं मैं आज ।
स्वभावसे तू ज्ञान-पुंज । अमर अर्जुन ॥ ८६ ॥
चैतन्य होता है गुणमें । न होता गुणके पाशमें ।
कहा यह त्रयोदशमें । मैंने तुझको ॥ ८७ ॥
गुणोंको तजके कर्त्ता आत्मा जो उस पार है ।
देखता जानता ऐसा होता मेरा स्वरूप सो ॥ १९ ॥
५५७ गुण-निस्तारयोग
जिस समय अंतःकरणमें । प्रतीत हो ज्ञान बोध-रूपमें ।
तब जैसे जागृत अवस्थामें । होता स्वप्न-भंग ॥ ८८ ॥
या जब तरंग उठते । उसे तटसे हैं देखते ।
बिंबके अंग-भंग होते । उसी प्रकार ॥ ८९ ॥
नट जैसे नहीं फंसता । अपने स्वांगको जानता ।
वैसे ही गुणोंको देखता । साक्षी-रूप ॥ २९० ॥
अथवा ऋतु-त्रयमें आकाश । ऋतुओंको देकर अवकाश ।
अलिप्तता रखता अविनाश । अपनी जैसे ॥ ९१ ॥
वैसे गुणमें गुणसे पर । अपने मूल-रूपमें स्थिर ।
होता अहंतापे अहंकार । उस समय ॥ ९२ ॥
वहांसे जब वह देखता । कहता मैं हूं साक्षी अकर्ता ।
क्रियाओंका नियोजन कर्ता । केवल हैं गुण ॥ ९३ ॥
तीन गुणोंका है जो प्रकार । दीखता कर्मका हो विस्तार ।
वह है गुणोंका विकार । धनंजय ॥ ९४ ॥
इसमें रहता हूं मैं ऐसा । वनमें वसंत ऋतु जैसा ।
वन-लक्ष्मीका विलास जैसा । कारण-रूप ॥ ९५ ॥
अथवा तारागणका लोपना । सूर्यकांतका उद्दीपन होना ।
तथा कमलोंका खिलना । या जाना तनका ॥ ९६ ॥
यहां किसी भी काममें कहीं । सविता उलझता नहीं ।
वैसे अकर्ता होता है देही । सत्ता-रूप ॥ ९७ ॥
गुण-प्रकाश कर गुण-दर्शन । होता है मुझमें गुणत्वका पोषण ।
गुणत्रयका होकर जो निरसन । रहता वह मैं हूं ॥ ९८ ॥
ऐसे विवेकका जो उदय । होता है जिसका धनंजय ।
उसे मिलता पथ विजय । गुणातीतका ॥ ९९ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५८
अध्याय ११: विश्वरूपदर्शनयोग
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥
गुण-निस्तारसे मोक्ष प्राप्त होता है—
निर्गुण ऐसा और जो पार्थ । रहता है उसको निश्चित ।
जानता वह उसमें नित । बसता ज्ञान ॥ ३०० ॥
अथवा मानो पांडुसुता । पाता है वह मेरी सत्ता ।
जिस भांति पाती सरिता । सिंधुत्व जैसे ॥ १ ॥
नळिका परसे उड़कर । बसता है शुक डालपर ।
वैसे वह मूल अहंकार । ओढता है सो ॥ २ ॥
अज्ञानकी नींद जो सोया था । जोरसे खुर्राटे भरता था ।
पाकर वह स्वरूपावस्था । उठता अर्जुन ॥ ३ ॥
बुद्धि-भेदका जब दर्पण । हाथसे छूटके गिरा जान ।
तब स्व-मुखाभास दर्शन । होगा कैसे ॥ ४ ॥
देहाभिमानका पवन जब रुकता । चित्तसिंधु पर तरंग नहीं उठता ।
तरंग-सिंधुका तब जैसे ऐक्य होता । वैसे जीवेशका ॥ ५ ॥
वर्षातमें गगनमें जैसे । लय होते हैं बादल वैसे ।
पूर्ण होता वह मद्भावसे । पांडुकुमार ॥ ६ ॥
ऐसे वह मद्रूप कर प्राप्त । शरीरमें रहता है सतत ।
नहीं होता है त्रिगुणमें लिप्त । देह-संभूत जो ॥ ७ ॥
अजी ! कांचका घर जो होता । प्रकाशको रोक न सकता ।
या वडवानल न बुझता । सिंधु-जलसे ॥ ८ ॥
वैसे ही आवागमन जो गुणोंका । बोध नहीं मिटा सकता उसका ।
जैसे चंद्र होता जलमें व्योमका । वैसे देहमें रहता वह ॥ ९ ॥
देह कारण ये तीन गुण जो तरता इन्हे ।
जन्म-मृत्यु जरा दुःख तरके मोक्ष जीतता ॥ २० ॥
५५९ गुण-निस्तारयोग
शरीरमें करते हैं तीनों गुण । अपने सामर्थ्यका घोर नर्तन
न भेजता वह करने दर्शन । अपनी अहंताको ॥ ३१० ॥
हृदयमें ऐसा वह धनंजय । रहता है करके दृढ निश्चय ।
शरीरमें करते क्या गुण-त्रय । यह न जानता वह ॥ ११ ॥
तज कर अंगका खोल । सर्प घुस बैठा पाताल ।
त्वचाका करेगा संभाल । कौन बाहर ॥ १२ ॥
अथवा पक्व सौरभ जैसा । लय होता आकाशमें वैसा ।
न आता कभी कमल-कोश । लौटकर जो ॥ १३ ॥
हुवा स्व-रूप समरससे । उसकी जीव-दशा भी वैसे ।
रहा शरीर-धर्म भी कैसे । जानता नहीं ॥ १४ ॥
तभी जन्म जरा मरण । इत्यादि जो छ हैं लक्षण ।
रहे ये देहके कारण । इसकी वार्ता नहीं ॥ १५ ॥
घट ही जब टूट गया । खपरा भी है फेंका गया ।
महदाकाशमें हो लिया । घटाकाश ॥ १६ ॥
देहका भाव जब मिटता । निजका ही स्मरण रहता ।
तब कहो अन्य क्या रहता । उसके बिन ॥ १७ ॥
ऐसा जो श्रेष्ठ बोध-युक्त । देहमें रहता सतत ।
तभी मैं उसे गुणातीत । कहता अर्जुन ॥ १८ ॥
श्रीकृष्णके सुन ये बोल । तुष्ट हुवा पार्थ निर्मल ।
गरजने पर बादल । मोर होता जैसे ॥ १९ ॥
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥
अर्जुनने कहा
त्रिगुणातीतके देव कह लक्षण तू मुझे ।
आचार उसके कैसे कैसे निस्तारता गुण ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६०
अर्जुनकी जिज्ञासा, गुणातीत कैसे होता है ?--
उसी तोषसे पूछता अर्जुन । दीखते उसके क्या लक्षण ।
जिसमें बसता है ऐसा ज्ञान । कह तू श्रीहरि ॥ २० ॥
उसका होता कैसा आचरण । करता कैसे गुण-निस्तरण ।
कृपाका तू नैहर श्रीकृष्ण । यह कह कृपाकर ॥ २१ ॥
अर्जुनका सुन यह प्रश्न । षड्गुणैश्वर्य-युत श्रीकृष्ण ।
उत्तर देता है कृपा-पूर्ण । सुनिये अब ॥ २२ ॥
विचित्र है तेरी यह बात । पूछता तू प्रश्न विसंगत ।
यह सत्य कैसे असत् पार्थ । ऐसा यह प्रश्न ॥ २३ ॥
जिसका नाम गुणातीत । नहीं होता गुण-संयुत ।
होता भी यदि गुण-युत । मुक्त रहता वह ॥ २४ ॥
कृष्ण प्रश्नका वास्तविक रूप समझाता है --
किंतु गुणमें है उलझता । तब गुणाधीन वह होता ।
अथवा गुण-मुक्त रहता । जानना कैसे ॥ २५ ॥
ऐसा है यदि तेरा प्रश्न । पूछ तू सुखसे अर्जुन ।
करता हूं समाधान । तेरे संदेहका ॥ २६ ॥
भगवान् उवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥
गुणोंके कल्लोलमें वह निर्लिप्त रहता है-
जब रजोगुणका मद । देहमें लाता कर्म साध ।
प्रवृत्ति लेती है उसे बांध । कर्मांकुरसे ॥ २७ ॥
श्री भगवानने कहा
प्रकाश मोह उद्योग गुण-कार्य स्वभाविक ।
पानेसे न करे खेद न धरे चाह लोपसे ॥ २२ ॥
(71) ५६१ गुण-निस्तारयोग
तब कर्म-जन्य अभिमान । नहीं आता उसमें अर्जुन ।
या कर्म रह जानेसे मन । खिन्न नहीं होता ॥ २८ ॥
या सत्व होता है जब अधिक । इंद्रियां होती हैं ज्ञान प्रकाशक ।
तब न होता सु-विधाका तोष । या अविधाका खेद ॥ २९ ॥
अथवा बढ़ता है जब तम । तब न भासता मोह या भ्रम ।
या नहीं होता अज्ञानका श्रम । या न करे स्वीकार ॥ ३० ॥
आता जब मोहका अवसर । नहीं चाहता ज्ञान धनुर्धर ।
या ज्ञानसे कर्म-स्वीकार कर । न होता दुःखी ॥ ३१ ॥
प्रातः माध्यान्ह सायंकाल । गणना करके त्रिकाल ।
न तपता सूर्य निर्मल । वैसे वह रहता ॥ ३२ ॥
उसको भिन्न क्या प्रकाश । ज्ञानसे मिलाता है शेष ।
नहीं सुखाती अनावर्षा । जैसे सागरको ॥ ३३ ॥
या करनेसे कर्म-प्रवर्तन । नहीं होगा कर्मका अभिमान ।
कहो कहींसे होगा क्या कंपन । हिमालयको ॥ ३४ ॥
होनेसे मोहका आगमन । भूल जायेगा क्या वह ज्ञान ।
घामसे जलेगा क्या अर्जुन । प्रलयाग्नि कभी ॥ ३५ ॥
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३ ॥
गुणोंके जालमें निर्लिप्त और निष्कंप रहता है—
गुण और गुणका कार्य । आप है पूर्ण धनंजय ।
तभी है एकेकका कार्य । न डिगाता उसे ॥ ३६ ॥
करके ऐसी प्रतीति । देहमें मैने की वसति ।
जैसे राहमें कोई पंथी । मान लेके ॥ ३७ ॥
रहे जैसे उदासीन गुणोंसे जो न कांपता ।
जानके उनका खेल न डिगे लेश-मात्र भी ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६२
न जिताता या न हराता । स्वयं जीतता या हारता ।
न गुण होता या कराता । जैसा रण-रंग ॥ ३८ ॥
अथवा शरीर-गत प्राण । घरमें आतिथ्यका ब्राह्मण ।
या चौराहेपे खडा जो स्थाणु । वैसा उदास ॥ ३९ ॥
तथा गुणोंका आवागमन । उसको नहीं कंपाता जान ।
मृग-जलोर्मियोंसे अर्जुन । नहीं कांपता मेरू ॥ ४० ॥
इससे अधिक क्या बोलना । वायुसे गगनका हिलना ।
तमका सूर्यको निगलना । इसी भांति ॥ ४१ ॥
स्वप्न जैसा नहीं मोहता । जगता जो उसको पार्थ ।
वैसे उसे नहीं बांधता । गुणका जाल ॥ ४२ ॥
गुणमें वह नहीं फंसता । दूरसे वह है देखता ।
गुण-दोषकी नृत्य-कथा । साक्षी जैसा ॥ ४३ ॥
सात्विक करता सत्कर्म । रज करता रजो कर्म ।
भ्रम-आलस्यादिमें तम । करता कार्य ॥ ४४ ॥
सुन तू उसकी है सत्ता । होती गुण-क्रिया समस्त ।
जैसे सम्मुख हो सविता । लौकिकका ॥ ४५ ॥
समुद्र जैसे उमड आता । सोमकांत मणि पसीजता ।
अथवा है कुमुद खिलता । चंद्रिकासे ॥ ४६ ॥
या पवन बहता रुकता । गगन जैसे निश्चल रहता ।
वैसे गुणोंका हलचल होता । वह होता निश्चल ॥ ४७ ॥
ये हैं उसके लक्षण । गुणातीतके तू जान ।
कहता हूं आचरण । उसका मैं ॥ ४८ ॥
समदुःखसुखःस्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥
शांत जो स्तुति निंदामें धीर जो सुख दुःखमें ।
प्रियाप्रिय जिसे तुल्य स्वर्ण पाषाण मृत्तिका ॥ २४ ॥
५६३ गुण-निस्तारयोग
गुणातीतकी सम-वृत्ति-
कपडेके अंदर बाहर । होता है तंतू ही धनुर्धर ।
वैसे देखता है चराचर । विश्वमें मद्रूप ॥ ४९ ॥
रिपु भक्तमें जैसे समान । रहता है परमात्मा जान ।
वैसे ही सुख दुःख अर्जुन । एकसे उसको ॥ ३५० ॥
वैसे भी स्वाभाविक । भोगना सुख दुःख ।
देह-रूप उदक । पाता मीन ॥ ५१ ॥
अब उसने वह छोड़ दिया । अपना स्व-स्वरूप जान लिया ।
जैसे भूसेसे दाना चुन लिया । खेतीहरने ॥ ५२ ॥
अथवा ओघ छोड़कर गांग । बन गया समुद्रका ही अंग ।
भूलकर अपना लगभग । कलकल ध्वनि ॥ ५३ ॥
हो गयी जब उसकी निश्चित । आत्म-रूपमें वसति सतत ।
देहमें तब उसको समस्त । एकसे सुख दुःख ॥ ५४ ॥
रात-दिवस समान । मानता स्तंभ अर्जुन ।
आत्म रत होता तन । द्वंद्व वैसे ॥ ५५ ॥
जैसे नींदमें रत शरीर । अप्सरा अथवा अजगर ।
एक मानता है धनुर्धर । वैसे देहके द्वंद्व ॥ ५६ ॥
देखता उसका मन । सुवर्ण रत्न पाषाण ।
सदैव एक समान । बिना भेदके ॥ ५७ ॥
घरमें उतर आता स्वर्ग । अथवा ऊपर आता बाघ ।
न होता आत्म-बुद्धिका भंग । उसका कभी ॥ ५८ ॥
जैसे मृत न होता जागृत । या भूना बीज न अंकुरित ।
वैसी होती है बुद्धि आत्मस्थ । सदा अभंग ॥ ५९ ॥
ब्रह्म है तू ऐसा स्तवन । या निंदा करो नीच मान ।
जलने बुझनेका ज्ञान । नहीं जानती राख ॥ ३६० ॥
ज्ञानेश्वरी ५६४
वैसे निंदा अथवा स्तवन । जानता नहीं वह अर्जुन ।
तम और प्रकाशका ज्ञान । न होता सूर्यको ॥ ६१ ॥
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥
ईश्वर-बुद्धिसे किया पूजन । या चोर मानके किया ताडन ।
वृष-गजसे किया दलन । या दिया राज ॥ ६२ ॥
जैसे पास आये आप्त-मित्र । या घिर आये शत्रु-सर्वत्र ।
किंतु न जानता सूर्य रात्र । अथवा दिवस ॥ ६३ ॥
सभी ऋतुमें जैसे गगन । निर्लिप्त रहता है अर्जुन ।
ऐसा वैषम्य रहित मन । होता उसका ॥ ६४ ॥
वैसे ही उसका एक आचार । कहता हूं तुझे पांडुकुमार ।
नहीं होता कभी कोई व्यापार । वहां प्रारंभ ॥ ६५ ॥
सर्वारंभ वहां समाप्त । प्रवृत्तिका होता है अस्त ।
जले हैं कर्म-फल पार्थ । सभी वहां ॥ ६६ ॥
दृष्ट्यादृष्ट्य भोगकी पार्थ । नहीं होती चाह जागृत ।
प्रारब्धसे होता जो प्राप्त । पाता वह सहज ॥ ६७ ॥
सुख या दुखमें जैसे । पाषाण रहता वैसे ।
त्याग-स्वीकार मनसे । मिट गया है ॥ ६८ ॥
कितना करना विस्तार । जिसका है ऐसा आचार ।
उसे मान तू धनुर्धर । गुणातीत ॥ ६९ ॥
गुणोंका अतिक्रमण । करनेका क्या साधन ।
कहता वह श्रीकृष्ण । सुनिये अब ॥ ३७० ॥
मानापमानमें जैसे समान शत्रु-मित्रमें ।
गुणातीत वही मान आरंभ जिसने तजा ॥ २५ ॥
५६५ गुण-निस्तारयोग
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥
गुण-निस्तारका साधन--
ऐसे जो अव्यभिचार चित्त । भक्ति-योग-रत हो सतत ।
मेरा सेवन करता पार्थ । लांघता गुण ॥ ७१ ॥
अव्यभिचारी भक्तिका विवेचन--
तब कौन हूं मैं कैसी भक्ति । अव्यभिचारकी अभिव्यक्ति ।
होना उसकी पूर्ण निश्चिति । अत्यावश्यक ॥ ७२ ॥
तब तू सुन अर्जुन । यहां है मेरा क्या स्थान ।
रत्नमें तेज जो रत्न । वैसा हूं मैं ॥ ७३ ॥
या द्रवणवत है नीर । या अवकाश है अंबर ।
या मिठास ही है शक्कर । नहीं भिन्न ॥ ७४ ॥
या अग्नि ही है ज्वाल । दल ही है कमल ।
वृक्ष जो वही डाल । फलादिक ॥ ७५ ॥
हिम होता जो संघटित । कहलाता वह हिमवंत ।
या जामन लगा दूध पार्थ । कहलाता दही ॥ ७६ ॥
यहां विश्व है जो अर्जुन । स्वयं मैं हूं वह संपूर्ण ।
चंद्र-बिंबका तरासना । न होता वैसे ॥ ७७ ॥
अजी ! जमा हुवा घृत । जमकर भी रहता घृत ।
या कंकण रूपमें भी पार्थ । होता सोना ही ॥ ७८ ॥
न उघड़ कर भी वस्त्र । स्पष्ट ही रहता सूत्र ।
जैसे न तोडके भी पात्र । रहती मृत्तिका ॥ ७९ ॥
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जो एक-निष्ठ भक्तीसे करता मम सेवन ।
लांघके गुणको सारे पाता ब्रह्मत्व है वह ॥ २६ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६६
इसलिये विश्वत्वका निवारण । कर फिर करना मेरा ग्रहण ।
ऐसा नहीं जान तू यह संपूर्ण । विश्व-सह मै हूं ॥ ३८० ॥
इस प्रकार जो मुझको जानना । उसको अव्यभिचारी भक्ति कहना ।
विश्वमें औ' मुझमें भेद देखना । व्यभिचारी भक्ति ॥ ८१ ॥
इसलिये भेद तज पार्थ । तथा करके अभेद-चित्त ।
जानना है अपने सहित । मुझको सदैव ॥ ८२ ॥
सोनेपे जैसे सुवर्ण । जडा जाता है अर्जुन ।
वैसे अपनेसे भिन्न । न मानना मुझे ॥ ८३ ॥
तेजसे जो होता उत्पन्न । तेजोमय होता किरण ।
तेजसे होता है अभिन्न । ऐसा होना बोध ॥ ८४ ॥
भूतलमें जैसे परमाणु । हिमाचलमें है हिम-कण ।
वैसे मुझमें कर अर्पण । अपनेको तू ॥ ८५ ॥
तरंग होता छोटा अर्जुन । किंतु न होता सिंधुसे भिन्न ।
वैसे ईश्वरसे नहीं भिन्न । कुछ भी यहां ॥ ८६ ॥
इसी भांति समरस । दृष्टि रख स-उल्लास ।
भक्तिका वह निवास । कहते हम ॥ ८७ ॥
ज्ञान और योगका समन्वय, अद्वय-दृष्टि—
तथा ज्ञानकी भी अर्जुन । सही दृष्टि यह है जान ।
तथा योगका है संपूर्ण । सार भी यही ॥ ८८ ॥
सिंधुसे जैसे जल-धर । लेते हैं अखंड जो धार ।
वैसी वृत्ति पांडुकुमार । बनती तन्मय ॥ ८९ ॥
जैसे कूप मुखका आकाश । सांधा न जाता महाकाश ।
होता है वैसे परम-रस । ऐक्य-रूप ॥ ३९० ॥
प्रति-बिंब तक बिंबसे । प्रभा-ज्योति होती है जैसे ।
सोऽहम् वृत्ति होती है वैसे । धनंजय ॥ ९१ ॥
५६७ : गुण-निस्तारयोग
ऐसे ही फिर परस्पर । सोऽहम् वृत्तिका अवतार ।
वह भी मिटती फिर । अपने आप ॥ ९२ ॥
जैसे नूनका एक कण । समुद्रमें पिघला जान ।
गलना भी फिर अर्जुन । भूलता जैसे ॥ ९३ ॥
अथवा जलकर तृण । बुझ जाता है अग्नि-कण ।
भेद-नाशका वैसे ज्ञान । मिटता आप ॥ ९४ ॥
रहता हूं मैं उस पार । भक्त रहता इस पार ।
यह दोनों ही मिटकर । रहता अनादि ऐक्य ॥ ९५ ॥
गुणोंको है वह लांघता । यह भी अब न रहता ।
न रहती एक वाक्यता । एकत्वकी भी ॥ ९६ ॥
इसीको ब्रह्मत्व कहते हैं जो मेरी एक-निष्ठ भक्तिसे मिलता है—
यह जो है ऐसी स्थिति । ब्रह्मत्व है कहलाती ।
मेरी अव्यभिचारी भक्ति । देती है यह ॥ ९७ ॥
तथा ऐसे लक्षण-युक्त । जगतमें मेरा जो भक्त ।
ब्रह्मत्व उससे संयुक्त । पतिव्रता जैसे ॥ ९८ ॥
पानी जो गंगामें बहता । सिंधुसे निश्चित मिलता ।
इसमें नहीं है अन्यथा । उसी भांति ॥ ९९ ॥
ज्ञान-दृष्टिसे जो अर्जुन । करता है मेरा सेवन ।
होता है वह जुडा रत्न । ब्रह्म-पदका ॥ ४०० ॥
ऐसे ब्रह्म-पदका पार्थ । सायुज्य ऐसी व्यवस्था ।
उसीका नाम है चौथा । पुरुषार्थ जो ॥ १ ॥
किंतु मेरा यह आराधन । होता है ब्रह्मत्वका सोपान ।
इससे मैं इसका साधन । मानेगा तू ॥ २ ॥
यदि एसा है तेरा मन । करता कल्पना अर्जुन ।
नहीं है अन्य मेरे बिन । कोई ब्रह्म ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६८
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥
सबका मूल आधार मैं हूं--
ब्रह्म नामका आधार । मैं हूं यहां धनुर्धर ।
औ' अन्य शब्दका सार । वह भी मैं हूं ॥ ४ ॥
जैसा मंडल औ' चंद्रमा । अभेद होते हैं जान मर्म ।
वैसे ही मैं और हे ब्रह्म । एक-रूप ॥ ५ ॥
तथा नित्य जो निष्कंप । अनावृत्त धर्मरूप ।
सुख-रूप जो अमाप । अद्वितीय ॥ ६ ॥
विवेक अपना काम । करके मिलता धाम ।
निष्कर्षका है निःसीम । वह भी मैं हूं ॥ ७ ॥
विजय गया अब दूर-
अजी ! कीजिये यह श्रवण । अनन्य भक्त-प्रिय श्रीकृष्ण ।
करता है पार्थसे कथन । कहता संजय ॥ ८ ॥
धृतराष्ट्र कहता यह सुन । तुझसे यह पूछता है कौन ।
बिन पूछे ही व्यर्थका भाषण । करता क्यों तू ? ॥ ९ ॥
विजयकी वार्ता तू कहकर । हमारी व्यग्रता .दूर कर ।
कहता है "विजय गया दूर" । संजय मनमें ॥ ४१० ॥
संजय है मनमें विस्मित । वैसे ही है अतिशय त्रस्त ।
किस भांति यह द्वेश-रस । श्रीकृष्णसे है ॥ ११ ॥
फिर भी वह कृपालु हो तुष्ट । इन्हें करें आत्म-विवेक पुष्ट ।
जिससे हो इनका रोग नष्ट । महा-मोहका ॥ १२ ॥
आधार ब्रह्मका मैं हूं वैसे ही अमृतत्वका ।
शाश्वत धर्मका भी मैं तथा निस्सीम सुखका ॥ २७ ॥
(72) ५६९ गुण-निस्तारयोग
करता है संजय ऐसा चिंतन । तथा करता संवादका श्रवण ।
जिससे उमडकर आता मन । हर्षातिरेकसे ॥ १३ ॥
ऐसा हो वह उत्साहित । अब श्रीकृष्णार्जुनकी बात ।
कहेगा तो देकर चित्त । सुनियेगा ॥ १४ ॥
उन अक्षरोंका जो है भाव । पहुंचाऊंगा आपके ठांव ।
कहता सुनिये ज्ञानदेव । निवृत्तिका दास ॥ १५ ॥
गीता श्लोक २७
ज्ञानेश्वरी ओवी ४१५.
१५
पुरुषोत्तम-दर्शनयोग
श्रीसद्गुरुकी मानस-पूजा—
अपना यह अंतःकरण । बना करके श्रीसिंहासन ।
उस पर रखेंगे चरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥
ऐक्य भावकी अंजली । इंद्रिय-कमल-कली ।
भरकर पुष्पांजली । देंगे अर्घ्य ॥ २ ॥
अनन्यता-उदक शुद्ध । संस्कार निष्ठाका सु-सिद्ध ।
लगावें अनामिका गंध । चंदन-तिलक ॥ ३ ॥
स्वर्णिम प्रेमके नूपुर । श्रीचरणमें सुकुमार
चढायें समर्पित कर । विशुद्धतासे ॥ ४ ॥
अनन्यतासे जो है दृढ । अव्यभिचारका निचोड़ ।
बनाके चरणोंके जोड़ । चढ़ायेंगे ॥ ५ ॥
आनंद-मोद बहुल । सात्विकताके मुकुल ।
खिले हुए अष्ट-दल । चढायें पदपे ॥ ६ ॥
जलायें अहंका धूप । उतारें नाहंका दीप ।
समरस होके आप । मिले निरंतर ॥ ७ ॥
बनाके मेरे तन औ' प्राण । चढाऊं पादुका श्रीचरण ।
करूं भोग-मोक्षका निंब-लोण । उन चरणों पर ॥ ८ ॥
इन गुरु-चरणोंकी सेवा । देती सकल पुरुषार्थ मेवा ।
प्राप्त हो हम वह सुदैव । ऐसा करें हम ॥ ९ ॥
देता अंतिम-विश्रांति-स्थान । वहां तक खिलता जो ज्ञान ।
बनाता सुधा-सिंधु महान । वाचाका वह ॥ १० ॥
असंख्य पूर्ण-सुधाकर । करें जिसपे न्योच्छावर ।
होता है वक्तृत्व मधुर । जिस दैवसे ॥ ११ ॥
सूर्य उदय जो पूर्व-दिशा । देती है जगतको प्रकाश ।
करती दीवाली ज्ञान-दशा । वैसे श्रोताओंकी ॥ १२ ॥
जिससे स्फुरता है व्याख्यान । लगता नाद-ब्रह्म भी बौना ।
मोक्ष-धाम भी है शोभा-हीन । उसके सम्मुख ॥ १३ ॥
मंडपमें श्रवण सुखके । जगतको वसंत ऋतुके ।
सुख मिले व्याख्यान-वल्लीके । ऐसा बहार आता ॥ १४ ॥
नहीं लगनेसे जिसकी थाह । लौटती है वाचा मनके सह ।
उसके शब्दमें आता है वह । कितना आश्चर्य ॥ १५ ॥
ज्ञान जिसे नहीं जानता । ध्यानमें भी जो नहीं आता ।
वह है अगोचर रमता । उसकी गोष्ठियोंमें ॥ १६ ॥
इतना बड़ा जो सौभग । बनता है वाचाका अंग ।
गुरु-पद-पद्म-पराग । प्राप्त होता ॥ १७ ॥
ऐसा यह भाग्य है नहीं । मेरे बिन अन्यको कहीं ।
कहता है आपसे यहीं । ज्ञानदेव ॥ १८ ॥
रहा हूं अबोध बालक । श्रीगुरुका इकलौता एक ।
इसी लिए कृपा स्वाभाविक । मिली मुझको मात्र ॥ १९ ॥
मेघमाला जैसे संपूर्ण । देती है चातकको प्राण ।
मेरे लिए गुरु-चरण । बने वैसे ॥ २० ॥
तभी मेरा रीता ही मुख । करने लगा बकबक ।
किंतु निकला स्वाभाविक । गीता तत्व मधुर ॥ २१ ॥
होता है जब दैव अनुकूल । रेती बनते मोति अनमोल ।
शत्रु भी बन जाते हैं सकल । ऐश्वर्य सह मित्र ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५७२
चुल्हेपे चढाये हुए हरल । पक जाते अमृतसे चावल ।
भूखेका रखना यदि काल । जगन्नाथको ॥ २३ ॥
ऐसे ही जिसे श्रीगुरुवर । करते हैं जब अंगीकार ।
बन जाता है सारा संसार । मोक्षधाम ॥ २४ ॥
देखो कैसे नारायण । पांडवोंके अवगुण ।
बना देते हैं पुराण । विश्व-वंद्य ॥ २५ ॥
ऐसे श्री निवृत्तिराज । मुझ अज्ञानिमें आज ।
लाते हैं ज्ञानका ओज । स्व-कृपासे ॥ २६ ॥
रहने दे यह गुरु-गुण वर्णन । वर्णनसे होती है महिमा मलीन ।
गुरुवर्णनका मुझमें कहां ज्ञान । इसीलिए ॥ २७ ॥
उनकी कृपासे सदय । कहते गीता साभिप्राय ।
धोता हूं मैं आपके पूज्य । अब श्री चरण ॥ २८ ॥
करता चौदहका अंत । कह कर यह सिद्धांत ।
अर्जुनसे श्री भगवंत । कैवल्य पति जो ॥ २९ ॥
ज्ञानी ज्ञानसे मोक्ष पाता है—
करता जो ज्ञान हस्तगत । मोक्ष पाता है वही समर्थ ।
होता इंद्रपद हस्तगत । जैसे शत-मखसे ॥ ३० ॥
अथवा लेकर शत जन्म । करता सतत ब्रह्म-कर्म ।
वही बनता अंतमें ब्रह्म । अन्य नहीं कोई ॥ ३१ ॥
या करता है सूर्य दर्शन । केवल मात्र एक नयन ।
वैसे केवल ज्ञानसे मान । मोक्ष प्राप्त ॥ ३२ ॥
ऐसे ज्ञान के लिए कौन । होता यहां सामर्थ्यवान ।
खो जानेसे हुवा दर्शन । अकेलेका ॥ ३३ ॥
पातालमें भी जो है निधान । दिखाएगा लगाके अंजन ।
इसके लिए होना लोचन । पाव्जके ही ॥ ३४ ॥
वैसे ही मोक्ष देगा ज्ञान । यहां बात नहीं भिन्न ।
इसके लिए होना मन । परम-शुद्ध ॥ ३५ ॥
५७३ पुरुषोत्तमयोग
ज्ञानके लिए वैराग्य आवश्यक—
तब विरक्तिके बिन । टिकता नहीं ज्ञान ।
निर्णय है यह जान । हरि चित्तका ॥ ३६ ॥
विरक्तिका कौनसा प्रकार । करेगा मनका अंगीकार ।
कर रखा यह भी विचार । सर्वज्ञ हरिने ॥ ३७ ॥
यह है विष मिश्रित अन्न । अतिथिको हो इसका ज्ञान ।
छोड़ उठता वह भोजन । इसी भांति ॥ ३८ ॥
अनित्य यह सब संसार । जानता है जो इसका सार ।
वह करता विरक्ति दूर । तो भी वह चिपकती ॥ ३९ ॥
पंद्रहवे अध्यायकी भूमिका—
अनिश्चितताका रूप निश्चित । वृक्ष-रूपकसे है जगन्नाथ ।
सुनायेंगे सुने सब यथार्थ । पंद्रहवेंमें ॥ ४० ॥
सहज पडा जो हो उन्मूलन । डाली जड़ उलट कर जान ।
सूखेगा वह जैसे क्षण क्षण । वैसे नहीं यह ॥ ४१ ॥
मिटाते हैं ऐसा दिखाकर । रूपकका भला चमत्कार ।
जन्म-मरणका जो चक्कर । संसारका ॥ ४२ ॥
दिखाके संसारका अनित्यत्व । स्वरूपमें अहंताका लयत्व ।
कहा जायेगा अब सार-तत्व । पंद्रहवेंमें ॥ ४३ ॥
अब यहीं ग्रंथ हृद्गत । कहेंगे सिद्धांत विस्तृत ।
सुने आप देकर चित्त । श्रोतृ-वृंद ॥ ४४ ॥
वह ब्रह्मानंद समुद्र । जो पूर्ण-पूर्णिमाका चंद्र ।
तथा द्वारकाका नरेंद्र । कहता ऐसा ॥ ४५ ॥
अजी ! सुन तू पांडुकुमार । आते हुए स्वरूपके घर ।
रुकावट करता समीर । विश्वाभासका ॥ ४६ ॥
वह जो जगडंबर । नहीं है यहां संसार ।
जान महा तरुवर । पड़ा है यहां ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी : ५७४