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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 793 में से

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पृष्ठ 433

हंबीरराव के निकट सम्बन्धी रंगोजी के युद्ध में मारे जाने की बुरी खबर मिली।
इसलिए शिविर में वापस आने में उन्हें बिलम्ब हो गया था।
शाम को शम्भूराजा विश्राम कर रहे थे। उसी समय रायप्पा बाहर से दौड़ता
हुआ अन्दर आया। भयभीत होकर कहने लगा—"महाराज, हंबीरराव को पालकी
में डालकर ले आये हैं। उनका हाथ कट गया।"
"क्या कह रहे हो?"
महाराज झट से बाहर आये और पालकी की ओर बढ़ गये। मशाल की
रोशनी में उन्होंने हंबीरराव के चेहरे की ओर देखा। हंबीरराव की काली आँखों को
मुस्कराते देखकर उनकी जान में जान आयी। हंबीरराव ने धीमी आवाज में बताया—
"महाराज व्यर्थ में चिन्तित न होइए। एक बाण से हाथ का टुकड़ा टूट गया।
इसलिए बायाँ हाथ चला गया। इतना ही तो हुआ।"
"हंबीरराव थोड़ा सँभालिए अपने आपको।" शम्भूराजा ने कहा, "दाहिना
हाथ तो बचा है न? चिन्ता क्यों करते हो?" हंबीरराव मुस्करा दिये।
शिविर में हंबीरराव की देखभाल हो रही थी। स्वयं शम्भू महाराज उनके
घावों पर पट्टी बाँध रहे थे। शम्भूराजा की दिनचर्या और चिन्ता की छाया देखकर
हंबीरराव हँसकर बोले, "शम्भू बेटे मेरे सगे भाँजे राजाराम को गद्दी मिले,
सोयराबाई जैसी महत्त्वाकांक्षी बहन की इच्छा पूरी हो इसलिए शक्ति होने पर भी मैं
कभी आगे नहीं आया। अपना तो रिश्ता ही अलग है।"
शम्भूराजा ने हंबीरराव की ओर प्रश्नार्थक दृष्टि से देखा। तब हंबीरराव ने
हँसते हुए कहा, "जो रिश्ता शिवाजी महाराज का इस मिट्टी के साथ था वही
हमारा और आपका है।" शम्भूराजा थोड़ी देर वैसे ही बैठे रहे।
हंबीरराव को उन्होंने बर्तन से निकालकर वनस्पति की औषधि दी। उसी
समय हरकारों ने सूचित किया कि वर्षा का मौसम समीप आ रहा है इसलिए
औरंगजेब ने कल्याण के लिए भेजी हुई सेना को वापस आने का हुक्म दिया है।
हंबीरराव के थोड़ा सावधान होने पर शम्भूराजा ने कहा, "हंबीरराव काल देवता
हमारे पहाड़ जैसे पिता को लेकर चला गया। उसके बाद दूसरे पहाड़ के रूप में आप
मेरे पीछे खड़े रहे। आपके साथ रहने पर मुझे अनेक बार ऐसा लगा कि पिताजी के
ही साथ हूँ। पर सँभालिए अपने आप को हंबीरराव...आप ही हमारी बाँहों की
शक्ति हैं। आपके हाथ का घाव बढ़ेगा तो हमारा कन्धा टूट जाएगा। कृपा कीजिए,
थोड़ा धीरज रखिए।"
सम्भाजी :: 431