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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 793 में से

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पृष्ठ 63

शिवाजी महाराज स्वयं को असहाय अनुभव करने लगे। उन्हें लगा कि कुछ
भूल हो रही है। मराठी सेना चिपलूण की दिशा में प्रस्थान कर रही थी। महाराज ने
जानबूझकर शम्भूराजा को अपने साथ हाथी के हौदे में बिठा लिया था। संगमेश्वर के
पास शास्त्री नदी पार करने के बाद युवराज शृंगारपुर और महाराज कर्नाटक की ओर
जाने वाले थे।
मार्ग में पिता पुत्र ने एक साथ कोंकण के स्वामी परशुराम के दर्शन किए।
सेना समुद्र की तरह उमड़ती संगमेश्वर की दिशा में आगे बढ़ रही थी। घोड़े तेज
चाल से चल रहे थे। हाथियों के गले में घंटे वातावरण में एक अलग ध्वनि
अनुगूंजित कर रहे थे। सैनिकों के हाथ का भगवा झंडा हवा में लहरा रहा था।
संभाजी राजा का गला अचानक भर आया। उन्होंने कहा, "पिताजी ! आप
अभी-अभी लम्बी बिमारी से उठे हैं। इस उम्र आप युद्ध के लिए जाएँगे और दाढ़ी-
मूँछ वाले हम लाश की तरह शृंगारपुर की गुफा में पड़े रहेंगे। युद्ध की कल्पना मात्र
से हमारी धमनियों में आग भड़कने लगती है, पहना हुआ कपड़ा भी हमें जलाने
लगता है। जाने दीजिए... हम कर भी क्या सकते हैं? हम तो महाराजा की नाराजी
के शिकार हैं।"
शम्भूराजा के सीने की आग और ईर्ष्या की भाषा महाराज को अच्छी तरह
समझ में आ रही थी। वे दुखी स्वर में बोले, "युवराज के माथ अन्याय हो जाने पर
राजा मे सीधे प्रश्न पूछा जा सकता है शम्भू बेटे। किन्तु जब राजा पर न्याय-अन्याय
प्रत्यक्ष या परोक्ष वार होते हैं, तब उसके लिए न्याय की कोई सीढ़ी कहाँ रहती
है?"
संगमेश्वर समीप आ गया। घने जंगलों के बीच से सैनिक आगे बढ़ने लगे।
पिता-पुत्र दोनों वियोग की कल्पना से चिन्तित होने लगे। शम्भूराजा ने थोड़े धीमे
स्वर में अपना असन्तोष व्यक्त किया-"पिताजी हमारा भाग्य ही फूट गया है। ऐसा
ही कहना पड़ रहा है। मर्दों की तलवारें दीवारों पर लटकी जंग खा रही हैं और
लिपिकों की कलमों में ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिशोध के दाँत निकल रहे हैं। इसीलिए तो
हमारे भाग्य में युद्ध भूमि के बदले शृंगारपुर आया।"
"जाने दो शम्भू। आप अभी उम्र में बहुत छोटे हो।"
"आगरा दरबार में औरंगजेब से मिलने गये थे, तब तो हम केवल आठ वर्ष
के थे। दस वर्ष की चौखट पार करने के पहले हम दो बार मुगलों के दरबार में
मनसबदार बन चुके थे, पिताजी। आज बीस वर्ष की देहरी पर खड़े हम बच्चे,
निन्दनीय और नादान कैसे ठहराये जा रहे हैं, पिताजी?"
संभाजी राजा के भीतर उछलते लहू उनकी भुजाओं में उद्वेलित पौरुष, आँखों
में आशा की ज्योति आदि सभी कुछ महाराज की समझ में आ रहा था। विदा होते

संभाजी :: 61