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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 632

शरीरमें करते हैं तीनों गुण । अपने सामर्थ्यका घोर नर्तन
न भेजता वह करने दर्शन । अपनी अहंताको ॥ ३१० ॥
हृदयमें ऐसा वह धनंजय । रहता है करके दृढ निश्चय ।
शरीरमें करते क्या गुण-त्रय । यह न जानता वह ॥ ११ ॥
तज कर अंगका खोल । सर्प घुस बैठा पाताल ।
त्वचाका करेगा संभाल । कौन बाहर ॥ १२ ॥
अथवा पक्व सौरभ जैसा । लय होता आकाशमें वैसा ।
न आता कभी कमल-कोश । लौटकर जो ॥ १३ ॥
हुवा स्व-रूप समरससे । उसकी जीव-दशा भी वैसे ।
रहा शरीर-धर्म भी कैसे । जानता नहीं ॥ १४ ॥
तभी जन्म जरा मरण । इत्यादि जो छ हैं लक्षण ।
रहे ये देहके कारण । इसकी वार्ता नहीं ॥ १५ ॥
घट ही जब टूट गया । खपरा भी है फेंका गया ।
महदाकाशमें हो लिया । घटाकाश ॥ १६ ॥
देहका भाव जब मिटता । निजका ही स्मरण रहता ।
तब कहो अन्य क्या रहता । उसके बिन ॥ १७ ॥
ऐसा जो श्रेष्ठ बोध-युक्त । देहमें रहता सतत ।
तभी मैं उसे गुणातीत । कहता अर्जुन ॥ १८ ॥
श्रीकृष्णके सुन ये बोल । तुष्ट हुवा पार्थ निर्मल ।
गरजने पर बादल । मोर होता जैसे ॥ १९ ॥
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥
अर्जुनने कहा
त्रिगुणातीतके देव कह लक्षण तू मुझे ।
आचार उसके कैसे कैसे निस्तारता गुण ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ५६०