छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 48, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोना चमक रहा हो। देव सृष्टि लज्जित हो जाय ऐसा भव्य समारोह राज्याभिषेक
के समय रायगढ़ पर हुआ था किन्तु तब भी शिवाजी महाराज के मुख पर ऐसी आभा
दिखाई नहीं पड़ी थी। शम्भूराजा का हाथ अपने हाथ में लेकर महाराज भाव विभोर
होकर बोले, "शम्भू बेटा! महाराष्ट्र केवल मराठों का राज्य नहीं है। यह देव या
ब्राह्मण का भी राज्य नहीं है। महाराष्ट्र का अर्थ है महार लोगों का राज्य—परिश्रम
करने वालों का राज्य। यहाँ हर एक किले के लिए एक-एक पत्थर गढ़ने के लिए,
हथौड़े के साथ खेलते हुए जिन्होंने अपनी उँगलियाँ कुचल डालीं, किले के कलश
की नींव में अपनी बलि चढ़ाई, उन सभी का राष्ट्र अर्थात् महाराष्ट्र।"
दो
मोरोपन्त ने अण्णाजी से कहा, "दत्तो बा, कल आन्ध्रभावाल के कुनबी राजा से
मिले।"
"अच्छा?" मोरोपन्त की बात सुनकर अण्णाजी दत्तो हड़बड़ा गये। बड़े
महाराज मान गये। वहाँ भीषण अकाल पड़ा हुआ है। महाराज ने स्वीकृति दे दी।
महसूल माफी का निर्णय भी उन्होंने तत्काल घोषित कर दिया।
अण्णाजी को यह तरीका अच्छा नहीं लगा। वे क्रोध के आवेश में बोलने
लगे—"मैं उसी समय दरबार में सभी से कहकर आया था कि उस कुनबट सीधे
महाराज के पास मत जाने देना। मन लगाकर खेती नहीं करेंगे, मेहनत नहीं करेंगे।
राज्य के किस किस कोने से ये ग्रामीण लोग दौड़े दौड़े चले आते हैं। उठते बैठते
शम्भूराजा, शम्भूराजा कहकर गला फाड़ते रहते हैं। वसूली और महसूल माफी में
भी युवराज हस्तक्षेप करने लगे तो समझो कि बड़ा कठिन समय आने वाला है।"
अण्णाजी के आवेश पर मोरोपन्त ठठाकर हँसे। इस पर अण्णाजी की भौंहें
और भी तन गयीं। उसी समय मोरोपन्त उन्हें शान्त करते हुए गम्भीर आवाज में
बोले, "राज्य की प्रजा की शिकायतें युवराज को नहीं सुननी चाहिए क्या? क्या
राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में युवराज केवल गोटियाँ खेलते रहेंगे?"
"बोलो मयूरेश्वर! आप सभी युवराज के पक्ष के हो।" अण्णाजी को क्रोध
आ गया।
"अण्णाजी! प्रश्न यह नहीं है कि कौन किसके पक्ष का है। प्रश्न है प्रजा की
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