सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

मिलना मुश्किल है। "
उस रात बादशाह को थोड़ा-सा बुखार आ गया था। उदयपुरी बेगम रातभर
बादशाह के पास बैठी रहीं। उन्होंने मुअज्जम को भी वहीं रोक रखा था। बादशाह
को गहरी नींद आयी।, सवेरे उनका चेहरा प्रसन्न दिख रहा था। अवसर पाकर
मुअज्जम ने धीरे से पूछा—"अब्बाजान, आदमी को अपनी औलाद पर तो भरोसा
रखना चाहिए। कम-से-कम हर बात को अविश्वास से तो न देखें?"
औरंगजेब मुस्कराया। अपनी सफेद दाढ़ी पर हल्के से हाथ फेरकर बोला,
"बेटे मुअज्जम जिसे हुकूमत का घोड़ा दौड़ाना है उसे अपनी परछाईं की ओर भी
संशय से देखना चाहिए।"
दो
मुंब्रादेवी का दर्शन करके शम्भुराजा बगल की पहाड़ी की चोटी पर चढ़े। उनके साथ
कवि कलश, रूपाजी भोसले एवं अन्य सहयोगी थे। उस पहाड़ी की चोटी से राजा
ने बाई ओर देखा। दूर घोड़बन्दर किले की दिशा में थाना गाँव के पास सामने की
पहाड़ी से लगी विशाल खाड़ी दिखाई पड़ी। वहीं खाड़ी आगे कल्याण बन्दरगाह
तक पहुँच रही थी। दाहिनी ओर नारियल के घने जंगलों में थाना और उसके
आसपास के गाँव छुपे थे। वहाँ मछुआरों की बस्ती के आसपास सफेद बालू की
चमचमाती पर्त दिखाई पड़ रही थी। वहीं पर अपनी तटबन्दी को पानी में डुबोये
थाना का किला एक सुस्त राक्षस की तरह खड़ा था। किले की तटबन्दी पर लम्बी
टोपी वाले सैनिकों का पहरा था।
शम्भुराजा बीच बीच में कल्याण बन्दर की ओर चिन्तित दृष्टि से देख रहे
थे। पिछले साल इसी जंगल से मराठों ने रूहूल्लाखान को भगाया था। दो-तीन
महीने बाद औरंगजेब का सेनापति रणमस्तखान कल्याण पर आक्रमण करने आया
था। चोले, डोंबिवली अंबरनाथ से दूसरी ओर मुरखाड तक का क्षेत्र उसने जलाकर
राख कर दिया था। मराठी क्षेत्र पर दहशत पैदा करके कल्याण के बन्दरगाह पर
क़ब्ज़ा कर लिया था।
"कविराज कल्याण का बन्दरगाह वैश्विक आयात-निर्यात का केन्द्र है। यहीं
सम्भाजी :: 425

से ही इस्ताम्बूल, पेरिस, लंदन से लेकर अफ्रीका, जावां. सुमात्रा तक का व्यापार
चलता है। इस सोने की लंका को अधिक दिन के लिए औरंगजेब के अधिकार में
छोड़ना, उसकी शक्ति को बढ़ावा देना है।"
"राजन, एक और मुद्दा भी बड़े महत्त्व का है।"
"कौन-सा?"
"औरंगजेब के सरदारों का यहाँ पैर जमाकर बैठ जाना अनुचित और
धोखादायक होगा। मराठों का कोंकण से नासिक और बाग़लान की ओर जाने का
रास्ता दुश्मनों के क़ब्ज़े में आ जाएगा। एक बार रसद पहुँचाना बन्द हुआ कि
खानदेश के अपने बीस-पचीस किले अपने आप पके जामुन की तरह हमेशा के
लिए औरंगजेब के मुँह में चले जाएँगे।
शम्भूराजा ने गर्दन हिलाकर हामी भरी। पहाड़ी से उतरते-उतरते सूबेदार
बिट्ठलराव ने राजा और कविराज को जानकारी दी—"महाराज, अभी हाल में समुद्री
क्षेत्र में अरबों के जंगेखान और अँग्रेजो के नौसैनिकों में बड़ी अनबन हुई।"
"कैसी अनबन सूबेदार?"
"अँग्रेजों के प्रेसिडेंट नामक जहाज पर आक्रमण करने के लिए जंगेखान ने
अपनी पाँच जहाजें भेजी थीं। उस जहाज को जला देने की अरबों ने पूरी
कोशिश की।"
"आगे?"
"जहाज बहुत बड़ा था। उसका नुकसान भी बहुत हुआ। किन्तु वह डूबा
नहीं। इससे मुम्बई के सारे अँग्रेज विचलित हो गये हैं।"
"अरब लोग छूट गये?" राजा ने जानना चाहा।
"नहीं, नहीं, जंगेखान के तीन जहाज जला दिये गये। आखिर में वे पीछे
हटे। कुछ भी हो निलोपन्त पेशवा से पता चला है कि जंगेखान ने अँग्रेजों को अच्छा
सबक सिखाया।"
शम्भूराजा और कविराज एक दूसरे की ओर देखकर सन्तोष व्यक्त करते हुए
हँसे। शम्भूराजा की दृष्टि नीचे तलहटी की ओर गयी। वहीं पर खाड़ी में घुसी हुई
पहाड़ी की सूँड़ पर बसा हुआ पारसिक गाँव था।
शम्भूराजा ने हाल ही में वहाँ एक किला बनाना आरम्भ किया था। पास
खुदाई का काम चल रहा था। वहाँ सैकड़ों की संख्या में कमाठी मजदूर और
कारीगर काम कर रहे थे। हाथियों की पीठ पर और ऊँटगाड़ी में लादकर पत्थर
इकट्ठे किये जा रहे थे। इन्हीं पत्थरों से पानी के तट पर बड़े-बड़े बुर्जों का निर्माण हो
रहा था।
426 :: सम्भाजी

"कविराज, रणमस्तखान की मस्ती मिटाने के लिए ही हम यहाँ आये हैं। पर
उससे अधिक पुर्तगाली नाम का मूर्ख शत्रु मुझे सता रहा है।" शम्भूराजा ने चिन्ता
व्यक्त की।
"सच है राजन, वह गोवा का वाइसराय बातें तो बड़ी मीठी करता है।
व्यवहार में भी अच्छा है। तभी तो पुत्ररत्न की प्राप्ति के अवसर पर उसने आपको
बधाईपत्र और बालक के लिए पुर्तगाल के कीमती आभूषण भेजे थे।"
कविराज के स्मरण दिलाते ही शम्भूराजा मुक्त भाव से हँस पड़े। उन्होंने
कहा, "आपने उस कपटी को अच्छी तरह पहचाना। आपको क्या बताएँ। हमारे पुत्र
के लिए शृंगारपुर से उसके मामा गणोजी के यहाँ से आभूषणों का उपहार समय पर
नहीं पहुँचा किन्तु, इस कपटी मामा का घोड़ा गांगोली के महल में उपस्थित हो
गया।"
शम्भूराजा उस विशाल खाड़ी, पुर्तगालियों के प्रदेश और बाई ओर अभी
मराठों से मुगलों द्वारा अपहृत कल्याण का क्षेत्र देखने लगे। उन्होंने कुछ उत्तेजित
होकर पूछा- "कविराज जैसा मैंने कहा था गांवा को दूत भेजा गया या नहीं?"
"राजन, इस दिशा से आप सदैव ही निश्चिन्त रहें। अपने दूत अब तक
मांडवी नदी पार करके गोवा के राजप्रासाद में पहुँच चुके होंगे।"
"क्या सन्देश भेजा है उस वाइसराय को ?"
"यही, कि हम मराठा और मुगलों के झगड़े में बिलकुल न पड़ें और आराम
से रहें। पुर्तगालियों की अधिकार वाली नदियों से यदि मुगलों की जहाजों का
आना जाना आरम्भ हुआ तो शम्भूराजा किसी भी समय गोवा पर आक्रमण करेंगे।"
मुंब्रा की पहाड़ी से शम्भूराजा जल्दी जल्दी नीचे उतरने लगे। मुंब्रा का
पहाड़ खड़ी चट्टानों वाला था। वहाँ बकरियों का चढ़ पाना भी कठिन था। घोड़ों
के वहाँ पहुँचने का तो प्रश्न ही नहीं था। राजा वहाँ के पत्थरों से होते हुए शीघ्रता से
नीचे आ रहे थे। पारसिक के किले की हो रही जुड़ाई की ओर बार बार देख रहे
थे। पानी की सतह से पचीस फीट की ऊँचाई की प्रचंड चट्टान पर यह किला
बनाया जा रहा था। उसकी नीव बहुत मजबूत थी। राजा के सामने समुद्र में लकड़ी
की अनेक मजबूत फल्लियाँ बिछाकर उस पर किला जैसा बनाया था। उस पर
अनेक तोपें बिठाई गयी थीं। पारसिक किले की पाषाणी तटबन्दी पर भी अनके
बुर्जियाँ बनाकर उनमें बत्तियाँ लगाने की व्यवस्था की गयी थी। शम्भूराजा मन से
आश्वस्त थे। कल को अगर पुर्तगाली मुगलों से जा मिलें तो उनकी नावों और
जहाजों को ध्वस्त करने की तैयारी हो गयी थी। पहाड़ी से उतरने हुए शम्भूराजा ने
कवि कलश से पूछा-
"कविराज, इस रणमस्तखान का नाम इससे पहले कभी सुना था ?"
सम्भाजी : 427

कविकल्श ने राजा की ओर देखा तब राजा स्वयं बताने लगे—"यह रणमस्तखान
फन्नी पहले आदिलशाह का सरदार था। पर बाद में मुगलों से मिल गया। कविराज,
हमारे पिताजी जालना से पन्हाला जाने के लिए निकले थे। तब इसी ने उनको
संगमनेर के जंगल में तीन दिन तक बन्दी बना रखा था।" एक ठंडी साँस लेकर
शम्भूराजा ने कहा, "कविराज, एक बात का स्मरण रखिये। उत्तर से मुगल सेना के
साथ आये सरदारों की हमें कोई चिन्ता नहीं होती किन्तु, दक्षिण के लोग अधिक
खतरनाक हैं।"
शम्भूराजा पारसिक किला बनवाने में व्यस्त थे। फिर अनेक मराठा दल
सोलापुर क्षेत्र में धावा करते हुए दहशत फैला रहे थे। शहाबुद्दीन खान की सेना के
साथ पुरन्दर, शिवापुर और राजगढ़ में निरंतर झड़प हो रही थी। राजा ने केशव
त्रिमल, निलो मोरेश्वर पेशवा और रूपाजी भोसले जैसे सरदारों को पुनः कल्याण पर
आक्रमण करने के लिए भेजा था। एक समय में बादशाह के साथ राज्य में अनेक
स्थानों पर आग का खेल चालू था। इसलिए कुछ प्रशासकीय कार्य भी रुके हुए थे।
उन्हें निपटाने के लिए राजा रायगढ़ के लिए निकले।
शम्भूराजा ने मुंब्रा के अपने स्थान पर सन्देशा भेजा—"कविराज, पन्हाला में
हंबीरराव को तत्काल सन्देश भेजिये और कहिये कि वहाँ का आक्रमण शान्त हो
गया हो तो अपने घोड़े तुरन्त कल्याण की ओर ले आइए। बरसात शुरू होने से
पहले रणमस्तखान की गर्दन तोड़नी चाहिए।"
"और महाराज तब तक हमारे लिए क्या आज्ञा है?" तुकोजी शिंदे ने पूछा।
"कल्याण का किला फिर से अपने क़ब्ज़े में लेकर राजा पर उपकार कीजिए।
दूसरा क्या है?" राजा ने कहा।
पारसिक का किला और खाड़ी की व्यवस्था अपने सहयोगियों को सौंपकर
राजा रायगढ़ चले गये। राजा रायगढ़ जा रहे तभी गुप्तचरों ने सूचना दी—
"महाराज, वह फिरंगी पलट गया है। थाने की खाड़ी से पुर्तगालियों के जहाज
कल्याण की ओर जाने लगे हैं?"
"अच्छा तो अपना पारसिक का किलेदार क्या कर रहा है?" राजा ने उसी
जगह लगाम खींचकर घोड़ा खड़ा कर दिया।
"अपने पारसिक किले की सेना रात-दिन गोले फेंक रही है। उनकी छोटी-
मोटी जहाजें और नावें जलाकर खाक कर दी गयीं। पर खाड़ी बहुत बड़ी है।
उसकी चौड़ाई भी बहुत है, महाराज।"
राजा ने सुझाव दिया—"फिर आप लोग निराश न होना। जितना सम्भव हो
फिरंगी को उतना नष्ट कीजिए।"
महाराज रायगढ़ पर आए। बहुत दिनों के बाद येसूबाई से भेंट हुई थी। बेटा
428 :: सम्भाजी

शाहू अब एक वर्ष का हो गया था। हाथ-पैर झाड़कर आगे निकल रहे थे। शीघ्र ही
चलने की सम्भावना दिख रही थी।
अभी चार ही दिन हुए थे कि सेनापति हंबीरराव राजा से भेंट करने के लिए
किले पर पधारे। महाराज उन्हें एकटक देख रहे थे। औरंगजेब भी हंबीरराव को
'आसमान में चलने वाला बिजली का गोला' कहकर उनकी तारीफ करता था।
बुरहानपुर जैसे समृद्ध नगर में तीन दिन तक चलने वाली लूट हो या खानदेश में की
गयी घुड़दौड़ हो, विदर्भ में अकोला और मुतिजापुर तक मुगलों का पीछा करना हो,
जुन्नर और अहमदनगर का दौरा ही या अभी-अभी पन्हाला में शहजादा आजम की
हार हो, 'हंबीर आयाऽऽ, हंबीर आयाऽ' ऐसा चिल्लाते हुए मुगल सैनिक इधर-
उधर भाग जाते थे।
थोड़े ही दिनों में कल्याण की ओर से बुरी खबरें आने लगीं पारसिक किले से
होने वाली गोलाबारी को पुर्तगालियों ने कोई महत्त्व नहीं दिया। वे अपने संरक्षण में
रसद और गोला-बारूद कल्याण की ओर ले जा रहे थे। इतना ही नहीं एक रात को
पुर्तगालियों की गोला बारूद मे भरी पाँच जहाजें पारसिक किले पर आक्रमण करने
आ गयीं। रातभर पानी के तट पर आग नाचती रही। सुबह होने से पहले ही
पुर्तगालियों ने आधे से अधिक किला जलाकर खाक कर दिया था।
पुर्तगालियों का यह समाचार सुनकर शम्भुराजा बेचैन हो गये। उन्होंने
सेनापति से पूछा-"हंबीरराव, यह फिरंगी मुगलों की थूक चाटने के लिए इतना
क्यों नाच रहा है?"
"महाराज, आपने भी सुना होगा कि उन दोनों के बीच एक समझौता हुआ
है। कोंकण का जितना क्षेत्र मुगल जीतेंगे उसे पुर्तगालियों को देकर, उपकार का
बदला चुकाएँगे।"
"हंबीरराव पुर्तगालियों और मुगलों को मिलने से पहले उन्हें तोड़ना
आवश्यक है। तो तत्काल निकलिए और उन टोपीधारियों को जलाकर राख कर
दीजिए।"
"जैसी आपकी आज्ञा, महाराज।"
हंबीरराव ने अपने पूर्व निश्चित स्थान की ओर न जाकर कल्याण की ओर
दौड़ लगाई। हंबीरराव के पहुँचने से पहले रणमस्तखान ने बिठोजी माने नामक
मगठा सरदार को बहुत पीड़ित किया था। हंबीरराव के नेतृत्व में बीस हजार सवार
और दस हजार की पैदल सेना कल्याण पहुँची। औरंगजेब को पता था कि अकेले
रणमस्तखान को मराठे संकट में डाल देंगे इसलिए उसने अपने मौसरे भाई
रूहूल्लाखान को रणमस्तखान की सहायता के लिए भेजा।
कल्याण की खाड़ी पर युद्ध शुरू हुआ। पानी के किनारे से होने वाले
सम्भाजी 429

आक्रमण का उत्तर मराठे बाहर से दे रहे थे। मराठों ने रणमस्तखान की मस्ती उतारने
की शुरुआत की। कल्याण और डोंबिवली परिसर से उठने वाला धुआँ और आग
की लपटें पुर्तगाली थाने किले बुर्ज से देखते रह गये। मराठों के आक्रमण से
रणमस्तखान कठिनाई में आ गया। कभी मुरबाड़ के जंगल से 'हर हर महादेव' का
उद्घोष करते हुए मराठे कल्याण बन्दगाह पर आक्रमण करते थे तो कभी दूर
मलंगगढ़ की तलहटी से धुआँ उठने लगता था। कल्याण की खाड़ी में दौड़ते हुए
घुड़सवारों की परछाइयाँ पड़ रही थीं।
कल्याण की तटबन्दी गिर गयी। दुर्गाड़ी किला सूना सूना दिखने लगा।
रणमस्तखान पीछे हटकर टिटवाला की ओर चला गया। टिटवाला के घाटी में
गजानन की साक्षी में युद्ध आरम्भ हुआ। उसी समय डोंबिवली के शम्भुराजा के
आने का समाचार हंबीरराव तक पहुँचा। यह समाचार सुनकर मराठों के शरीर का
खून उबलने लगा। कल्याण बन्दरगाह परिसर के पीछे उठता हुआ धुआँ देखकर
शम्भुराजा में उत्तेजना आ गयी। उन्हें खाने-पीने की भी सुध न रही। सारा दिन
निलोपन्त पेशवा, कवि कलश और मानाजी मोरे की तैयारी चलती रही। शाम को
ही आसपास के मछुआरों की बस्ती में खबर भेजी गयी। जंगल के निवासी और
डोंबिवली के लोग तमतमा कर खड़े हो गये। सुबह होने के पहले ही मुगल और
पुर्तगाली खाड़ी में कूद पड़े। अनेक लोग डूबकर मर गये। रातभर चलने वाली
मराठों की भुतही लीला टिटवाला के पहाड़ से साफ-साफ दिख रही थी। रात की
यह दहशत मुगलों के भीतर बैठ गयी थी।
उस दिन दोपहर को भयंकर युद्ध हुआ। अट्ठावन वर्ष के हंबीरराव के शरीर
में हाथी जितनी शक्ति आ गयी। रूहूल्लाखान पर हंबीरराव की सेना तेजी से टूट
पड़ी। अकरमखान, इब्राहिम बेग, राजा दुर्गा सिंह, माधोराम जैसे अनेक मुसलमान
और राजपूत सरदार लड़ाई मे मारे गये।
डरा हुआ रूहूल्लाखान टिटवाला के रास्ते से भागने लगा। किन्तु उसे इस
बात का पता न था कि बीस हजार की सेना लेकर स्वयं शम्भुराजा स्वागत के लिए
खड़े हैं। भागती हुई रुहुल्ला की सेना के दिखाई पड़ते ही शम्भुराजा ने उन पर
आक्रमण किया। संयोग से रणमस्तखान और रुहुल्लाखान दोनों ही घाटी में अटक
गये। रात में निश्चित की गयी योजना के अनुसार एक ओर से हंबीरराव और दूसरी
ओर से शम्भुराजा ने जोरदार आक्रमण किया। इसमें खान की स्थिति कुचली हुई
सुपारी जैसी हो गयी।
दोपहर तक खान की सारी सेना नष्ट हो गयी। जिधर भी रास्ता मिला उसी
ओर लोग भागने लगे। 'हर हर महादेव ऽ ऽ', 'जय शिवा जी', 'जय सम्भाजी'
ऐसा जयघोष करते हुए विजयी सेना डोंबीवेली के अपने शिविर में पहुँची। रास्ते में
430 :. सम्भाजी

हंबीरराव के निकट सम्बन्धी रंगोजी के युद्ध में मारे जाने की बुरी खबर मिली।
इसलिए शिविर में वापस आने में उन्हें बिलम्ब हो गया था।
शाम को शम्भूराजा विश्राम कर रहे थे। उसी समय रायप्पा बाहर से दौड़ता
हुआ अन्दर आया। भयभीत होकर कहने लगा—"महाराज, हंबीरराव को पालकी
में डालकर ले आये हैं। उनका हाथ कट गया।"
"क्या कह रहे हो?"
महाराज झट से बाहर आये और पालकी की ओर बढ़ गये। मशाल की
रोशनी में उन्होंने हंबीरराव के चेहरे की ओर देखा। हंबीरराव की काली आँखों को
मुस्कराते देखकर उनकी जान में जान आयी। हंबीरराव ने धीमी आवाज में बताया—
"महाराज व्यर्थ में चिन्तित न होइए। एक बाण से हाथ का टुकड़ा टूट गया।
इसलिए बायाँ हाथ चला गया। इतना ही तो हुआ।"
"हंबीरराव थोड़ा सँभालिए अपने आपको।" शम्भूराजा ने कहा, "दाहिना
हाथ तो बचा है न? चिन्ता क्यों करते हो?" हंबीरराव मुस्करा दिये।
शिविर में हंबीरराव की देखभाल हो रही थी। स्वयं शम्भू महाराज उनके
घावों पर पट्टी बाँध रहे थे। शम्भूराजा की दिनचर्या और चिन्ता की छाया देखकर
हंबीरराव हँसकर बोले, "शम्भू बेटे मेरे सगे भाँजे राजाराम को गद्दी मिले,
सोयराबाई जैसी महत्त्वाकांक्षी बहन की इच्छा पूरी हो इसलिए शक्ति होने पर भी मैं
कभी आगे नहीं आया। अपना तो रिश्ता ही अलग है।"
शम्भूराजा ने हंबीरराव की ओर प्रश्नार्थक दृष्टि से देखा। तब हंबीरराव ने
हँसते हुए कहा, "जो रिश्ता शिवाजी महाराज का इस मिट्टी के साथ था वही
हमारा और आपका है।" शम्भूराजा थोड़ी देर वैसे ही बैठे रहे।
हंबीरराव को उन्होंने बर्तन से निकालकर वनस्पति की औषधि दी। उसी
समय हरकारों ने सूचित किया कि वर्षा का मौसम समीप आ रहा है इसलिए
औरंगजेब ने कल्याण के लिए भेजी हुई सेना को वापस आने का हुक्म दिया है।
हंबीरराव के थोड़ा सावधान होने पर शम्भूराजा ने कहा, "हंबीरराव काल देवता
हमारे पहाड़ जैसे पिता को लेकर चला गया। उसके बाद दूसरे पहाड़ के रूप में आप
मेरे पीछे खड़े रहे। आपके साथ रहने पर मुझे अनेक बार ऐसा लगा कि पिताजी के
ही साथ हूँ। पर सँभालिए अपने आप को हंबीरराव...आप ही हमारी बाँहों की
शक्ति हैं। आपके हाथ का घाव बढ़ेगा तो हमारा कन्धा टूट जाएगा। कृपा कीजिए,
थोड़ा धीरज रखिए।"
सम्भाजी :: 431

तीन
"दिल्ली के बादशाह की शक्ति गैंडे की थी। उसके सामने मराठों का यह उत्साही
राजा बकरी का बच्चा था। एक बार यह गैंडा सम्भाजी और उसके महाराष्ट्र को
कुचल दिया तो फिर अपना फायदा-ही-फायदा है।" गोवा के पुर्तगाली वाइसराय
कांट द आल्होर ने चिढ़कर कहा।
"वह कैसे?" उनके सचिव गोंसाल्विस ने पूछा।
"औरंगजेब जिस उत्साह से आएगा उसी उत्साह से पीछे लौट भी जाएगा
फिर हम धीरे से मालवण से थाना तक का क्षेत्र अपने राज्य में मिला लेंगे। गोवा का
महाराष्ट्र बनाएँगे।" कांट साहब अपने ऊँचे राजमहल के भव्य मयखाने में मदिरा
का घूँट लेते हुए बोल रहे थे।
बढ़-चढ़कर बोलने वाला वाइसराय शम्भूराजा के उस पत्र की ओर बार बार
वितिष्णा के साथ देख रहा था। वह जितना विलासी था, उतना ही खुशदिल हद दर्जे
का स्वार्थी और धूर्त भी था। पुर्तगालियों की राजसेवा के सारे अधिकारी और
कर्मचारी सरकारी सेवा के साथ-साथ अपना स्वतन्त्र व्यापार भी करते थे। पूर्वी
गोलार्ध में कुस्तुनतुनियाँ और दुला के बाद पणजी व्यापार की दृष्टि मे अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह था।
गोवा का वाइसराय अपनी तुलना पुर्तगाल के राजा से करता था। उसकी
अपनी स्वतन्त्र सेना तो थी ही। उसमें उमने अनेक काले अफ्रीकी हबशी भी भर्ती
किये थे। पणजी शहर के चारों ओर डेढ़ पोरसा ऊँची भव्य पाषाणी प्राचीर बनाकर
वह प्रसन्नता से रह रहा था। दोनों ओर पंख फैलाकर बैठे हुए मशक्त पंछी की तरह
दिखाई देने वाला उसका राजमहल, चाँदनी को तरह चमचमाती रेत पर खड़ा था।
उसका पिछला हिस्सा समुद्र की ओर झुका हुआ था। चारों ओर हवा के साथ झूमने
वाले ऊँचे नारियल के पेड़ थे। बीच में वाइसराय के पारिवारिक जनों के तैरने के
लिए नीले पानी से भरा तालाब था। इस परिसर में विशेष मेहमानों के लिए अनेक
महल थे। ऐसा लगता था। मानो इस राजप्रासाद के सामने स्वर्ग ही उतर आया है।
कांट साहब का व्यक्तित्व भी बहुत आकर्षक था। मध्यम ऊँचाई, थोड़े मोटे,
लम्बी बाँहों वाला फूला हुआ कोट और ढीला पैंट, गालों तक कटी हुई मूँछें, भूरी
दाढ़ी और भूरी भूरी आँखें उन आँखों में समीप से झाँकने पर भी यह पता लगाना
कठिन था कि कांट साहब के मन में क्या चल रहा है? उनकी टाई हमेशा अच्छी
432 :: सम्भाजी

तरह बँधी रहती थी।
एक-दो दिनों में ही वाइसराय को कुछ दुर्लभ उपलब्धि करनी थी। बीच में
ही उसे स्मरण हुआ तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता की लहर फैल गयी। उसी धुन में
उसने सचिव से सम्भाजी का पत्र पढ़ने के लिए कहा। सचिव पढ़ने लगा-
"मराठी राज्य का कार्यभार सँभालते मुझे लगभग ढाई वर्ष हो चुके हैं। इसके
पहले हमारे दूत रामजी ठाकुर के माध्यम से आपसे पत्र व्यवहार हुआ था। मित्रता
की शर्तों और समझौतों के सम्बन्ध में भी बहुत पत्राचार हो चुका है। आपने ही
अनेक बार स्मरण दिलाया है कि आप हमारे शीव के पड़ोसी हैं। किन्तु आप कहते
कुछ हैं और करते कुछ और हैं। आपने वादा किया था कि आप दिल्ली के बादशाह
की कोई सहायता नहीं करेंगे। हमारी लड़ाई के समय आप मुगलों-दोनों से तटस्थ
रहेंगे। किन्तु दुर्भाग्य से आपने मैत्री समझौते की शर्त और शर्म दोनों किनारे कर
दिया। सूरत की ओर से समुद्री रास्ते से आने वाले गोले बारूद और रसद को अपनी
सीमा से ले आने की आपने मुगलों को इजाजत दे दी। ऐसी ही गद्दारी आपने थाना
क्षेत्र में भी की थी। ध्यान में रखिए कि इस तरह के धोखे वाली चाल का परिणाम
आपको एक न एक दिन अवश्य भोगना पड़ेगा।"
वाइसराय अचानक गम्भीर हो गया। एक ओर सम्भाजी की धमकी और
दूसरी ओर औरंगजेब का तकाजा। दोनों ही बातें महँगी पड़ने वाली थीं। उसने
परेशान होकर कहा, "इन दोनों शक्तियों के सामने जाना किसी मदारी के शरीर पर
विषैले साँप के खेल जैसा है।"
"लेकिन सर बादशाह ने आग्रह किया है कि आप सम्भाजी के साथ खुली
लड़ाई का एलान करें।" सचिव ने स्मरण दिलाया।
"ऐसा करना हमारे लिए महँगा पड़ेगा। यह सम्भा बहुत क्रोधी है, एक दम
गर्म दिमाग का। हमारे कुलाबा और थाना के अनेक बन्दरगाहों पर उसने एक साथ
आक्रमण किया है। बार बार का अग्निकांड तो चल ही रहा है। बसई की तरफ के
दो धर्मगुरुओं को वहाँ के सूबेदार ने बन्दी बना लिया है।"
"लेकिन सर आपने भी तो उसका बदला ले लिया है। मराठों का वकील
येसाजी गम्भीरराव पिछले तीन महीनों से हमारी कैद में है।"
आधी रात को येसाजी गम्भीरराव को राजभवन में बुलाया गया। उनकी ओर
देखकर वाइसराय गुर्राया—"येसाजी हम दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाते हैं तो आपका
मालिक दुश्मनी पर उतर रहा है। यह ठीक नहीं है।"
सरकार ताली कभी एक हाथ से बजती है क्या? औरंगजेब का गोला बारूद
से भरा हुआ भंडार मुगलों के प्रदेश से हमारे राज्य में आप कैसे घुसने देते हैं? यह
बात आपकी मित्रता की नीति के अनुकूल है क्या?"
सम्भाजी . 433

"येसाजी आपका राजा मतवाला है।" वाइसराय ऊँची आवाज मे पूछने
लगे- "आपका राजा अरबों से दोस्ती कैसे रखता है?"
"जिस तरह आप मुगलों से छुपकर दोस्ती रखते हैं। ठीक उसी तरह।"
वाइसराय और उनके सचिव येसाजी के निर्भीक उत्तर सुनकर कुछ देर तक
चुपचाप बैठे रहे। किन्तु येसाजी से रहा नहीं गया। अपने मन की व्यथा को प्रकट
करते हुए बोले, "विजरई सरकार, सम्भाजी से मित्रता रखने की बात आपके मन में
कभी थी ही नहीं। आप सिर्फ एक मौके की प्रतीक्षा कर रहे हैं।"
"कौन से?"
"औरंगजेब की सेना से मराठों का विनाश होने वाले मौके की।"
"नहीं नहीं येसाजी ये आप क्या कर रहे हैं? भला इसमें हम पुर्तगालियों का
क्या फायदा?" वाइसराय ने हँसते हुए पूछा।
"बहुत बड़ा फायदा, बेगुर्ला से चौल-पनवेल तक का समुद्री तट, वहाँ का
व्यापार, धन दौलत, अनाज लूटने के लिए आप पुर्तगाली जाने कब से बेचैन हैं।"
येसाजी ने थोड़े से शब्दों में पुर्तगालियों का उद्देश्य स्पष्ट कर दिया था। किन्तु
उसकी ओर ध्यान न देते हुए वाइसराय ने कहा, "आपको पात है येसाजी, अभी
पिछले महीने ही आपके सम्भाजी राजा ने हमारे रेवदांडा के किले पर आक्रमण
किया था। तारापुर, दहाणू, थाना के हमारे समुद्री तट पर जहाँ सम्भव हुआ अपना
घोड़ा दौड़ाया। हमारा प्रदेश जल रहा है। आपके सम्भाजी ने चौल की सीमा पर छः
हजार सिपाही और दो हजार घुड़सवार घुसा दिये हैं। उन्होंने वहाँ पर हमारे पूरे गाँव
की नाकाबन्दी कर दी है।"
येमाजी के चेहरे पर प्रसन्नता छा गयी। तीन महीने की कैद में उन्हें अपने
राज्य का कोई समाचार नहीं मिला था। बहुत दिनों के बाद अच्छी खबर सुनने को
मिली थी। येसाजी को पुनः जेल में ले जाया गया। कांट द आल्होर कुछ देर तक
वैसे ही विचार में डूबे रहे। फिर एक माहसी कल्पना उसके मन में आयी। उसने
अपने सचिव से कहा, "दिल्ली के शाहंशाह ने आग्रह किया कि कुछ भी करके
मराठों के साथ युद्ध की घोषणा कीजिए। किन्तु वह कठिन कार्य लगता है। जैसे
किमी आदमी का हाथ पैर तोड़कर उसे विकलांग बना दिया जाय वैसी ही अवस्था
सम्भाजी ने जंजीरे के सिद्दी की बना दी है। इसलिए उससे खुला बैर रखना साहस
का कार्य लगता है।"
सचिव दुविधा में पड़ गया कि कहे या न कहे। फिर भी साहस बटोरकर
उसने कहा, "सर सम्भाजी का प्रदेश अपनी सीमा से लगा हुआ है। डिचोली और
कुडाल के बारूदखाने में सम्भाजी अनेक बार आते हैं।
"मुझे मालूम है।"
434 .: सम्भाजी

"बहुत बार वे शिकार के लिए निडर होकर इधर-उधर घूमते हैं। हिन्दुओं के
देवस्थानों का दर्शन करते हैं। तब उसके साथ थोड़े ही सिपाही होते हैं।"
"हूँऽऽ.."
कुछ सोचकर वाइसराय का चेहरा खिल उठा। उसने अपने सचिव को आदेश
दिया—"अपनी सेना को सावधान रहने के लिए कहो। वह सम्भा इधर कब आता
है ? कब जाता है ? कहाँ घूमता है ? उसकी हर एक गतिविधि पर नजर रखो।"
दिनाँक 12 अगस्त. 1683 का वह दिन।
सुबह होते ही वाइसराय कांट द आल्होर की शाही नाव दीवाड़ी बन्दरगाह
तक आ गयी थी। सामने गोवा की पंचगंगा नदी बह रही थी। आज गोकुल अष्टमी
का दिन था। दीवाड़ी-बन्दरगाह पार करने के बाद सामने भतगाँव का नाखे गाँव था।
नाखे गाँव के लिए गोकुल अष्टमी का दिन आनन्द का दिन होता था। ऐसा सभी का
विश्वास था कि गोकुल अष्टमी के दिन नाखे के घाट पर स्नान किया तो बहुत पुण्य
लाभ होता है। इसलिए गोवा बारदेश से बेगुर्ला तक के अनके हिन्दू इस पर्व का
पुण्य लूटने दौड़े आते थे।
अभी तक सूर्य ठीक से ऊपर नहीं आये थे। अभी भी जल का प्रवाह काला
दिखाई पड़ रहा था। दीवाड़ी के तट के ऊपर से वाइसराय अपनी भरी आँखों से नदी
के पार देख रहा था। उसकी दाहिनी ओर दीवाड़ी के थानेदार और फौजदार खड़े
थे। दिन निकलने के बाद कांट साहब ने फौजदार के हाथ से पीतल की दूरबीन
अपने हाथ में ली। उमसे नदी के पार देखा। अब दूसरी ओर का सम्भाजी के
अधिकार वाला हरा भरा क्षेत्र स्पष्ट दिखाई देने लगा। कांट साहब के मन में
गुदगुदी होने लगी।
औरंगजेब ने वाइसराय को अनेक पत्र भेजे थे। सभी में उसने वही बात
दोहराई थी। "सम्भाजी के जितने क्षेत्र पर आप क़ब्ज़ा करेंगे वह सारा क्षेत्र हम
पुर्तगालियों को दे देंगे। किन्तु आप इस काफिर के बच्चे को किसी तरह जिन्दा या
मुर्दा पकड़ लिया तो गोवा के साथ कोंकण का पूरा क्षेत्र हम आपकी दे देंगे।" किसे
मालूम किन्तु वाइसराय को औरंगजेब पर बहुत भरोसा लग रहा था। किसी भी
प्रकार से पुर्तगालियों को बेगुर्ला से पनवेल तक के सम्पन्न इलाके पर क़ब्ज़ा करना
था। उसके लिए वे पिछले अनेक वर्षों से प्रयत्नशील थे।
दो दिन पहले गुप्तचरों ने गोवा के राजभवन में जब यह खुशखबरी दी तब
पचास वर्ष का अनुभवी, अनेक देशों में घूमा हुआ वाइसराय भी खुशी से पागल हो
. गया। उसे कल्पना नहीं थी कि उसका भाग्य इतना अच्छा होगा? गोकुल अष्टमी
के शुभ मुहूर्त में नाखे घाट पर शम्भुराजा आने वाले थे। उन्हें पवित्र स्नान करना था।
यह पक्की खबर थी।
सम्भाजी :: 435

एक दिन पहले से ही पंचगंगा के दोनों तटों पर पुर्तगाली सेना की अनेक
टुकड़ियाँ आसपास के जंगलों में छुपकर बैठी थीं। प्रायः तीर्थस्थान या देवपूजा के
लिए जाते समय शम्भूराजा अपने साथ बहुत कम सेना रखते थे। वह सूचना
वाइसराय को भी मिल चुकी थी। फिर भी सात-आठ सौ शस्त्रधारी उनके साथ
होंगे। फिर भी साहस के साथ आक्रमण करके शम्भूराजा को बन्दी बनाकर बदला
लेना है। ऐसी वाइसराय की इच्छा थी।
अब सुबह हो चुकी थी। पंचगंगा के दूसरे किनारे पर कुछ हिन्दू यात्री पानी
में उतरते दिखाई देने लगे थे। दूसरा किनारा मराठों के अधिकार में होने पर भी पर्व
के समय मराठे वहाँ नहीं आते। इस बात का वाइसराय के लोगों को अच्छी तरह
पता था। यात्रियों की भीड़ बढ़ने से पहले ही आसपास चक्कर लगाएँगे और ठीक
जगह से देख सकेंगे, ऐसा सोचकर कांट साहब पानी में उतरे। उनकी शाही नाव
देखते-देखते दूसरे किनारे पर जा पहुँची। उसी समय पुर्तगाली थानेदार को एक बात
सूझी। वह अपने मालिक से बोला, "विरजई सरकार की इस नाव को कौन नहीं
पहचानता ?"
अपनी भूल वाइसराय के ध्यान में आ गयी। उसने दूसरे किनारे से अपनी नाव
पीछे घुमाई। उसके नाविकों को आदेश दिया कि वे नाव को झाड़ियों में छुपा दें।
इसी समय सामने से मछुवारों की नाव आती हुई दिखाई पड़ी। थानेदार ने
नाविक को रोका। वाइसराय साहब को कौन नकार सकता था। कांट और उसके
आठ शस्त्रधारी सिपाही नाव में बैठे। सिपाही नाव में छुपकर बैठे। नाव में हरा कुर्ता
और बूटेदार हरी कफनी बाँधे एक पीर बाबा भी बैठे थे। उनके साथ चार तरुण
शिष्य थे। पीर बाबा ने अपनी आँखों में काजल लगा रखा था। पीर बाबा ने अपनी
शंकु के आकार की दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए अपने लम्बे मयूर पंख वाले चँवर को
उठाया और प्रत्येक सिपाही की पीठ पर हल्के से मारा। 'अल्लाह अल्लाह'
बोलकर फकीर धीरे-धीरे कुछ बड़बड़ा रहा था। मयूर पंख का प्रसाद अर्थात् ईश्वर
की कृपा। इसलिए पुर्तगालियों के हिन्दुस्तानी सिपाही भी प्रसन्न हो गये। उन्होंने
उस फकीर के पाँव छुये।
"कहाँ जा रहे हो, पीर बाबा ?" पुर्तगाली थानेदार ने पृछा।
"आज तो जन्माष्टमी का दिन है।" फकीर हँसकर बोला।
वाइसराय को फकीर के प्रति बड़ा कुतूहल हुआ।
"मुसलमान होकर हिन्दुओं की तरह स्नान करने कैसे आए?" ऐसा कहकर
वाइसराय ने फकीर का उपहास किया।
फकीर ने कहा, "हम फकीर लोगों का क्या है ? अल्लाह और कृष्ण दोनों
हमारे भगवान हैं। और पाक फकीर इस्लाम से अधिक हिन्दुओं में शिष्य मिलते हैं।
नीचे थोड़ी दूरी पर नाव रुकी। नाखे के घाट पर वह फकीर और उसके शिष्य
436 :: सम्भाजी

स्नान के लिए उतरे। नाव से उतरते समय उस फकीर ने वाइसराय का हाथ बड़े प्रेम
से अपने हाथ में ले लिया। अपनी उँगली से ताम्बे की अँगूठी निकालकर वाइसराय
की उँगली में पहना दी। उस समय सिपाहियों को विजरई साहब बड़े भाग्यवान
लगे। उन्होंने बड़े प्यार से वाइसराय से कहा, "हुजूर फकीर से ऐसा प्रसाद
खुशकिस्मत को ही मिलता है। उसे कभी खोने न दें। फकीर की अँगूठी से बड़े-
बड़े संकट दूर हो जाते हैं।"
नाव थोड़ी दूर जाने के बाद वाइसराय को एकदम झटका लगा। माथे पर हाथ
रखकर वे थानेदार से बोले, "ओ गाड ऑलमाइटी, इस फकीर बाबा ने सचमुच मेरी
आँखें खोल दीं। अपने सभी सैनिकों को हुक्म दीजिए कि यहाँ स्नान के लिए आने
वाले किसी भी हिन्दू वैरागी या गोसावी को जाने न दें। हर एक की तलाशी लो।
वह शिवाजी भी अनेक बार गोसावी के वेश में घूमता था।"
दिनभर स्नान करने वाले यात्रियों की भीड़ लगी रही। हिन्दू वैरागियों और
गोसावियों को आज स्नान करने की इच्छा नहीं हो रही थी। पुर्तगाली सिपाही उनके
पीछे पड़ गये थे। तलाशी निरन्तर चल रही थी। गोकुल अष्टमी का वह दिन बीत
गया। पंचगंगा के पाट पर अँधेरा छा गया। वाइसराय के हाथ कुछ भी नहीं लगा वे
निराश होकर राजभवन लौट गये।
चार दिन बाद एकबार फिर वाइसराय ने विचार-विमर्श के लिए येसाजी
गम्भीर राव को बुलवाया। चर्चा के दौरान येसाजी ने वाइसराय की अँगूठी की ओर
देखा। येसाजी का बार-बार अँगूठी की ओर घूरना, वाइसराय से छिपा न रहा।
उन्होंने अँगूठी निकालकर येसाजी के हाथ में दे दी।
येसाजी ने उस अँगूठी को ध्यान से देखा और उसमें लिखे अक्षर को देखकर
जोर-जोर से हँसने लगे। वाइसराय ने फिर अँगूठी अपने हाथ में लेते हुए येसाजी से
पूछा-"इसमें क्या लिखा है?"
"मुझसे अधिक अच्छी तरह आपके सचिव पढ़ सकेंगे। उन्हीं से पूछ लें।"
येसाजी ने सुझाया।
लुइस गोंसाल्विस ने अँगूठी पर लिखा हुआ अक्षर जोर से पढ़ा-
"सम्भाजी"।
वाइसराय को लगा जैसे उसके कान में किसी ने लोहे की सलाख डाल दी
हो। वह पागल की तरह अँगूठी को देखता रहा। उसी समय वह हरा-भरा किनारा,
वह जवान फकीर बाबा, उसकी काजल से अँजी आँखें कांट साहब के सामने घूमने
लगीं।
सम्भाजी 437

चार
"क्यूँऽ क्यूँऽऽ फतेह नहीं हो रहा है रामशेज?" ऐसा कहते हुए बादशाह बेचैन हो
रहा था। औरंगाबाद में बादशाह को ठीक से नींद नहीं आती थी। रायगढ़ की
राजधानी से शम्भुराजा का घोड़ा सह्याद्रि की तलहटी में चारों ओर चौकड़ी भर रहा
था। वे पूरी तरह सावधान थे। उनका ध्यान नासिक की ओर रामशेज पर भी बना
हुआ था। रामशेज नासिक से सात मील की दूरी पर उत्तर की ओर था। प्रभुरामचन्द्र
वनवास के समय सीता माता के साथ गोदावरी के तट पर आये थे। इसी स्थान पर
उन्होंने कुछ दिन निवास किया था। यहीं उनका शयनस्थल था। इसीलिए इस स्थान
को रामशेज कहने लगे।
किसी जमाने में औरंगजेब के पिता शाहजहाँ ने दक्खिन पर आक्रमण किया
था। उस समय रामशेज एक शुभशकुन सिद्ध हुआ था। यहीं से उसने दक्षिण
दिग्विजय आरम्भ की थी। औरंगजेब के लिए रामशेज एक भावनात्मक विषय बन
गया था। इस किले पर चाँद सितारों वाला झंडा फहराने के बाद त्र्यम्बक, अहिवंत,
मार्केडा और साल्हेर के किलों पर क़ब्ज़ा करके शहजादा अकबर के लिए दिल्ली
का रास्ता बन्द कर दिया जाय और फिर पूरी शक्ति से कोंकण में जाकर उस काफिर
के बच्चे को पकड़ा जाय। ऐसी औरंगजेब की कल्पना थी। किन्तु महीनों बीत गये,
बड़ी मात्रा में गोला बारूद व्यर्थ बर्बाद हुआ, रामशेज के आसपास हजारों लाशें गिर
गयीं। फिर भी रामशेज का किला हाथ नहीं आ रहा था। औरंगजेब की बेचैनी
बढ़ती जा रही थी।
रामशेज का किला मराठों और मुगलों के हठ, उनके द्वेष और उनके अस्तित्व
की निशानी बन गया था। देखने में वह अन्य किलों की भाँति सुन्दर और भव्यदिव्य
नहीं था। किन्तु वह बेलाग, मुस्तंडा और कठोर चट्टानों की छाती वाला था।
उसकी पाषाणी तटबन्दी को गिराने और किले पर क़ब्ज़ा करने के लिए शहाबुद्दीन
तीस-पैंतीस हजार की फौज लेकर किले पर घेरा डाले हुए था। किला प्राकृतिक रूप
से खुला हुआ था। अगल-बगल अन्य पहाड़ियों या घाटियों का साथ न था। किले
पर केवल आठ-नौ सौ मराठों की सेना। इतना अवश्य था कि किले के ये सिपाही
संकल्पशील और फौलादी छाती वाले थे।
रामशेज का बूढ़ा किलेदार सूर्याजी जेधे मावल का हट्टा-कट्टा साहसी,
निर्भीक और बहादुर मराठा था। उसे रोलारमामा के अखाड़े में तालीम मिली थी।
438 :: सम्भाजी

उन्हें शम्भूराजा के हाथ का पत्र मिला था—"सूर्याजी जेधे मामा, आप तो पिताजी के
अखाड़े के पहलवान हैं। आप जैसों को हम क्या उपदेश देंगे? लेकिन शिवाजी
महाराज के उस कथन को कभी न भूलें। उन्होंने कहा था—'हमारा एक एक किला
औरंगजेब से पाँच पाँच वर्ष तक लड़ेगा। ऐसे हमारे तीन सौ साठ किले हैं।
औरंगजेब को पूरा महाराष्ट्र जीतने के लिए कितने जन्म लेने पड़ेंगे?' जेधे मामा मैं
इतना ही कहूँगा कि आपका किला महाराष्ट्र का प्रवेशद्वार है। दिल्ली के उस बूढ़े
दूल्हे को प्रवेशद्वार पर ही रोक दो। मराठों के प्रदेश में राक्षस विवाह करने का
बादशाह का स्वप्न मिट्टी में मिला दो।'"
बस इसी पत्र से सूर्याजी का जीवन ही बदल गया। उनकी बलवान हड्डियाँ
एक अभेद्य बुर्ज बन गयी थीं। बहुमूल्य खजाने से भरे घड़े के चारों ओर जिस प्रकार
कालसर्प घूमता रहता है, उसी प्रकार सूर्याजी किले के चारों ओर घूमते रहते थे।
उन्होंने दिन रात एक कर दिया था। कब सोते थे इसका किसी को भी पता न था।
थोड़ी सी रसद के सहारे ही उन्होंने लड़ाई चालू रखी।
लड़ाई शुरू करके दोपहर की नमाज की चादर किले पर बिछाने का स्वप्न
देखने वाले शहाबुद्दीन को सूर्याजी ने अच्छा सबक सिखाया था। शहाबुद्दीन ने
आरम्भ में बहुत जोर का आक्रमण किया। तटबन्दी के ऊपर का हिस्सा गिरा दिया।
रात को मुगल गोलंदाज हँस रहे थे। सुबह होते सिंहद्वार को गिरा देंगे। यही
सोचकर अपने डेरे में चले गये थे।
दूसरी सुबह मुगल सेना तटबन्दी को देखती रह गयी। तटबन्दी का गिरा हुआ
हिस्सा रातभर में फिर से जोड़ दिया गया था। हाथियों के सूंड से मनुष्यों के हाथों
से सभी आबाल वृद्ध रात भर जागकर अभूतपूर्व पराक्रम प्रदर्शित किये थे। मुगलों
को इस घटना पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। उन्हें विश्वास हो गया था कि
मराठों के साथ भूत-प्रेत रहते हैं।
पिछले कुछ महीनों से वहाँ युद्ध चल रहा था। तोपों के गोले-बारूद और
घोड़ों की दौड़ से पूरा प्रदेश उद्ध्वस्त हो गया था। आसपास की बस्ती से लोग
गाँव छोड़कर चले गये थे। शम्भूराजा को पता था किले पर सात-आठ सौ लोग हैं।
वे बार बार हंबीरराव मोहिते को रामशेज पर नजर रखने के लिए कहते थे। मोहिते
को भी इस बात का पता था। इसलिए कभी कभी रात में सात आठ सौ मराठा
सैनिक जंगलों से भूत की तरह निकलते थे और तीस पैंतीस हजार मुगल सैनिकों
से भिड़ जाते थे। दिन में सूर्याजी रामशेज की ओर आँख नहीं उठाने देते थे और रात
को हंबीरराव सोने नहीं देते थे। इसी तरह कई महीनों तक चलता रहा।
मुगलों का दो सौ मन बारूद समाप्त हो गया। 1682 के मई महीने में
शरीफखान नाम का मुगल सरदार रामशेज परिसर में पहुँच रहा था। उसके साथ
सम्भाजी :. 439

रसद से लदे पाँच सौ हाथी एक हजार बैल थे। लेकिन दिन में ही गड़बड़ी हो
गयी। सीटियों से पूरा जंगल गूँजने लगा। बगल की घाटी में छुपे सात हजार मराठा
सैनिक उस रसद पर टूट पड़े। दो घंटे तक घमासान लड़ाई हुई। जाहिर खान,
फैजुल्लाखान जैसे अनेक मुगल अधिकारी मारे गये।
अपनी रसद का मराठों द्वारा लूटा जाना सुनकर रामशेज के आसपास घेरा
डाले मुगल सिपाही मदद के लिए दौड़े। घमासान लड़ाई हुई। लगभग छः सौ
मराठा सैनिक मारे गये। दो हजार के आसपास जख्मी हो गये। परन्तु उन्होंने रसद
का बहुत नुकसान किया था। मुगलों की विशाल सेना के सामने मराठा सेना पीछे
हट गयी। इस अचानक हमले से मुगलों का कलेजा फट गया था। किन्तु इस
छोटी-सी जीत से शरीफखान बहुत आनंदित हो गया। उसने अपने पराक्रम की
बड़ाई का पत्र औरंगजेब के पास भेजा।
असदखान को यह अच्छी तरह मालूम था कि रामशेज की विजय का
समाचार सुनने के लिए बादशाह कितना आतुर है? उस पत्र सच्चाई को पक्का किये
बिना ही वह दौड़ता हुआ गया। "बधाई हो मेरे मालिक बधाई हो। हमारी विजय
हो गयी—रामशेज पर हमारी बड़ी जीत हुई है।"
"विजय? कहाँ? किले पर या किले के नीचे?"
असदखान गड़बड़ा गया। खिन्न स्वर में बोला. "जी हाँ, हुजूर! किले के
नीचे तलहटी में।"
बादशाह की भूरी आँखें इस तरह नाचीं, मान कह रही हों—'आप कितने
मूर्ख हो?' उस समय वजीर को पसीना छूट गया।
बादशाह ने विषाद के स्वर में कहा—
"अपने बेवकूफ सेनाधिकारी मराठों के तरीके क्यों नहीं सीखते? मराठे
किस तरह घूम-घूमकर आक्रमण करते हैं?"
महीनों बीत गये किन्तु रामशेज हाथ नहीं आया। इसलिए बादशाह बहुत
बेचैन था। शहाबुद्दीनखान भी हैरान था। किले पर थोड़ी सी ही सेना थी लेकिन
अपना घोर प्रतिकार रोक नहीं रही थी। शहाबुद्दीन ने नयी रसद आने के लिए सभी
रास्ते बन्द कर दिये थे। किले पर तोपें नहीं थीं फिर भी सूर्याजी पीछे हटने को तैयार
नहीं था। किले में भैंसों-बैलों का चमड़ा इकट्ठा करके उन्होंने लकड़ी और चमड़े
की तोपें बना ली थीं। इन तोपों का धमाका साधारण तोपों से दस गुना अधिक था।
शहाबुद्दीन भी पीछे हटने को तैयार नहीं था। किला जीतने के लिए नये-नये
उपाय खोजने लगा। किले का मोर्चा तोड़ने के लिए ज़मीन से गोले दागना कारगर
नहीं हो रहा था। इससे विजय मिलने वाली नहीं थी। यह अनुभव करके शहाबुद्दीन
ने सभी लुहारों और बढ़इयों को एकत्र किया। बड़े बड़े वृक्षों को काटकर उसने एक
440 : सम्भाजी

बड़ा बुर्ज तैयार किया। उसके ऊपर एक साथ पाँच सौ सैनिक खड़े होकर सहजता
से किले पर आक्रमण करने लगे। वह लकड़ी की ऊँची मीनार जमीन से आकाश को
छूने वाले पहाड़-सी दिखाई पड़ती थी। शहाबुद्दीन ने वहाँ से बहुत गोलाबारी की।
किन्तु रामशेज अजेय बना रहा।
रामशेज की विजय मुगलों और मराठों दोनों के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन
गयी थी। प्रतिदिन औरंगाबाद और रायगढ़ से गुप्तचर आते थे और रामशेज का
ताजा समाचार लेकर जाते थे। रोज नयी-नयी योजनाएँ बनाई जाती थीं फिर भी एक
मामूली-सा किला हाथ नहीं आ रहा था। इससे बादशाह बहुत त्रस्त हो गया था।
रामशेज की आग बुझने का नाम नहीं ले रही थी। इसी बीच बादशाह को
सूचना मिली कि सम्भाजी अपनी सेना की सहायता के लिए एक बड़ी फौज रामशेज
भेज रहे हैं। शीघ्र ही मराठों की सेना वहाँ पहुँचेगी। बादशाह ने बहादुरगढ़ से अपने
दूधभाई खानजहाँन बहादुरखान को तुरन्त बुलवाया। उसे आगाह किया-"भाईजान
पहले आपकी लापरवाही के कारण ही उस काफिर के बच्चे की बानरी सेना ने
बुरहानपुर को बेचिरागी कर दिया। सम्भाजी सही सलामत निकल गया। अब
रामशेज को तो हाथ से न निकलने दें।"
हजरत ऐसा नहीं है कि जो भूल एक बार हो गयी वही बार बार
दुहराई जाएगी।"
"मत बताओ ज्यादा कुछ, आपकी लापरवाही बार-बार हमारा रास्ता
रोकती है।"
बहादुरखान ने लज्जा से गर्दन नीचे झुका ली। थोड़ी देर बाद उसने कहा,
"लेकिन हजरत, शहाबुद्दीन तो यकीन दिला रहा है कि वह रामशेज जीते बिना
वापस नहीं आएगा।"
"फिजूल यकीन दिलाने में उसका क्या जाता है?- एक छोटे से किले से
हमारी जो बेइज्जती हो रही है, उसका क्या ? अपनी फौज का मनोबल गिरना नहीं
चाहिए। चाहें तो आप दोनों मिलकर कुछ दिन कोशिश करके देखो इसके लिए हमें
कोई एतराज नहीं होगा।"
रायगढ़ में सम्भाजी राजा को मालूम पड़ा कि बहादुर खान अपना सारा सामान
बहादुरगढ़ पर छोड़कर नासिक की ओर जा रहा है। सम्भाजी ने शहापुर के पास
माहुली किले में अपनी सेना रखी थी। रूपाजी भोसले और मामाजी मोरे की आठ
हजार सेना रामशेज की ओर चल पड़ी। बादशाह ने बहादुरखान को पन्द्रह हजार की
सेना दी थी। बहादुरखान किले की तलहटी में पहले पहुँचा। मुगलों की सेना
इकट्ठा हो गयी। उन्हें नष्ट करने के लिए रूपाजी और मानाजी की सेना आ रही
है। ऐसी सूचना पाते ही मुगलों की सेना पीछे मुड़ गयी। गणेश गाँव के पास दोनों
सेनाओं में युद्ध हुआ। मराठों की बहुत हानि हुई और रूपाजी तथा मानाजी पीछे हट
सम्भाजी :: 441

गये। किन्तु दोनों की सेनाएँ पूरी सावधानी के साथ आसपास के क्षेत्रों में घूमने लगी।
शहाबुद्दीन किला जीते बिना जाने को बिलकुल तैयार नहीं था। बूढ़े बहादुरखान के
साथ उसका विचार-विमर्श चल रहा था।
उस शाम को शहाबुद्दीन और बहादुरखान अपने डेरे पर खड़े थे। सन्ध्याकाल
की तेज हवा में रामशेज के ऊपर भगवा झंडा फहरा रहा था। ये दोनों उसकी ओर
पूँछ कुचले साँप की तरह क्रोध से देख रहे थे। थके हुए बूढ़े आदमी की तरह सूरज
डूब रहा था। अँधेरा घिरता आ रहा था। दिन में निश्चित की गयी योजना के अनुसार
मुगलों के हजारों सैनिक जमा हो गये। उन सभी को दोनों ने संकेत किया- "धीरे-
धीरे किले के सिंहद्वार की ओर चलना है नीचे जमीन से और दूसरी ओर लकड़ी की
बनी ऊँची मीनार के ऊपर से रात भर गोले दागते रहना है।"
"कब तक?"
"पूरी रात।" शहाबुद्दीन ने कहा।
रणभेरी बजी। मशालें जल गयीं। अँधेरे का परदा फाड़कर 'अल्ला हो
अकबर' का घोष आसमान से टकराने लगा। दस-बारह हजार की मुगल सेना आगे
सरक रही थी। उसमें ईरानी, तूरानी, रूहेले, दक्खिनी आदि अनेक जातियों के लोग
थे। रामशेज के मराठा सैनिक यह तमाशा ऊपर से देख रहे थे। मराठों को विश्वास
था कि कुछ भी हो पर रामशेज की तटबन्दी को कुछ होने वाला नहीं है। उसी
समय किले की तलहटी में दूसरा एक अलग नाटक चल रहा था। नारे लगाते हुए
आगे बढ़ने वाले सैनिकों में शहाबुद्दीन और बहादुर खान नहीं थे। अँधेरे का फायदा
उठाते हुए दोनों के घोड़े तेजी से निकले। उनके दाहिने-बायें कुछ साथी भी थे।
अँधेरे में पीछे की ओर हजार-डेढ़ हजार मुगल सैनिक जमा थे। शहाबुद्दीन घोड़े से
उतर कर धीरे से बोला, "दोस्तो! किसी को भी मशाल नहीं जालानी है। चिलम
पीने के लिए भी आग नहीं जलानी है।"
"जी हुज़ूर।" उत्तर आया।
"इसी अँधेरे में साँप की तरह किले पर सर-सर चढ़ने वाले साहसी जवान
हमें चाहिए।"
"जिसे मौत चाहिए वही आगे आएगा।" बहादुरखान ने कहा।
देखते-देखते मुगल सेना के सात आठ सौ जवान आगे आये। सिंहद्वार की
ओर से तोपों की आवाज आ रही थी और यहाँ अँधेरे में नयी चाल चली जा रही
थी।
ऊपर से मराठे नीचे का खेल देख रहे थे। लोगों की भीड़ के पीछे बूढ़ा
सूर्याजी जेधे खड़ा था। वह घोड़े पर सवार था। सामने का तमाशा देखकर उसने
तम्बाकू की चुटकी मुँह में डाली। उसके साले सुभान ने सूर्याजी से कहा-
"जीजा जी, ये बन्दर आज इतना अधिक क्यों नाच रहे हैं?"
442 .. सम्भाजी

सूर्याजी ने मुँह की तम्बाकू एक ओर थूक दी और धीरे-से कहा, "सुभान,
तुमने अच्छी याद दिलाई। शेलार मामा कुश्ती खेल रहे थे तब उन्होंने एक बड़ी
महत्त्वपूर्ण बात कही थी।"
"कौन-सी?"
"उन्होंने कहा था कि जिस सुबह मुर्गा अधिक जोर से बोले तो समझना
चाहिए कि कुछ-न-कुछ गड़बड़ है।"
तमाशा देखने वालों के बीच से सूर्याजी पीछे हटे। पीछे के लोगों को धीरे से
संकेत किया। देखते-ही-देखते दो सौ लोग चुपचाप अँधेरे में निकल गये।
सामने जो शोर हो रहा था उसकी अपेक्षा पीछे की ओर पूर्ण शान्ति थी। पीछे
की ओर से कुछ मुगल सैनिक चुपचाप किले पर चढ़ रहे थे। वे पेड़ों से रस्सियाँ
बाँधकर अपने साथियों की सहायता कर रहे थे। रस्सियों के सहारे मुगल होशियार
बन्दरों की तरह ऊपर सरक रहे थे। झाड़ियों को पकड़कर, कहीं-कहीं रस्सियाँ
बाँधकर उनसे लटकते हुए, अपने पीछे आने वालों को सहारा देते हुए धीरे-धीरे
ऊपर सरक रहे थे।
अन्ततः तीन चार जन एक साथ ऊपर आ गये। उनके सिर तट से ऊपर दिखे
नहीं कि मराठों की गुलेलों के रबड़ तन गये। मुगलों के माथे पर सटासट बड़े-बड़े
पत्थर टकराये।
'अल्लाऽऽ', 'अरे भागोऽऽ' जैसी करुण चीत्कारों से वन प्रदेश की आँखें
बाहर आ गयीं। ऊपर चढ़ने वाले धड़ाधड़ नीचे गिरने लगे। 'सम्भाजी महाराज की
जयऽऽ!' 'शिवाजी महाराज की जयऽऽ'।
किले के ऊपर आयी आफत का अन्दाजा शहाबुद्दीन को हो गया। तब तक
मराठे आगे आ चुके थे। जो लोग दिखाई दिये उन्हें ऊपर के ऊपर ही सपासप
काटकर रख दिया। जो बचे वे पेड़ों और रस्सियों का सहारा लेकर नीचे उतरने
लगे। उसी समय किले के बुर्ज से बड़े-बड़े पत्थर और तेल-भीगी जलती मशालें
नीचे की ओर फेंके जाने लगे। कुछ लोग पत्थरों के तो कुछ आग के शिकार बने।
चार सौ सैनिकों में से केवल बीस पचीस मुगल सैनिक ही बच पाये। शेष सभी को
इस काली रात ने निगल लिया।
रातभर जागते रहने से शहाबुद्दीन थक गया था। वह दिनभर अपने शिविर में
आराम करता रहा। किन्तु पराजय के कारण उसका सिर फटा जा रहा था। तलहटी में
दिन भर सामान बाँधने का कार्य होता रहा। कनातों की डोरियाँ लपेटी जा रही थीं।
बीच बीच में शहाबुद्दीन की दुखती आँखें किले की ओर क्रोध से देख लेती थीं।
सामने का वह पत्थर, वह दरवाजा, वह बुर्ज देखकर वह संतृप्त होता था।
इस अशुभ जगह में रुकने की उसकी बिलकुल इच्छा नहीं थी। आज रात को
उसे नासिक के पास कहीं रुकना था। शहाबुद्दीन ने घोड़े पर सवार होते-होते अपने
सम्भाजी 443

द्वारा बनवाई गयी लकड़ी की मीनार की ओर देखा तो उसे बहुत क्रोध आया।
सामान बाँधने का काम उसने बन्द करवा दिया। पाँच सौ सैनिकों को साथ लेकर
लकड़ी की मीनार की ओर दौड़ पड़ा। उस मीनार को बनाने के लिए हजारों लोगों
ने तीन महीने कार्य किया था। किन्तु अब शहाबुद्दीन को इसकी कोई चिन्ता नहीं थी।
उसने अपने सैनिकों को घास इकट्ठा करने के लिए कहा। मीनार के चारों ओर घास
बिछा दी गयी।
शहाबुद्दीन क्रोध से लाल हो गया था। अपनी आँखों का आँसू पोंछते हुए
उसने घास में आग लगा दी। घास जलने लगी, उसके साथ मीनार भी जलने लगी।
बहादुरखान दौड़ता हुआ वहाँ आया। शहाबुद्दीन का हाथ पकड़कर पूछने लगा—
"आप पागल तो नहीं हो गये हैं?"
"नहीं खान साहब, मैं अपने अशुभ हाथ की कोई निशानी यहाँ नहीं
छोड़ना है। आप नये सिरे से सब कुछ शुरू करो, अल्लाह और बादशाह को जीत
हासिल कराओ।"
रात में वह महाकाय मीनार धाड़-धाड़ जल रही थी। उसका प्रकाश चारों
ओर फैल रहा था। उस जंगल से शहाबुद्दीन का घोड़ा वापस जा रहा था। आँखों से
निकलकर दाढ़ी पर गिरने वाले आँसुओं को शहाबुद्दीन बड़े कष्ट से पोंछ रहा था।
पाँच
पूरे महाराष्ट्र में मराठी सेना और मुगल सेना में जगह-जगह पर लड़ाई हो रही थी।
दोनों ने जगह-जगह पर अपने झंडे गाड़े और कहीं-कहीं उखाड़े थे। किन्तु
रामशेज के चारों ओर मुगल सेना का घेरा हट नहीं रहा था। मराठे मधुमक्खियों की
तरह उन्हें डसते रहते थे। किसी को भी किले के ऊपर सरकने नहीं दे रहे थे।
हमेशा की तरह बहादुरखान अत्यन्त हताश होकर किले की ओर देख रहा
था। उसके साईस से उसकी यह दशा देखी न गयी। उसने दबी आवाज में कहा—
"अजी हुजूर, छोटा मुँह बड़ी बात कर रहा हूँ। व्यर्थ में समय क्यों जाया कर
रहे हैं? किसी मान्त्रिक से सलाह क्यों नहीं लेते?"
"चुप बैठ, बेवकूफ!" खान साहब ने डाँटते हुए कहा।
"लेकिन हुजूर, मरगठों ने भूत वश में किया है इसीलिए मैंने कहा...।"
"हर बीमारी का इलाज रहता है तो भूत-प्रेत का क्यों नहीं?"
444 :: सम्भाजी