छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 59, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंसभी सहयोगी उनके आसपास जमा हो गये थे। युवराज की मानसिक अवस्था
अधिक न बिगड़े, कर्तृत्ववान पिता-पुत्र के बीच दुराव की दरार अधिक न बढ़े,
इसके लिए येसूबाई बहुत चिन्तित थीं। किन्तु अण्णाजी दत्तो और उनके साथी
सोयराबाई की सहायता से शम्भूराजा की पीठ में खंजर भोंक चुके थे। जो युवराज
एक श्रेष्ठ वीर के रूप में युद्ध में सम्मिलित होने वाले थे, कुटिल राजनीति के कारण
उसी युवराज के हौसले को मिट्टी में मिला दिया गया था।
शम्भूराजा की स्थिति शेर के घायल बच्चे जैसी हो गयी थी। स्थिति को
सँभालने के उद्देश्य से येसूबाई ने कहा, "कर्नाटक की एक लड़ाई से क्या होता है ?
ऐसी कितनी ही लड़ाइयाँ होंगी। स्वामी को धैर्य नहीं खोना चाहिए। ससुरजी
महाराज ने स्वामी जी को कैद करने का आदेश थोड़े ही दिया है।"
"येसू ! रायगढ़ के आसपास आज कल ऐसी प्रदूषित हवा चल रही है कि
हम कल्पना नहीं कर सकते। मुझे तो घुटन-सी अनुभव होने लगी है।"
शम्भूराजा के साथ अन्य सभी को बालाजी आवजी के आने की व्यग्र प्रतीक्षा
थी। शाम ढल चुकी थी। रात काफी बीत चुकी थी। इसी समय थके हारे बालाजी
पन्त महल में आये।
रायप्पा द्वारा दिया गया जलपात्र उन्होंने मुँह से लगाया। बिना अधिक रुके
चिटणीस ने घोषित किया, "महाराज ने सुझाव दिया है कि कर्नाटक युद्ध समाप्त
होने तक युवराज शृंगारपुर में जाकर रहेंगे।"
शम्भूराजा ने आश्चर्यचकित होकर बालाजी पन्त को देखा। करौंदे के काँटे के
लगते ही जैसे रक्त बाहर निकल आता है वैसे ही उनकी आँखें भीग गयीं। वे
बीमार से स्वर में बोले-
"इसका अर्थ तो यह हुआ कि महाराज की अनुपस्थिति में मुझे रायगढ़ पर
नहीं रहना है।"
"चिटणीस और येसूबाई ने सिर नीचे झुका लिया। युवराज के इष्टमित्र
विकल हो गये। इस घटना से बालाजी का मन भी विषाद से भर आया था। उन्होंने
कहा, "शम्भूराजा आपके पक्ष में मैंने बहुत प्रयास किया। परन्तु ऐसा लगता है कि
आपके शत्रुओं का पलड़ा भारी हो गया है।"
"चिटणीस काका, केवल एक प्रश्न का उत्तर दीजिए। राजा की अनुपस्थिति
में युवराज गद्दी सँभालते हैं। यह नियम बहुत पहले से चलता आया है-बहुत
पहले महाभारत काल से चलता आया है न ?"
"अब जाने भी दीजिए न।" येसूबाई ने कहा।
"क्यों जाने दूँ?" शम्भूराजा की आँखों में अंगारे धधकने लगे। वे जोर से
बोले, "युद्ध में जाने में मेरा कोई स्वार्थ नहीं था। पिछले कुछ वर्षों में पिताजी का
स्वास्थ्य अनेक बार खराब हो चुका है। बालाजी काका मुझे लग रहा था कि इस
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