छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 444, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंगये। किन्तु दोनों की सेनाएँ पूरी सावधानी के साथ आसपास के क्षेत्रों में घूमने लगी।
शहाबुद्दीन किला जीते बिना जाने को बिलकुल तैयार नहीं था। बूढ़े बहादुरखान के
साथ उसका विचार-विमर्श चल रहा था।
उस शाम को शहाबुद्दीन और बहादुरखान अपने डेरे पर खड़े थे। सन्ध्याकाल
की तेज हवा में रामशेज के ऊपर भगवा झंडा फहरा रहा था। ये दोनों उसकी ओर
पूँछ कुचले साँप की तरह क्रोध से देख रहे थे। थके हुए बूढ़े आदमी की तरह सूरज
डूब रहा था। अँधेरा घिरता आ रहा था। दिन में निश्चित की गयी योजना के अनुसार
मुगलों के हजारों सैनिक जमा हो गये। उन सभी को दोनों ने संकेत किया- "धीरे-
धीरे किले के सिंहद्वार की ओर चलना है नीचे जमीन से और दूसरी ओर लकड़ी की
बनी ऊँची मीनार के ऊपर से रात भर गोले दागते रहना है।"
"कब तक?"
"पूरी रात।" शहाबुद्दीन ने कहा।
रणभेरी बजी। मशालें जल गयीं। अँधेरे का परदा फाड़कर 'अल्ला हो
अकबर' का घोष आसमान से टकराने लगा। दस-बारह हजार की मुगल सेना आगे
सरक रही थी। उसमें ईरानी, तूरानी, रूहेले, दक्खिनी आदि अनेक जातियों के लोग
थे। रामशेज के मराठा सैनिक यह तमाशा ऊपर से देख रहे थे। मराठों को विश्वास
था कि कुछ भी हो पर रामशेज की तटबन्दी को कुछ होने वाला नहीं है। उसी
समय किले की तलहटी में दूसरा एक अलग नाटक चल रहा था। नारे लगाते हुए
आगे बढ़ने वाले सैनिकों में शहाबुद्दीन और बहादुर खान नहीं थे। अँधेरे का फायदा
उठाते हुए दोनों के घोड़े तेजी से निकले। उनके दाहिने-बायें कुछ साथी भी थे।
अँधेरे में पीछे की ओर हजार-डेढ़ हजार मुगल सैनिक जमा थे। शहाबुद्दीन घोड़े से
उतर कर धीरे से बोला, "दोस्तो! किसी को भी मशाल नहीं जालानी है। चिलम
पीने के लिए भी आग नहीं जलानी है।"
"जी हुज़ूर।" उत्तर आया।
"इसी अँधेरे में साँप की तरह किले पर सर-सर चढ़ने वाले साहसी जवान
हमें चाहिए।"
"जिसे मौत चाहिए वही आगे आएगा।" बहादुरखान ने कहा।
देखते-देखते मुगल सेना के सात आठ सौ जवान आगे आये। सिंहद्वार की
ओर से तोपों की आवाज आ रही थी और यहाँ अँधेरे में नयी चाल चली जा रही
थी।
ऊपर से मराठे नीचे का खेल देख रहे थे। लोगों की भीड़ के पीछे बूढ़ा
सूर्याजी जेधे खड़ा था। वह घोड़े पर सवार था। सामने का तमाशा देखकर उसने
तम्बाकू की चुटकी मुँह में डाली। उसके साले सुभान ने सूर्याजी से कहा-
"जीजा जी, ये बन्दर आज इतना अधिक क्यों नाच रहे हैं?"
442 .. सम्भाजी