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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 443, कुल 793 में से

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पृष्ठ 443

बड़ा बुर्ज तैयार किया। उसके ऊपर एक साथ पाँच सौ सैनिक खड़े होकर सहजता
से किले पर आक्रमण करने लगे। वह लकड़ी की ऊँची मीनार जमीन से आकाश को
छूने वाले पहाड़-सी दिखाई पड़ती थी। शहाबुद्दीन ने वहाँ से बहुत गोलाबारी की।
किन्तु रामशेज अजेय बना रहा।
रामशेज की विजय मुगलों और मराठों दोनों के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन
गयी थी। प्रतिदिन औरंगाबाद और रायगढ़ से गुप्तचर आते थे और रामशेज का
ताजा समाचार लेकर जाते थे। रोज नयी-नयी योजनाएँ बनाई जाती थीं फिर भी एक
मामूली-सा किला हाथ नहीं आ रहा था। इससे बादशाह बहुत त्रस्त हो गया था।
रामशेज की आग बुझने का नाम नहीं ले रही थी। इसी बीच बादशाह को
सूचना मिली कि सम्भाजी अपनी सेना की सहायता के लिए एक बड़ी फौज रामशेज
भेज रहे हैं। शीघ्र ही मराठों की सेना वहाँ पहुँचेगी। बादशाह ने बहादुरगढ़ से अपने
दूधभाई खानजहाँन बहादुरखान को तुरन्त बुलवाया। उसे आगाह किया-"भाईजान
पहले आपकी लापरवाही के कारण ही उस काफिर के बच्चे की बानरी सेना ने
बुरहानपुर को बेचिरागी कर दिया। सम्भाजी सही सलामत निकल गया। अब
रामशेज को तो हाथ से न निकलने दें।"
हजरत ऐसा नहीं है कि जो भूल एक बार हो गयी वही बार बार
दुहराई जाएगी।"
"मत बताओ ज्यादा कुछ, आपकी लापरवाही बार-बार हमारा रास्ता
रोकती है।"
बहादुरखान ने लज्जा से गर्दन नीचे झुका ली। थोड़ी देर बाद उसने कहा,
"लेकिन हजरत, शहाबुद्दीन तो यकीन दिला रहा है कि वह रामशेज जीते बिना
वापस नहीं आएगा।"
"फिजूल यकीन दिलाने में उसका क्या जाता है?- एक छोटे से किले से
हमारी जो बेइज्जती हो रही है, उसका क्या ? अपनी फौज का मनोबल गिरना नहीं
चाहिए। चाहें तो आप दोनों मिलकर कुछ दिन कोशिश करके देखो इसके लिए हमें
कोई एतराज नहीं होगा।"
रायगढ़ में सम्भाजी राजा को मालूम पड़ा कि बहादुर खान अपना सारा सामान
बहादुरगढ़ पर छोड़कर नासिक की ओर जा रहा है। सम्भाजी ने शहापुर के पास
माहुली किले में अपनी सेना रखी थी। रूपाजी भोसले और मामाजी मोरे की आठ
हजार सेना रामशेज की ओर चल पड़ी। बादशाह ने बहादुरखान को पन्द्रह हजार की
सेना दी थी। बहादुरखान किले की तलहटी में पहले पहुँचा। मुगलों की सेना
इकट्ठा हो गयी। उन्हें नष्ट करने के लिए रूपाजी और मानाजी की सेना आ रही
है। ऐसी सूचना पाते ही मुगलों की सेना पीछे मुड़ गयी। गणेश गाँव के पास दोनों
सेनाओं में युद्ध हुआ। मराठों की बहुत हानि हुई और रूपाजी तथा मानाजी पीछे हट
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