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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 793 में से

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पृष्ठ 440

चार
"क्यूँऽ क्यूँऽऽ फतेह नहीं हो रहा है रामशेज?" ऐसा कहते हुए बादशाह बेचैन हो
रहा था। औरंगाबाद में बादशाह को ठीक से नींद नहीं आती थी। रायगढ़ की
राजधानी से शम्भुराजा का घोड़ा सह्याद्रि की तलहटी में चारों ओर चौकड़ी भर रहा
था। वे पूरी तरह सावधान थे। उनका ध्यान नासिक की ओर रामशेज पर भी बना
हुआ था। रामशेज नासिक से सात मील की दूरी पर उत्तर की ओर था। प्रभुरामचन्द्र
वनवास के समय सीता माता के साथ गोदावरी के तट पर आये थे। इसी स्थान पर
उन्होंने कुछ दिन निवास किया था। यहीं उनका शयनस्थल था। इसीलिए इस स्थान
को रामशेज कहने लगे।
किसी जमाने में औरंगजेब के पिता शाहजहाँ ने दक्खिन पर आक्रमण किया
था। उस समय रामशेज एक शुभशकुन सिद्ध हुआ था। यहीं से उसने दक्षिण
दिग्विजय आरम्भ की थी। औरंगजेब के लिए रामशेज एक भावनात्मक विषय बन
गया था। इस किले पर चाँद सितारों वाला झंडा फहराने के बाद त्र्यम्बक, अहिवंत,
मार्केडा और साल्हेर के किलों पर क़ब्ज़ा करके शहजादा अकबर के लिए दिल्ली
का रास्ता बन्द कर दिया जाय और फिर पूरी शक्ति से कोंकण में जाकर उस काफिर
के बच्चे को पकड़ा जाय। ऐसी औरंगजेब की कल्पना थी। किन्तु महीनों बीत गये,
बड़ी मात्रा में गोला बारूद व्यर्थ बर्बाद हुआ, रामशेज के आसपास हजारों लाशें गिर
गयीं। फिर भी रामशेज का किला हाथ नहीं आ रहा था। औरंगजेब की बेचैनी
बढ़ती जा रही थी।
रामशेज का किला मराठों और मुगलों के हठ, उनके द्वेष और उनके अस्तित्व
की निशानी बन गया था। देखने में वह अन्य किलों की भाँति सुन्दर और भव्यदिव्य
नहीं था। किन्तु वह बेलाग, मुस्तंडा और कठोर चट्टानों की छाती वाला था।
उसकी पाषाणी तटबन्दी को गिराने और किले पर क़ब्ज़ा करने के लिए शहाबुद्दीन
तीस-पैंतीस हजार की फौज लेकर किले पर घेरा डाले हुए था। किला प्राकृतिक रूप
से खुला हुआ था। अगल-बगल अन्य पहाड़ियों या घाटियों का साथ न था। किले
पर केवल आठ-नौ सौ मराठों की सेना। इतना अवश्य था कि किले के ये सिपाही
संकल्पशील और फौलादी छाती वाले थे।
रामशेज का बूढ़ा किलेदार सूर्याजी जेधे मावल का हट्टा-कट्टा साहसी,
निर्भीक और बहादुर मराठा था। उसे रोलारमामा के अखाड़े में तालीम मिली थी।
438 :: सम्भाजी