छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 441, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्हें शम्भूराजा के हाथ का पत्र मिला था—"सूर्याजी जेधे मामा, आप तो पिताजी के
अखाड़े के पहलवान हैं। आप जैसों को हम क्या उपदेश देंगे? लेकिन शिवाजी
महाराज के उस कथन को कभी न भूलें। उन्होंने कहा था—'हमारा एक एक किला
औरंगजेब से पाँच पाँच वर्ष तक लड़ेगा। ऐसे हमारे तीन सौ साठ किले हैं।
औरंगजेब को पूरा महाराष्ट्र जीतने के लिए कितने जन्म लेने पड़ेंगे?' जेधे मामा मैं
इतना ही कहूँगा कि आपका किला महाराष्ट्र का प्रवेशद्वार है। दिल्ली के उस बूढ़े
दूल्हे को प्रवेशद्वार पर ही रोक दो। मराठों के प्रदेश में राक्षस विवाह करने का
बादशाह का स्वप्न मिट्टी में मिला दो।'"
बस इसी पत्र से सूर्याजी का जीवन ही बदल गया। उनकी बलवान हड्डियाँ
एक अभेद्य बुर्ज बन गयी थीं। बहुमूल्य खजाने से भरे घड़े के चारों ओर जिस प्रकार
कालसर्प घूमता रहता है, उसी प्रकार सूर्याजी किले के चारों ओर घूमते रहते थे।
उन्होंने दिन रात एक कर दिया था। कब सोते थे इसका किसी को भी पता न था।
थोड़ी सी रसद के सहारे ही उन्होंने लड़ाई चालू रखी।
लड़ाई शुरू करके दोपहर की नमाज की चादर किले पर बिछाने का स्वप्न
देखने वाले शहाबुद्दीन को सूर्याजी ने अच्छा सबक सिखाया था। शहाबुद्दीन ने
आरम्भ में बहुत जोर का आक्रमण किया। तटबन्दी के ऊपर का हिस्सा गिरा दिया।
रात को मुगल गोलंदाज हँस रहे थे। सुबह होते सिंहद्वार को गिरा देंगे। यही
सोचकर अपने डेरे में चले गये थे।
दूसरी सुबह मुगल सेना तटबन्दी को देखती रह गयी। तटबन्दी का गिरा हुआ
हिस्सा रातभर में फिर से जोड़ दिया गया था। हाथियों के सूंड से मनुष्यों के हाथों
से सभी आबाल वृद्ध रात भर जागकर अभूतपूर्व पराक्रम प्रदर्शित किये थे। मुगलों
को इस घटना पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। उन्हें विश्वास हो गया था कि
मराठों के साथ भूत-प्रेत रहते हैं।
पिछले कुछ महीनों से वहाँ युद्ध चल रहा था। तोपों के गोले-बारूद और
घोड़ों की दौड़ से पूरा प्रदेश उद्ध्वस्त हो गया था। आसपास की बस्ती से लोग
गाँव छोड़कर चले गये थे। शम्भूराजा को पता था किले पर सात-आठ सौ लोग हैं।
वे बार बार हंबीरराव मोहिते को रामशेज पर नजर रखने के लिए कहते थे। मोहिते
को भी इस बात का पता था। इसलिए कभी कभी रात में सात आठ सौ मराठा
सैनिक जंगलों से भूत की तरह निकलते थे और तीस पैंतीस हजार मुगल सैनिकों
से भिड़ जाते थे। दिन में सूर्याजी रामशेज की ओर आँख नहीं उठाने देते थे और रात
को हंबीरराव सोने नहीं देते थे। इसी तरह कई महीनों तक चलता रहा।
मुगलों का दो सौ मन बारूद समाप्त हो गया। 1682 के मई महीने में
शरीफखान नाम का मुगल सरदार रामशेज परिसर में पहुँच रहा था। उसके साथ
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