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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 793 में से

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पृष्ठ 67

मन्दिर में बैठी जीजा माता के पास छोटी येसू दौड़ती हुई गयी और उनके कन्धे पर
हाथ रखकर कहने लगी—"दादीजी वे साधु आपका दर्शन करना चाहते हैं। उनमें
से एक साधु तो कह रहा है कि दर्शन किये बिना जाऊँगा ही नहीं। एकदम हठ
करके बैठा है।"
जीजा माता धीमे कदमों से बाहर आयीं। साधुओं के समूह में एक गोरा-
चिट्टा, घुँघराले बालों वाला, बिना दाढ़ी के एक साधु था। जीजा माता के सामने
आते ही दौड़कर उसने जीजा माता के चरणों में अपना सिर टिका दिया। उसके मुख
से कराहने जैसी आवाज निकली—"माँ।"
आवाज सुनते ही जीजा माता आगे बढ़ी और 'शिवबा!' कहते हुए
साधुवेशधारी शिवाजी को बाँहों में भर लिया। आखिर औरंगजेब की फौलादी
सलाखों को तोड़कर महाराज पंछी की तरह गढ़ पर उपस्थित हो गये थे।
शहनाइयों, चौघड़ों और ढांलां की आवाजें ऊँची हो गयीं। राजगढ़ किले के
हर बुर्ज से तोपें 'धुड़म धाम' 'धुड़म धाम' की आवाज में गरजने लगीं। किले में
रहने वाले लोग, सभी सिपाही प्रसन्नता से नाचने लगे। राजधानी में गरजने वाली
तोपों का आशय आसपास के बत्तीस किलों को ज्ञात हो गया। प्रत्येक किले की तोपें
प्रत्युत्तर देने लगीं। ऐसा लगा जैसे चारों ओर दशहरा दीवाली का उत्सव हो रहा
हो।
येसू की बावरी नजर केवल शम्भूराजा को ढूँढ़ रही थीं। वे कहाँ हैं? कहाँ
रुक गये हैं वे? जीजा माता भी व्याकुल हो रही थीं। उन्होंने चिन्तित स्वर में पूछा,
"शिवबा, अकेला ही आया है क्या तू? अरे मेरा शम्भू बेटा कहाँ है?"
शिवाजी महाराज चौंक गये। कुछ बात बनाते हुए बोले, "यहाँ सबके सामने
क्यों? रात को सब बताऊँगा न आपको।"
शिवाजी महाराज की रहस्यमयी बातों से येसू भीतर ही भीतर डर गयीं।
ऐसी क्या भेद की बात है जो महाराज छुपा रहे हैं? दूसरे दिन प्रातः महादेव का बड़ा
अभिषेक किया गया। गढ़ और बुर्ज के सभी छोटे बड़े देवताओं की पूजा की गयी।
सारी प्रजा को सामूहिक रूप से मीठा भोजन दिया गया।
तीसरे दिन प्रातःकाल महाराज अपने अन्तःपुर के मन्दिर में बैठे थे। उनके
पास जीजा माता और शम्भूराजा की सौतेली माताएँ बैठी थीं। महाराज ने छोटी येसू
को पास बुलाते हुए कहा, "आओ बेटा, मेरे पास आओ।" महाराज ने उसे अपनी
गोद में बिठा लिया। येसू की उम्र केवल सात वर्ष, ऊपर से बड़ी साड़ी का बोझ।
वह साड़ी में लिपटी मेले की गुड़िया-सी दिख रही थी। महाराज ने ममता से उसके
सिर पर हाथ फेरा और शीघ्रता से उसके माथे का कुमकुम मिटा दिया। जीजा माता
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