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बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)

Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad

सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished36 पृष्ठ

२८ बुल्ला साहिब का शब्दसार
मूँदि के मदन जतन करु संजम, इहै ज्ञान कै मेला ।
निरगुन नाम निरंतर पेखी, तहाँ गुरु नहिं चेला ॥ २ ॥
विद्या बेद भेद नहिं जानो, जानो एक अकेला ।
आवै न जाय मरे नहिं जीवै, सो सतगुरु सत चेला ॥ ३ ॥
जो कछु कहौं कहत नहिं आवै, जौ रे कहौं तौ पेला१ ।
जन बुल्ला नामहिं को सेवक, अर्ध उर्ध मन खेला ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
साँझ सुबह एकौ नहिं जान, धरि धरि लेइ चलावै बान ॥१॥
धनि वे पुरुष धनि वे नारी, आवागवन तें लिहल उबारी ॥२॥
यारी सतगुरु किया निगाह, जन बुल्लहिं ले चला बियाह ॥३॥
॥ शब्द ७ ॥
मैं कस राखौं पाँच नारि, बरज न मानै बड़ी खुवारि२ ॥१॥
जिन आपन घर किया उजारि३, कबहुँ न सुमिरहिं देव मुरारि ॥२॥
अबकी उजरे छाइ४ न जाइ, कासे कहौं यह गति बनाइ ॥३॥
मनुवाँ मकरी रहे समाइ, लै लै जात है संग लगाइ ॥४॥
भोग बिलास कि आस बनाइ, फिरिफिरि नरकहि माहिं समाइ ॥५॥
भला भयल मन चलल कोहाँइ५, बीचहिं में मिलिगे गुरुराय ॥६॥
हमरे हौ तुम सदा सहाय, जन बुल्ला तुम्हरी बलि जाय ॥७॥
॥ शब्द ८ ॥
सोहं हंसा लागलि डोर ।
सुरति निरति चढ़ मनुवाँ मोर ॥ १ ॥
झिलिमिलि झिलिमिलि त्रिकुटी ध्यान ।
जगमग जगमग गगन तान ॥ २ ॥
गह गह गह अनहद निसान ।
प्रान पुरुष तहँ रहत जान ॥ ३ ॥
(१) जबरदस्ती । (२) खराब । (३) उजाड़ । (४) छावना । (५) रूठना ।

मिश्रित २६
लहरि लहरि उठि पछिव १ घाट ।
फहरि फहरि चल उतर बाट ॥ ४ ॥
सेत बरन तहँ आवै आप ।
कह बुल्ला सोइ माइ बाप ॥ ५ ॥
॥ शब्द ६ ॥
होत भई बिन मोल कि बाँदी २ ।
अविगति ने मोहिं सहजहिं छाँदी ३ ॥ १ ॥
बिना दाम अब छूटब कैसे ।
राखहु अविगति जैसेहिं तैसे ॥ २ ॥
तन मन धन मेरो दाम दमइया ।
लेहुँ न अविगति अपनि दुहइया ४ ॥ ३ ॥
जन बुल्ला सरनागति अइया ।
बिना राम अब कवन छुड़इया ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
बैशागिनि मोरि हो, होउ जोगिनि के भेस ॥ टेक ॥
उहवाँ तें आइल सँदेसवा हो, सुनहु सखी पाँच नारि ॥ १ ॥
कुसल छेम तें चालहु हो, बहुरि न मिलि है मुरारि ॥ २ ॥
बदली रंग बिरँग है हो, भंग रंग केहि

३० बुल्ला साहिब का शब्दसार
।। शब्द १२ ।।
ऐसे मन रहु हरि के पास । सदा होय तोहि मुक्ति बास । १॥
जस धना१ सेन१ कबीरदास१। नामदेव१ रैदास१ दास ॥२॥
सदना१ पोपा१ कान्हादास१। यारीदास१ तहँ केसोदास१ ॥३॥
जिन हरि भक्ति महँ लियो निवास । जम जालिम की काटि फाँस ॥४॥
जुग जुग अचल प्रगास बास । जन बुल्ला की पुजलि आस ॥५॥
।। शब्द १३ ।।
नाथ हाजिरी मेरी लीजे, ता तें दफ्तर दाखिल कीजे ॥ टेक ॥
हौं अतीत२ गरीब सिपाही, वाहि रोज कछु दीजे ॥ १ ॥
दया धरम अरु ज्ञान ध्यान व्रत, येही अल्फा३ दीजे ॥ २ ॥
पाँच पचीस तीन मोवासी, वाहि तोरि गढ़ लीजे ॥ ३ ॥
जो जन हृदय बिचार दिखतु है, जन बुल्ला सहि कीजे ॥ ४ ॥
।। शब्द १४ ।।
यह जग जैसे सुपन है, सुनहु बचन परमान ॥ टेक ॥
यह माया जस डाइनी, हरहि लेति है प्रान ॥ १ ॥
पल पल छिन छिन ब्यापई, है जम दूत समान ॥ २ ॥
इत की आसा छोड़िये, भजि लीजे निजु नाम ॥ ३ ॥
उबरे कोई संत जन, जिन्ह सुमिरयो है नाम ॥ ४ ॥
जन बुल्ला सरनहिं तेरी, बेरी४ काटो राम ॥ ५ ॥
भव सागर तें उबारिये, दीजे अपनो धाम ॥ ६ ॥
।। शब्द १५ ।।
जिवन हमार सुफल भो हो, सइयाँ सुतल समीप ॥ टेक ॥
एक पलक नहिं बिछुरे हो, सांई मोर जिहीत५ ।
पुलकि पुलकि रति मानल हो, जानल परतीत ॥ १ ॥
मन पवना सेजासन हो, तिरबेनी तीर ।
हम धन तहवाँ बिराजल हो, लिहले रघुबीर ॥ २ ॥
(१) भक्तों के नाम। (२) यतीम, अनाथ। (३) अलिफी, मेखली। (४) बेड़ी।
(५) जीव-हित।

मिश्रित ३१
सुरति निरति ले जाइब हो, पाइब गुर रीति ।
बहुरि न यह जग आइब हो, गाइब निर्गुन गीति ॥ ३ ॥
जन बुल्ला घर छाइब हो, बारब तहँ जोति ।
अनहद डंक बजाइब हो, हानि कबहुँ न होति ॥ ४ ॥
।। शब्द १६ ।।
ऐसे हरि सरनी जो धावे ।
राम नाम निजु भजे जु प्रानी, जमदूत निकट न आवे ॥१॥
जैसे भुवँग निकाले मनि को, जुगति से भोग भुगावे ।
ऐसीही गति काया मद्धे, बिरला जन कोइ पावे ॥२॥
चलत फिरत पुहमी में टेढ़ो, माँद पईसत सीधो१ ।
जाइ के बैठो गगन भवन में, मनहीं मन से रीझो ॥३॥
सुरति निरति लै भवन से निकसे, भवसागर नहिं सोवे ।
जन बुल्ला वहि तत्त प्रगासी, आनँद मंगल गावे ॥४॥
।। शब्द १७ ।।
हरि नाम निसानी हो जानी ॥ १ ॥
जदि जानी तदि भइ है दिवानी, लोक कहै यह भरम भुलानी ॥२॥
जन बुल्ला की यही निसानी, सुरति निरति ले जोति समानी ॥३॥
।। शब्द १८ ।।
भाई इक सांई जग न्यारा है ॥ १ ॥
सो मुझ में मैं वाही माहीं, ज्यों जल मद्धे तारा है ॥ २ ॥
वा के रूप रेख काया नहिं, बिना सीस बिस्तारा है ॥ ३ ॥
अगम अपार अमर अबिनासी, सो संतन का प्यारा है ॥ ४ ॥
अनँत कला जाके लहरि उठतु है, परम तत्त निरकारा है ॥ ५ ॥
जन बुल्ला ब्रह्मज्ञान बोलतु है, सतगुरु सब्द अधारा है ॥ ६ ॥
(१) सर्प जमीन पर तो टेढ़ा चलता है मगर बाँबी में सीधा घुसता है ।

३२ बुल्ला साहिब का शब्दसार
॥ साखी ॥
आठ पहर चौंसठ घरी, जन बुल्ला धर ध्यान ।
नहिं जानो कौनी घरी, आइ मिलैं भगवान ॥ १ ॥
आठ पहर चौंसठ घरी, भरो पियाला प्रेम ।
बुल्ला कहै बिचारि कै, इहै हमारो नेम ॥ २ ॥
जग आये जग जागिये, पगिये हरि के नाम ।
बुल्ला कहै बिचारि कै, छोड़ि देहु तन धाम ॥ ३ ॥
अच्छै१ रंग में रंगिया, दीन्ह्यो प्रान अकोल२ ।
उनमुनि मुद्रा भस्म धरि, बोलत अमृत बोल ॥ ४ ॥
बोलत डोलत हँसि खेलत, आपुहिं करत कलोल ।
अरज करौं बिन दामहीं, बुल्लहि लीजै मोल ॥ ५ ॥
बिना नीर बिनु मालिहीं, बिनु सींचे रंग होय ।
बिनु नैनन तहँ दरसनो, अस अचरज इक सोय ॥ ६ ॥
ना वह टूटे ना वह फूटे, ना कबहीं कुम्हिलाय ।
सर्ब कला गुन आगरो३, मोपै बरनि न जाय ॥ ७ ॥
(१) अक्षय । (२) अँकवार, गोद । (३) श्रेष्ठ ।

इस पृष्ठ पर छपा हुआ पाठ (संभवतः बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद की पुस्तकों की सूची/विज्ञापन) अत्यधिक धुंधला (faded) और मिटा हुआ होने के कारण अधिकांशतः अपाठ्य (illegible) है। पृष्ठ से जितने faint अंश और रूपरेखा पहचानी जा सकती है, उसका यथासंभव लिप्यंतरण नीचे प्रस्तुत है:

[अस्पष्ट शीर्षक]
१
२
३
४
[अस्पष्ट पंक्ति]
[अस्पष्ट पंक्ति]
[अस्पष्ट पंक्ति]
[अस्पष्ट पंक्ति]
[अस्पष्ट पंक्ति]
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[अस्पष्ट पंक्ति]
पता—मैनेजर, बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद।

"राधास्वामी"
संतबानी की संपूर्ण पुस्तकों का सूचीपत्र, १६७७
गुरु नानक की प्राण संगली पहला भाग ५) रैदास जी की बानी
गुरु नानक की प्राण संगली दूसरा भाग ५) दरिया साहिब बिहार का दरिया
संत महात्माओं का जीवन चरित्र संग्रह २॥) दरिया साहिब के चुने हुए पद और
कबीर साहिब का अनुराग सागर २॥) दरिया साहब मारवाड़ वाले की ब
कबीर साहिब का बीजक ४) भीखा साहिब की शब्दावली
कबीर साहिब का साखी-संग्रह ६) गुलाल साहिब की बानी
कबीर साहिब की शब्दावली, पहला भाग २॥) बाबा मलूकदास जी की बानी
कबीर साहिब की शब्दावली, दूसरा भाग २॥) गुसाईं तुलसीदास जी की बारहमा
कबीर साहिब की शब्दावली, तीसरा भाग १॥) यारी साहिब की रत्नावली
कबीर साहिब की शब्दावली, चौथा भाग १) बुल्ला साहिब का शब्दसार
कबीर साहब की ज्ञान-गुदड़ी, रेखते और झूलने १॥) केशवदास जी की अमीघूंट
कबीर साहिब की अखरावती १) धरनीदास जी की बानी
धनी धरमदास जी की शब्दावली २) मीराबाई की शब्दावली
तुलसी सा० हाथरस वाले की शब्दावली भाग १ ३) सहजोबाई का सहज-प्रकाश
तुलसी सा० दूसरा भाग पद्मसागर ग्रन्थ सहित ३) दयाबाई की बानी
तुलसी साहिब का रत्नसागर ४) संतबानी संग्रह, भाग १ साखी [ प्रत
तुलसी साहिब का घटरामायण पहला भाग ६) त्माओं के संक्षिप्त जीवन-चरित्र स
तुलसी साहिब का घटरामायण दूसरा भाग ६) संतबानी संग्रह भाग २ शब्द
दादू दयाल की बानी भाग १ "साखी" ५) महात्माओं के संक्षिप्त जीवन
दादू दयाल की बानी भाग २ "शब्द" ५) सहित जो भाग १ में नहीं हैं
सुन्दर बिलास ३) लोक परलोक हितकारी
पलटू साहिब भाग १—कुण्डलियां ३)
पलटू साहिब भाग २—रेखते, झूलने, अरिल,
कवित्त, सवैया २॥) संत महात्माओं के चि
पलटू साहिब भाग ३—भजन और साखियां २॥) तुलसीदास
जगजीवन साहिब की बानी पहला भाग ४) कबीर साहब
जगजीवन साहिब की बानी दूसरा भाग २॥) दादू दयाल
दूलनदास जी की बानी १) मीराबाई
चरनदास जी की बानी, पहला भाग २) दरिया साहब
चरनदास जी की बानी, दूसरा भाग २॥) मलूकदास
गरीबदास जी की बानी ३) तुलसी साहब हाथरस वाले
गुरु नानक
दाम में डाक महसूल व पैकिङ्ग शामिल नहीं है, वह अलग से लिया जावे
पुस्तकें मँगवाने का पता :—
मैनेजर, बेलवीडियर प्रिंटिंग वर्क्स,
१३, मोतीलाल नेहरू रोड, प्रयाग ।