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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

सोना चमक रहा हो। देव सृष्टि लज्जित हो जाय ऐसा भव्य समारोह राज्याभिषेक
के समय रायगढ़ पर हुआ था किन्तु तब भी शिवाजी महाराज के मुख पर ऐसी आभा
दिखाई नहीं पड़ी थी। शम्भूराजा का हाथ अपने हाथ में लेकर महाराज भाव विभोर
होकर बोले, "शम्भू बेटा! महाराष्ट्र केवल मराठों का राज्य नहीं है। यह देव या
ब्राह्मण का भी राज्य नहीं है। महाराष्ट्र का अर्थ है महार लोगों का राज्य—परिश्रम
करने वालों का राज्य। यहाँ हर एक किले के लिए एक-एक पत्थर गढ़ने के लिए,
हथौड़े के साथ खेलते हुए जिन्होंने अपनी उँगलियाँ कुचल डालीं, किले के कलश
की नींव में अपनी बलि चढ़ाई, उन सभी का राष्ट्र अर्थात् महाराष्ट्र।"

दो

मोरोपन्त ने अण्णाजी से कहा, "दत्तो बा, कल आन्ध्रभावाल के कुनबी राजा से
मिले।"
"अच्छा?" मोरोपन्त की बात सुनकर अण्णाजी दत्तो हड़बड़ा गये। बड़े
महाराज मान गये। वहाँ भीषण अकाल पड़ा हुआ है। महाराज ने स्वीकृति दे दी।
महसूल माफी का निर्णय भी उन्होंने तत्काल घोषित कर दिया।
अण्णाजी को यह तरीका अच्छा नहीं लगा। वे क्रोध के आवेश में बोलने
लगे—"मैं उसी समय दरबार में सभी से कहकर आया था कि उस कुनबट सीधे
महाराज के पास मत जाने देना। मन लगाकर खेती नहीं करेंगे, मेहनत नहीं करेंगे।
राज्य के किस किस कोने से ये ग्रामीण लोग दौड़े दौड़े चले आते हैं। उठते बैठते
शम्भूराजा, शम्भूराजा कहकर गला फाड़ते रहते हैं। वसूली और महसूल माफी में
भी युवराज हस्तक्षेप करने लगे तो समझो कि बड़ा कठिन समय आने वाला है।"
अण्णाजी के आवेश पर मोरोपन्त ठठाकर हँसे। इस पर अण्णाजी की भौंहें
और भी तन गयीं। उसी समय मोरोपन्त उन्हें शान्त करते हुए गम्भीर आवाज में
बोले, "राज्य की प्रजा की शिकायतें युवराज को नहीं सुननी चाहिए क्या? क्या
राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में युवराज केवल गोटियाँ खेलते रहेंगे?"
"बोलो मयूरेश्वर! आप सभी युवराज के पक्ष के हो।" अण्णाजी को क्रोध
आ गया।
"अण्णाजी! प्रश्न यह नहीं है कि कौन किसके पक्ष का है। प्रश्न है प्रजा की

46 :: सम्भाजी

शिकायतों को दूर करने का। वह आवश्यक है। "
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मोरोपन्त ने अण्णाजी से कहा, "कुछ दिन
पहले विशालगढ़ के कुछ लोग उनसे मिले। एक झरने पर बड़ा बाँध बाँधकर पानी
को घुमाकर खेती के लिए उपयोग में लाने की माँग कर रहे थे। युवराज उसे
उत्साहपूर्वक स्वीकार कर लिए। चलता है अण्णाजी! जब नया खून कार्यभार उठाता
है तो उसकी उड़ान भी फौवारे की तरह उछलती रहती है। हम जैसे बुजुर्गों को दो
कदम पीछे
हटकर उन्हें रास्ता देना चाहिए।"
अण्णाजी दिल खोलकर हँसे। युवराज का उपहास करते कहने लगे—
"अच्छा! तो अब झरनों के बहने की दिशा भी बदल देंगे। कल बहती नदियों पर
बाँध बाँधकर पानी रोकने की बात करेंगे।"
"इतने विस्तार से तो मुझे कुछ नहीं ज्ञात है। किन्तु कर्नाटक की लड़ाई में
शम्भूराजा अनेक नयी कल्पनाओं और योजनाओं को लेकर महाराज के साथ
विचार विमर्श करने वाले हैं।"
"चलता है। हमारे युवराज को कवि कलश के साथ रहकर कविता का रोग
लग गया है। कवियों और बैलों का दिमाग अलग अलग रहता है परन्तु उद्देश्य
दोनों का एक ही होता है। एक कागज के साथ खेलता है तो दूसरा सींग से मिट्टी
उखाड़ता है। सारा श्रम व्यर्थ।"
मोरोपन्त खास दरबार की ओर चले गये। किन्तु अण्णाजी के मस्तिष्क में एक
ही विचार मन्थन चल रहा था। उन्हें चार दिन पहले की बात याद आ गयी। उस
समय दरबार में कार्य में व्यस्त शिवाजी महाराज से मोरोपन्त ने प्रश्न किया था—
"महाराज! कर्नाटक की लड़ाई में शम्भूराजा तो जाएँगे न?"
शिवाजी महाराज ने पेशवा की ओर चौंककर देखा। तब उन्होंने हँसते हुए
उत्तर दिया—"मोरोपन्त अपनी सहायता के लिए भविष्य में तैयार होने वाले युवराज
को राजा युद्ध में नहीं ले जाएगा तो क्या उसको घर में मुर्गी की तरह बन्द रखेगा?"
"युद्ध की तैयारी करने, योजना बनाने और राजकीय कार्य व्यापार की
विभिन्न स्थितियों का ज्ञान युवराज को उचित उम्र में नहीं होना चाहिए क्या?"
बालाजी आवजी बीच में ही बोल पड़े।
बिना पूछे ही बालाजी का बोलना अण्णाजी दत्तो को अच्छा नहीं लग रहा
था। जिस संकट का अण्णाजी को भय था, वही घटित होने जा रहा था। कर्नाटक
युद्ध में युवराज संभाजी को साथ ले जाने के लिए महाराज ने निश्चय कर लिया था।
अण्णाजी के विचार से यहीं से दुष्टचक्र का आरम्भ होने वाला था। हजारों की भीड़
सम्भाजी :: 47

में शम्भूराजा का व्यक्तित्व चमकने वाला था। युद्ध में तलवार भाँजेंगे, बातचीत में
हीरे की तरह चमकेंगे। भविष्य की बात सोचकर अण्णाजी अपना धीरज खो बैठे।
दरबार में उनसे और अधिक रुका न गया। वे तेज गति से बाहर निकले। उनके पाँव
उन्हें सोयराबाई के महल की ओर खींचे लिए जा रहे थे।
अष्टप्रधानों में अण्णाजी एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। लम्बे शरीर, मजबूत कद
काठी, साँवले रंग, सिर पर तिरछी पगड़ी, कानों में झूमती मोतियों की बाली,
शानदार चाल वाले अण्णाजी दरबार की शोभा थे। वे संगमेश्वर के कुलकर्णी
परिवार के थे। उन पर शिवाजी महाराज की नजर पड़ी और उनके जीवन में
परिवर्तन आ गया। वे हिन्दवी स्वराज्य के सुरनवीस बन गये। महाराज के निजी
पत्राचार, राजनीति सम्बन्धी कार्य, महसूल की वसूली जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य उन्हीं के
पास थे। स्वराज्य की भूमि व्यवस्था का काम भी वही देखते थे। छोटी से छोटी
त्रुटि भी उनकी नजर से छूटती नहीं थी। अण्णाजी का आतंक इतना भयानक था कि
उनके नाम से ही लिपिक और अधिकारी भय से काँप उठते थे।
अण्णाजी ने स्वराज्य के लिए कुछ कम परिश्रम नहीं किया था। पन्हाला और
रांगणा किला जीतने के लिए अण्णाजी ने स्वयं तलवार चलाई थी। कोंकण प्रान्त में
स्वराज्य की व्यवस्था करने के लिए उन्होंने घोर परिश्रम किया था। उसी श्रम के
पुरस्कार के रूप में महाराज ने दक्षिण कोंकण का दाभोल, राजापुर कुडाल से लेकर
फोंडा तक का सारा प्रशासनिक कार्यभार उन्हीं को सौंप दिया था। रायगढ़ के
राजकीय कार्य व्यापार में अण्णाजी का स्थान एक किले की ही तरह मजबूत था।
संभाजी स्वभाव से मुँहतोड़ जवाब देने वाले व्यक्ति थे। युवावस्था के कारण
अपेक्षाकृत निश्चिन्त भी थे। यहाँ तक तो ठीक था। किन्तु शम्भूराजा के तीखे
स्वभाव की आग जब प्रमुख कर्मचारियों को लगने लगी तो अण्णाजी पूरी तरह
सावधान हो गये। शिवाजी महाराज को मिलने के लिए रायगढ़ जब कोई अंग्रेज,
डच या पुर्तगाली आते थे तो महाराज के साथ ही मोरोपन्त, अण्णाजी और राहूजी
सोमनाथ इन तीनों के लिए भी उपहार ले आना नहीं भूलते थे। यदि द्रव्य थोड़ा भी
कम हुआ तो अण्णाजी बहुत क्रुद्ध होते थे। कभी कभी इस प्रकार वसूली के लिए
अपने कर्मचारियों को चुपके से फिरंगियों की कोठी तक भेज देते थे। दक्षिण कोंकण
से आने वाली वसूली में अनेक बार कम रकम दिखाई जाती थी। अण्णाजी के
कृपापात्र अनेक लिपिक और वरिष्ठ लिपिक तो वहाँ थे ही।
सत्ता भी जब अचार की तरह पुरानी हो जाती है तो अधिकारियों के मुँह में
भी पानी आने लगता है। शिवाजी महाराज को ज्ञात था कि इस प्रकार की गड़बड़ियाँ
राज्य में चल रही हैं। परन्तु प्रमुख लिपिक की उम्र, उनके अनुभव, पहले के कार्य
48 सम्भाजी

उनके पूर्व चरित्र का स्मरण करके वे उस ओर अधिक ध्यान नहीं देते थे। किन्तु
शम्भूराजा के उफनते हुए गर्म खून को ये बातें सह्य न थीं। उन्होंने अनेक लोगों की
चोरी पकड़ी थी। जवानी के जोश में वे अनेक बार अण्णाजी की उम्र का ध्यान नहीं
रख पाते थे। और भरी सभा में बोल देते थे—"देखो आ गये मुफ्त का खाने वाले।
ये आ गये धन का अपहरण करने वाले।'' युवराज के इस प्रकार के स्पष्ट उद्गार को
सुनकर अण्णाजी जैसे अनुभवी लोगों के हृदय को ठेस लगती थी।
संभाजी अठारह उन्नीस वर्ष के हो गये थे। वे दिनोंदिन शक्तिशाली बनते
जा रहे थे। उनके और सुरनबीस अण्णाजी के बीच एक दरार बढ़ती जा रही थी।
हंसा की घटना के बाद से तो युवराज अण्णाजी को कई जन्मों के शत्रु से भी अधिक
दुष्ट लगते थे। अण्णाजी को आया देखकर सोयराबाई आनंदित हो गयीं। दोनों की
राह का काँटा एक ही था। इसी कारण सोयराबाई ने अपने मन की बात अण्णाजी से
कह दी। "अण्णाजी पन्त हमारे बेटे राजाराम यदि शम्भूराजा से उम्र में बड़े होते तो
कितना अच्छा होता?''
राजगद्दी के लिए उम्र का ख्याल अनेक बार नहीं किया जाता, महारानी! गर्भ
में स्थित राजमाता के पुत्र को आदर के कारण राजगद्दी का अधिकारी बनाया जाता है।
ऐसे कितने उदाहरण मैं आपको दूँ? हमारे राजाराम साहेब तो छः सात मास के हो
गये हैं।'' राजाराम के राज्याभिषेक की कल्पनामात्र से ही अण्णाजी दत्तो प्रसन्न हो
गये।
सोयराबाई थोड़ी देर तक चुप बैठी रहीं। फिर कुछ स्मरण करके बोलीं,
"एक बात तो अच्छी हुई। बिना सोंठ के ही कुछ समय के लिए खाँसी चली गयी।
शिवपुत्र कर्नाटक की लड़ाई में जा रहे हैं न? उनकी अनुपस्थिति में रायगढ़ के लोग
कुछ महीने बिना किसी बाधा के बिताएँगे।''
"नहीं, नहीं महारानी जी! आप यह क्या कह रही हैं?'' अण्णाजी
कड़वाहट भरे स्वर में बोले, "कैसे भयंकर सपने आप देख रही हैं इसकी कल्पना
क्या है आपको? इस लड़ाई में स्वयं को महाराज की दृष्टि में महापराक्रमी सिद्ध
करने का अवसर शम्भूराजा बिल्कुल नहीं छोड़ेंगे। उनके मुकुट में यह अतिरिक्त
सम्मान चिह्न होगा। हिन्दवी स्वराज्य के योग्य उत्तराधिकारी बनकर वही घूमेंगे।"
सोयराबाई ने माथे का पसीना अपने पल्लू से पोंछ लिया। लम्बी गहरी साँस
लेकर बोलीं, "पन्त! वायु की दिशा कुछ अच्छी नहीं है।"
"परन्तु इसके लिए जिम्मेदार कौन है? आप या हम?'' सोयराबाई चुप रहीं।
उनके मन में द्वन्द्व चल रहा था। हंसा प्रसंग की जाँच का दायित्व मुझे क्यों दिया
गया! शिवाजी महाराज के करोड़ों मुहरों के ज्येष्ठपुत्र, आम जनता की आशा के
केन्द्र, हिन्दवी स्वराज्य के उत्तराधिकारी शम्भूराजा पर अत्यन्त हीन कोटि का कार्य
संभाजी :: 49

करने का आरोप लगाया गया था। वसन्त पंचमी के त्योहार के दिन राजमहल में
आयी एक ब्राह्मण कन्या के साथ अत्याचार करने का आरोप। वह भी दिन दहाड़े।
वह कन्या भी किसी ऐरे-गैरे की नहीं, अष्टप्रधानों में से तीन क्रमांक के अधिकारी
सुरनबीस अण्णाजी दत्तो की लाड़ली कन्या। सोयराबाई स्मृति भ्रमित हो गयी थीं।
बड़े महाराज द्वारा दिये गये दायित्व को उन्होंने बड़ी निष्ठा से पूरा किया था। मूल
प्रश्न यह था कि जब सभी बहू-बेटियाँ वसन्त पंचमी के उत्सव के लिए अन्तःपुर में
एकत्र थीं तो हंसा उन सभी को छोड़कर दो महलों को छोड़कर तीसरे महल में क्यों
गयी? सोयराबाई ने पहरेदारों, खिदमतदारों, महल की दासियों आदि सभी की
साक्षी ली। दुख से विह्वल हंसा की माँ से भी मिली और उन्हें सान्त्वना दी। जिस
कुएँ में हंसा ने आत्महत्या की थी उसका भी मुआयना किया। अन्त में उन्होंने
शम्भूराजा को उपस्थित होने का आदेश दिया।
आरम्भ में युवराज कुछ भी बोलने के लिए तैयार न थे। अन्त में वे इतना ही
बोले, “माताजी, हमारे हर महल के आसपास इतने मन्दिर हैं, तुलसी के वृंदावन
हैं, इतना ही नहीं हर दरवाजे की चौखट के साथ श्री गणेशजी की मूर्ति रखी है, हर
गवाक्ष में भगवान प्रस्तर की मूर्तियाँ विराजमान हैं। इतने मंगलमय वातावरण और
उसकी पवित्रता को हम कैसे भूल सकते हैं?”
“किन्तु शम्भूराजा! तुम पर जो आरोप लगाया गया है वह सच है, या झूठ?
इसी का स्पष्ट उत्तर दो।”
“आप इस तरह पूछ ही कैसे सकती हैं, माताजी? इधर-उधर हजारों लोगों
की भीड़ में दिन दहाड़े किसी जवान युवती को अपने पलंग पर खींचने वाले क्या
हम कौवों की औलाद हैं? मैं सिंह का बच्चा हूँ, जंगल का तोता हूँ।”
सोयराबाई ने सारे बयान दर्ज कर लिए। साथ में बालाजी चिटणीस तो थे ही।
उन्हीं के द्वारा सारा वृत्तान्त लिखकर तैयार हुआ। जब महाराजा ने सारे विवरण पर
निगाह दौड़ाई तो एक लम्बी साँस लेकर राहत का अनुभव किया। महाराज ने
सोयराबाई से केवल इतना पूछा, “रानी साहब यदि वास्तव में इस प्रकार का पाप
घटित हुआ होता तो आप क्या करतीं?”
बिना एक क्षण रुके और बिना महाराज को देखे सोयराबाई ने कहा,
“युगप्रवर्तक और पुण्यवान पिता ऐसा बदनाम पुत्र देखकर हमें अत्यन्त क्षोभ होता।
मैंने महाराज से अनुरोध किया होता कि ऐसे अपराध के लिए किसी ऊँची पहाड़ी से
खाई में गिरा देने का नया नियम बनायें।”
इस उद्गार से महाराज प्रसन्नतापूर्वक हँसे। सोयराबाई कुछ अचकचा गयीं।
उन्होंने महाराज से पूछा, “दरबार में प्रह्लाद निराजी और काजी हैदर जैसे बड़े-
बड़े न्यायाधीश के होते हुए इस जाँच का कार्य आपने मुझे क्यों सौंपा?”
50 :: सम्भाजी

महाराज मन्द-मन्द मुस्कराते हुए बोले, "एक तो यह घटना ही बहुत
संवेदनशील थी। दूसरे आप शम्भू की सौतेली माँ। इसलिए मुझे विश्वास था कि
आरोपी के प्रति जरा भी सहानुभूति रखे बिना आप कठोरता से पूछताछ करेंगी।
इससे जो सच्चाई होगी वह अन्त में सामने आ जाएगी। इसलिए आपको यह दायित्व
सौंपा।"
वे सारी बातें सोयराबाई को स्मरण हो आयीं। वह अण्णाजी से स्पष्ट शब्दों
में बोली, "हंसा ने एकतरफा प्यार में असफल होने के कारण कुएँ में कूदकर
आत्महत्या की। अपना यह अनुमान मुझे आज भी सत्य लगता है, पन्त।"
"देखिए महारानी जी! शम्भूराजा नाम के युवराज के लिए मेरी बेटी अकारण
अपनी जिन्दगी से हाथ धो बैठी। यही शम्भू हमारे सारे विनाश की जड़ है, यही
शम्भू हमारा घातक है। इस बात को मैं अपनी आखिरी साँस तक नहीं भूल
सकता।"
"फिर मुझे क्या करना चाहिए था, पन्त?"
"महारानी जी, भविष्य में बनने वाली राजमाता के जरीदार वस्त्रों और मंगल
शहनाई की थोड़ी भी याद की होती तो आपके हाथ में आयी न्याय के तराजू की
डंडी सही दिशा में झुक गयी होती।"
बहुत समय तक दोनों में बातचीत होती रही। अन्त में थके हुए अण्णाजी
अलसाते हुए उठे। धीमी आवाज में सोयराबाई से बोले, "देखिए महारानी जी, आप
ही सोचिए। यदि शम्भूराजा कर्नाटक गये तो लड़ाई में बहादुरी दिखाएँगे और
महाराज की नाक का बाल बनेंगे।"
"परन्तु अण्णाजी पन्त, इस सम्बन्ध में महाराज के साथ मेरी बात हो चुकी
है। वे शम्भूराजा को साथ ले जाने का निश्चय कर चुके हैं। उनका मन
बदलना कठिन है।"
"क्यों?"
महाराज ने कहा, "जैसे रात के पीछे दिन दौड़ता है, उसी तरह राजा के साथ
युवराज का युद्ध पर जाना योग्य और आवश्यक है। कल राज्य का कार्य भार युवराज
को ही सँभालना है।"
"अच्छा। इसका मतलब बड़े महाराज ने एक बार उत्तर दे ही दिया है,
तो?"
अण्णाजी ने पहेली सुलझाई। उस समय सोयराबाई की सारी हिम्मत समाप्त
हो चुकी थी। वे पत्थर की मूर्ति जैसी चुपचाप बैठी थीं। उनके समीप सरककर
अण्णाजी बोले, "यदि आपको स्मरण हो तो एक बार महाराज के मन में कर्नाटक
राज्य और रायगढ़ राज्य ऐसे हिन्दवी राज्य के बँटवारे का विचार आया था। आप
सम्भाजी :: 51

केवल बँटवारे का आग्रह करिए और निर्णय महराज पर ही छोड़ दीजिए कि वे
बँटवारा चाहते हैं या शम्भूराजा को साथ लेकर युद्ध पर जाना। मेरी मानो तो
शम्भूराजा का महाराजा के साथ जाना हमारे विनाश का कारण होगा। पहले से ही
पिता-पुत्र का अच्छा मेल हो गया है। राज्याभिषेक के लिए काशी से गागा भट्ट
आये थे। उस समय उनके साथ शिवपुत्र दिन रात संस्कृत काव्य पर चर्चा करते थे।
युवराज ने उन्हें अभिभूत कर लिया था। आप जानती हैं क्या कि काशी के उस
महन्त ने शिवाजी महाराज से क्या कहा था।"
"क्या ?"
"उन्होंने कहा था कि 'यह सवाई शिवाजी बनेगा।' मेरी मानो तो युवराज को
कर्नाटक युद्ध में जाने से रोको। नहीं तो चतुर युवराज शम्भूराजा अपने लिए वसीयत
लिखवा ले आएँगे और आपके राजाराम के लिए रायगढ़ घास फूस की झोपड़ी के
बाहरी कोने में भी जगह नहीं मिलेगी।"
तीन
रानी सोयराबाई बड़ी तेजी से महाराज के महल की ओर चली जा रही थीं।
आजकल उनको किसी 'अज्ञात भय ने घेर रखा था। बिस्तर पर विश्राम कर रहे
शिवाजी महाराज के पास जाकर सोयराबाई बैठ गयीं। इन दिनों वे बहुत सावधान
रहने लगी थीं। भविष्य की चिन्ता सोयराबाई को उद्वेलित कर रही थी। समय ने ही
उन्हें अपने और पराये का भेद करना सिखाया था। सोयराबाई अनेक मधुर कल्पनाएँ
करती थीं। राजमहल में ठुमक ठुमक कर दौड़ने वाला उनका बेटा राजाराम अपने
पिता के सिंहासन पर बैठना चाहिए। उसके पीछे आज के स्वराज्य सेनापति बन्धु
हम्बीर राव मोहिते खड़े रहेंगे। माता भवानी के बहुत बहुत आशीर्वाद मिलेंगे। इन्हीं
दिनों बड़े महाराज के साथ राज्य के कार्यव्यापार में शम्भूराजा की ख्याति और
लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती जा रही थी। गागा भट्ट ही नहीं, रायगढ़ पर आने वाले
फ्रांसीसियों और पुर्तगालियों के वकील भी शम्भूराजा की प्रखर बुद्धि और
कर्तव्यपरायणता की प्रशंसा करते थे। यही कारण था या कुछ और किन्तु आज कल
जब भी शम्भूराजा सामने पड़ते थे, सोयराबाई के गोरे चिट्टे भाल की छोटी नस तन
जाती थी। रंग में भंग डालने वाले शम्भूराजा उन्हें बिन बुलाये मेहमान जैसे पराये
और ठग प्रतीत होते थे। महाराज के साथ थोड़ी इधर उधर की बात करने के बाद
52 :: सम्भाजी

सोयराबाई अपने मूल मुद्दे पर आयीं—"स्वामी, शम्भूराजा तो धधकती आग है।
स्वामी के बाद उन्हें सँभालेगा कौन?"
शिवाजी महाराज हँसे उन्होंने सोयराबाई की आँखों में बदलती भावनाओं के
रंग देखे। महाराज ने कहा, "अच्छा, तो आप यह सिफारिश करने आयी हैं कि
कर्नाटक युद्ध में मुझे शम्भूराजा को साथ लेकर जाना चाहिए।"
सोयराबाई कुछ हड़बड़ा गयीं। उन्हें लगा कि अपनी बात कहते कहते कुछ
और ही तो नहीं बोल गयीं। अपने को सँभालते हुए उन्होंने फिर कहा, "नहीं, नहीं
मेरे कहने का आशय यह नहीं था। आज कल युवराज और राज्य कर्मचारियों में
ताल मेल नहीं बैठता। आपके इतनी दूर चले जाने पर इनमें यदि विरोध की आग
भड़की तो उसे बुझाएगा कौन?"
महाराज चुप हो गये। थोड़े समय के बाद सोयराबाई को तीखी नजर से देखते
हुए बोले—"महारानी जी सच बताइये मुझे क्या करना चाहिए? हम अपने साथ
उन्हें ले जाएँ या नहीं?"
"आजकल उनका व्यवहार सारी सीमाओं को तोड़ चुका है। मानसिक क्लेश
के अतिरिक्त स्वामी के हाथ और कुछ नहीं लगेगा।"
महाराज थोड़ा रुके और फिर दर्द भरी आवाज में बोले, "आपकी ही तरह
अष्ट प्रधान और विशेष रूप से अण्णाजी और राहुजी जैसे लोग भी शम्भूराजा के
लिए आग्रह कर रहे हैं। वे हठ कर रहे हैं—कुछ भी कीजिए परन्तु अपनी
अनुपस्थिति में उन्हें रायगढ़ पर मत छोड़िए। इसका अर्थ तो यह हुआ कि इस
समृद्ध स्वराज्य में हमारे शम्भूराजा के लिए बहुत कठिन समय आया है।"
सोयराबाई डर गयीं। सँवारने वाली भाषा में एक एक शब्द अलग उच्चारित
करते हुए बोलीं, "बहुत पहले महाराज के मन में स्वराज्य को दो भागों में
विभाजित करने का विचार आया था।"
"आप यहीं पर रुक जाइए, महारानी।" शिवाजी महाराज की गरुड़ जैसी
नाक पर पसीने की बूँदें छलक आयीं। उनका प्रशस्त मस्तक सिकुड़ गया। मस्तक
पर रेखायें उभर आयीं। वे तीखी आवाज में बोले, "महारानी, हमारे हिन्दवी
स्वराज्य के बँटवारे की कल्पना ही कितनी अशोभनीय और कष्टकारक है? यह
राज्य या साम्राज्य हमारा है ही नहीं। पूर्वजों के पुण्य से, भगवान के आशीर्वाद से
जन साधारण के खून-पसीने से हमें प्राप्त हुआ एक अमृत कलश है। उसे दो हिस्सों
में कैसे बाँटा जा सकता है?"
सोयराबाई से रहा नहीं गया। उन्होंने कहा, "परन्तु महाराज, आपके अकेले
शम्भूराजा ही नहीं एक और पुत्र भी हैं।"
"स्वीकार है। किन्तु यह महाराष्ट्र एक अच्छे आचार और विवेक से प्रतिबद्ध
सम्भाजी :: 53

है। शम्भू हों या राजाराम जो अपने कर्तृत्व से महान बनेगा, प्रजावर्ग और सैनिकों का
लाड़ला होगा, वही अपने परिश्रम से उत्तराधिकारी बनेगा।"
सोयराबाई का मन टूट गया। एक सामान्य स्त्री की तरह वे दहाड़ें मारकर रोने
लगीं। उनकी जैसी धीर-गम्भीर स्त्री का यह स्वरूप शिवाजी महाराज पहली बार
देख रहे थे। महारानी किसी भी प्रकार हटने को तैयार न थीं। अन्त में उन्होंने कठोर
शब्दों में महाराज से कहा, "महाराज या तो राजाराम के लिए राज्य बाँटकर दे
दीजिए या फिर अकेले शम्भूराजा को साथ लेकर न जाइए। इनमें से यदि एक बात न
मानी गयी तो मैं भोजन पानी छोड़कर भगवान को प्यारी हो जाऊँगी।"
शिवाजी महाराज ने किसी प्रकार समझा-बुझाकर सोयराबाई को अन्तःपुर में
भेज दिया। किन्तु महाराज स्वयं अन्दर-बाहर से भयभीत हो गये थे। उन्हें हल्का
सा बुखार आ गया। वे बेचैन हो गये। अन्ततः उन्होंने अपने समीपी बालाजी
चिटणीस को बुलवाया। महाराज दुखभरी वाणी में बोले-
"चिटणीस, वीर पुरुष के कर्तृत्व की कोई सीमा नहीं होती। हो सकता है
कि खुले मैदान बारूद के गोले से कोई बच जाय, किन्तु माया-ममता और स्वार्थ के
जंजाल से कोई कभी बच पाया है क्या ? चाहे राम हों या कृष्ण। इन धागों के जंजाल
से महान लोग भी हैरान हो जाते हैं।"
बालाजी पन्त चिटणीस बहुत समय तक महाराज के साथ विचार विमर्श करते
रहे। उनसे अधिक महाराज का मन जानने वाला दूसरा कौन था? बालाजी पन्त ने
अपनी राय दी- "महाराज रानी साहेब की शपथ में इतना क्या उलझना। आपने मन
में शम्भूराजा को युद्ध में साथ ले जाने का निश्चय किया है न ? तो प्रसन्नतापूर्वक
लेकर जाइए।"
शिवाजी महाराज खिन्नता से हँस दिये और बोले, "कोई व्यक्ति यदि पति
पत्नी के रिश्ते को सारी जिन्दगी बिताए तो भी यह कहना ठीक नहीं कि वह उसे
पूरी तरह जानता है। आज महारानी से मुझे जो अनुभव मिला वह बहुत ही विलक्षण
और विस्मयकारक है।"
"महाराज।"
"हाँ बालाजी। हमें कठिनाई में डालने के लिए महारानी और अन्य लोगों ने
जो समय चुना है वह भी बहुत कठिन है। कर्नाटक की लड़ाई दो-चार दिन में ही
आरम्भ होने वाली है। आधी से अधिक सेना गयगढ़ मे निकल चुकी है। ऐसे समय
में घरेलू झगड़ों के कारण यदि मैंने युद्ध को स्थगित किया तो हमारी प्रतिष्ठा
नहीं बचेगी। आज हम शम्भूराजा को ही नहीं अपनी न्यायबुद्धि को भी यथोचित
न्याय नहीं दे पा रहे हैं। अभी भी भविष्य के गर्भ में क्या-क्या रचा जा रहा है इसे
माता भवानी ही जाने।"
51 सम्भाजी

चार
येसूबाई बड़ी हड़बड़ी में अपने महल में लौट आयीं। रायप्पा ने उन्हें सूचित किया
था कि शम्भूराजा आज रोज से बहुत पहले अन्तःपुर में लौट आये हैं। थके हुए
युवराज सीधे अपने शयन कक्ष में चले गये थे। चिराग के लालप्रकाश में येसूबाई ने
युवराज की क्लान्त मुदा को देखा। वे बहुत चिन्तित दिख रहे थे। युवराज के कन्धे
पर हल्के से अपना हाथ रखकर येसूबाई ने कहा, "लगता है बहुत थक गये हैं।
कर्नाटक युद्ध कहें तो कितनी बड़ी तैयारी। सीध नीचे की ओर रामेश्वर, जिंजी तक
की दौड़।"
"क्या आपको सचमुच ऐसा लगता है कि मुझे वहाँ जाना चाहिए?"
युवराज ने कुछ आवेश के साथ पूछा।
"क्यों नहीं? आप तो जब केवल आठ नौ वर्ष के थे तभी आगरा तक की
दौड़ लगा आये थे।" शम्भूराजा के माथे पर हाथ फेरते हुए येमूबाई ने कहा, "अब
तो आप हिन्दवी स्वराज्य के भावी उनराधिकारी हैं। मसुर जी ने युवराज के रूप में
आपको पहले ही सम्मानित कर दिया है। दूमरी एक बात मम्भवतः आपके ध्यान में
नहीं आ रही है।"
"कौन सी?"
"रायगढ़ के देवदुर्लभ राज्याभिषेक समारोह के बाद महाराज की यह पहली
युद्ध यात्रा है। उसमें अपनी तलवार का जौहर दिखाने का सुअवसर आप क्यों छोड़
रहे हैं?"
येसूबाई के उत्साहवर्धक शब्दों से युवराज और भी उनेजित हो गये। वे
बिस्तर से उठकर कक्ष में इधर उधर घूमते हुए बोले-
"येसू जरा रुक! यों ही खयाली पुलाव मत पका।"
"मतलब?"
"पिताजी ने मुझे युद्ध में न ले जाने का निर्णय ले लिया है।"
"क्या कह रहे हैं?" येसूबाई का चेहरा एकदम उतर गया। शम्भूराजा कुछ
अधिक नहीं बोले। बहुत समय तक घायल सिंह की भाँति घूमते रहे। येसूबाई को
कुछ सूझ ही नहीं रहा था। लगभग चार-पाँच घंटे तक, जब तक उनके पैर थक नहीं
गये, शम्भूराजा उसी अस्वस्थता में घूमते रहे। उनकी आँखें पूरी तरह खुली थीं।
सम्भाजी : 55

निद्रा किसी मुक्त पंछी की तरह कहीं दूर भाग गयी थी।
ऐसा कुछ घटित होगा, इसका अनुमान शम्भूराजा को बिलकुल न था। वैसे
भी शम्भूराजा के लिए कर्नाटक प्रदेश कुछ नया नहीं था। छोटी उम्र में ही उनको
कोलार और चिक्कबालपुर की जागीरदारी दी गयी थी। इस कारण उनका दक्षिण में
बहुत बार आना-जाना हुआ था। अभी चार दिन पहले ही पिता-पुत्र में विचार
विमर्श हुआ था कि दक्षिण में जाकर क्या-क्या करना है। उसी समय अपने पिता
शाहजी राजा का नाम बड़े अभिमान से लेकर शिवाजी महाराज ने कहा था, "शम्भू
बंगलूर की जागीर मेरे पिताजी के अधिकार में थी। आज उस नगर का जो वैभव
और ठाट-बाट है, उसमें उनका बड़ा हाथ है।"
"जी, पिताजी।"
"किन्तु उनके बाद मेरे सौतेले भाई एकोजी राजा से एक बड़ी भूल हो गयी।
उन्होंने अपना प्रशासन केन्द्र बंगलूर से हटाकर नीचे तंजौर को बनाया।"
"किन्तु पिताजी मैंने सुना है कि तंजौर, त्रिचनापल्ली और जिंजी की ओर
प्रदेश बहुत उर्वर और कृषि की दृष्टि से समृद्ध है।"
"वह सच है। किन्तु एकोजी राजा के सुदूर दक्षिण डेग जमाने से विगत
तीन चार वर्षों मे मैसूर का राजा चिक्कदेव बहुत धृष्ट होता जा रहा है। अपने
दक्षिण के कर्नाटक और तमिल प्रदेशों से जो कुछ प्राप्त होता है उसके कारण उसे
भी खतरा पैदा हो गया है। एक न एक दिन आपको उसका भी सामना करना
पड़ेगा। उसकी व्यवस्था करनी होगी।"
ये सारी बातें शम्भूराजा को रह रहकर स्मरण हो रही थीं।
शम्भूराजा बहुत देर तक वैसे छटपटाते रहे। थोड़ी देर बाद उन्हें गहरी नींद
आ गयी, वे जोर जोर से खर्राटे भरने लगे। उनके क्रुद्ध मन और क्लान्त शरीर की
येसूबाई को पूरी जानकारी थी। वे सारी रात बिस्तर का एक कोना पकड़े युवराज के
सिर के पास बैठी रहीं। उनकी आँखों का चिराग सारी रात लगातार जलता रहा।
पाँच
शम्भूराजा के महल पर शोक की गहरी छाया घिर आयी थी। युवराज को प्राणों से
भी अधिक प्यार करने वाले कवि कलश, जांत्याजी केमरकर, कृष्णाजी कंक जैसे
56 सम्भाजी

सभी सहयोगी उनके आसपास जमा हो गये थे। युवराज की मानसिक अवस्था
अधिक न बिगड़े, कर्तृत्ववान पिता-पुत्र के बीच दुराव की दरार अधिक न बढ़े,
इसके लिए येसूबाई बहुत चिन्तित थीं। किन्तु अण्णाजी दत्तो और उनके साथी
सोयराबाई की सहायता से शम्भूराजा की पीठ में खंजर भोंक चुके थे। जो युवराज
एक श्रेष्ठ वीर के रूप में युद्ध में सम्मिलित होने वाले थे, कुटिल राजनीति के कारण
उसी युवराज के हौसले को मिट्टी में मिला दिया गया था।
शम्भूराजा की स्थिति शेर के घायल बच्चे जैसी हो गयी थी। स्थिति को
सँभालने के उद्देश्य से येसूबाई ने कहा, "कर्नाटक की एक लड़ाई से क्या होता है ?
ऐसी कितनी ही लड़ाइयाँ होंगी। स्वामी को धैर्य नहीं खोना चाहिए। ससुरजी
महाराज ने स्वामी जी को कैद करने का आदेश थोड़े ही दिया है।"
"येसू ! रायगढ़ के आसपास आज कल ऐसी प्रदूषित हवा चल रही है कि
हम कल्पना नहीं कर सकते। मुझे तो घुटन-सी अनुभव होने लगी है।"
शम्भूराजा के साथ अन्य सभी को बालाजी आवजी के आने की व्यग्र प्रतीक्षा
थी। शाम ढल चुकी थी। रात काफी बीत चुकी थी। इसी समय थके हारे बालाजी
पन्त महल में आये।
रायप्पा द्वारा दिया गया जलपात्र उन्होंने मुँह से लगाया। बिना अधिक रुके
चिटणीस ने घोषित किया, "महाराज ने सुझाव दिया है कि कर्नाटक युद्ध समाप्त
होने तक युवराज शृंगारपुर में जाकर रहेंगे।"
शम्भूराजा ने आश्चर्यचकित होकर बालाजी पन्त को देखा। करौंदे के काँटे के
लगते ही जैसे रक्त बाहर निकल आता है वैसे ही उनकी आँखें भीग गयीं। वे
बीमार से स्वर में बोले-
"इसका अर्थ तो यह हुआ कि महाराज की अनुपस्थिति में मुझे रायगढ़ पर
नहीं रहना है।"
"चिटणीस और येसूबाई ने सिर नीचे झुका लिया। युवराज के इष्टमित्र
विकल हो गये। इस घटना से बालाजी का मन भी विषाद से भर आया था। उन्होंने
कहा, "शम्भूराजा आपके पक्ष में मैंने बहुत प्रयास किया। परन्तु ऐसा लगता है कि
आपके शत्रुओं का पलड़ा भारी हो गया है।"
"चिटणीस काका, केवल एक प्रश्न का उत्तर दीजिए। राजा की अनुपस्थिति
में युवराज गद्दी सँभालते हैं। यह नियम बहुत पहले से चलता आया है-बहुत
पहले महाभारत काल से चलता आया है न ?"
"अब जाने भी दीजिए न।" येसूबाई ने कहा।
"क्यों जाने दूँ?" शम्भूराजा की आँखों में अंगारे धधकने लगे। वे जोर से
बोले, "युद्ध में जाने में मेरा कोई स्वार्थ नहीं था। पिछले कुछ वर्षों में पिताजी का
स्वास्थ्य अनेक बार खराब हो चुका है। बालाजी काका मुझे लग रहा था कि इस
सम्भाजी :: 57

युद्ध के बहाने अपने महान पिता के साथ चार दिन रहने का अवसर मिलेगा, कुछ
नया सीखने को मिलेगा। किन्तु आज मेरे गले में यह दुर्देवी फंदा क्यों डाला जा रहा
है? हम अपने जन्मदाता के साथ युद्ध में नहीं जा सकते, उनकी अनुपस्थिति में यहाँ
राजधानी में एक क्षण रह नहीं सकते। ऊपर से हमारे द्वेषियों के पक्ष के प्रतिनिधि बने
राहुजी सोमनाथ जैसे नाचीज दरबारी को सारा शासन सूत्र सौंप दिया जा रहा है?"
शम्भुराजा का मन भर आया, "येसू मेरी आँखों के आगे एक चित्र उभर रहा
है। करोड़ों मुहरों की जायदाद और तेजस्वी पिता के होने के बाद भी हम अनाथ हो
गये हैं। किसी विवश लावारिस की तरह अपना हाथ बाँधे, कर्मचारियों का आदेश
सिर आँखों पर लिए, किसी चोर उचक्के या अपराधी की तरह सिर झुकाये शृंगारपुर
की ओर चला जाना है।"
येसूबाई ने कहा, "आप को शृंगारपुर में रहकर प्रभावली गाँव का कार्यभार
सँभालना है।"
"बस! बस! इस तरह अपने ससुरजी के पक्ष में न बोलो। आज उनको युद्ध
मे जाने से पहले केवल यह प्रदर्शित करना है कि शम्भुराजा के लिए उनके मन में
कोई खोट नहीं है। यह सिद्ध करने के लिए ही वे शृंगारपुर की व्यवस्था का जुआ
मेरे गले में बाँध रहे हैं। हमारे अपमान के कम करने के ऐसे प्रयत्न से कलेजे में लगी
आग बुझने वाली थोड़े ही है।"
जिस प्रकार ग्रीष्म में वर्षा के बादल अचानक घिर आते हैं उसी प्रकार युवराज
का मन भर आया।
येसूबाई ने युवराज को आँख भरकर देखा। उस अवस्था में भी वे हँसते हुए
बोलीं "ऐसे पहाड़ जैसे दृढ़ पिता की छाया होते हुए भी आप इस तरह क्यों
डगमगा रहे हैं?"
"येसू, शत्रुओं की उखली तोपों से हमारे सीने के चिथड़े चिथड़े हो जाएँ तो
भी यह संभाजी जरा भी नहीं डगमगाएगा। किन्तु क्या बताऊँ येसू! अपने पक्ष के
स्वार्थी लोगों से आजकल मुझे बहुत भय लगने लगा हैं।"
"मतलब ?"
"येसू दुख होता है तो केवल इसी बात का कि जब मैं केवल आठ वर्ष का
नाबालिग था तब औरंगजेब जैसे दुष्ट सियार की माँद में मुझे अकेले छोड़कर मेरे
पिताजी निश्चिन्त भाव से दक्षिण की ओर चले आये थे। किन्तु आज सत्रह-अठारह
साल के उसी युवराज को युद्ध में ले जाने से उन्हें डर लग रहा है कि बह वीरता में
सवासेर सिद्ध हो जाएगा।"
"महाराज को?"
"नहीं उनके कर्मचारियों को! और मेरी माताजी सोयराबाई को लग रहा है
58 सम्भाजी

की युवराज रायगढ़ पर रह गये तो काल की तरह भयानक बन जाएँगे। सिंहासन की
बात तो छोड़ो कल को संभाजी के लिए सिर टिकाने के लिए एक आसन भी न बच
पाये, इसके लिए सभी राहु केतु एकजुट होकर कार्य कर रहे हैं।"
शम्भुराजा की बातों से उनके इष्टमित्र अत्यन्त दुखी हो गये। कवि कलश के
चेहरे का लाल रंग तो कब का गायब हो चुका था।
शम्भुराजा ने बड़े दुख के साथ कहा, "कर्नाटक की लड़ाई भले ही मेरे भाग्य
में न हो, परन्तु मुझे इस बात का दुख है कि आज रायगढ़ के दरवाजे पर पहरा देने
वाले दरबान पर पिताजी का जितना भरोसा है उतना उनके अपने बेटे पर नहीं रहा।
इसी बात से मेरा कलेजा सागौन के सूखे पत्ते की तरह चूर-चूर हो रहा है।"
छह
संभाजी राजा महाराज के महल में आए। महाराज को प्रणाम करते हुए उन्होंने कहा,
"पिताजी! आशीर्वाद दीजिए, आज दोपहर में हम निकल रहे हैं।"
"कहाँ?"
"और कहाँ जाएँगे? शृंगारपुर के लिए आपकी आज्ञा सिर आँखों पर।"
शिवाजी महाराज क्षणभर चुप रहे, फिर ममतापूर्वक पुत्र के कन्धे पर हाथ
रखकर बोले, "ऐसे कैसे? कल तक रुकिए, उसी रास्ते से तो हमें भी कर्नाटक की
ओर जाना है, बात करते-करते संगमेश्वर तक चलेंगे।"
दूसरे दिन दोपहर को दस बारह शाही पालकियाँ बाहर निकलीं, नाणे
दरवाजे से नीचे की ओर उतरने लगीं। उसी समय तुरुही और तासे की आवाज से
सारा परिसर प्रतिध्वनित हो उठा। कहार पालकी लेकर चितदरवाजे के पास पहुँच
गये। शिवाजी महाराज और संभाजी राजा ने पाचाड़ के मैदान पर दृष्टि डाली। वहाँ
पर बीस हजार घुड़सवार और चालीस हजार पैदल सैनिक खड़े थे। बहुत समय के
विश्राम के बाद शिवाजी महाराज लड़ाई पर जा रहे थे। इस समाचार से ही जानवर
और आदमी रोमांचित हो रहे थे।
आज महाराज को प्रभावशाली आशीर्वाद देने के लिए जीजा माता जिन्दा नहीं
थीं। इसलिए लड़ाई के लिए प्रस्थान करने के पूर्व राजाओं की पालकियाँ जीजा माता
की समाधि की ओर अपने आप मुड़ गयीं। काले पत्थरों से बनी छोटी सी समाधि
पर महाराज ने जवाकुसुम और स्वर्णचम्पा के पुष्प अर्पित किये। उस पवित्र समाधि
सम्भाजी :: 59

के सम्मुख महाराज ने सिर झुकाया। दूसरी ओर मैदान में आनन्दराव, बाजी सर्जेराव,
येमाजी कंक, सर्फोजी गायकवाड़, सूर्याजी मालुसरे जैसे एक से बढ़कर एक योद्धा
और वीर सरदार प्रस्थान के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे। परन्तु शिवाजी महाराज के
पाँव समाधि के पास से हटने का नाम नहीं ले रहे थे। वहाँ के पवित्र वातावरण ने
महाराज पर जादू सा कर दिया था। ऐसा लगा जैसे समाधि में आँखें निकल आयी
थीं और जीजा माता महाराज को घूर कर देख रही थीं।
पुरन्दर की घटना के बाद वाले दिन महाराज को स्मरण हो रहे थे। मिर्जा राजा
जयसिंह और दिलेरखान ने महाराष्ट्र को संकटग्रस्त कर दिया था। शिवाजी महाराज
और संभाजी को औरंगजेब ने मिलने के लिए आगरा बुलवाया था।
पिता-पुत्र के आगरा जाते समय जब शम्भुराजा ने अपने छोटे छोटे हाथों को
जीजा माता के पैरों पर रखा तो मानो जीजा माता पर आसमान ही टूट पड़ा। किसी
मादा पंछी की भाँति उन्होंने शम्भुराजा को अपनी बाँहों में समेट लिया और व्याकुल
होकर बोलीं, "शिवबा! मेरे शम्भू बेटे को किसलिए ले जा रहे हो? अभी तो पूरी
आठ बरसातें भी नहीं देखी हैं इस बच्चे ने।"
"क्या करे माताजी! शर्तनामे ने हमारे हाथ बाँध रखे हैं।" किसी भी प्रकार
और कुछ भी करके जीजा माता विलम्ब कर रही थीं। अपनी बाँहों से शम्भुराजा को
अलग करना उनकी जान पर बन आया था। जीजा माता का वह व्यवहार शिवाजी
महाराज से सहन नहीं हुआ। उन्होंने कठोर स्वर में कहा-"माताजी! कर्तव्य तो
कर्तव्य ही है, छोड़ो युवराज को। यह जानकर भी कि अफजल खान से मिलने
जाना मौत के मुँह में कदम रखना था, आपने कलेजे पर पत्थर रखकर कितनी
निर्भयता से मुझे हँसते हँसते विदा किया था! याद है आपको?"
"राजा, आप जब स्वयं दादा बनोगे तभी जान पाओगे कि पौत्र की कीमत
और ममता क्या होती है?"
"माताजी, आपकी पीड़ा हम समझ सकते हैं। किन्तु आप जानते हैं कि
गिरगिट के बच्चे बिल में रहते हैं इसलिए जीवन भर जमीन पर रेंगते हैं। हमें तो
गरुड़ के बच्चे को बड़ा करना है। उसे संकटपूर्ण मौत की खाई में नहीं फेंकेंगे तो
उसके पंखों में शक्ति कहाँ से आएगी?" शिवाजी महाराज ने यह प्रश्न पूछा था।
स्मृति की उस खरोंच से महाराज कुछ विचलित हो गये। उन्हें लगा कि
उनसे कुछ भूल हो रही है। यह सोचकर उनका मन और दुखी होने लगा। उस
काली समाधि में मानो आँखें निकल आयी थीं। लगा जैसे जीजा माता शिवाजी
महाराज से पूछ रही हैं-"क्यों शिवबा, गरुड़ के बच्चे को बड़ा करने की वह भाषा
अब कहाँ चली गयी? इतने शूरवीर बहादुर बच्चे को शृंगारपुर की गुफा में बन्द
करके आज अकेले कहाँ जा रहे हो?"
60 संभाजी

शिवाजी महाराज स्वयं को असहाय अनुभव करने लगे। उन्हें लगा कि कुछ
भूल हो रही है। मराठी सेना चिपलूण की दिशा में प्रस्थान कर रही थी। महाराज ने
जानबूझकर शम्भूराजा को अपने साथ हाथी के हौदे में बिठा लिया था। संगमेश्वर के
पास शास्त्री नदी पार करने के बाद युवराज शृंगारपुर और महाराज कर्नाटक की ओर
जाने वाले थे।
मार्ग में पिता पुत्र ने एक साथ कोंकण के स्वामी परशुराम के दर्शन किए।
सेना समुद्र की तरह उमड़ती संगमेश्वर की दिशा में आगे बढ़ रही थी। घोड़े तेज
चाल से चल रहे थे। हाथियों के गले में घंटे वातावरण में एक अलग ध्वनि
अनुगूंजित कर रहे थे। सैनिकों के हाथ का भगवा झंडा हवा में लहरा रहा था।
संभाजी राजा का गला अचानक भर आया। उन्होंने कहा, "पिताजी ! आप
अभी-अभी लम्बी बिमारी से उठे हैं। इस उम्र आप युद्ध के लिए जाएँगे और दाढ़ी-
मूँछ वाले हम लाश की तरह शृंगारपुर की गुफा में पड़े रहेंगे। युद्ध की कल्पना मात्र
से हमारी धमनियों में आग भड़कने लगती है, पहना हुआ कपड़ा भी हमें जलाने
लगता है। जाने दीजिए... हम कर भी क्या सकते हैं? हम तो महाराजा की नाराजी
के शिकार हैं।"
शम्भूराजा के सीने की आग और ईर्ष्या की भाषा महाराज को अच्छी तरह
समझ में आ रही थी। वे दुखी स्वर में बोले, "युवराज के माथ अन्याय हो जाने पर
राजा मे सीधे प्रश्न पूछा जा सकता है शम्भू बेटे। किन्तु जब राजा पर न्याय-अन्याय
प्रत्यक्ष या परोक्ष वार होते हैं, तब उसके लिए न्याय की कोई सीढ़ी कहाँ रहती
है?"
संगमेश्वर समीप आ गया। घने जंगलों के बीच से सैनिक आगे बढ़ने लगे।
पिता-पुत्र दोनों वियोग की कल्पना से चिन्तित होने लगे। शम्भूराजा ने थोड़े धीमे
स्वर में अपना असन्तोष व्यक्त किया-"पिताजी हमारा भाग्य ही फूट गया है। ऐसा
ही कहना पड़ रहा है। मर्दों की तलवारें दीवारों पर लटकी जंग खा रही हैं और
लिपिकों की कलमों में ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिशोध के दाँत निकल रहे हैं। इसीलिए तो
हमारे भाग्य में युद्ध भूमि के बदले शृंगारपुर आया।"
"जाने दो शम्भू। आप अभी उम्र में बहुत छोटे हो।"
"आगरा दरबार में औरंगजेब से मिलने गये थे, तब तो हम केवल आठ वर्ष
के थे। दस वर्ष की चौखट पार करने के पहले हम दो बार मुगलों के दरबार में
मनसबदार बन चुके थे, पिताजी। आज बीस वर्ष की देहरी पर खड़े हम बच्चे,
निन्दनीय और नादान कैसे ठहराये जा रहे हैं, पिताजी?"
संभाजी राजा के भीतर उछलते लहू उनकी भुजाओं में उद्वेलित पौरुष, आँखों
में आशा की ज्योति आदि सभी कुछ महाराज की समझ में आ रहा था। विदा होते

संभाजी :: 61

समय युवा पुत्र को समझाना भी आवश्यक था। इसलिए उन्होंने कहा, "शम्भू
आपको यहाँ पीछे छोड़ जाने में भी मेरा एक उद्देश्य है। हम सुदूर देश में अधिक
समय तक अटके रहे तो राज्य की रक्षा के लिए तो यहाँ किसी जिम्मेदार व्यक्ति को
रहना नहीं चाहिए क्या?"
"रक्षा की पूरी तैयारी और सेना रायगढ़ पर है। सारा कार्य व्यापार और सारी
सम्पदा वहाँ पर है। यहाँ शृंगारपुर में रहकर हम किसकी और कितनी रक्षा करेंगे,
पिताजी?"
कुछ छुपाने के प्रयत्न में जैसे भेद और भी खुल जाय, ऐसी स्थिति शिवाजी
महाराज की हो गयी। उन्होंने ममता से शम्भूराजा का हाथ कसकर पकड़ लिया।
कुछ देर में ही उनका दम घुटने लगा। पीड़ा से कराहती-सी आवाज में बोले,
"बस! शम्भू बेटे, हम इतना ही कह सकते हैं कि आपके लिए आज रायगढ़
सुरक्षित नहीं है। दुर्भाग्य से आज हम तुम्हें रायगढ़ भी नहीं दे सकते। साथ ही हमें
अपने होनहार और प्राणों से प्रिय शम्भू को खोना भी नहीं है।"
सेना शास्त्री नदी के पार जा रही थी। शिवाजी महाराज संगमेश्वर के
आसपास जमकर बैठी पहाड़ी की कतारों, घने जंगल और नदी पार के नावड़ी
बन्दरगाह के पास की खाड़ी को ध्यान से देख रहे थे। यहाँ का जंगल सघन दिखाई
पड़ रहा था। घने जंगल की ओर देखते हुए महाराज बोले, "शम्भू बेटे, इसके बाद
कुछ महीनों के लिए आपको शान्ति मिलेगी। अपने काव्य प्रेम के साथ विद्याभ्यास
भी कर लें। साथ ही यहाँ की मिट्टी के अनेक रंगों को परखकर देखें। जिस प्रदेश पर
आपको कल शासन करना है वहाँ के लोगों को परखना पढ़ना सीखें। ध्यान रखें
कि हमारे मराठा लोगों में कुछ ऐसी नीच प्रवृत्ति के लोग हैं कि अपने छोटे से स्वार्थ
के लिए अपने राज्य और राजा को डुबो देने में जरा भी आगा पीछा नहीं देखेंगे।"
62 . सम्भाजी

श्रृंगारपुर में
एक
श्रृंगारपुर के पीछे की ओर सह्याद्रि की श्रेणियों की लम्बी कतार और ऊबड़ खाबड़
पहाड़ थे। बहुत ही दुर्गम प्रदेश, यहाँ दिन में अन्धकार बना रहता था, देखने में
डरावना लगता था। यहीं से तिवरा घाट और भालेघाट के बहुत ही कठिन रास्ते
सह्याद्रि की चोटी पर पहुँचते थे। कोंकण बन्दरगाह का माल यहाँ से बैलों की पीठ
पर लादकर पहुँचाया जाता था। यहाँ का जंगल इतना घना था कि बाघ को भी यहाँ
से गुजरने में पसीना आ जाय। इसीलिए बैलों को खाने के साथ में घास लेकर जाते
थे। उनके साथ पचास-साठ लोग नंगी तलवारें और भाले लेकर चलते थे। और
किसी काम के लिए इस रास्ते से कोई आता-जाता नहीं था।
श्रृंगारपुर में लगभग पन्द्रह बीस हजार लोग रहते थे। इस बस्ती में सरदारों
और सम्मानित लोगों के साठ बड़े बड़े मकान थे ! बस्ती के बीचोबीच एक बड़ा
झरना था। झरने के किनारे सूर्यराव सुर्वे का बहुत बड़ा मकान था। सुर्वे के बाद उनके
दामाद शिर्के इस घर में आये। यहीं थी शम्भूराजा की ससुराल। इस घर के समीप ही
शिवाजी महाराज ने एक बड़ा राजमहल बनवाया था। उसी में शम्भूराजा, येसूबाई
और दुर्गादेवी रहते थे। बस्ती के मध्य में दो बड़े बगीचे, समकोण पर बने रास्ते और
फौवारे थे। बगीचे की दूसरी ओर सुल्तान हवेली थी। उसमें युवराज के मित्र कवि
कलश रहते थे।
श्रृंगारपुर में शाक्त पन्थियों का शक्तिपीठ बन गया था। तन्त्र मन्त्र का ज्ञान
रखने वाले बहुत से ब्राह्मण श्रृंगारपुर क्षेत्र में रहते थे।
सह्याद्रि पर्वत की भव्य चोटियों पर शिवाजी महाराज ने अभी हाल ही में
प्रतिचगढ़ नामक किले का निर्माण किया था। उस किले की चोटी पर भी बहुत से
ब्रह्मर्षियों ने अपने मठ बना लिए थे। चारों ओर की गुफाएँ भी भर गयी थीं।
येसूबाई भी अपने अपमान और उपेक्षाभाव से भीतर भीतर जल रही थीं। वे
सम्भाजी . 63

जब रायगढ़ से यहाँ आने के लिए पालकी में बैठीं, उस समय सोयराबाई ने उन्हें
जिस उपेक्षाभरी दृष्टि से देखा था, उसे वे भूल नहीं पायी थीं। परन्तु शम्भूराजा जैसे
ईंट का जवाब पत्थर से देने वाले, अपमान और अन्याय के अवसर पर कपूर की तरह
जल उठने वाले कुसुम कोमल और वज्र कठोर, समझदार किन्तु शीघ्र ही क्रुद्ध होने
वाले के पति को संभालना उनका प्रथम कर्तव्य था।
कठिनाइयों के बीच रहने और उनका सामना करने का येसूबाई को बचपन से
अच्छा अभ्यास था। प्रथा के अनुसार कु. सात वर्ष की उम्र में ही शम्भूराजा के साथ
उनका विवाह हो चुका था। स्वराज्य पर आने वाली विपत्तियों के साथ उनकी
भावनाओं की नाल जुड़ी थी। महाराष्ट्र पर मुसलमानों ने पहला बड़ा आक्रमण
किया था। तब पुरन्दर अपमानजनक सन्धिपत्र पर शिवाजी महाराज को हस्ताक्षर
करने पड़े थे। इसके अतिरिक्त शम्भूराजा जैसे अपने केवल आठ नौ वर्ष के पुत्र को
लेकर आगरा की दास्ता वाली राह पर चलने के लिए विवश होना पड़ा था।
पिता-पुत्र को आगरा की ओर गये कई महीने हो चुके थे। यहाँ राजगढ़ पर
जीजा माता बहुत चिन्तित होने लगीं। अपने पुत्र और प्रिय पौत्र की याद करके रात
बेरात घबराकर उठ जाती थीं। भोर के घने अँधेरे में पद्मावती के तालाब पर जाती
थीं। कलश भर भर कर वहाँ के महादेव का अखंड अभिषेक करती थीं। तब उनके
साथ उनकी छोटी सी पौत्रवधू येसूबाई भी होती थी। उसी तालाब के किनारे ही
शम्भूराजा की माताजी सईबाई की भी समाधि थी। येसू उस पर भी सदैव जल से
अभिषेक करती थी।
उत्तर से पिता पुत्र कब लौटेंगे, इसका कोई समाचार नहीं था। किन्तु अनेक
बार पथिकों आदि से अप्रिय समाचार सुनने में आते थे। लोग कहते थे—
"औरंगजेब जैसे मगरमच्छ के हाथ से शिवाजी सरलता से तो छूटेंगे नहीं। बादशाह
के मन में खोट है। राजा को दूर कन्दहार में भेजकर बादशाह कोई घात करना चाहता
है। वह राजा को अपने रास्ते से हटाना चाहता है। ऐसी खबरें सुनकर महाराज का
परिवार चिन्तित हो उठता था।
देखते देखते वर्षा ऋतु समाप्त हो गयी। आसमान में बादलों का नामोनिशान
न रहा। जंगल के झरने और नहरें सूख गये। हवा के साथ नाचनेवाली घास भी
अपना रंग बदलने लगी। घाम का रंग पीला होने लगा। ऐसे समय में जीजा माता
और येसूबाई का धैर्य साथ छोड़ने लगा। दूध से भरे थनवाली गाय जिस तरह बछड़े
की ममता में विकल होकर खूँटे के चारों ओर घूमती और चिल्लाती है उसी तरह
जीजा माता भी व्यग्र होने लगीं। राज्य और परिवार पर आये महान संकट से दोनों
व्यथित थीं। दोनों मन्दिर में घंटों तक पूरा दिन बैठी रहती थीं।
एक दिन महल के दरवाजे पर भगवाधारी साधुओं का एक झुंड आ गया।
64 . सम्भाजी

मन्दिर में बैठी जीजा माता के पास छोटी येसू दौड़ती हुई गयी और उनके कन्धे पर
हाथ रखकर कहने लगी—"दादीजी वे साधु आपका दर्शन करना चाहते हैं। उनमें
से एक साधु तो कह रहा है कि दर्शन किये बिना जाऊँगा ही नहीं। एकदम हठ
करके बैठा है।"
जीजा माता धीमे कदमों से बाहर आयीं। साधुओं के समूह में एक गोरा-
चिट्टा, घुँघराले बालों वाला, बिना दाढ़ी के एक साधु था। जीजा माता के सामने
आते ही दौड़कर उसने जीजा माता के चरणों में अपना सिर टिका दिया। उसके मुख
से कराहने जैसी आवाज निकली—"माँ।"
आवाज सुनते ही जीजा माता आगे बढ़ी और 'शिवबा!' कहते हुए
साधुवेशधारी शिवाजी को बाँहों में भर लिया। आखिर औरंगजेब की फौलादी
सलाखों को तोड़कर महाराज पंछी की तरह गढ़ पर उपस्थित हो गये थे।
शहनाइयों, चौघड़ों और ढांलां की आवाजें ऊँची हो गयीं। राजगढ़ किले के
हर बुर्ज से तोपें 'धुड़म धाम' 'धुड़म धाम' की आवाज में गरजने लगीं। किले में
रहने वाले लोग, सभी सिपाही प्रसन्नता से नाचने लगे। राजधानी में गरजने वाली
तोपों का आशय आसपास के बत्तीस किलों को ज्ञात हो गया। प्रत्येक किले की तोपें
प्रत्युत्तर देने लगीं। ऐसा लगा जैसे चारों ओर दशहरा दीवाली का उत्सव हो रहा
हो।
येसू की बावरी नजर केवल शम्भूराजा को ढूँढ़ रही थीं। वे कहाँ हैं? कहाँ
रुक गये हैं वे? जीजा माता भी व्याकुल हो रही थीं। उन्होंने चिन्तित स्वर में पूछा,
"शिवबा, अकेला ही आया है क्या तू? अरे मेरा शम्भू बेटा कहाँ है?"
शिवाजी महाराज चौंक गये। कुछ बात बनाते हुए बोले, "यहाँ सबके सामने
क्यों? रात को सब बताऊँगा न आपको।"
शिवाजी महाराज की रहस्यमयी बातों से येसू भीतर ही भीतर डर गयीं।
ऐसी क्या भेद की बात है जो महाराज छुपा रहे हैं? दूसरे दिन प्रातः महादेव का बड़ा
अभिषेक किया गया। गढ़ और बुर्ज के सभी छोटे बड़े देवताओं की पूजा की गयी।
सारी प्रजा को सामूहिक रूप से मीठा भोजन दिया गया।
तीसरे दिन प्रातःकाल महाराज अपने अन्तःपुर के मन्दिर में बैठे थे। उनके
पास जीजा माता और शम्भूराजा की सौतेली माताएँ बैठी थीं। महाराज ने छोटी येसू
को पास बुलाते हुए कहा, "आओ बेटा, मेरे पास आओ।" महाराज ने उसे अपनी
गोद में बिठा लिया। येसू की उम्र केवल सात वर्ष, ऊपर से बड़ी साड़ी का बोझ।
वह साड़ी में लिपटी मेले की गुड़िया-सी दिख रही थी। महाराज ने ममता से उसके
सिर पर हाथ फेरा और शीघ्रता से उसके माथे का कुमकुम मिटा दिया। जीजा माता
छावा 65